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(1) राजादेशः (2) शासनपत्रम्‌ (3 ) राज्ञो भूञेपत्तखा (4) महामात्यपत्तला (5 )

राणकपत्तखा (6 ) देशोत्तारविधिः (2 ) भामप्टरकविपिः (8) समक्रद्रमामष्ट्ूकः (9) गुप्ता कराणि ( 10 ) उत्तराक्षराणि ( 11) निरूपणा (12 ) अपरानिरूपणा ( 13 ) अश्चविक्रयपत्र- विधिः (14 } महामात्यभूजपत्म्‌ ( 15 ) श्रीकरणभूजपत्रम्‌ (16 ) टिप्पणकम्‌ (17 ) मागा ्षराभि (18 } ुणाक्षराणि (19) न्यायचारबिधिः ( 20) प्रपिष्च्छा (21 ) मामसंसथा (22 ) पचारे बलरभूमिसंस्थाविधिः (23 ) आधौ कृतवस्तुन उपरि गृहीतद्रग्यविधिः ( 24 ) द्धमेक (वद्धि !) धान्याक्चराणि (25) धर्मचीरिका (26 ) डोदिकायुक्तिः (27 ) व्यासे (ष) घः ( 28 ) भ्रासखोषनम्‌ ( 29 ) बिघुद्धक्षराणि (30) उपगता ( 31) ठेक (32) व्याषे- (से) थः (33) राजविज्ञतिका (34 ) ुरुविज्ञध्िका (35) पित्मिज्ञतिका (36 > मातृविज्ञ तिका (37) वृहेतो राञजेखः (38 ) सरूपविषि; (39 ) डेः (40) सन्विषिमरहौ (41) महामात्यस्य राजविज्ञप्चिः ( 42 ) उ्यवह्‌रपत्रबिधि; (43 ) वङितपत्रविधिः (44. ) कषत्राडाण- कपत्रविधिः (45 ) गृहा़ाणकपत्रविधिः ( 46 ) गृहविक्रयपत्रबिधिः (47) गृहदलिकापत्रविधिः ( 45 ) अश्वाड़ाणकपत्रविधिः (49 ) आधिपत्रम्‌ ( 50 ) धर्मेण दत्तमूभिपत्रविधिः ( 51) दासी- पत्रविधिः ( 52 ) खयमागताद्ासीपत्रविधिः ( 53 ) विभङ्पत्रविधिः ( 54 ) गदेभपत्रतरिधिः ( 55 ) शीरपत्रविधिः (56 ) उर्थानपत्रिका ( 57 ) कृष्णाश्च रज्छटाक्षरविधिः (58 ) दाणमण्डपिका- पत्रनिषिः ( 59) दतक्षराणि (60) सन्ुसदृ्ता्षराणि ( 61) मण्डडकरणध्य उपगता

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(11) 1.45 1165 ° जामातृेखः ( 12) स्वाभिरेखः (13 ) भूत्यलेखः ( 14) मित्रडेखः ( 15 ) प्रसन्नभायौ भव्रडेखं प्रस्थापयति यथा ( 16) संरुष्टभायोभतृरेखः { 17 ) गुप्त प्रियाप्रियस्य ङेखः ( 18 ) भा्याङेखः (19 ) सरोषभायौया भतृखेखः ( 20 सानुरागः प्रश्था- पयति प्रियाङेखो यथा ( 21 ) कनिष्टभ्रावृरेखः ( 22 ) पूर्वक्तपूचयविप्तरव्यापिसामान्यप्रदि. पत्तिरेखः; (23 ) अुकपुरे मित्रं प्रति प्रस्थापयति छेखो यथा

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(1) राजादेशः ( 2) शासनम्‌ ८5) ताग्रक्षासनप्‌ (4) भूञेपत्तला (5) ्रीपत्तखा (6) देशोत्तारः (7) म्रामपटरकः (8 ) व्यवस्था (9 ) राजहुण्डिका (10) सामान्यहुण्डिका 11 ) गुप्तपट्रकः ( 12 ) उत्तराक्षराणि ( 13 ) निरूपणा (14 ) अपरा निरूपणा ( 15 ) अश्वयिक्रयपट्कः ( 16 ) गुणाक्षराणि (17 ) टिषनकम्‌ ( 18 ) मागाक्षराणि ( 19) भूजपन्नम्‌ ( 20) न्यायवाद; (21) प्रतिष्रच्छा ( 22 ) म्रामसंस्था (23) घर्मचीरिका (24 ) दिव्यम्‌ (25) डोहचिकाञक्तिः (26) व्याषेधः (27 ) व्याषेधः ( 28 ) ्ामङोपनम्‌ ( 29) व्याधः ( 30 रचिचुद्धिः (31 ) उपगता (32) ठेकः (33 ) सन्धिविग्रहः ( 34 ) टछिखितम्‌ ( 35 ) रेखः (36) राज लिज्ञप्चिका ( 328. ) ुरुविज्ञप्निका ( 37 ) पितृविज्ञप्निका ( ०८) मातृविज्ञपचिकरा (38 ) आशीवोदः (39 ) व्यवहारपतरम्‌ ( 40 ) वछितपत्रम्‌ ( 41) विक्रयचन्द्रका छ्िकिपत्रम्‌ ( 42 ) द्धफट्मोग्यपत्रम्‌ (43 ) आधिपत्रस्‌ ( 44 ) अपत्रम्‌ (45) धपत्रम्‌ ( 46 ) दासीपत्रम्‌ (47 ) विभङ्गपत्रम्‌ (48 ) गदभपत्रम्‌ 6 49 ) शीख्पत्रम्‌ ( 50 ) समयपच्रम्‌ (51 ) यमल्पत्रम्‌ ( 52} ढोकनपत्रम्‌ ( 53 ) संमक्तयाक्षराणि ( 54 ) स्वहस्ताक्षराणि

{€ 6010100 {प्र 28 11161 -- जर्मतादिरेखानां भागे लोकस्य कथ्यते चत्रिरे बुद्धिमानेन कथवां विदुभमेता छेलप॑चासिका समाप्ति शिवमस्तु संवत्‌ १५३६ वप चैत्र शुद्धि ११ बुधे यादश्षमित्यादि ग्री खरी छ॥ खरी ओरी | शवमस्तु॥छ॥

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(1) धमेचीरिका (2 ) दिव्यम्‌ ङेपद्धतिः (1) श्राषकगुरविक्ञसिका (2 ) आचायः पावकस्य प्रस्थापयति छेखं यथा (3 ) मदै्रयोभ्यविज्ञप्रिका (4 ) गुरः रिष्यस्यारीवि भरसथा- पयति यथा (5) श्रीपहाराजहेतीः विन्नध्रिका (6) स्वामी सेवकस्य हेतोः प्रस्थापयति ङेखं यथा (7) सधुध्रातृदेतोः प्रष्थापयति ङेखं यथा (8 ) माता एतस्य देतो; आश्ीवोदं प्रस्थापयति यथा (9 ) जामत श्ुरयोग्यां विञघ्निका प्रस्थापयति यथा (10 ) मार्य परियोग्यां विज्ञपिकां प्रस्थाप- यति यथा (11) रष्टमायां वरयोग्यां विज्ञप्तिकां प्रस्थापयति यथा (12 ) पतिः भायाहितोः प्रस्थापयति डेखं यथा (13 ) हुदूकमप्निका (14 ) पत्तङा ( 15 ) भरामपहकः (16 ) आछापः (12 ) घोटकवेचणकपत्रम्‌ ( 18 ) विकरणपटूकः (19 ) भूजौरिका ( 20 ) उत्थानपत्चिका (21) चीरिका ( 22 ) उपगता (23 ) कण-उपगतता ( 24) हृण्डिका (25 ) श्रीपत्निका (26) क्िया- णकपथकपट्क < 27) देशपटृकः (28 ) शासनपतरम्‌ (29 ) भाषोत्तरम्‌ ( 30 ) व्यवहारपचम्‌ ( 31) आधिपत्रस्‌ (32 ) विभङ्खपत्रम्‌ (33) वरिधिपत्रम्‌ ( 34) ध्मवीरिका (35 ) गुणपन्रम्‌ ( 0 ) व्यवदहारपत्रम्‌ ( 37 ) कषत्राङ़ाणकपन्नम्‌ ( 38 ) स्वयमागतादासीपत्रम्‌

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संवत्‌ १५३३ वं च्ये्ठ छदि भौमे ज्येह नरसंडाभ्रामि राणाश्रीजगमारविजयग्य सुदणा श्रीरामखुतहरिदासेन आलमदैतवे ठेखपचाश्चका डिखिता ख्ीयपटनार्थम्‌ |

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7274 { लेखपद्त्ति 91105 1-11.

(1) गुरुलेखः (2 ) शिष्यङेखः. (3 ) श्रावकगुरुरेखः (4 ) आचार्यः प्रस्थापयति अ्ब-

कटेखम्‌ (8 ) पितरेखः (6) पुत्रकेखः (7) मात्ृङेखः (8) श््ुरङेखः (9) शवश्रू

‡21

रेखः (10 ) मात्ररेखः (11 ) स्वामिटेखः (12 ) भृत्यटेखः (13 ) भित्ररेखः ( 14 ) प्रसन्नै- भार्यारेखः (15 ) रुष्टभार्याभ्रैरेखः (16) प्त प्रियाङेखं प्रस्थापयति प्रिये (17 ) भत्ता प्रस्थापयति भार्या प्रति ङेखं यथा (18 सरोषपतिभायौटेखः (19 ) सायुरागपत्तिः भायौ प्रति टेखं प्रस्थापयति यथा,

2211 [1 लेवपञ्चाश्चिका 01108 12-13. {118 01115 1111 1116 {€॥ ‰€1568 711116€त। 01 226 ° पाऽ €ता1्०प. शवला 011८5 (1) राजादेशः (01115 0 11168), (2 ) छषडोहलिकाविषिः (2 {0107}, (3) व्याषेव धप्ा10€ा€त्‌ ४5 11; (8 00 प्रमा 0715), (4 ) व्याधः ( 5) व्याषेधपत्रिका (6) वि्चदराक्षसणि (पपा ला6त 98 24 ); (7) उपगतम्‌ (111111616त 25 25 ), 216 ण्ला8€8 £] हरा ४६ ६16 €. शास्तन (111110616त 98 33 )

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0, ६4, 1दगातलः.

गुरोवेचनमादाय सतिमाभित्य धीमताम्‌

अनज्ञानबोधनाथोय वक्ष्येऽहं लेखपद्धतिम्‌ १॥

राजादेशः रासनं पत्तला देशोत्तारो यामपटो त्यवस्था ण्डी गसोत्तारनिरूपणान्वक्रीतं भूल टिप्यनं भोणपच्रम्‌ न्यायवाद्‌ः प्रतिणच्छा आाससंस्था चीरिका)

दिव्यं डोहलिकाशक्तिन्योषेधो याश्लोपनम्‌ विद्ुद्धयुपगता टेको व्याषेषः सन्धिविग्रहौ

सखुष्टदां छिखितं हीने ठेखो विज्ञसिकारिषोौ व्यवहारवलितविक्रयच्रद्धिरफलाध्यन्वघमदासीनाम्‌

पन्नं विभङ्गगदेगरीलसमययमलदौोकसंवित्तेः

एं व्रयोगाः ५० |

वहवो थव्याचारा राजस्रूले व्यवस्थिताः स्वाभिविन्ताुद्स्तिनज्ञेः व्यापिथन्ते विह्ारदेः श्रीकरणब्यथकरणे राज्ञो धमधिकरणमण्डपिके वेखाङ्ख्जर्पथकवरिकागरहटङ्गराखाशच ्रव्यांह्ुकमाण्डागारो वारिग्हदेववेडमगणिकानाम्‌ दस्त्यन्वकरगरालास्रेणिव्यापारतन्त्रकरणानि कोचछागारोपक्रमकमेकरस्थानदेवष्टरणानि सन्धिभदाक्चपटलं जहानसं जयनशराला सच्चागारोर्न्वःपुरसुवणेकरणं कोशिका चैव दराचिदात्करणानां नियोगिनः ज्युडमतयः स्युः १०

^ युण्यपत्र २7) पीठका ३.4 & केख्या- 6. फलाचाहि. © श्रीकरणे देवकरणे. © बल्कुलमार्गपथि. 1) पास्मिह. 8 & 7) सत्रागासोपक्रम. 1) कोक्लादि १-> ठेखप्‌०

रेखपद्धतिः।

श्रीराजादेशो यथा-

4 स्वस्ति ग्रीमहाराजाधिराजभ्रीमदयुकराजादेरात्‌ अयुक्देरो राणा- असुकाकस्य सप्रसादं समादिरहयते यथा यदसुकदेरीयरान्ञो अस्ुकाकस्योषरि निरूपितदण्डनायकेन सम ॒स्वीयघोटकपदातिश्वुङ्धियिव्रजवैजयनरालाप्ररार- वारणादिसवेसामभिकया सहितः कटके प्रचङेथाः दण्डनायकः श्रीजस्माभिः श्रीनिजस्थाने विदहितोऽस्तीत्यनुष्टह्थ एवागन्तघ्यः दण्डनाथकस्यादेराव- सिना सवेन्र विचरणीयं, निजमनोहा्या क्षणमपि वर्तितव्यं यथा दण्डना- यकस्तदीयनिदेदावत्तितास्वरूपं श्रीमदस्मास्कं सदैव विज्ञापयति वैराखद्दि १५ सोमे दृ थक स्वयमादेदाः प्रमाणं मनसाऽपि नो्ु्कनीयम्‌ शास्नपत्र यथा-

1 ^ संवत्‌ ८०२ वर्षे कार्तिकड्युदि ११ शुरावदेद्‌ श्रीमदणदिषटुपन्तने ख- मस्तदादहाराजमण्डलीसमलड्कत-परमेभ्वर-परम मघ्रारक-उमापतिवररन्धपौढ- प्रताप-संरोषितारातिनिवह-दक्षिणाधीडहावरूथिनीगजघटाकुम्मस्थलविदारणै- कपश्चानन-रणाङ्गणविनिजितगजेनिकाधिराज-अभिनवसिडराजचक्रवति-राल्य- लद्मीस्वयंवर-चलुदेराविद्यापारङ्गम-षद्विरादण्डायुधपयु शने महानिपुण-दाक्ति- लयोपचितोदय-सिडिलयोपेत-सम्पूणंषड्युणनिधान-चारप्रयोगैः संदेवाधिगतप- रराषटस्वरूप-षड्द नाधार -वाहैरपत्थौरानसीराजनीतिप्रयोगनिपुण-परच्छिद्रा- न्वेषणे महाजागशूक-आभितकल्पदुम-घरजारस्नने पितृरूप-बह्मविष्णुरुदरादिदेव- तामहदाभक्तितत्पर-महाराजाधिराजश्रीवणराजविजयराञ्ये तत्पादपद्मोपजीवि- नि तन्नियुक्तमदामात्यश्रीरीलणे श्रीश्रीकरणादिसमस्तयुद्राग्यापारान्‌ परिष- न्थयति सतीत्येवं काले प्रवतेमाने तद्विभो; प्रसादपत्तलायां सुस्यमानभीम- पषटीमण्डलकरणे महाराणाकभीमण्डटीकदेवपदिनियुक्तदण्ड०साङ्गणे पश्चरातेषु व्याप्रियमाणे सासनपन्रमभिटिख्यते यथा |

अभिती्थं खात्वा िसुवननाथं ओरीसोमनाथं पश्ोपचारविधिना सम- भ्यच्ये नमस्कृत्य संसारासारतां विचिन्त्य दष्िगोचरगतानां समस्तपदाभ- वस्तूनामनित्यतां ज्ञात्वाऽसुना प्रकारेण नलिनीदलगतजरुल्वतरलतरं हि जी- वितं श्रयुरिरःपतनभयचकित्गीकटाक्चविक्षेपभद्करं रारदाभ्रपटख्पायं योवनं, पदरदयच्छायासदरी लक्ष्मीः, विषप्राया विषयाः, दुःखप्राया भोगाः, पुत्र मिच्रकलचं स्वाथोपपत्या निविकारि अन्यथ सविकारि, इदमपि संसार-

ङेखपद्धतिः

विखसितं क्षणदष्टविनष्ं मत्वा माधासथः संसारोऽयभिति निधित्य नित्यो- ऽविनभ्वरः केवरो घमः कीर्तिशेति सम्यगवबुध्य सोमपवणि सूयेपवणि वा राणः कश्रीअसुकदेवेन परमया यक्त्या परलोकहिताय अपुकग्रामः स्वसीमापयेन्त- सब््चमालाङ्कलो नवनिधानसदहितः प्रवेरीत्या पलमानदेवदायत्रह्यदायगवां गो- चरवजं पानीयगप्वेानिःसारसंयुक्तः स्वसीमायां प्रवेस्यां अखुकमामसीमायां सीमाभयौदा एवं चतुराघाटोपलक्षितश्चतुरसीतिमठायनादिसुख्यानां विप्राणां तापसानां विदितं अधिवाससक्तचातुवेण्येसमक्चं चतुर्विधविप्रान तन्नि- वासिनो बिप्रवयान्‌ तथा तन्नियुक्ताधिकारिणो अपरान्‌ ग्रामजनपदावस्था- नाधिपतीन्‌ राजपुत्रांश्च दानेन कांथित्‌, सूव्रतवाणीभिः कांथिद्धिदोषप्रदान- मानेन कांथित्सुवणेरूप्यमणिसुक्ताभिः कांथिदखद्‌निश्च सम्पूज्य दानमा- नादिकेन सन्तोष्य असुकदेवाय विप्राय वा चासने प्रदत्तः तदेतस्मिन्‌ यामे यथोत्पवययमानकणदिरण्यशरूप्यादि पूवेरीत्या नागलागादिकं भासेयकेराज्ञावि- धेयकैभेत्वा सवं ओदेवाय विप्राय वा दातन्यम्‌ ग्रामोऽयं भमान्वयेनापरेण वा धाभिकेण भूत्वा स्वपुच्रपौच्रपरम्परया पालनीयो यथा दाता भ्रेयोभाग्‌ भवति तथा पाटयिता तथा पुरा चोक्तं भगवता श्रीव्यासेन- बहुभिवेखुधा खुक्ता राजभिः सगरादिभिः यस्य यस्य यदा भूमिस्तस्य तस्य तदा फम्‌ स्वदन्तां परदत्तां वा यो इरे वसुन्धराम्‌ विष्ठायां कृमिभूत्वा पित्रभिः सह मल्लति २॥ विन्ध्याटवीष्वतोयासु ह्युष्ककोटरवासिनः। कषणा! सपः वजायन्ते दत्तदानापदारिणः षष्टि वषेसहस्राणि स्वे तिष्ठति भूमिदः आच्छेत्ता चाचुमन्ता तान्येव नरकं वसेत्‌ यानीह दत्तानि पुरा नरेन्द्रैदीनानि धमीथयदास्कराणि। निमील्यवान्तपरतिभानि तानि को नाम साधुः पनराददीत तडागानां सदस्रेण अग्वसेधरातेन गवां कोरिप्रदानेन भूमिदहतो युध्यति

दत्वा दानं भाविनः पाथिवन्द्रान्‌ भूयो भ्यो याचते रामषन्द्रः | सामान्योऽं दानघमों नुपाणां स्वे स्वे कले पारनीयो 'मवद्धिः।

ठेखपद्ध तिः |

दि जखूदलीलाचश्चरे जीवलोके तणतुकरघुखारे सारसंसारसारे ति दराराः चानं देवतानां नरकगहनगत्तोवत्तेपातोतश्ुके यः॥ विषं विषभित्याहूबरेह्यस्वं विषुच्यते विषमेकाकिन दन्ति बरह्यस्थं पुत्रवोच्रकम्‌ अकराकरकन्तौ यो गोखहसखवधोपमः | गोसहस्रप्रदानेन पूथेदत्तमलोपयन्‌ १० लान्धात्ता खं महीपतिः कुतयुगाऽलङ्ारभूतो गतः सेतुर्यन महोदधौ विरचितः कासौ दरास्यान्तकः अन्ये चापि युधिष्ठिरप्रभृतयो यावद्धवान्‌ भूषते तैकेनापि समं गता वसुमती मन्ये त्वया यास्यति ११॥ ममर व॑ंशाश्चये क्षीणे कोऽपि राजा भविष्यति तस्याह करलस्नोऽस्मि मम दन्तं चालयेत्‌ १२॥ इति दासनपद्धतिः

1 8 संवत्‌ १२८८ वर्षे वेदाखश्युदि १५ सोमेऽयेह् आओमदणदिष्टुपन्ते समस्तराजावटीसमलङ्कुतमहाराजाधिराजपरममघ्नरकडमापतिवरलन्धपौटपर- तापसंरोषितारातिनिकरसक्षमचक्रवरतिओीपावतीपतिप्रसादसम्पादितराल्यल- क्मीस्वयवराभिनवसिडराजरिपुराज्यश्रीभीमश्रीमद्धीमदेवः ओ्रीअसुकदेषस्यार्थे बराह्मणस्य वा राक्षन प्रयच्छति यथा | अभित स्मात्वा लिखवनस्वामिनं श्री सोना प्ोपचारविधिना समभ्यच्ये नमस्छरत्य संसारासारतां विचिन्त्य

रगोचरगतानां समस्तपदाथेवस्तूनामनित्यतः संददयेत्यस्ुना प्रकारेण नलिनी- दर्गतजरुल्वतरर्तरं यौवनं पहरदवच्छायासटरी ल्मी; विकचाथा विषयाः दुभखपाया विभोगाः पुच्रभि्रकलच्रं स्वाथसस्पत्या निर्विकार अन्यथा सवि

कीतिश्चेति भत्वा सोमपवेणि परया भक्त्या धार्मिकेन भूत्वाऽप्ुकग ब्राह्यणस्य वा देवद्‌्यब्रह्मदायवजं शासनेन प्रदत्तः तदेवास्मि थो दिरण्यरौप्यकणमभोगभागवित्तादिकं ग्रासेयकैर्दैवदाये ब्रह्मदाये का दात- त्यम्‌ ग्रामोऽयं भमान्वयैनापरेण धार्मिकेण भूत्वा पालनीयः पथा दाता तथा पारुकोऽपि भ्रेयोभाम्‌ भवति यथोक्त भगवता व्यासेन-

बहु भवेखुधा खक्ता राजभिः सगरादिभिः

यस्य यस्य यदा भूमिस्तस्य तस्य तदा रलम *

ङेखपद्धतिः

स्वदत्ता परदत्तां वा यो दरे वसुन्धराम्‌ षष्टि वचसहसराणि विष्ठायां जायते क्रमिः प्रीपनच्र कासखनसिति |

ताम्रशासनं यथा--

? श्रीदपविक्रमसमयातीतसंवत्सररातेषु दादरासु अश्टाधिक्षादी केषु संवत्सरान्नः वेराखमासे शुङ्कपक्षे ततीयायां गरुवासरेऽस्यां संवतसरथास- तिधिवारपूवं शासनपच्रमिदम्‌। अघ्रांकतोऽपि संवत्‌ १२८८ वर्षे दैदाखद्ुदि गुरावयेह ओमदणदिह्छपाटके समस्तराजावरीसमलङ्कतमहाराजाधिराजपरसमे- 'वरपरमभह्षरकडमापतिवरलन्धग्रोदप्रतापश्रीवृहन्मृखराजदेवपादादुध्यातमहा- राजाधिराजपरममन्रकउमापतिवरलन्धयौटपरतापस्रीचासुण्डदेवपादालष्यात- श्रीभरिराजनन्दनराङर (शश्रीवद्छभदेवपादानुष्यातश्रीमहाराजाधिराजभ्रीदुद्ल- मदेवपादालुध्यानरतमहाराजाधिराजभीवृददद्धीमपादालध्यानरतमटाराजश्रीन- त्कणदेवपादानुष्यानरतमहाराजाधिराजरिपुराज्यल््मीस्वयंवरयवर्षरकलिष्ण॒अ- बन्तीनाधच्धि्ुवनगण्डश्रीमल्नयसिहदेवपादानुध्यातरणविनिञ्जिताकस्मरीभू- पाटश्रीङुमारषाख्देवपादानुध्यातप्रतापाच्नान्तकरदीक्रतसपादल्चलश्मीपाल- श्रीमदजयपाल्पादानुध्यातवबालनारायणावताररणाङ्णविनिक्जितगसनकाधिरा- जश्रीसरखदेवपाद्लुध्यातजभिनवसिद्धराजरिपुराल्यलष्षमीस्वयंवरश्रीमद्रीमदेव- कल्याणविजयराज्ये तत्पाद्पद्योपजीविनि प्रखमक्तिसिद्धमन्तैकाभ्यसनव्यस- निनि सुनयानुरक्जितमीयमानगुणोघे महामात्यश्चरीमाभूये ओश्रीकरणादिसमस्न- ख॒द्राच्यापारान्‌ परिपन्थयतीत्येवं काले प्रवलतैमाने पभोः प्रसादान्महानण्डला- धिपतिराणकश्रीरखावष्यदेवप्रसादेन प्रसादपत्तरायां खल्यभानखेटकाधारपथके तच्नियुक्तदण्ड °श्रीमाधवपश्ूतिपश्चकुल्पतिपत्तो ताग्रशासनं लिख्यते चथा श्रीमचोल्टक्य्वंशान्वये प्रसखूतराणकथ्रीजनलदेसुतमहामण्डलेन्वराधिपतिश्रीरा- णकलावण्यप्रसाददेवः स्वपितुरात्मनञ परमपुण्याभिच्रडये अधिती्थ स्नात्वा विशुवनस्वामिनं ओसोमनाथं पश्चाङ्पूजोपहारविधिना समभ्यच्य॑नमस्करत्थ संसारासारतां विचिन्त्य दष्टिगोचरगतानां समरतपदार्थवस्तूनामनित्यतां सदरयेत्थस्ुना प्रकारेण नखिनीदलगतजखट्वतरलतरं योवनं जीवितव्यं प्रदरद्यचायासद री रष्मीविंषप्राया विषया दुःखपाथा भोगाः प्मिन्नकल- चादिकं स्वाथेसम्पत्त्या निर्विकारभन्यथा सविकारीति युक्तया इदमपि परं

रेखपद्धतिः

संसारादिकं विसित क्षणदृष्टविनष्टं चेत्याकलय्य सवेमप्यनित्यं निश्चित्य नित्यः केवलो घमः कीति तस्मात्परलोकसुखाय देवव्राह्यणान्‌ गुरूख सुवण हप्याथरणवख्नादिधिः सम्पूज्य तल्िवासिनो ब्ाह्यणोत्तरान्‌ नियुक्त रिणो म्रामजनपदान्‌ मटस्थानाधिपतीन्‌ राजपुच्र्य दानेन काथिडनस कोधलाप्य सम्भाव्य बोधयन्‌ सर्वेषां विदितं शासनं चकार आस्मिन्‌ खेटकाधारपथके असुकग्रामः सवसीमापयेन्तः सब्रक्षमालङकुटः सकाशतरणोदको पेतः सबैस्वीयसीमोपेतो नवनिधानसदितः पूवेष्ख्या पलमानदेवन्रह्यदायवज्ञं आ्देवपत्तनवास्तव्यप्रत्ययजनकरट० अश्ुकाय श्रीसोसेश्वरदेवस्य पश्चोषचारस्ना- नपूजादिनैवेयादिनिमित्तमसकपूवेमस्माभिः रासनेन प्रदत्तः म्रामाधाया यथा इमं चतुराधारोपलक्षितं रामं प्रदत्तमित्यवगम्य तननिवासिभिल्ंनपदे- ग्रीमस्यास्य भोगकरदिरण्यादिकं सवेसपि श्रीसोमनाथदेवस्य पूजां प्रत्ययज- नकठ० असुकाकस्य सम्पेयितव्यं सम्पादनीथं सामान्यं महपुष्यफलमे तद्वगम्य मदंदाजैरन्यैरपि खो भोक्तभिरस्मत्पदत्तघमेदायोऽनुमन्तव्यः पाल- नीयश्च उक्त मगवता व्यासेन-

बह्भिवैसुधा खुक्ता राजमिः सगरादिभिः।

यस्य यस्य यदा भूमिस्तस्य तस्य तदा लम्‌

घटि वषेसहस्राणि स्वे तिष्ठति भूमिदः

आच्छेत्ता चालुमन्ता तान्येव नरकं वसेत्‌ २॥

स्वदत्तां परदत्तां वा यो हरेच्च वसुन्धराम्‌

विष्ठायां करभिभेत्वा पितृभिः सह मल्लति

इद दि जख्दलीखाचश्ले जीवलोके तरणतुषटघुशारे सारससारसारे

अपहरति दराराः शासनं देवतानां नरकगहनगत्तावत्तेपातो ध्ुबोऽयम्‌ ॥२॥

द्त्वा दानं भाविनः पार्थिवेन्द्रान्‌ भूयो भूयो याचते रासचन्द्रः

सासान्थोऽयं दानघमों चषाणां स्वे स्वे काले पाङनीयो यवद्धिः

यानीह दन्तानि पुरा नरेनद्रेदनानि धमोथेयरास्कराणि

निमाल्यवान्तप्रतिमानि तानि को नाल खाधुः पनराददीत न्ध्याटवीष्वतोयास्ु शुष्ककोटरवासिनः कृष्णा; सपौः प्रजायन्ते दत्तदानापहारिणः मम वंराक्षये क्षीणे कोऽपि राजा भविष्यति तस्यां करलग्रोऽस्मि मम दत्तं चालयेत्‌

रेखपद्धतिः |

मान्धाता महीपतिः कृतयुगाऽलङ्ारभूलो गतः

सेतुर्यन भहोद्धोौ विरचितः कासौ दशास्यान्तकः

अन्ये चापि युधिष्टिरपरभतयो यावद्भवान्‌ मूषते

नैकेनापि समं गता वसुमती अन्ये त्वया यास्यति ्ीमूलपत्तसा यथा--

1 5 ( श्रीराज्ञो भूजेपत्तलखा ) ओमदसुकराजादेशात्‌ अशकराणकस्य सपादं खलादिद्यते थथा अख्ुकदेरोऽयं ओओअस्माभिः पूषरूट्यापलसानदे वदायन्रह्यदायवल्ग मवतः धर्ादेन प्रदत्त इति संवत्‌ १२८८ वरचे वेराखद्दि १५ सोमे दयक स्वयसदेशाः

1 ^+ ( श्रीमहाभात्यपत्तखा ) स्वस्ति आओमदहामात्यवचनादसुकदेशीय- समस्तमहाविषयिकाणां सखभादिदयते यथा यत्‌ ओरीराजदेशादहशोऽयं राणा- ठुकाकस्य पूवरूद्या पलमानदेवदायन्रह्यदायवसे प्रसादेन सञ्ातेऽस्ति चत्त लामङ्गीक्रुत्य यथोत्यद्सिडदानद्‌ायदानीमोगादिकं सवं निदरुद्यव्स्या पीति पूवं राणाजष्ुकाकस्य दातस्यमिति सं. ८०२ ज्ये्ठद्चुदि १५ गरे मतं भीः

77 ^ ( ओराणकपन्तला ) संवत्‌ ८०२ वैराखह्युदि रवावदयेह समस्तयथालिख्यमानराजावलीपूवं अखुकमण्डरूकरणदेशादिमदहाराणकश्रीअ- खुकः पत्तखा प्रयच्छति यथा थत्‌ श्रीअस्माभिः राज० अखुकाकस्य असुक- मण्डलकरणे उद्ग्राद्यमाणअश्ुकग्रामोऽय देवदायव्रह्यदायवजं पसादपत्त- खायां प्रदत्तः ततोऽस्निय्‌ ग्रासे पूवखूट्या दानीवोलापिकागोचरतलारयामान्य- दानप्रश्रति यत््किख्िदुद्राद्यमाणं जवति तत्सवं राज० असुकाकेन पूचैरीत्या न्यायपूवसुद्रारयितव्यम्‌ नवतरभूमी शासने कस्यापि देवस्य विप्रस्यवा दातव्या ग्रामे रक्तपाकत्व कायेस्‌ श्ुद्रोपद्रवादिकं रक्षणीयम्‌ स्वसीमा- मध्ये पाथानां यामे कवसमानरोकानां गतं वस्तु वारयित्वा पदातव्यस्‌ ! अपरसेव या्स्यास्यायपद्‌ भोगवता ( खस्ता ) पदातिजन १०० घोटक २० एतेः घोटकमालुषैः करके राजधान्धां खरीञस्माक सेवा काय अक्षय- तृतीयायां वसमानसमकरङ्द्ेः खम मरामोऽयं ओरीञस्माकं उद्वाहणीयः ! तथा ङिखितयत्तखाविधिनिवेहणाय नवीनविनारारश्चणाय दावापितान्तरस्थाः रश्च- पालाः सवं कृतविधिटो्वं विनां निवेहन्ति इ्ार्थं स्वहस्तेन उमथोरपि प्रदत्तमन्तानि साक्षिणय् दूयके ओस्वथलादेश्ाः

इति चिविधपत्तलखाविधिः

टेखपद्धतिः |

प्र ¢ संवत्‌ १५६३३ वर्वे ज्येष्टद्ुदि भये अदेहं भीभरयुकर जावरीपूर्वं महाराजाधिसञभ्रीमतअसुकदेवपादाः पत्तलां परसादीङ वन्ति यथा राजन्ञसकाउत्तअसकाकस्य अदुकदेखो देवदायन्रह्मदायवज भसादय- चलायां पदत्तोऽस्ति अस्मिन्देले पूचेख्ट्या उद्वाल्यमाणवस्ति तत्‌ न्यायपू- धरः राणाश्रीअसुकाकेन परस्परारीत्या उद्वाद्च व्रहीतन्यं, देदामभ्ये चोरः चरटादिष्चुद्रोपद्रवादिकं रक्षणीयम्‌ रुचिरा रक्ता कायो स्वसीभायां गतं चर दातव्यम्‌ अपरं राणकथ्रीअदुकाकेन पालापद्‌ातिजन ४०० वारूघोरक १०० प्रवहणकयोटक १०० एतावद लहरणेन अवलगा करणीया नवतरभूमी चासने दातव्या एतावन्धाच्रङ्कलैवंसमानदेशा उद्वाहणीयः इति मतं श्रीः

देशोत्तारो यथा-

^ स्वस्ति मर्ह.ओ्रीअघुकवचनान्मा्भे समस्तदेशाधिपराङ्करवुखावी- यातलारदिण्डीपकप्तीसारकप्रथ्रतीनां समादिङयते यथा यत्‌ ओअणदि्ध- पुरपत्तनात्‌ नागसारिकाउपरि वाहनैः वद्स्वरूपाणि बछ्यधिकरातक्रियाण- कनि साहञक्घुकाकेन चलापितानि सन्ति बुखापिकाविदये खन्ुखं नावलो- कनीयं, षञ्ा कायौ इति संवत्‌ ८०२ वैशाष छदि शरै मत रीः \

17 5 राजादेदात्‌ अदय मर्हतकश्रीअष्ुकवचनात्‌ माभ अघ्ुकदेशा- मध्ये समस्तग्रायेषु समस्तनदीषु उययतटसंतिषमानवृद्राजिकपश्वङकुखदे साधिपटद्करग्रामतखारदहिण्डीपकवतीसारकवोलखापिकनियोयकादिव्रभतीनां आ- दियते यथा मागं असुकाकेन सममघ्ुकग्रामात्‌ अघ्ुकग्रामे राज अभुका- कसक्तसमागच्छमानउचालकभृतलाङ्गडि तथा कण सूडा 2 वरीवदे म- दिषी १० एवसेतेषां सन्खुखं स्थानदानवोलछापिकतलारामाव्यप्रभृतीनां व्यति कः काऽपि खश्चा बडा करणीया, केनापि कापि किमपि मणनीयं ट्‌ स्वयमादेदाः

111 8 बालाधिशश्रीअसुकाकवचनान्मार्भे समस्तदेराठक्छुरदेरातला- रग्रासतलारदिण्डीयक्यतीसारकबोलापिक्प्भ्नीनां समादिदयते यथा वाहन- भृतसमस्तक्रियमाणकानां ओरीमत्पत्तनान्नागसारिकाउपरि साधुञसुकपरतवरीव- दानां दानवोलापनादिविषये केनापि सन्शुखमवलोकनीयमिति संवत्‌ १२८८ वषं वैहाखद्युदि १५ सोमे मतं श्री;

ग्रामपटरको यथा- 7 ^ संव ८०२ वैशाख शुदि शुरौ अदेह अमुकपथके मह॑°श्रीअशरु-

रेखपद्धतिः

कप्रभृतिपश्चक्कटं राज गोदाकस्थ असुकयाभवद्रकं परयच्छति यथा राजगोदा- केन सां° आगामि ८०३ वर्षोपरि ग्ामपद्के देथ द्र ° ३००० सदखच्रयं द्रस्पा-

श्रा वश्चकुटस्य कयेट भावे देयद्रम्माः २१६ बोडराधिकदातद्रयं द्रस्मा विकरष- दे देयद्र० ४० चत्वारिंदात्‌ चटापकमरूमागेणमाङ्गरीयकचतुरकपतितं देराचा- रेण दातव्यम्‌ स्वसीमामध्ये मागो खोहमयो रक्चषणीयः। वष्कद्रस्माणां व्यवस्था यथा प्रथमस्कन्धे सां भाद्रपदे देयद्न ०१००० तथा द्ितीयस्कन्पे सार माभे- रीष देथद्र० १००० तथाः तृतीयस्कन्धे अक्षयक्ततीयायां देयद्र ° १००० अनया व्यवस्थया स्कलन्धन्रथेण ओभाण्डागारे ओकरणविदितं पटकद्रम्भाः व्रवेदा- नीथाः अमीषां पट्कट्रम्माणां यथाटिखितपदटकविधिना दावावनाय पष्टका- थस्य नि्रदणाय दावापितप्रतिमुः असुकग्रामराज असकाकसतः सर्ब श्रीकः रणपुरतो निवहं करोति इहार्थं वतिभरूजसुकाकमतं साक्षिणश्च

71 2 संवत्‌ १२८८ वर्ष वैशाखद्युदि १५ सोमे अदेह असुकपथके अह श्रीअश्ुकाकः रा० अक्ुकाकस्य असुकथ्रामयटक परयच्छति यथा | परमारअसु- काकेन संवत्‌ १२८९. वर्घोपरि ग्राभयहके देथद्र ° ३००० शचीणि सहस्वाणि पञ्च- कुटस्य माव्ये देयद्रम्मा २१द दे राते षोडशभिः खदित, विकरपदे देथद्र ° 2० चत्वारिरात्‌ चटापकमलमाङ्लीयकमाभेणचतुरकपतितं देशाचारेण दातञ्यम्‌

सीमासध्यमागों लोदमयो रक्षणीयः पटकद्रम्माणां व्यवस्था थथा व्रथमस्क- न्धके सां० जाद्रपदे देयद्र ° १००० तथा दितीयस्कन्धे खां० मागेरीषे देयद्र १००० तथाऽश्चयत्ततीयायां देयद्र ° १००० अनया व्यवस्थया पटह्कद्रम्पाः स्फघच्येण दातव्याः पटकद्रम्माणां दानाय पच्काथेसमस्तकरणाय दोषचिना- चतावष्टन्धिरश्चणाय दत्तप्रतिभरुअसुकवास्तव्यठ० अद्ुकमतं ओः

17 0 संवत्‌ १५३३ वर्षे च्येषटद्युदि मोम अद्येह ओनरसघुद्रे राणक- श्रीजस्ुक्देवप्रतिपतो भर्ह° असुकय्रश्रतिपश्चङ्कट पष्क प्रयच्छति यथा राज” असुकाकेन परवरूट्यापलमानदेवदायब्रह्यदाधथगवांगोचरवज्लमसुकयामस्य पट के देयद्रस्नाः ४००१ विकरपदे देयद्र० दै महं०श्री अञुकाकस्य कपैटपदे द्र० ११६ पारि० कथटयष्टे एवं देयद्रम्माः ४२४४ पश्चचत्वारिंदादधिकरातद याधिकचत्वारि सहस्राणि दातव्याः भोगे देयकवतुरुकलसी ४० सूटक चतुष्टयं भोगे दातव्यम्‌ अमीषां द्रम्माणां स्कन्धकल्यवस्था दीयोत्सवे देयद्रम्माः २००० कार्तिकान्ते देयद्र° २२४५ उययथा अनया स्कन्धकव्यवस्थया द्रम्मा- णां दानाय पटकाथस्य करणाय दोषविनारावष्न्धिरक्चषणाय, ओषधिप्रभूतीनां निस्सारणाथ, अवधेरनन्तरं थाकमानानां पञ्चकरचातप्रत्या सन्याजकद्रम्माणां दा-

१० टेखपद्धतिः।

नाय, समकरङुलानां निस्सारेण पालनाय, उदसखकुटुम्बिकानां प्रदत्तगुणाक्षरेः पालनाय, कुलकुटुम्बिकानामन्यायेनादंडनाथ, पञ्चविंडातिद्रम्माणामूष्वं अधिक- दण्डस्य राजङले प्वेदानाय, स्वसीभायां स्वसडतेन चोरादिकोपद्रवरक्षणाय, पाद्रीधकानां नवीनपञक्चिकानकरणाय, देवव्राह्मणेभ्यो नवतरभूमीनदानाय, माई आडतन्त्वा?मेदङुलखानां बनवासनाय, मातङ्ञानां यहे गवां निषेधनाय, समस्त- लिखितपच्रविधेः परिपालनाय दत्तप्रतिभूः राज०अघुकाउन्तअश्रुकाकः १००० तथा २००० राज असुकरत्तअसुक्ाकः, तथा १२५५ राज अद्ुकञद्ुकाकः एसिखिभिः प्रतिभूषिः पषटकनिगेभः करणीयः

समकरद्धम्रामपटरकविधियथा-

^ सं० असुकव्वे यथालिखितराजावलरीषूर्वं जयश्रीनिभेरयलिङ्धितिशरीर- नहामण्डलेन्वरराउरश्रीअघुकप्रतिबद्धम्द० शओ्रीअसुकाकप्रभरतिपश्ङल म्राम- पष्टः प्रयच्छति थथा यत्‌ पूवेरूढ्या पलमानदेवदायन्रह्मदायग्वांगोचरस्थि- तिसुक्तिराजगप्रसादवजं दाणवुलावीमाण्डवीवजं ससीमापयेन्तस्थ अशुकम्रामस्य असुकनज्ञातीयअसुकाकेन समकरपषकेऽथ उद्धपषटके यथाकालं व्याप्रियमाणेन देयद्रम्माः ४००४ चतुरुत्तरचत्वारि सहस्राणि पश्चकुटविदितं श्री माण्डागारे विद्युडिसदहिताः प्रवेरानीयाः

व्यवस्था यथा-

8 संवत्‌ १२८८ वर्षे वेराखड्युदि १५ सोमे अयेह श्रीकरणमहामात्य- श्रीअसुकादिपश्चङ्कलमन्रैव प्रयच्छति करूतापराधदण्डे वा० अमुकाकस्य दण्ड- दरम्माणां व्यवस्थाक्षराणि यथा वाणिन्ञसुकाकेन दण्डपदे देथरोप्य ५००० पञ्चसहस्रम्‌ अमीषां मध्यात्प्रथमस्कधके देथद्र° २००० तथा माघान्ते देयद्र १५०० तथा अक्षयत॒तीयायां देयद्र° १५०० अनथा व्यवस्थया स्कन्धच्रथेण व्रम्मान्‌ ग्ररीष्यामः इति मतं ओरी; रजहृण्डिका यथा-

1 ^ स्वस्ति महासण्डलेग्वरराणकश्रीअष्ुकाकः स्वमण्डले अधिकारि- मसुकाक समादिराति यथा आदेष्टन्यभिदम्‌ ! यत्‌ राज असुकाकस्य भवता प्रथमोद्रादितपोत्तकात्‌ देयद्र० ३००० सहखरचितयं द्रम्मा देथाः ! तथा तच्रसमा- याततदीयपदातिजन अष्टपदातीनां द्रम्माणां विद्ाडि यावत्‌ दिनं प्रति देय कणभक्तक संवत्‌ ८०२ ज्येष्ठ छदि १५५ गुरौ मतं श्रीः द्‌° स्वयमेवादेराः।

7 2 स्वति महामण्डलेन्वरराणकञअसुकाकः असुकमण्डले अधि० अ-

रेखपद्धतिः ११

सुकाक॑ं समादिराति थथा आदेष्टन्यभिद्म्‌ परमारराज०अस्ुकाकस्य भवता वथमोद्रदणकपोत्तकात्‌ द्र° ३०० रातच्रयम्पेणीयम्‌ एतदीयपदातिजन अ- छयदातीनां द्रम्माणां विद्ुद्धेधौवत्‌ दिनं प्रति देयकणभक्तक संवत्‌ १२८८ वर्षे वेहाख छदि १५ सोमे द° स्वयमादेराः

717 6 राजादेरात्‌ अथ शओरीञसुकवचनात्‌ असुकदेदो अश्काकस्य इ- ष्डिका लिख्यते यथा राज ०अशकाउन्तअद्ुकाकस्य फलितपदे हण्डिकाचारेण देथद्र ° १२४ चतर्विदात्ययिकशातसेकंः देयम्‌ अवधौ दिन १५। ऊध्वदिनपाटि- कायां दिनं प्रति देयद्र० १क०२। संवत्‌ १५३३ वरवे ज्येष्ठ छय०° भोभे। मतम्‌

ग्पटरको यथा-

1 ^ स्वस्ति ओदेवकरणमटामात्यश्रीअसुकादिपश्चङ्टं अ० पाखडसुत श्रे° बाहडस्य गु्ाश्चराणि प्रयच्छति यथा यत्‌ श्रीचिपुरुषदेवस्याग्रतो अमु- कपाटके पूवाभिसुखं समाछिन्दकं दिभूमिकं सफलदहिकं चतुराघाटनिवडं ओर वारडस्य शुकेन समपिंतम्‌ शुक्तके प्रतिवषं दीपोत्छवे आरदेवस्थ देथद्र° २१६ षोडराधिके दे दाते द्रम्मास्तथा विकरपदे देयद्र ° २२ चतुर्विरशातिद्रम्माः भरतिवषं दातव्याः गुसकलिखितद्रम्मान ददतो वा० बाहडेन पुच्रपौच्रपरस्परया गह- भिदं भोक्तव्यम्‌ चटापकं कुवेतोऽन्यस्य कस्यापि गृहमिदं पश्चङ्कलेन दात- तन्यम्‌ अययदिनान्तरं गृहं धुषितं भ्रं देववश्ाल्वकितं वा० बाहडेन थथापू- समरापणीयं निजद्रव्येण संवत्‌ ८०२ वैराषल्युदि शरौ मतं श्रीः प- माणम्‌

1 ? स्वस्ति ओदेवकरणमर्दतकश्रीअखकादिपश्चङक्कलं अ० असुकउत्त- श्रे° अश्ुकस्य गु्पटकाश्चराणि प्रयच्छति यथा ओओचिपुरुषदेवस्याग्रतो असु- कपटटके ग्रहं समालिन्दकं दिभूभिकं सषलदहिक चतुराघाटनिवडं भरे ° असुकाकः- स्थ पट्केन समपिंतम्‌ ग॒श्चपटटके पतिवषं दीपोत्सव द्र° २२ चतुर्विंद्तिद्रम्माः प्रतिवषं दातव्याः प्रतिवषं तु चतुर्विंदातिद्रम्मान्‌ दक्वा वा० असुकाकेन पुत्रपौच्रपरम्परया भोक्तव्यम्‌ अन्यस्य चटापकेनापि पश्चङ्कुलेन नापेणीयम्‌ जवयदिनानन्तरं गृहं धुषितं म्र चात्मीयद्रव्येण सभचोपनीयम्‌ संवत्‌ १२८८ वेहाखद्युदि १५ सोमे मतं ओः

उत्तराक्षरणि यथा- 5 संवत्‌ १२८८ वर्षे वैशाखद्युदि १५ सोमेऽयेद काटापह्यां अधिर

१२ रेखपद्धतिः

षुकाक्यधतिपश्वङ्कुरं च्यव अघुकाकस्योतच्रयाणि प्रथच्छति यथा ततः संप्रत्यागाभि सं० ८९ व्षोपरि असुकयासं सकरुभपि अश्चकेनोत्तारेण सम- पित्‌ उत्तराङ्क कृतद्रम्म २०००० विरातिसदहस्राणि राजमाङ्रीथके व्यव- हारपदे देथ द्र° ४००० चत्वारिंहात्‌ शतानि पश्चङुरुषदे कपेटकयाच्ये २०० द्विरदातं विकरणपदे देय ५० पंचादात्‌ व्यवहारेण मालमध्ये दिकश्तव्या- जेन द्रम्ा उद्वाद्याः। वादोटकोऽपि दिकशतन्याजग्रमाणेन ग्राद्यः उयवहार- केणोत्तारकद्रम्माः स्कंधच्येण शओरीयद्राजङकले प्रवेकनीयाः सां कार्तिकान्ते प्रथमस्कधके देयद्र ७००० सक्तसहखं माधति दितीयस्कन्धके देय ७००० सप्तसहसखं चेच्रान्ते त्तीथस्कन्धके देय ६९५० षट्षष्टिखतानि प्ारादधि- कानि अनयथा व्यवस्थया शओ्रीपद्राजङ्लेन ग्राह्यम्‌ टिखितविधिपारनाय स्कन्धके द्रम्ाणां दानाय दत्तप्रतिभुव्यव० अघ्ुकाकसुतञअसुकाकमतं शरीः 17 ^ संवत्‌ ८०२ वैशाख छदि गुराव यथासन्तिष्टमानराजावली- पूर्व लाटावह्यां अधिकारिदण्डनायकपञ्चकुरं व्यव०सोभसीहस्य उत्तराक्चराणि प्रयच्छति थथा यदागाभिवषोंपरि खं ८०३ वर्षं अदुकयरामे कोटीया च- त्वारो ग्रामा मवतः समविताः अमीषां ग्राभाणामागसिष्यमाणायपदो- परि मवता ओराजङुले देयटंकाः २०००० तथा साङ्लीयके देथरंकाः ४०० पश्चकरुरस्य कपेटभावे देयरडूम २१६ विकरपदे देय ०५० एवं समस्तपदेषु व्य सोमसीहेन देथट० २०६६६ षट्ूषष्छयधिकषट्रातोपेतविरातिटका व्य°सोम- सीहेन अङ्गीकूत्य ग्रामाणामायपदात्‌ ङुडभ्विकानां पाश्वादद्राद्य गरीतन्याः व्य० सोभसीहेन उत्तारकद्रम्भाः स्कन्धक्त्रयेण ओ्रीराजकुटे पवेदानीयाः सां० कार्तिकान्ते प्रथमस्कन्धे 2० ७६६६ सां° माघान्ते दितीयस्कन्धे ६५०० सां° चेत्रान्ते तृतीयस्कन्धे ठ० ६५०० अनया व्यवस्थया भामाणां मध्यादुत्पन्नद्रम्मा लिखितोत्तराक्चरपमाणेन राजङटे देयाः यामाणां मध्ये दण्डमाङ्लीथकादिवं सवे श्रीराजङटेन कभ्यम्‌ इदां लिखितविधेः पालनाय सकन्धकच्रयेण ट- डगनां विद्युदिकरणाय दावापितप्रतिथुवौ अधुकसुतौ असकाकौ उत्तरः परतयुत्तररदितो समग्रनिवाहकरणाय उभयोरपि मतानि स्वहस्तेन

निरूपणा यथा-

1 ^ स्वसि ्रीमहामात्यश्रीमालदेवः अखुकयथके अधिकारिणं महं हरिराजं बोधयति यथा बोडञ्यभिदम्‌ अस्माभिस्तव स्थाने अधिकारी माख्देवो निरूपितोऽस्तीत्यकवघरुध्य तदस्य भवता समस्तसुद्रासदितपदलेख्यकपो-

रखेखपद्धतिः | १३

तक्वहिकादिकं थावस्थितसुद्घणनीयम्‌ भवता उत्थायाचागन्तव्यम्‌ सं ८०२ स्येष्टछ्युदि १३ भौमे

11 8 स्वस्ति ओीञद्ुकाकः असुकपथके अधि० असुक्‌ वो बोड्यमिद्‌म्‌ ।॥ अस्माभ्मिस्तव स्थाने अधिकारी अद्काको नि तदस्य मवता समस्तसुद्रादिउद्वणकलेखकपोत्तकवदहिकादिकः चं समष्पं मवतात्रागन्तव्यम्‌ वैदाखद्युदि १९ सोये सतं ओीः अपरजप नरूपणा यथा-

1 ^ स्वस्ति } महामात्यश्रीनागडः जसुकपथके धिर अजयरीरं बोधय- ति यथा बोद्धन्यभिदम्‌ भवतां पावे तन्त्रे ाज० असुकाको निरूपितोऽस्ति ¦ मवतां तदस्य स्वाङ्भोगपदे दिनं चरति देयद्रस्माः २। अभीवां द््वथ्वादात्पदा- तीनां मासं जनं धनि देय द° ७, तथा इशयोटक खादनमोदने दिनं प्रति देथ द्र अमीषां इछयोध्कपदातीनां अवलगा सदैवावलोक््या अमीषां घोटक्पदातीनां जातक्षुणानि समग्राण्यपि दिनगतानि वहिकाथां टिखनीया- नि सं ८०२ उयेष्टञ्ुदि १३ गरौ द° कडा अघुकाकप्रतीतडोकरा राघ- देवमतं श्रीः

1 5 स्वस्ति महामात्यश्री्सुकाकः अश्चुकपथे अधि० अश्चुकाकं बोधयः ति थथा बोद्धव्यमिदम्‌ भवतां पाश्च निरूपिततंच्नराज असुकाकस्तचाया- तोऽस्ति तथा दृशयोटस्य खादनमोदने दिन प्रति देय द्र तथा टदष्टपदातीनां मासं व्रति जिनं प्रति समोजनं सदैवावखोकनीया ! अमीवा श्षुण्ण- दिकं विकायां ज्ञातन्यस्‌ संवत्‌ १२८८ व्व वैशाखचछ्युदि < सोमे दयक अस्युकाकः भतं

अश्वविक्रयपटको यथा--

^ सं° ८०२ वै्छाखद्युदि युरावयेह्‌ बल्छाशश्रीनागराजपय्वङ्कलं हेडा- उनागडस्य अन्वविक्रयपदटकं परयच्छति यथा } यत्‌ व्य० अशघुकवाभ्वां उनागडेन ऋतं श्रीषण्डघोडु सूल्ये दस्मा; ५००० पञ्चसदृसद्रम्म स्यास्य दानखस्बन्धे दहाबन्धे देय द्र ° ५०० पञ्चादातानि द्रस्भाः शिताः देकामध्ये देशान्तरे प्रचरतो देडाडनागडस्थ केनापि कायौ सं ८०२ ज्येष्ठदयदि १५ युरौ मतं ओः प्रमाणभिति

यणाक्षरणि यथा-

१४ रेखपद्धतिः

1 ^ स्वस्ति) महापण्डपिकायां बला०श्रीअसुकपश्चङ्कल वाणि० भदनस्य गुणाक्चराणि प्रयच्छति यथा नागसारिकायां श्रीपत्तनोपरि वा० मदनेन कीतपूगनालिकेरमक्िघाहरीतकीमरीचषण्डगुलवख्रभृतपोटीयाबलीवदौनां पूवे- रीत्या रूढा गद्धमाणदानस्य पादोनं दान ग्रहीष्यामः साथेवाहकस्य कपैरपदे प्रसादस॒क्तौ वरीवदहीः २० विरातिपोटीयकाः संवत्‌ ८०२ वर्ष वेदाखद्युदि गुरौ मतं आरीः प्रमाणम्‌

1 5 स्वस्ति महामण्डपिकाथां बछा०श्री अश्चुकपश्चकुलं बाणि० असु- काकस्य गुणाक्षराणि प्रयच्छति यथा श्रीपत्तनोपरि नागसारिकाया बाणि° अखकाकेन प्रूगनालिकेरमक्िश्ठाश्रीखंडप्रभृतिवरीवदीनां रूढ्या दीयभानदानस्य पादोनं दानं ग्रहीष्यामः साथवाहस्य बलीवदीनां चिरातिः। संवत्‌ १२८८ वषं वेदाख दछ्यदि १५ सोमे मतं रीः ्पिनकं यथा-

1 ^ सवस्ति बारा० अघकपश्चकुलं अरदटआपथके श्रीवधमानपथकवा- स्तव्यवर्चाहडस्य टिप्पणकं प्रषच्छति यथा थत्‌ श्रीपत्तनोपरि वाणि° चाह्‌- डेन भतसुगसूडक १०० सूल्ये द्रस्मा १०००० दासदस्राणि दम्नाणां दानं तत्रैव ग्राह्यं, प्रतिरिप्पणकं समषणीयम्‌। सं° ८०२ ज्येष्टद्युदि १५ गुरौ मतं ओः प्रमाणम्‌ |

1 2 स्वस्ति अस्ुकपथके बला० अघुकादिपचङ्कटं बाणि० असुकाकस्य रिप्पनक प्रयच्छति यथा श्रीपत्तनोपरि वाणि० असुकाकेन भतबरीवदषुद््‌- मूटक १०० दातमेकम्‌ ¦ दानं तत्रैव ग्राद्य, प्रतिरिप्पनकं समप्पेणीयभिति संवत्‌ १२८८ वर्षे वेशाखश्युदि १५ सोमे मतं ओः

अथ मागाक्षरणि यथा-

1 ^ सं ८०२ वैदाखद्युदि गुरो अदेह श्रीअसुकपश्वङ्कलं पटकलि- खित प्रयच्छति यथा यत्‌ बाणि० पासडेन अ्रतग॑त्री धाणा १०। सयुण- नीदाने द्र° चत्वारः मतं श्रीः प्रमाणम्‌

7 संवत्‌ १२८८ वर्षं वैदाख हदि १५ सोमे अद्येह श्रीअमुकपथके मह असुकादिपश्चङ्कलं षटकं प्रयच्छति यथा वाणि० असरुकाकेन भतवलीवदे १० तिरुभरतवाहन ४८ सगुणीदाने द्र ° चत्वारः रीः

717 © संवत्‌ १५३३ वषं उयेषठद्युदि भौमे सडपिकानिकडमह०

ठेखपद्धतिः १५

अथ्ुकाकप्रभतिपश्चकुरं पदकं प्रयच्छति यथा साहअन्चुकाकसक्तवाहण ठे ठाभि १० मनिछा भार १५ संकडि गांरि १० श्रीषंडार ठामि प्रवालं मण ५० मेथी २! एवं सगुणदानात्‌ प्रवेशाद्र ° १००० खहसखरमेकमेतत्‌ ज्ञातम्‌

प्रीमहामात्यस्य भूजपत्रं यथा-

1 ^ ओ्रीषहामात्यश्रीनागडस्यदेदणत्‌ पेटलाउद्रे अधि० महिषस्य छिख्य- ते यथा } यद्धवता निजव्यापारस्य चिषपदलेख्यकानां दानाय द्ादेराप्रमाणेनात्रा- गन्तन्यम्‌ ¦ अस्मिन्‌ सस्वन्पे प्रहितमदट्रपुच्रस्य देय द्र ° दिनं पति दौ द्रम्मास्त- था कणमक्तक 2 चत्वारि देयानि च्येचह्यदि १५ गुरौ मतं आरीः प्रमाणम्‌

17 5 ओमदहंतकवचनात्पेदलापदे भहई० अस्कस्य छिख्यते यथा ले- चानां दानायान्रागन्तन्यम्‌ सखस्बन्पे व्रदितमटपुच्चस्य दिनं प्रति देथ द्र° कण नक्तक वेदाखद्ुदि १५ सोसे मतं ओीः मण्डलेश्वरमूजंपत्रे यथा-

^ स्वस्ति ओअसुकमण्डरुकरणात्‌ महानण्डकेन्वरश्रीधारावषपादाना- मादेरात्‌ अघ्ुकय्रामे राजग्जगडस्यादिरयते यथा यत्‌ डभ्यराजकीयद्रम्भाणां सम्बन्धे उदृग्रादणाय प्रहितभटपु् दिनं प्रति देयद्र° चत्वारो द्रभ्माः एवं प्रतिदिन द्र° १६ षोडचा व्रम्माः। वैदाखवदि गुरो इति लिखितं प्रमाणम्‌

न्यायवादो यथा-

^ संवत्‌ ८०२ वर्च वैशाखश्चुदि गुरावद्येह श्रीपत्तने यथासन्तिष्ठमान- पूवटिखितराजावलीपूवं महामात्यविदित्तं धमौधिकरणे न्याथपन्रमभिलिख्यते यथा यत्‌ केनाऽपि पिद्युनेन परकीयां ऋद्धिमसहमानेन खोमाभिभूतेन वक कायेकारणमलीकं चित्ते विस्रदय ओराजङ्कले गत्वा जल्पिल यद्‌सुकाकस्य प- त्नी स्वैरिणी सती विषेषु रभते साङ्त्य कुरुते इत्यादिष्षुद्रवचनेराकोरिता जा- हणी धमोधिकरणे गत्वा पण्डितानामग्रे विज्ञिकां कतवती यद्यहं स्वप- ति परित्यञ्य पनसा वाचा कमंणाऽपि परपुरुषभरभिरषामि तदा मम कुल- गृहमेव प्रमाणम्‌ इति भाषोत्तरमाकण्ये चण्ड्तिनिर्णीतस्‌ दोषचक्षुःखाक्षी प्रोता नास्तीति दिव्यं प्रमाणमिति वरकटो न्यायः प्रमाणं विना दण्डसाध्यो भवति इति न्यायवादः

प्रतिप्रच्छा यथा- 8 स्वस्ति श्रीमहाङ्ुलपादानां विज्ञे यदश्ल

दौवारिकअशुकाकेन ्राघु-

१६ ङेखपद्धतिः |

पोन प्राचूणेकं दीयते खरम्‌ सववारं धरभावितवस्तृनां च्छा क्रियते संवत्‌ १२८८ वर्वे वैदादुदि १५ सोमे दूयके स्वयमादेदाः

स्ति रखाटापल्यां अधिकारिभीञद्धकपश्वङकटं पेरखाउद्रे समस्त विषथिकाणां समस्तयामेयकानां संध्थाक्चराणि व्रयच्छति चथा यत्‌ समस्तमरामे- घु समकरभूषिविदोपकं वति देय द्र ° २४, तथा पोचिरुभूभिविद्ोपकं प्रति देथ- द्र° २०, उद्रखिलभूमिविरोपकं व्रति देष० १६, तथा नव्यसमायातङटुम्विकेः उद्धखिरुभूभिविहोपक वति ०१० दचा द्रम्माः नाडीयके व्र०३ चयो द्रम्भाः मदिषीगोचरे द्र०२ दौ, बलीवदेगोचरे द्र०१ एकः, वल्होडीथाकछालीगोचरे द्र ०॥ द्रम्माधे, वहमानहलबलीवदीनां गोचरो नदि तथा चमचौरिकायां द्ण्डपदे द्र° २९५ पश्चविहातिः, मस्तकरफोटने द्र षड्‌, मागकषेणे द्र° पञ्च दस्माः, सकणकानां वारके एकः, आज्ञाभङ्‌ द° पश्च द्रम्माः अनया व्यवस्थया समग्रदेशीयग्रामा उद्ग्रादिताः सं° ८०२ ज्येष्ुदि १५ शुरो मत श्रीः प्रमाणम्‌

1 2 स्वस्ति छाटावह्यां देामध्ये समस्तथ्रामेषु समकरनन्यवासितस- मस्तङुटुम्विकरैवेणिगम्भिश्च वहमानसमकरभूमिविदोपरक प्रति दान्यां देय द्र° २४ तथा पोचिलउद्धविदोपकं प्रति ्र° २० उडखिरविद्ोपकं प्रति ०१६ तथा खिविरोपक व्रति द्र० १० तथा अणाडियक प्रति द्र महिषीगोचरे द्र° बलीवदेगोचरे ्र° वल्दोडागोचरे द° ०॥ छरीगोचरे द्र° ०॥ वह- मानवलीवहानां गोचरो नहि तथा दण्डपदे मस्तकास्फोटने द्र° बड़+मागक- षेणे चमयोरिकायां द्र ° २५ संकलाभारके द्र ° आज्ञामङ्क द्र° ५। अनया व्यवस्थया देरामुद्राहयिष्यामि तं ओरी;

ध्चीरिका यथा-

1 ^. संवत्‌ १२८८ व्च वेशाख शुदि गुरावयेह श्रीञरापट्यां राजघा- न्यां अधिष्टित-दादाराजमण्डलीसमलङ्कत-महाराजाधिराज-परमेश्वर-परम- मट्ारक-्रीडमापतिवरलब्धपोदप्रताप-सदरोषितारातिवनगहन-निजभुजवि कमेण रणाङ्गणनिजितशाकम्भरीभुपाल-श्रीमच्चौद्धक्यान्वयनरपतिमूलराज- ङुलकमलिनीविकादानैकमातेण्ड-उदितोदितवंरापङ्धिसुक्तावलिनायकमणि-रा-

खेखपद्धतिः १५.

रणागतचञ्जपस्रर-लडदरीलावतीस्तनकलदाविल सनेष्छहार-प्रतिपन्नवयाचाऽवि- चरू-अकारणरारणद्‌-वलयथिक्षितिपारुमोलिवर भीविन्यस्तपादाम्बुज-षट्‌- चिङादण्डायुधयोधविव्यानिपुण-वेरिषषिदानविसुल-सदाजयावदात-राक्तिच- योपचितसम्रद्धि-चतुरङ्बलोपेत-गाम्भीयदायेविनयनयगुणप्घ्ुखगुणयुणाल- इतगाच्न-देवद्धिजस्ुरपरिचयो्थं श्रद्धाभरवन्धुरवित्त-षट्चिराद्राजकुरीघुञ्कः- रूप-यजनाध्ययनदानरत-गज्ञोद्कनिभेल-आभितकल्पट्मपाय-घपमधोरेय- आधिव्याधिरदितकलेवर-शशाङ्निमेखय शोव्यासदिगन्त-इतचारनियोगैरल- दिन परिज्ञातपरराषटस्वरूप-खूपेण निजिताश्विनीक्कुमार-स्वराष्रोपचयथधवश्चनि- पुण-यथास्थानं यथावसरं रामादिरदण्डपयुञ्चनेऽतिङकुशाल-धीरोदात्तधीरललितयु- प्णालङ्कतविद्रह-परदारविखुसख-अष्टमहासिडिसाघक-जगद्रक्लाजागरूक-अशरो- वविद्यापारग-व्यखनैरवाहित-पजारखनतत्यर-सौ भाग्येकनिधान-विव्यारद्धस- इख्सभानिखक्षयमान-दिंजजनपरिन्रन-अभिनवरामाजैनपराकम-स्चमया घ. रित्रीरूप-सत्येन युधिष्टिरप्रतिम-स्थानश्नष्टावनीशस्थापनष्वायै-रावणवदृढाह- इर-सागरवदगाधगाम्भीये-सत्सङ्गतितत्पर-श्रीमह्युघ्नीकान्तग्रणनिपर-श्री - सीमेश्वरपादपद्ययुगरुध्यानिकनिष्ट-इटरिपुनिग्रहग-(विनिजित)मारूवाधीराय- जिबल्याट-राजराञेन्द्रश्रीमत्छुमारपारुकल्याणविजयशरास्ये एतस्मात्‌ परमस्वा- भिनः प्रसादावाद्रामात्यपदमहामात्यश्रीजगदेवे ओश्रीकरणादिसमस्तखुद्राव्या- फारान्‌ परिपन्थयति खतीत्येवं काले प्रवतेमाने इहैव खेरकाधारमण्डलान्तथतु- रन्तरचतुरासिकायां जह पेटलाउद्रे मदं° माभूवभ्रतिवश्च ङलपरतिपन्तौ तेषं प्रत्यक्षं भमोधिकरणविदितं पश्चष्ुखनगरे चातुष्षण्यलोकमहाजनसनक्ष॑ओी- मञ्ञगतः स्वासिनः पुरतः असुकाकः राजादिष्टेन शिर उयस्यापयति अश्रु कदिव्यग्राही स्वीयसत्यादिपरतिन्ञया इत्यादि चेष्टति यन्या अञ्ुकाको अपराधो कारापितः यद्यहमपराधमिमं करोमि कारापयामि तदा स्वि. धि-एकाददापखतीनां मध्यादेकया सम्बध्यमानो भवामि } यदस्मिन्‌ क्रियमाणे असुकदिव्ये उुद्धि प्राप्युयां ततो से अपराधो भूयात्‌ अथ चेत्केनापि दि- जिह्वरूपिणा पिद्युनेन राजपुरूषाणामटीकदोष उत्पादिते कृमैकदिष्येन छुद्ा- मि ततः पिद्युनो राजनिमराद्यः अदं समासदं विदितं पश्वघुलनगरथत्यक्षं चन्द्रविरादो भवामि तदिहा्थं इदावतरन्तु सत्याननसाक्षिणो दिक्पाला लो- कपालञ्च साक्षिप्रतिभूताः

पुरा चोक्त ऋवषिधभिः-

एद्येषहटि भगवन्‌ धमे ! अस्मिन्‌ दिव्ये समाविक् >--५ लछप्‌%

4८ डेखपद्धतिः |

सहितो लोकपालैश्च वस्वादित्यमरद्णः | आदित्यचन्द्रावनिरोऽनर्ख वयौभरेभिरापो इदयं यमच अहश्च 'राधिश्च उमे सन्ध्ये र्थो विजानानि नरस्य चत्तम्‌ धर्मों जयति नाधमः सत्यं जयति नादतम्‌ क्षमा जथति कोधो विष्णुजेयनि नाखुराः + धर्मों बन्धुमेनुष्याणां धमो मपडनमुल्बलम्‌ अविनाशपरो घः घमः सन्न रश्चकः धमे एव परो बन्धुरधमे एव परं धनम्‌ ¦ धमे णव सहायश्च धर्मो रक्षति रक्षति यत्सत्यं चिषु रोकेषु इन्द्रे वैश्रवणे थमे ब्रह्मवादिषु यत्खत्यं तत्सत्यमिह दरयताम्‌ सत्येन धायते पृथ्वी सत्येन तपते रिः सत्येन वायवो वान्ति सव सत्ये प्रतिति एकपादस्थिते धम सत्ये प्रलयं गते विपरीतगते छोके थतो घमेस्ततो जयः यश्चश्युः सवेजगतां साक्षी लोकीयकमेणाम्‌ आदित्याय ननस्तस्मे जगदानन्दहेतवे ब्रूहि साक्षिन्‌ ! यक्रन्तं रम्बन्ति पितरस्तच तव वाक्यावसानेन पतन्ति पतन्ति च| अक्षरा खनिभिः परोक्ता पतन्ति कदाचन अष्षै्वि्यप्रानैस्तु दिव्यं तु साक्षिणः विवादेऽन्विष्यते पश्च तद मावे तु साक्षिणः | साक्ष्यभावे तततो दिव्यं प्रवदन्ति सनीदिणः धमराखाथकुराखाः इुलीनाः सत्यवादिनः | समाः रात्रौ भिन्रे न॒पतैः स्युः सभासदः उाचलुदैखयामान्तं यस्य नो राजंदेवकम्‌ व्यसनं वा भवेन्श्रत्युः तस्य छ्ुडि षिनि्दिरोत्‌ | प्ाललारम्‌मिसंस्थाविधियथा- सं° १४०७ वषं ब्ाण्डलिकरणे राणाश्रीरिणपद्देवः पश्चालदेरीयसम- श्नग्रामेषु वासेखकटुजिच्ानां गुणपच्रं प्रयच्छति यथा ! यन्‌ समकरञ्धडीषा

टेखपद्धतिः १९.

छलं पडीयाक्खेः यदच्छया ग्रामेषु वासनीयस्‌) वहिकायां स्वीस्वीथलिखितप्रमा- णेन दानीद्रम्माः ्रीराजक्ले प्रवेदानीयाः अद्ध द्रस्मा दीपोत्सव अद्ध राजो- ह्सवे देयाः देयाचारः समग्रोऽपि देशारीत्या निवहणीयः कुडुभ्विकैः खेडिब- खारभुम्यां निष्पन्नकणानां मागद्यं ओरीराणष्ुले प्रवेरानीयम्‌ ।॥ भागैकः कुटुम्बिकः ग्राह्यः एव॑परिणा बखारखिलभूभिकषेणे निष्पन्नकणा विमजञ्य आद्याः विकायां डिखितनिवन्धभूमी कुटुस्विकेः सथयापि खेडनीया वापनीथा पान- नीया नहि पतितभूभी-जायपदं इडम्विकानां विभागमध्यात्‌ वदिष्यति व्रीदिचिणागोधुलजवलाटवीजानि व्रडानि येडिमध्याद्ारखनीथानि अपराणि समग्रवीजानि खडुम्बिकेः कतेव्यानि चारिः खमग्रापि कटडस्विकेः याद्या ! वमस्तकुडम्बिकः मेदिद्ारको राजङ्ले सेदिमध्यादेयः सच्धारलोहकारकं म- कारप्र्तिपचकारूअकानां वाचकानि खरके दातव्यानि राजकीखलकीविदि याविदहितं सच्रधारस्य हक प्रति कगकः सेद्यां दातव्यः समस्तकणकानां मा- षकं स्ूडाकं प्रति पुंजीपदे कणसेर देयः। तथा वश्वकुरुमदाण्वलरक्चकाणां तरूके सुक्तकणाना मध्यात्‌ सषडी देया तथा राजषिभागायातकणाः समनया अपि श्रीराजकीयकोष्ागारे परविष्ाः कुडुम्बकैः काः देवदायीनत्रह्यदाथीकप्रसाद्‌- साचित्तपरभ्रतीनां भूमी कुटुम्बिकः अग्रकैने खेडनीया | तथा कुटुम्बिकः कणा चोरणीयाः सत्यस्वमायेन कणा विमजञ्याः जथ कदाचित्‌ कुडुभ्बि- काओ्योरितकणेः प्राप्यन्ते ततः कणानां माणक्ैकं याचत्‌ श्षुणं नहि एकवारकं तस्य प्रे हस्तः यदा द्वितीयवारं चोरितिकणेः कडभ्बिकः प्राप्यते तस्य कुटुम्बिकस्य सीरे निष्पन्नकणा राजकुले यान्ति इदां रक्चपालेन राका श्रोतव्या तथा ङटुम्बिको ग्रामादुद्वासनीयः अन्यत्र प्रणरयगतङुटुभ्बि- कस्य क्ेखरुककणघनटौरप्रभृति सवं राजङ्कले स्वाधीनं कतेन्यस्‌ गुणप- प्रमाणेन रक्चकेण कुडटुम्विका रक्षणीयाः यदा चत्वारः कुडुम्बिका गुणपच्नं ग्रहीत्वा आगच्छन्ति तदा रक्षकेण रावा ओंतव्या अन्यथा जनेकस्य सुखेन रावा श्रोतव्या इति समस्तपश्चाख्देसीयङलानां युणपच्रविधिः

आधो इृतवस्तूनासुपरि गहीतद्रग्यपत्रविपिः

+ संवत्‌ १२८८ वेराखज्यु° १५ गुरावय्येहं ओपत्तने यथासन्तिष्ठमान- राजावरीपूवं आधोक्रतवस्तूनासुपरि ग्रदीतोद्धारद्रस्माणां पं लिख्यते यथा यत्‌ इहेववास्तव्यप्राग्यारनज्ञातीय च्थ० चाहडपान्वौत्‌ संखारीयामीथ पष्ट० मा- खाकेन आधोौकरुतमहीषी८ बलीवद्‌ १६ गो ५० किक एतद्वस्तनि आधौ द्वा

२० टेखपद्धतिः |

श्रीभीमारीयसखरटड्‌राखादतलिःपरीक्चितहद््यकदरमागजीणेविग्वमह्ुधियद्र ४०४ चतुरधिकचतुर्विरातिराततानि द्रस्मा गररीताः। व्याजेन मासं रातं