नागपुरी शिष्ट साहित्य

नागपुरी शिष्ट साहित्य

डशॉ० धदरा शुमार पोग्यामो

र्सच : दिल्‍ली

नयी

रांची विश्वविद्यालय के द्वारा पी-एच० डो० की उपाधि के लिए त्मीकृत झोघन्प्रवन्ध लागपुरो और उसका शिप्ट-साहित्य |

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आमारोक्ति

छोटानागपुर की भूमि रत्नगर्मा है, पर इस घरती के बेटे संदा-सदा से उपेक्षित रहते आए हैं। प्राज छोटानागपुर का तीन गति से श्रौद्योगीकरण किया जा रहा है, परन्तु यहाँ के लोगो क्रो इस नूतत विकास का कोई लाभ प्राप्त नहीं हो रहा है। उपेक्षा भौर शोषण का यह क्रम छोटानागपुर के लिए भ्त्यत पुराना है, जिसका एक शिकार यहाँ की आन्तर-माषा नागपुरी तथा उसका साहित्य भी है। यह एक विलक्षण सयोग है कि नागपुरी की ओर जिन विद्वानों का किंचित्‌ ध्यान श्राकृष्ट भी हुआ है, उनका छोटानागपुर से कोई विशेष सम्पर्क नहीं रहा है। फल यह हुझा कि नागपुरी भाषा तथा साहित्य के सम्बन्ध भे इन विद्वानों के द्वारा भ्रत्यन्त प्रतिकूल तथा बिराक्षापूर्ण मत व्यक्त किए गए --

(१) नागपुरी भोजपुरी का विक्ृत रूप है।* -डॉ० प्रियर्सन (२) भोजपुरी की भ्रन्य वोलियो की भाँति सदानी में लिखित साहित्य का श्रभाव है ।* --डा० उदयनारायणु तिवारी

और यह माना जाने लग गया कि नागपुरी भोजपुरी को एक विभाषा है. जिसमे लिखित साहित्य का सर्वथा श्रभांव है। यह भ्रम फैलता रहा और इसके निराकरण का प्रयास तक नही किया गया यह वात मुझे बराबर सालती रही, फलतः मैंने इसी विषय पर श्ोध-कार्य करने का निश्चय किया। भ्रनेक वर्षों के परिश्रम तथा अनेक उतार-चढानो के पदचात्‌ मैंने “नागपुरी और उसका छिष्ठ- साहित्य” नामक शोध-प्रवन्‍्ध १४ जनवरी १६७० को राँची विश्वविद्यालय मे प्रस्तुत्त कर २४ नवम्बर ?९७० को पी-एच०्डी० की उपाधि प्राप्त की यहाँ पर उल्लेख कर देना समीचीन ही होगा कि नागपुरी भाषा तथा साहित्य-विषयक यह पहला शोध-काय है

नागपुरी और उसका शिष्ट साहित्य” नामक शोघ-अवन्ध को पूरा करने मे मुझे अनेक व्यक्तियों त्णा सस्थाओं का अमूल्य सहयोग विविध रूपो मे प्राप्त हुप्ला है, जिनके नामो का उल्लेख मैं विस्तार-भय के कारण नहीं कर रहा, पर मैं उन सबके प्रति कृतज्ञ हूँ

इस शोध-कार्य को सम्पन्त करते के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, नई दिल्‍ली तथा राँची विश्वविद्यालय से मुझे जो श्राथिक सहायता भ्राप्त हुई, उससे मुझे बडा वल प्राप्त हुआ, भत मैं इन दोनो ही सस्थाओ का आमभारी हूँ

नेशनल लाइब्रेरी, कलकत्ता, जिला पुस्तकालय, राँची, राँची विश्वविद्यालय पुस्तकालय, राँची, प्रसिद्ध मानव-विज्ञानी स्व० शरत्‌चन्द्र राय के निजी पुस्तकालय , राँची तथा इतिहास विभाग के पुस्तकालय (राँची विश्वविद्यालय) से मैंने पर्याप्त

लिग्विस्टिक सर्वे ग्राफ इण्डिया (१६०३), जिल्द-५, खण्ड-२, पृष्ड-२७७ भोजपुरी भाषा और साहित्य (१६४५४) पृष्ठ-३४४

यह मात्र झषचारिकता होगी, ध्रत मैं तप रहता ही उचित मानता हैँ

तागपुरी के प्रननन्‍्य भक्त व्वर्गीय पीटर शाति नवरगी ने इस कार्य में मुझे प्रत्येक्ष महयो। मिच्ा और मिली मब्से बडी वन्नु उनदी हृपा-दृप्टि उनके प्रति मैं क्लि बब्दों में आभार प्रतद कर्त--मैं समर नहीं पाना मेरे जानते नाग्पुरी को किखित्‌ सेवा कर ही उनके प्रति हतजता-ज्षापत समव हैं झौर मुझे यह विश्वास है कि ऐसा जरके ही उनकी प्रात्मा को झाति भी पहंंचाई जा सब्तो है

थी दोगन्द्र नाथ तिवारी, श्री राधाहृप्प, थी दिनेब्बन प्रनाद तथा श्री सुधीन कुमार से विचार-विमर्ज के मुन् जो अवसर प्रा होते रहे हैं, उनसे जुले अपने काये में ठड्े नहावता मिली है, श्रन मैं इन सदी कृपालुओ जगा अनुगहीत हें

इस घोध-अ्वन्ध को प्रस्तृत्त कर पाना कदाचित्‌ नेरे लिए सझव नहीं हों पाता, यदि पग-परा पर मुझे अपने गृरू तया शोघ-निदेशक डॉ० समसेलावन पाण्डेय ही० निदु, आचार्य तथा प्रत्यक्ष, हिदी-विभ्मय सँची विश्वविद्यालय के सुचित्नि निर्देशन नया पनामर्ण की यवासमय प्राप्ति नही होती रहती अत्यत व्यस्त रहते हाए भी मुझे समय प्रदान करने मे आपने कभी नी कोई कोदाही नहीं की। इन सबके लिए “आाशार-प्रदशन' को औपचारिक्ता निभाकर भी मैं प्रपने को उच्दण वहों कर पाज्या--घह ने अच्छी तरह जानता हें, घन सौन हे--पर भ्रद्धादनत

नुप्रसिद माषाविद श्रद्धेय डॉँ० उद्यन्यचयण निदारी, डी० लिए से वइत

रहकर नी मैं मद्ा उनके ब्राशीर्वाद पाता रहा हूँ जब-जब मेरे मामने जठिनाइयाँ

आई, डॉक्टर साहद ने सहर्ष मेरी सहायता जी है, प्रत' मैं छॉक्द्र नाहव के अपने-आ्रापको सदा नतमस्तक पाता हूँ रे झोव-प्रदन्‍्ध “नागपुरी और उनका दिप्ट साहित्याँ का प्रद्यशन दो प्रन्यो के रूप में लिया दा रहा १) नागपूरी शिप्ट साह्त्वि २) सायपूरी भाषा

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प्रस्तुत पुस्तक “नायपुरी शिप्ट दाहित्य' के प्रकाशक रिनर्च प्रक्लिकेशस इन प्रोग्न साइमेज दिल्ली-६ का मैं हृदय से आरा हूं, विन्होंवे इस पुस्तक के प्रकाभन

में विशेष नुरूचि प्रदर्शित की है

अन्युत पूस्तक छे लेखन में जिन लेखकों के प्रधों को सहायता ली गई है मोर जिनकी रचनाज़ों का उपयोग उद्धरप के रुप ने किया गया है, उन सबके प्रति भी

हृदय से कृनने हा - “/झण झुनार शोल्वारी नवम्दर १६७२ ७०३४, मत रोड

रचो-१२

विषय-सूची

प्रथम भ्रध्याय * प्रवेशक (क) छोटानागपुर--एक ऐतिहासिक परिचय (ख) नागपुरी साहित्य का सासास्य परिचय (ग) अ्रध्ययन-पद्धति द्वितीय झ्रष्याय ईसाई मिशनरियो के तत्त्वावधान मे रचित नागपुरी साहित्य

तृतीय भ्रष्याय

मागपुरी के विकास से श्राकाशवाणी, राँची का योगदान चतुर्थ श्रध्याय

नागपुरी के विकास मे पत्र-पत्निकाझो की भूमिका पंचस प्रध्याय

नागपुरी शिष्ट-साहित्य मे प्रतिफलित छोटानागपुर की सस्कृति पृष्ठ भ्रध्याय : परिशिष्ट

(क) नागपुरी मे प्रकाशित पुस्तको की सूची (ख) नागपुरी साहित्य-सेवियो का सक्षिप्त परिचय

पृष्ठ

१० श्प

डर

४७

दर

११६ १२६

प्रवेशक

(क) छोटानागपुर--एक ऐतिहासिक परिचय

पहले छोटानाग्रपुर का सपूर्ण क्षेत्र घने जगलों से परिपूर्ण था, फलस्वरूप यह ऋरजखण्ड के नाम से जाता जाता था प्राचीनकाल भे इस क्षेत्र को कर्कंखण्ड कहते थे महाभारत मे इसका उल्लेख कर्ण की दिग्विजय मे श्राया है--

अगान्‌ बगान्‌ कलिंगाएत्व शुझ्डिफान्‌ मिधिलानथ | मागघान्‌ ऊर्केखण्डाश्च लिदेश्य विषयेअमन' आवशीराश्च योध्याश्च अहिक्षत्र तिजेषत्‌। पूरं ऐश विनिजेत्य बत्सभुमि तथागतमु 0१

इस क्षेत्र को भ्रकंखण्ड भी कहा जाता था, क्योकि भ्रक रेखा (सूर्य रेखा) राँची से होकर भ्रुणरती है। “झाइन-ए-प्रकवरी” तथा “जहाँगीरतामा” मे इस भू-खण्ड को “कोकरा” कहा गया है। “जहाँगीरतवामा” के अनुसार यहाँ बहुमूल्य हीरे प्राप्त होते थे, समवत इसी कारण इसका एक नाम हीरानागपुर भी है। पर, इसका सर्वाधिक प्रचलित नाम "नागपुर” रहा हैं। इस नामकरण के दो आधार हैं -- (१) यहाँ के जयलों में कीमती हाथी पाये जाते थे, फलत इसका साम नागपुर पडा. यहाँ आप्त होनेवाले हाथी इतने विरुषात हुआ करते थे कि “इयामचन्द्र नामक हाथी को प्राप्त करने के लिए शेरशाह ने यहाँ के तत्कालीन राजा पर आक्रमण के निमित्त अपनी सेना सन्‌ १५१० ई० में भेजी थी ।* यहाँ के जगलो से प्राप्त होनेवाले

महाभारत, द्वितीय छण्ड (सदत्‌ २०२३ गोरखपुर) पृष्ठ १६६५

१५१०, ए० डी० शेरशाह सेन्ड्स ऐन एक्सपेडिशन अरेस्ट दि राजा झाफ पझारदण्ड (छोटा- नागपुर) दू तिक्योर दि पोजेशन भाफ ऐन एलिफ्रेंड नेस्ड श्यामचरनद्धनशरतूघन्ध राय, दि मु ढाज ऐंण्ड देपर क्री (१६१२) प्रपेंडिक्स-४।

» नागपुरोशिष्ट साहित्य

हाथियों की ख्याति का उल्लेख "आइन-ए-ग्रकवरी” में भी मिल्तता है ।* (२) प्राचीन- काल से ही छोटानागपुर के ऊपर नागवश्ी राजाओ्रों का प्रमुत्व रहा है, अत इस क्षेत्र का नागपुर के नाम से अमिज्ञात होना स्वाभाविक ही है। सन्‌ १७६२ ई० में इसका नाम “चूटियानागपुर” रखा गया, क्योंकि महाराष्ट्र के नागपुर तथा इस तायपुर के वीच भन्तर स्पप्ट करता प्रशासनिक दृष्टि मे श्रपरिहाये हो गया था| बूटिया श्राज भी राँची जिले के अन्तर्गत एक कम्बा है, जहाँ पहले नागवशी लोगो का निवास था अग्रेज “चुटिया” शब्द का ठोक-ठीक उच्चारण नहीं कर पाते थे, फलत कालान्तर में “चूटियानागपुर” आज का “छोटानागपुर” बन गया। सम्प्रति छोटानागपुर विद्वार का एक भ्रमुत्र प्रमइल है, जिसके पाँच जिले रांची, हजारीबाग, पलामू, सिहभूम तथा धतवाद हैँ

छोटानागपुर के भादिनिवासी प्रसुर माने जाते हैं। इस जाति के लोग श्राज भी छोटानागपुर मे पाये जाते हैं, जो लोहा गलाने का काम करते हैं यहाँ बाहर से प्ानेवाली श्रादिम जातियों मे मु डा, उराँव तथा खडिया हैं। पर इनके मागमन-- कान, कम तथा मूल-स्थान के सम्बन्ध मे निश्चय-पूवंक कुछ नही कहा जा सकता इस प्रदेश.मे पुरातत्त् विभाग की शोर से खोज नही के वरावर हुईं है, फिर भी उपलब्ध

सामग्रियों के भाधार पर यह कहा जा सकता है कि यहाँ मनुष्य ग्रनादि काल से रहते झा रहे हैं।

प्राचोन छोटानागपुर

प्राचीन छोटानागपुर भारसण्ड के नाम से जाना जाता था भौर ऐसा माना जाता हैं कि इस क्षेत्र के लोगो पर उस समय बाहरी राजाओं का कोई प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं था। महाभारत-काल में राजगृह के शक्ति-सम्पत्न राजा जरामन्ध ने भी इस क्षेत्र पर विशेष ध्यान नही रखा था। मगव के महापदेगनद उम्रसेन ने उड़ीसा तक के क्षेत्रो पर प्रधिकार प्राप्त किया था, परत ऐसा समव है कि उसने फारखण्ड को भी अधिकृत किया हो मगध साम्राज्य मे इस क्षेत्र को कदाचित्‌ पहली बार अशोक के राज्य-काल (२७३-२३२ ई० पू०) भे सम्मिलित किया गया था। मौर्य साम्राज्य के पतन पर कैलिंग के राजा खारवेत ने भारवण्ड के क्षेत्र से होकर राजगह तथा पाटसिपूत्र को पराभूत किया था। समुद्रगुप्त (सन्‌ ३३४-३८० ई०) ने दक्षिण पर भ्राक्मण के समय फ्रारखण्ड को भी पार किया था | चीनी थात्री इत्सिंग के सम्बन्ध

में यह कहा जाता हैं कि फारखण्ड से होकर ही वह नालन्श तथा बोधगया पहुँचा था

आइन-ए-भरकवरी (१६६४५), पृष्ठ १३०॥

हि. एम० डो० प्रसाद, डिस्ट्रिस्ट सेसस हैंढ बुक रांची १६६१, पृष्ठ १।

/ प्रवेशक.. नागवश का प्रारस्स- -

प्रथम नागवशी राजा फरणिमुकुट राय हुए। इस सम्बन्ध में निम्नेलिखित किंवदन्ती प्रचलित है--

जनमेजय के नागयज्ञ मे पुण्डरीक मामक नाग जलना नही चाहता था, भ्रत भवुष्य का रूप धारण कर वह काशी भाग झाया। यहाँ एक ब्राह्मण का वह शिष्य बन गया और उनके घर पर रहकर अध्ययत करने लगा। पुृण्डरीक की कुशाग्न प्रतिमा से प्रभावित होकर ब्राह्मण मे भ्रपत्ती कन्या पाती का विवाह उसके साथ कर दिया। पुण्डरीक जब सोंता था तो उसकी जीम बाहर निकल भाती थी, जो दो हिस्सों भें विभकत थी | उसके मु से जहरीली साँस निकला करती थी, जिससे पार्वती बेचैन हो जाया करती वह अपने पति से इसका कारण बराबर पूछती, पर पुण्डरीक कुछ भी नहीं बताता

एक वार दोनो दक्षिण के तीर्थो की यात्रा पर निकले। पुरी से लौटते हुए वे लोग सुतियाम्वे (पिठौरिया के समीप) पहुँचे। उन दिनो पाव॑ती गर्भवती थी। उसे भ्रस॒ह्म प्रसव-पीडा होने लगी उसने सोचा कि भ्रव वह जीवित नही बच पाएगी, अत क्यो नहीं भ्रपने पति से दो जीभो का रहस्य अभी ही पूछ लिया जाय पूछने पर पुण्डरीक ने पाती को सच्ची बात बतला दी कि वह मनुष्य नहीं नाग है। यह बतलाकर वह सुतियाम्वे के दह मे समा गया | पाव॑ती ने पुत्र॒रत्त को जन्म दिया। इसके बाद लकडियाँ चुनकर उसने आग जलाई भ्रौर उस आग मे बह जल मरी तदुपरात पुण्डरीक नाग दह से निकल आया भौर वह नवजात पुत्र की रक्षा अपना_ फण फैलाकर करने लगा। हु

कुछ लकड॒ह्वारों ने इस दृश्य को देखा ओर इसकी सूचना पड़ोस के एक दूवे नामक ब्राह्मण को दी दूवे नवजात शिशु को लेकर घर चला शाया। उसने उसका पालन-पोषण किया झौर उसका नामकरण फणिमुक्रुट राय किया, क्योंकि वेह नाग के फण के नीचे पाया गया था। इस किवदन्ती का दूसरा रूप यह भी है कि दूवे ने प्रधान मानकी मदर मु डा सामक व्यक्ति को यह वच्चा सौप दिया, जिसने अपने बेटे के साथ-साथ फणिमुकुट राय का भी लालन-पालन किया जब वारह वर्ष व्यतीत हो गए, तो मदरा मु डा ने देखा कि उसके अपने पुत्र की तुलवा मे फणिमुकुट राय कही भ्रधिक योग्य एवं प्रतिमाशात्री था, अत उसने फणिमुकुठ राय को ही श्रपता उत्तराधिकारी घोषित किया ग्रन्य मानकियो तथा परहा राजाओो ने भी एकमत होकर फणिमुकुट राय को अपना राजा स्वीकार कर लिया ! ऐसा माना जाता है कि यह घठना सवत्‌ १२१ अथवा सन्‌ ६४ ई० की है ।£ यहाँ से तागवशी राज्य का प्रारम्म होता है! (पर शरतचन्द्र राय के भ्रनुसार यह घटना श्वी शताब्दी की है।) फणिमुकुट राय

£ पी० वी» चत्रवर्ती, छोटानागपुर राज, पृष्ठ १।

०' नागपुरी शिप्ड साहित्य

पुष्डरीक नाग का पुत्र था, अत इस वश का नाम नागवश हुआ। यह उल्लेखनीय है कि लगमग ऐसी ही किवदन्ती शिशुनाग के सम्बन्ध में भी प्रचलित हैं

मुस्लिम शासन-काल

तुर्क-अफगान गासन-काले के पूर्व तक (सन्‌ १५२६ ई०) छोटानायपुर वाहरी प्रभावों ने भुक्त था भर इस ल्षेत्र को बाजा करना निरापद नहीं माना जाता था। फिर भो मथुरा जाते समय दैतम्य महाप्रमु ने भारखण्ड को पार किया था--

' शथुग यत्रार छले अपि भाप्हिएड मिल्ल प्राय लोक ताहा परम पापड 0 ५० ४. नाम्5म दिया पेंल समार नित्तार।) चैतन्येर रठलीला ब॒फ्षिति शक्ति कार ५१ ४- वन देव हब अम-ए़ वबुदाबन हौल-दवि मने हय एंट गोत्रईन 7२ याहा नदी देखे, ताष्ठ माजणे फालिंदी। तारेः प्रेनॉकिनाे प्रमु पढ़ें उ्तद्र ए्‌ ०३ पर

इसी प्रकार लोगो का छिटपुट झरावागमन इस क्षेत्र में होता। पर यहाँ के शासन पर यहाँ के राजाओं का ही अधिकार था और भारखण्ड बाहरी हम्तमेपो हि से पूर्णन. मुक्त था उतू १५१० में "ध्यामचंद्र” नामक हाथी को प्राप्त करने के लिए धेरश्चाह ने अपनी सेना यहां भेजी इसे सर्वेत्रयम मुस्लिम भ्राक्षमण मात्रा जा सकता है। घेरणाह जब हुमांवू का पीछा कर रहा था, उस समय भी उसने पलामू के चेरह सरदार के विरुद्ध स्वास सौ को मारसण्ड में भेजा था।* सन्‌ १५५६ ई० में अकवरे _ जामनारूढ हुश्ना। उन दिनो फारखंड को कोकरा भी कहा जाने लग गया घा। सन्‌ _ १४८५ ईं० में प्रकवर ने शाहवाज ख़ाँ के सेनापतित्व मे यहाँ एक सेना भेजी। भाट्वाज जा ने तत्कालीन राजा मधूतिह को पराजित किया, फ़लत मुप्तिह ने_ मुगव-साज्ाज्य को कर देता स्वीकार कर लिया ।£ सन्‌ १६०५ ६० भें अकबर को मृत्यु हो यह इसके पथ्चात्‌ छोटानागपुर एक प्रकार से पुन स्वतञ्न हो गया। 0 “तुश्षक-३-जहांगीरी” में छोटानागपुर को कौकरा कहा यया हैं। जहांगीर के

नहादद्ध टीका स्पष्ट पहनती है रि शिशृताय का जन्म वेशाली में एक लिश्छवी राजा थी वेश्या को हि से हुपा घा। इस बालव वो ूरे पर फ्के दिया पैया | एब' नायराजे इसरो रा एर रहा पा। प्रात सोग एत्र हीहर समाया देखने वर भौ” रहने सगे "दिपु! है, घत इस बालर वा मार रिनुवाद पढ़ इउ छाव या पाल्त-योपय तती डे युब में किया ।--यों6 देगपहाय ब्ियेड, हद भौर दियर (१६०४८, पृछ ६६-१००। हद धर चैसाद सचनतामत्र (म:पररैदा), जू दायन (१६६४), वृष्प ४६६ < चोरा के युद्ध है परार उसने “याप उो) जा विश शी सरण झाय में पैरहू नाशा हू “हि प्ोर जवा। मी विनसत "पा हाटो थी बदनी रो दपात गी 5२० “न भो- स्वय हुमायू

मा फैश करपे हुए घोये देश दब हर्िपर अ्रीद्यग्नद, मुगर सझादु टतायू पु ४८ + पार प्रयरी (१६६५६) पृ ४३६८

हब.

रत

प्रवशंक

शासन-काल मे यहाँ बहुमूल्य हीरे पाये जाते थे। यहाँ से जहाँगीर को एक ऐसा हीरा भी प्राप्त हुआ था, जिसका मूल्य पचास हजार रुपये औँका गया था। इस क्षेत्र को अपने अ्रधिकार मे लाने के लिए विहार के सूवेदारों ने कई प्रयास किए, कितू उन्हें कुछ हीरो से ही सतुष्ट होकर यहाँ से लौट जाना पढता था, क्योंकि यहाँ के जगल घने तथा मार्ग दुर्गंग थे जब इब्राहिम खाँ विहार का सुवेदार बनाया गया, तो जहाँगीर ने उसे कोकरा पर आक्रमण कर तत्कालीन राजा दुर्जनशाल को अ्रपदस्थ करने का आदेश दिया ताकि राज्य के सभी हीरो तथा होरे की खानों पर मुगल-प्रधिकार हो नके भूतरेदार बनने के परचात् इब्राहिम खाँ ने शीघ्र ही कोकरा पर झाक्रमण कर दिया पहले की तरह इस वार भी दुर्जनशाल ने कुछ हाथी तथा हीरे इब्राहिम खाँ के पास भिजवाए, पर खाँ ने उन्हें स्वीकार नहीं किया भौर राज्य के ऊपर पूरी शक्ति के साथ झचानक हमला वोल दिया दुर्जनशाल की सेना तैयार भी नहीं हो सकी थी कि मुगलों की सेना उस पर चढ श्राई। दुर्जनशाल की खोज होने लगी श्रतत- उसे एक घाटी में अपने भाई तथा विमाताओं के साथ गिरफ्तार कर लिया गया। इब्राहिम खाँ के हाथ दुर्जनक्षाल के कोपागार के सारे हीरे तथा तेईस हाथी लगे | इस बोरता तथा उपलब्धि से प्रसन्‍न होकर जहाँगीर ने इम्नाहिम खाँ को “फतेहजग” की उपाधि प्रदान की और उसका मसव चार हजार सवार का कर दिया ।** दुर्जजशाल को बदी घनाकर दिल्ली से ग्वालियर भेज दिया गया, जहाँ उसे

बारह वर्षो तक रखा गया। एक बार किसी हीरे की ठीक-ठीक परख नहीं होने के कारण दरार मे हीरे के पारखियों के बीच विवाद उठ खढा हुआ उस हीरे की परख के लिए दुर्जनशाल को बुलाया गया उसने सदेहास्पद हीरे शोर एक सच्चे

हीरे को दो भ्लग-अलग भेडो के सीगो मे बाँधकर उन्हें लडा दिया जो हौरा नकली

था, वह टूट गया दुर्जनशाल की परख करने की इस रीति से प्रसन्‍त होकर शहशाह

ने उसे तथा उसके सभी साथियों को मुक्त कर दिया तथा दुर्जनध्वाल को "शाह” की

'पदवी भी प्रदान की दुजंनशाल पुन शासनारूढ हुआ | भ्रव उसे प्रतिवर्ष 5० ६०००)

मुगल-शासन को दैने पढ़ते थे ।११

दुर्जनशाल के परवत्री राजाओो ने कर देना वन्द कर दिया, फलत मुहम्मद

शाह के शासन-काल (१७१६-१७४८) में विहार के सूवेदार सरबलन्द खाँ से

छोटानागपुर पर चढाई की सन्‌ १७३१ ई० में सूवेदार फल्षरुहौला ने भी छोटा- नागपुर पर आक्रमण किया। इस प्रकार छोटानागपुर मुस्लिम प्रभाव में आ्राता

गया और यहाँ मुसलमान वसने लग गए कहा जाता है कि राजा दुर्जनशाल मुक्त

होकर जब छोटानागपुर लौट रहे थे, तो उंनके साथ राजपूत सैनिक तथा पुजारी

ब्राह्मण भी आए। इन लोगो ने राज्य के सगठन मे राजा की सहागता की, श्रतः

१९ तुजक-इ-जहाँगीरी (१६५२), पृष्ठ १०८-१०६ | हु ५१ शरत्‌ चन्द्र राय, दि मु डाज ऐण्ड देयर कटी (१६१२) पृष्ठ १५२॥

चायपुरी छिष्ट साहित्य इन्हें जागीरें दी गईं। ये लोग हो झागे चन्नकर जमोदार कहलाए

ब्रिटिश शासन-काल

सन्‌ १७६५ ई० में सम्राट भाह भातम द्वितीय के द्वारा बगाल, विहार तथा उडीना की दीवानी ईस्ट इडिया कम्पनी को प्रदान की गई, जिसमे छोटानागपुर बिहार के एक अग्र के रूप मे सम्मिलित था सन्‌ १७६६ ई० में पहली बार छोटा- मागपुर से श्रग्नेजों का सम्पर्क स्थापित हुआ, जब कप्तान कैमक का झायमद हजारीबाग में हुआ लगभग सन्‌ १७६१-६२ ई० में मराठा झासक माधवराव के प्रभाव के कारण रामगढ़ का महत्त्व वढ गया। सन्‌ १७६६ ई० में पल्रामू के शाजा तेजनिह को उनके शत्रुओं ने श्रपदस्ध कर दिया, भ्रत उत्तने कप्तान कैमक से भेंट की लेफिटनेंट गोडार्द के अधीन एक सेना पलामू आई, जिसने तेजर्सिह को पु सत्तारुढ कर सपूर्ण पलामू को अपने कब्जे मे ले लिया पलामू का राजा रामगट को कर दिया करता था, पर कप्तान कैमक ने यह व्यवस्था कर दी कि वह त्ीघे कम्पनी को ऋर दे आगे चलकर पलामू राजा की सहामता से कप्तान कैमक ने रामगट के राजा को भी कम्पनी के ग्रधिकार मे ले लिया ।*

नागवशी राजा दुपनाय शाही ने कप्ठाव कैमक को पलामू-विजय में सहायता प्रदान की थी ) साथ हो उसने कम्पती का अधिकार भी स्वीकार कर लिया। प्ब उने कम्पत्ती को प्रतिवर्ष दारह हजार रुपए कर के रूप में देने पडते थे पर कर नहीं चुकाने के कारण सन्‌ १७७३ ई० में छोठानागपुर पर पुत चढ़ाई हुई। राजा ने वारह हजार त्पये के स्थान पर भव पद्रह हजार एक स्पए कर देना नन्‍्वीकार कर लिया | आतरिक प्रणामन प्र राजा का अधिकार पूर्वब्त्‌ बना रहा राजा ने यह क्वूलियत भी लि दी कि छोटानागपुर में यात्रा करते वाले यात्रियों की रक्षा तबा त्ोर-डाबुओ के आतंक को दवाने का भार राज्य पर होगा | पर, इन कार्मो में राजा को सफलता नही मिली ) वह कर देने भे भी पिछड गया राजा से यहाँ के निवासी श्रसंतुप्द ये है, जिसकी शिकायत चंत तक पहुँच चुकी थी ! इस प्रतततोष के कारण सन्‌ १७८६ ई० में आदिवासियों का विद्रोह हुआ, जो बड़ी कठिनाई से दबाया जा सका

सन्‌ १७८० ई० में कप्तान कैमक के स्थान पर चैपमल का आगमन हुआ, जो छोटानागपुर का प्रयम भ्रम॑निक प्रधामक था चैपमन, जज, मजिस्ट्रेद तथा जिले का कलक्टर भी था | उसकी अदालत वार्स-वारी से जेरघाटी तथा चतरा में लगती थी | इस समय रामगट बटालियन की स्थापना की गई, जिसका केन्द्र हजारीबाग था। चैपमेन के ग्रधिकार-स्ष के ग्रन्तगंत समयट, केन्दी. कू डा, सडगडीहा, सम्पूर्ण पलामू, १२. उुन० ढो० प्रसाद, डिम्ट्रिक्ट सेंसस हैंढ बुक, रांचो १६६१ पृष्ठ ३।॥ यूद वही, पृष्ठ २।

प्रवेशक्ष

चकाई, पाचेत तथा शेरघाटी के आस-पास के इलाके थे ।४

छोटानागपुर के महाराजा तथा उत्तके भाइयों मे कगडा शुरू हो गया। इस भगंगड़े के पीछे महाराजा के दीवान दीनदयालनाथ सिंह का हाथ था आदिवासी तो पहले से असतुप्ट थे ही, श्रत वे भी इस भंगडे का लाभ उठाने को उद्यत हो गए पर यह समाचार श्रग्नेजो को मिल गया, अत' सन्‌ १८०७-१८०८ ई० में मेजर रफ्तेज के अधीन एक सेना भेजी गई दीवान पहले तो भाग निकलने मे सफल हो गया, पर बाद में वह गिरफ्तार कर लिया गया | महाराजा ने बकाया कर चुका दिया और अपने भाइयों से समभौता भी कर लिया सन्‌ १८०६ ई० में यहाँ छः पुलिस थाने बनाए गए यही से श्रातरिक प्रशासन पर शग्रेजो का हस्तक्ष प्रारम हो गया ।**

आदिवासियो के वीच व्याप्त श्रसतोष की भ्राग भीतर-ही-मीतर सुलगती रही, जिसका विस्फोट सन्‌ १८३१-३२ के कोल आदोलन (लरका आदोलन) में हुभा। इसका प्रधान कारण मुस्लिम तथा सिख ठेकेदारों का मु ढाश्रो के प्रति श्रपमानजत्तक व्यवहार था। तमाड के समीप एक गाँव मे मु डा लोग जमा हुए | ४न लोगों ने मिलकर मुसलमान तथा सिख ठेकेदारों को लूटा तथा उनकी सम्पत्ति को काफी नुकसान पहुंचाय। यह भ्रादोलन रॉची जिले के अनेक हिस्सों मे फैल गया। आदोलन- कारियों ने गैर-प्रादिवासियों (सदान) के साथ श्रमानूपिक तथा वर्वर व्यवहार किया मार-काट काफी दिनो तक चलती रही यह श्रादोलन सन्‌ १८३१ ई० में प्रारस हुआ था, पर इसे सन्‌ १८३२ में काफी खून-खराबी के पश्चात्‌ कप्ताम विलकिन्सन के द्वारा दवाया जा सका चर

इस कोल झादोलन से शिक्षा ग्रहण कर अग्रेजो ने भ्रशासन की सुविधा को ध्यान मे रखकर “साउथ वेस्ट फ्र टीयर एजेन्सी” की स्थापना को, जिम्तका मुख्यालय लोहरदगा वनाया गया इस एजेन्सी के श्रधीन आज का लगभग संपूर्ण छोटानागपुर प्रमडल था इसकी देख-रेख एक एजेन्ट के द्वारा की जाती थी, जो एजेन्ट टू दि गवनेर जनरल कहलाता था आगे चलकर इस पद का नाम सन्‌ १८५४ ई० कमिइनर कर दिया गया। पहले एजेन्ट के अ्रधीन प्रिसिपल एसिस्टेंट टू दि एजेन्ट हुआ करता था सन्‌ १६६१ ई० में इस पद के स्थान पर डेपुटी कमिइ्नर पदनाम का प्रयोग प्रारम्भ हो गया ।*६

भव छोटानाग्रपुर पूर्णत अग्रेजो के भ्रधिकार मे था। सन्‌ १८४५ ई० में चार ईसाई मिशनरियों का जर्मन से यहाँ श्राममन हुथ्रा। श्रमी यहाँ चार ईसाई

मिशन सक्रिय हैं जिनके द्वारा यहाँ लाखों श्रादिवासियों को ईसाई घर्मं मे दीक्षित किया जा चुका है

१४ एस» डी० प्रसाद, डिस्ट्रिकट सेंसस हैंड बुक रांची, १६६१, पृष्ठ १४५ वही, पृष्ठ ३। १६ एस० डी० प्रसाद, हिस्ट्रिक्ट सेंसस हैंड बुक राँच्री, १६६१, पृष्ठ ३।॥

0 नाग्रपुरी भिष्ट साहित्य १६५७ का ब्रिड्ोह

रजारीबाग मे बैन्ट्रि] देशी सियाटियों री खाती तथा झादगी रग्यती ने जुगाई, १८४५७ को विटो। मर दिया। “प यह समावार बनर दोल्इन (रंत्री के पमिम्मर) को प्राप्त रथ, सो उगते राची से वपिटसेद शाहम को राम्गए सेता की दो पैदल पम्थतियों, सी घटसयारी सदा हो सोपी मे साथ पिद्ोश शाव जामेये लिए हजारीयाग भेजा ? उगस्त छो यह सेना यहां से घी “से बीच हतारीवान की पिद्रोही सेना ने राती पी दोर गस पर दिया जय बट समराझार प्रान्‍म है मैमियों को मिला, तो उन लोगो में भी शिद्िश प्रधिरारियों वें! विरत्र विद्रोह का दिया प्रौर वे री गी नरफ सोदने थग गण लेफिडनें याटम उुछ दफ़ाशर मंटिको के साथ अगस्त रो हृगगाीयग बी मृश्णित से पहुंच मेरा

नषिदमेट प्राईम की दिद्रोंद्री सेना रची टटेच गे इनसे पदों ने शोर्ण्टा में फेड्ित सेना णो उमड़ा, फलत बची मेग्रमेदी शासन के विस्द्ध भयवर विद्रोह भए्य उठा विद्रोतियों ने टिप्टी कमिब्नर मी कचहरी तप्ा सत्य पार्वोवियों वी जला टासा और सस्वारी पजागे मो लूट लिया जेत से कैदी मुक्त रूर दिए गए हाँ गी भेता पे अगजों गा विदवाग नहीं रट गया, फल कलेल टाल्डन तथा प्रन्य प्रग्रेज प्रधिकारी हजारीबाग भाग गए विद्रोहियों को पह आशा थी कि हजारीबाग की सेना उनके साथ हो जाएगी, पर हब हथारीबाग की सेना राँची नहीं पश्राई, तो उन लोगो ने शाहावार के पिद्रोही मेला बाबू गूबन्मिह ये प्रान पहुँचने करा निश्वण ढिया पर यह सेना बाबू कुचर्रसेह के पास नहीं पहुँच सकी, क्योकि चतरा में झवतूवर, १८५७ को उतकी मुठनेड मेजर इग्लिदा थी मेना से हुई प्रौर उन्हे पराजित होता पडा ।**

इस विद्रोह में वड़बागढ के ठायुर विश्वनाव शाही तथा भरने। के जमीदार पाप्डेय गणपत्त राय ने महत्त्वपूर्ण भाग लिया था विद्रोह धाव होने पर इन दोनो स्वातत्य-सेनानियों को फाँसी पी सजा दी गई

१८५७ के पश्चात्‌ की प्रमुख घटनाएं

जमीदारो के द्वारा वेगारी प्रवा के प्रारम्भ तथा मालगुजारी में प्रबैधानिक वृद्ध के कारण यहाँ के निवासियों के वीच प्सतोप व्याप्त होने लगा, जिसकी परिणति “सरदार लडाई” में हुईं। सन्‌ १८८७ ई० तक इस “लडाई” ने उप्र हप घारण कर लिया, जित्तमे उरांव, मु डा तथा किसान सभी भाग ले रहे थे | इन लोगो ने जमीदारों

को मालगुजारी देना वन्‍्द कर दिया समभौते के लिए लेफ्टिनेंट गवर्नर सर स्टूअर्ट

पृ७. एस० डी* प्रमाद, टिस्ट्रिगठ सेसस हैंड दुश रची, १६६१, पृष्ठ ३।

- प्रवेशक्क

वैली का सन्‌ १८६० ई० में यहाँ आगमन हुआ, पर इस समस्या का कोई समाधान नही निकल सका सन्‌ १८६५ ई० में यह आन्दोलन अपनी चरम-सीमा पर था। इसी समय विरसा मू डा नामक आ्रादिवासी नैना का प्रादुर्भाव हुआ विरसा ने जो भ्रान्दोलन चलाया वह भ्रमि तथा धर्म दोनों से सम्बन्धित था। बिरसा ईसाई पादरियों के भी विरोधी थे उन्होने यहां के लोगो को यह गदेश दिया--"यहाँ की भूमि के स्वामी हम हैं। इसके लिए किसी को भी मालग्रुजारी दी जाय हमे जागना चाहिए श्ौर गैर-आदिवासियो को यहाँ की भूमि से निकाल बाहर करना चाहिए ताकि हम भ्रपना शासन स्वय सेमाल सके ससार में ईब्वर सिर्फ एक है श्रत अन्य भगवानों तथा प्रेत आदि की पूजा बन्द की जाय हमे स्वच्छ तथा सच्चा जीवन व्यतीत करना चाहिए हत्या, चोरी, भूठ आदि महापाप है ।” विरसा का यह दावा भी था कि (विजली की कड़क के समय) उन्हें ईश्वर से मत्येरणा प्राप्त हुई है भौर वह ईश्वर दूत है भ्रागे चलकर उन्होने भ्रपतती दैविक शबित का परिचय भी लोगों को दिया, फलत वह भगवान कहे जाने लग गए बिरमा के वहते हुए प्रभाव के कारण भ्रग्नेज चिन्तित हुए, क्योकि विरसा के भ्रनुयायिओों ' ने मजस्त्र क्राति प्रारम्भ कर दी थी। अ्रगस्त, १८६४ ई० को बिरसा अपने प्रनेक * मायियों के साथ वन्दी बनाए गए सन्‌ १६०० ई० में उनकी मृत्यु जेल मे हैजे से हो गई, ऐसा कहा जाता हैं ।** विसुनपुर थाना के जतरा उराँव ने सन्‌ १६१४ ई० में “टाना भगत श्रान्दोलन” शुरू किया। ईस।ई धर्म स्वीकार कर लेनेवाले आदिवासियों की श्राथिक भ्रवस्था प्रन्य आदिवासियों की श्रपेक्षा तेजी से सुधरने लगी, फलत आन्दोलनकारियों ने भ्रग्रेजी घासन के साथ असहयोग प्रारम्भ कर दिया। इन्होने भ्रपने को महात्मा गाघी का प्रनुयायी बताया ) साथ ही इन्होने सादगी तथा पविश्नता का सदेश लोगों को दिया ठाना भगत मादक द्रव्य, माँस, नृत्य, सगीत तथा श्षिकार से दुर रहने है। ये सिर्फ ठाना भगत के द्वारा बनाया गया भोजन ही खाते है तया विवाह भ्रपनी जाति के बाहर नहीं करते ।** कागेस के द्वारा चलाए गए असहयोग प्रान्दोलन मे भाग लेने के कारण टाना « भगर्तों को काफी कप्ट उठाने पड़े, फलस्वरूप स्वतन्त्रता के पदचात्‌ इनकी स्थिति सुधारने के लिए ब्नेंक उपाय किए जा रहे है श्राज का सपूर्ण छोटानागपुर विशेषत रांची एक श्रौद्योगिक क्षेत्र के रूप मे परिवर्तित हो गया है, जहाँ छोटी-बडी घटनाएँ तथा गतिविधियाँ होती - ही रहती

45 एम» डी० प्रसाद, डिस्ट्रिक्ट सेंसस हैंड बुक रांची, १६६१, पृष्ठ १६ वही, पृष्ठ ४।

१० नागपुरी शिष्ट साहित्य

जिनका प्रभाव यहाँ के निदासियो पर तेज़ी से पड़ रहा है। ऐसी स्थिति मे यहां छोटे-मोटे भ्रानदोलनो का होना स्वाभाविक ही है। कभी-की “करारसण्ड प्तग राज्य” की माँग भी जोर पकंड लेतो है। सन्‌ १६६७-६८ में छोटानाग्रपुर से गैर- आदिवासियों को निकाल बाहर करने के आन्दोलन ने रांची जिले को विशेष रूप से प्रभावित किया | इसी समय से विरसा जो ईसाई धर्म तथा पादरियों के विरोधी पे, ईसाइयो के भी प्रेरणा-छ्लोत वत गए हैं। यहाँ के आदिवासी भी अब दो गुटों मे विमक्त हो गए हैं--( १) हिन्दू झ्रादिवासी तथा (२) ईसाई आदिवासी। इन दो विशिष्ट घटनाग्रो ने छोटानागपुर की राजनीति को एक नूतन दिद्ा प्रदान की है।

(ख) नागप्री साहित्य का सामान्‍य परिचय

नागपुरी भाषा की भाँति नागपुरी साहित्य का अध्ययत भी झव तक एक उपेक्षित विषय रहा है, फलत- नाग्रपुरी साहित्य का कोई इतिहास उपलब्ध नहीं। सत्य तो यह हैं कि आज तक छोटानागपुर का हो कोई इतिहास तैयार नहीं किया जा सका, तो यहाँ की एक भाषा के साहित्य के इंतिहास-लेखन कौ झोर किसी का ध्यान क्यों आकर्षित होता ? छोटानागपुर सदा से उपेक्षित रहता आवा है, जबकि यहाँ की भूमि रत्नगर्मा मानी जाती है। छोटानाग्पुर की सस्कृति से परिचय प्राप्त करने के लिए लव यह जावध्यक हो गया है कि यहाँ की विभिन्‍न भाषाझों तथा उनके साहित्य के अध्ययन, प्राचीन स्थलों तथा भ्रववेषो के पुरातात्विक भनुप्तघान तथा यहाँ के इतिहास के वास्तविक स्वरुप को दूढ निकालने के निमित्त विद्वानों तथा झनुसघानो की दृष्टि इस ओर झ्राकपित की जाय। इससे चहुत-पी लुप्त परम्पराम्ो तथा झाइचर्य- जनक ऐतिहासिक तथ्यों का उद्घाटन हो सकेगा जिस दिव ऐसा होगा, उस दिये निईचय हो लोगों की यह धारणा निमूंल प्रमाणित होकर रहेगी कि छोटानागपुर का भ्पना ऐसा कोई वैभिप्ट्य नही, जिस पर वह गवे कर सके

“छोटानागपुर की पहाडियो में सीताबेंगा की गुफा में द्वितीय या तृतीय शताब्दी ई० पू० की एक नाट्यशाला मिली है, जो “नाट्य-श्ास्त्र” के वर्णन से मेत ज्ञानी है ।/** इससे यह विद्वास दृढ़ होता है कि छोटानागपुर मे साहित्य की परम्परा अत्यन्त प्राचीन हे, पर यह परम्परा किन्‍्ही कारणों से लुप्तप्राथ हो गई है। इसी साहित्यिक-छल्लला की एक कडी नांगपुरी माहित्य भी है, जिसके सम्बन्ध में कविपय विद्वानों का यह मन्‍्तव्य रहा है कि इसमे कुछ भी नहीं! परन्तु, नागपुरी साहिल्‍य के प्रेमी तया बच्येता यह भली-माँदि जानते हैं कि नागपुरी का साहित्य विपरा हुआ भले ही क्यों हो, किन्तु मारा तथा गुण की दृष्टि मे उसे हीन नहीं माना जा सवता। वास्तविकता तो यह है कि मैविली को छोडकर विहारी परिवार की किमी भी भाषा

३० डॉ शान्विरुमार नानूरार व्याम, उम्दत पौर उसका साहित्य (१६४७), पृष्ठ ६७

प्रवेशक ११

का साहित्य गीतो की दृष्टि से नागपुरी साहित्य के समकक्ष नहीं। नागपुरी साहित्य की दो निश्चित घाराएँ हैँ --(१) लोक-साहित्य तया

(२) गिप्ठ-साहित्य

नागपुरी मे असल्य लोकगीत तथा लोक कथाएँ प्रचलित है यदि इन लोक- गीतो तथा लोक कथाझ्ो का सकलन भ्रौर विश्लेषण किया जाय, तो यह प्रकट हो जाएगा कि नागपुरी लोक-साहित्य का भाण्डार कितना सम्पन्न है। पर, दुर्भाग्यवश भरत त्तक ऐसा नही हो सका है लोक-माहित्य के सकलत की दिक्षा में भ्रव तक दो लघु प्रयास किए गए हैं :--

(१) काथलिक मिशन, रांची के रेवरेण्ड फादर बुकाउट ने “सदानी फोक- लोर स्टोरीज” नामक एक सकलन साइक्लोस्टाइल कर प्रकाशित किया था, जिममे ग्यारह लोक-कथाएँ है

(२) रेबरेण्ड एफ० हान, डब्लू० जी० श्रार्चर, आई० सी० एस० तथा घरमदास लकडा ने “लील खो-र भ्रा खे-जेल” नामक ग्रथ का प्रकाशन दो खण्डो भे पुस्तक भण्डार, लहेरियासराय से करवाया था, जिनमे उराँवो के बीच प्रचलित २६६० (दो हजार सौ साठ) गीतो का सकलन किया गया है। इन गीतो मे श्रधिकाश गीत नागपुरी भाषा-के है। इस ग्रथ के प्रथम खण्ड का प्रकाशन सन्‌ १६४० ई० तथा द्वितीय खण्ड का प्रकाशन सन्‌ १६४१ ई० में हुआ

इन प्रयासो के पश्चात्‌ लोक साहित्य के सकलन की दिशा मे कोई उल्लेसनीय प्रगति नही हुईं है, भ्रत. यह स्पप्द है कि अनुसधान की दृष्टि से मागपुरी लोक- साहित्य भ्रभी भी एक श्रदूता क्षेत्र है।

लोकन-साहित्य के श्रतिरिक्त नागपुरी में श्िष्द साहित्य भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है | यह ग्रथ इसी विषय से सम्बन्धित है। यहाँ यह जिज्ञासा स्वभाविक है कि लोक-साहित्य और शिष्ट साहित्य के बोच क्या भेद है ? इस विषय पर निम्न- लिखित विचार ध्यान देसे थोग्य है --

"साधारणत- मौखिक परम्परा से प्राप्त और दीघंकाल तक स्मृति के बल पर. चले आते हुए गीत और कथानक” लोक-साहित्य कहे जाते हैं। स्थूल दृष्टि से लोक- साहित्य भ्रलिखित परम्परा प्राप्त साहित्य है, परिनिष्ठित साहित्य लिपिबद्ध। इसी कारण एक विद्वान्‌ ने लोक-साहित्य को अपौरुषेय भी कहा है | क्योकि उसके रचयिता का पता नही, इसके अलावा वह किसी एक रचयिता की वैयक्तिक प्रभिरुचि से सीमित होकर समाज की भावनाओं का लेखा-जोला सामने रखता है ।”**

“लोक-साहित्य तथा परिनिष्ठित साहित्य का भेद मूलत वही है, जो एक बहती हुई सरिता तथा एक चारदीवारी से बंधे होज का परिनिष्ठित साहित्य नियमो

२१ बैजनाय प्िह “विनोद”, भोजपुरी चोक-दाहित्य 2, एक अध्ययन (१६५८), पृष्ठ २१६

१६ नायपुरी भिप्ट साहित्य

के ब्रात्न-बाल से आवद्ध रहता है, उसकी प्रभिव्यजना प्ैली एक निश्चित ढाँचे पर चलती है, उसमे कृत्रिम तप से खराद-तराश करके ह्ठाव शैलीयत रमणीयता लाने की कोशिण की जाती है, जो नैसगिक रमणीयता नहीं। फ़िर भी नहरी वातावरण में इन्टी की कदर होती हैं वस्तुत परिनिष्ठिन साहित्य को क्षन्म देने का श्रेय नाग- रिक लोगो को ही है ! वेदों के समय लोक-साहित्य तथा परिनिप्ठित त्ाहित्य जैत्ा भेद दिल्ललाई मटी पड़ता समूचा वैदिक माहित्य---अमुसत सहिदा भाग--मूलत् लोक-साहित्य हो है। महाभारत भें लोक-माहित्य के प्रचर वीज भरे पड़े है। कदावित्‌ भारतीय साहित्य में नोक-साहित्व तथा परिनिप्ठित साहित्य की प्रेदक रेखा वाल्मीकि रामायण हैं। इसऊे बाद टो लोक-साहित्य सथा परितिष्ठिन माहित्य के बीच की द््री उत्तरोनर बढती गई रिन्‍्तु इस दूरी के बावजूद भी परिनिष्ठतत माहित्य को लोक- साहित्य से प्रेरणा और नया वन मिलता रहा है '** ऊपर विष्ट माहित्व को ही परिनिष्ठित साहित्य वहा गया हैं। इन उद्धरणों से त्यप्ट है कि शिप्ट साहित्य मूलत लिपिबद्ध होता है और वहू लोक-साहिस्य की तरह मौखिक परम्परा तथा स्मृति का सहारा नहीं लेता इस प्रकार भिप्ठ साहित्य के भ्रन्नगंत हस्तलिखित, मुद्रित तथा रेडियो द्वारा प्रसारित रचनाएँ मरा आबादी हैं। वस्तुत लोक-माहित्य तथा धिप्ट साहित्य के बीच ऐसी क्षोई सर्वमान्य विभाजक-रेखा नही खीची जा सकती, जिससे यह ज्ञात हो सके कि किसी साहित्य का कितना भाग गशिष्ट साहित्य है भौर कितना भाग लोकनसाहित्य, क्योंकि प्रारम्भिक प्रवस्था में प्रत्येक साहित्य लोक-साहित्य के रूप में ही पतपना प्रारम्भ करता हैं, भ्रत मैंने उपयुक्त निकप को स्व्रीकार कर इस प्रवस्थ में शिप्ट साहित्य के प्रन्तगंत वैसी हो रचनाओ्रो को स्थान देने तया उनपर विचार करने का प्रयास किया है, जो हस्तलिखित, मुद्रित तथा रेडियो के द्वारा प्रसारित है नागपुरी में विप्ट साहित्य की रचना का क्रम कव से आरम्म हुआ, इस सम्बन्ध मे निश्चयपूर्वक कुछ भी नहीं कहा जा सकता नाग्पुरी का प्राचीन साहित्य

२२ वेजनाथ धिह, “विनोद”, भोजपुरी तोक-्साहित्य एक भ्रध्ययन (१ ६५८), पृष्ठ २१८

२१ इन भध्ययुग के सतो का लिखा हु साह्त्यि-कई वार तो वह लिख भी नही गया, कवीर ने ठो “मसि-कागद” छूम्रा ही नहीं था ।--पतोक साहित्म कहा जा सकता है या नहीं ? झ्राजकतत हिंदी साहित्य के इतिहाम-प्रथो में इन सतो की रचनाएँ विवेच्य यानी जाती हैं, भय त्‌ उनकी गणता पभिजात भौर परिष्दत साहित्य में होते लगी हैं। चीमा-रंघा कहाँ है ? प्रयो शवोर की रचना मोक-साहित्य नही है ? सच पृषा जाय तो कूछ योडे से प्रपदादों को छोड़कर मध्ययुत के सपा देशीभाषा के साहित्य को लोकस्साहित्य के भन्तगंत पस्तीट कर लाया जा तकता हैं। श्नीतिए इस देश में लोव-श्राद्वित्य की खोज का काम बहुत जटिल है। केवल परिप्कृत झोर सौरिक बहे जाने वाले साहिन्म की प्ध्ययन-प्रणाली को ही भेदक माना जा सकता है। लोक-माफेत्य मौखिक परुषरा से प्राप्त भौर समृहीत होता है, जबक्ति मध्ययुत का तथाकथित परिप्कृम छाहिंत्य सते पाडूलिपियों के झ्राघार पर सपादित द्वोता है। डॉँ०--हजारी प्रमाद द्विवेदी, जनपद (म्लूदर

टर

3६४२) पृष्ठ ५१। है का

प्रबेशक्‌ ०७ १३१

तथा उसका इतिहास उपलब्ध नहीं, अत- किसी सत्नमान्य निष्कर्ष का दावा किया जाना अभी सभव नही नागपुरी साहित्य-प्रेमियो के बीच एक मान्यता यह प्रचलित है कि मागपुरी के ज्ञात प्रारम्भिक कवि हनूमान सिंह थे। यह भी कहा जाता है कि वरजूराम पाठक हनूमान सिंह के समकालीन थे सन्‌ १८३१ ई० के कोल-विद्रोह को बरबूराम पाठक ने अ्रपनी श्राँखो देखा था | इस विपय पर उनके गीत भी उपलब्ध हैं। पुराने लोगी के श्रनुत्तार हनुमान सिंह वरजूराम पाठक से उम्र में ४० वर्ष बडे थे, भ्रत यह भनुमान किया जा सकता है कि हनूमान सिंह सन्‌ १८६०० ई० के श्रास- पास मे अवश्य जीवित रहे होगे हमूमान सिंह नाग्रपुरी के दुर्जय गायक एवं कवि ये। एक बार हनूमान सिंह तथा बरजूराम पाठक के वीच सगीत-गीत प्रतियोगिता हुई थी, जिसमे हनूमान सिंह को पराक्ष होता पडा था। कालास्‍्तर मे हनूमान सिंह में पुन साधना कर बरजूराम पाठक को सगीत-गीत प्रतियोगिता में पछाडा था। प्रतियोगिता की बात भी मानी जाय, तो वरजूराम पाठक का हनूमान सिंह का समकालीन होना निश्चित है, अत प्रचलित धारणा का श्राधार लेकर यह कहा जा सकता हैं कि नागपुरी शिप्ट साहित्य की रचना का श्रीयणेश सन्‌ १८०० ई० के पूर्व अवध्य हो गया होगा। इसके पूर्व भी नागपुरी के कवि तथा लेखक रहे होंगे, पर तो कही उनका उल्लेख ही प्राप्त होता है श्रौर उनका कृतित्व

'नागपुरी साहित्य ग्रे गीतो की प्रचुरता है। नाग्रपुरी के गीत मुर्यत वैष्णव गीत हैँ और इसमे राधा तथा कृष्ण का प्रायः किशोर तथा यौवन ही चित्रित हु्रा हैं। साथ ही रामकथा तथा शिव-महिमा भी नागपुरी गीतों को उपजीव्य रही हैं।' हनूमान सिंह के समय में गीतो का विषय रहस्यवाद से भी प्रभावित प्रतीत होता है, क्योंकि उस समय के गीतो पर कंवीर की छाप दिखलाई पडती है। हनूमान सिंह के समकालीन कवियों ते भी कृष्णतीला, राम-कथा तथा शिव-महिमा पर ही गीत लिखे है। उस समय के प्रसिद्ध कवियों में वरजूराम पाठक, लेदाराम तथा घासी महयथ के नाम लिए जा सकते है ! हनूमान सिंह के पश्चात्‌ अभिमन (पूरा ताम महथा श्रभिमन प्रसाद सिह) तथा सोवरन को विशेष स्थाति मिली इनके गीत मुस्यत क्ृष्णलीला तथा राम-कथया पर ग्राधारित है, पर सोबरन के गीतो में रहस्यवाद की छाप भी दिलाई पत्ती है

भामी राम नागपुरी के सर्वाधिक लोकप्रिय कवि हुए उनका जन्म (उसके पुत्र हुलास राम के अनुसार) सन्‌ १८५९ (सवत्‌ १६१६) मे रोची जिला के करकट नामक गाँव में हुआ था। ऐसा कहा जाता हैँ कि घासीराम ७१ वर्ष की झायु तक जीवित

अवरजराम नामक एक वि पचण्रानिया मे भी हुए है। इनका जत्म मद १७३० के झास-पाप्त बाधमु ही .घाना के अन्तयत सारजमहातु में टुए। या इसते भी स्पष्ठ है हि सागपुरी मे साहित्व-सतना का क्रम काफ़ी पहले प्रारम्भ हो चुका था, क्योदि पं्रपरातिया दायपूरी वी ही रपर विधापा है।

१४ 9 नागपुरी श्रिप्ट साहित्य

थे, इसका श्रथ॑ हैं कि सन्‌ १६३० ई० के आस-पास उनका देहावसान हुआ होगा। 'पर उनके पुत्र हुलामराम का कहना है कि उनके पिता घासीराम ६७ वर्ष तक जीवित रहे। इस दृष्टि से घामीराम की मृत्यु का वर्य १६२६ ई० माना जा सकता है। इन्हे मिड्ल तक की शिक्षा मिली थी भौर जीविका अजित करने के लिए इन्होंने शिक्षक तथा पोस्टमास्‍्टर के काम किए घे। गरनन्‍्तु इनको काव्य-साधना की घूम यहाँ के जमीदारों के यहाँ मच गई और घासीराम ने नौकरी छोड दी घासीराम की प्रकाणित्त पुस्तक "नागपुरी फाग शतक” है, झपितु यो कहना चाहिए कि घासीराम नाग्रपुरी के ऐसे प्रथम कवि हुए जित़्की रचना उनके जीवन-काल मे ही प्रकाशित हो सकी इस पुस्तक की प्रति भ्रव उपबब्ध नहीं। इसकी 'प्रत्ि मेरे देखने में श्राई है, जिससे यह पता चलता है कि रांची जिला के मसमानों ठाकुरगाँव के लाल गोझूलनाथ श्ाहदेव घासीराम के आश्रयदाता थे। लाल साहव ने ही “नागपुरी फाग झतक” का प्रकाक्षन करवाया था। भांततीराम के -अधिकाश गीत हृष्ण-लीना, राम-कथा तथा शिवस्तुति से मवधित है इन्होंने कुछ गीत अपने झ्ाश्नयदाता तथा उनके परिवार के सम्बन्ध में भी लिखे हैं घात्तीराम के गीतो में शगारःरस भी अपने निखार पर है, जिसमे सबोग तथा वियोग दोनो का मर्मस्पर्शी वर्णन है। स्फुट गीत लिखने की परम्परा को छोडकर भ्रवन्धात्मक काव्य लिखने की दिशा मे दृकूपाल देवधरिया ने सर्वप्रथम प्रयास किया “नलदसयतौ-चरित”, “श्री वत्स- चरित”, तथा “महाप्रभु वासुदेव-घरित” इनकी मुल्य ऋृत्तियाँ हैं। इनमे से "नल- दमयती-चरित” का धारावाहिक प्रकाशन “'झादिवासी” में हो चुका है। श्लेष दो रचनाएं श्रप्रकाशित हैं। इसी शैली मे महलीदात ने "सुदामा-चरित” लिखा जयगोवबिन्द कृत” लका काण्ड” को भी काफी स्थाति मिली, पर अब इसकी मुद्रित प्रति उपलब्ध नहीं इन कवियों के बलावा फुटकल गोन लिखने वाले झनेक कवि हुए, जिनमे द्विज भोला, शीतलप्रसाद प्रिह (अमिमन के पुत्र), लछमिनो, रु गदू मलार, पदुम तथा गदुरा आदि मुस्य है पाँच परगने में प्रचलित पचरपरगनिया नागपुरी की एक विभाया है, जिसपर

ववगला की किंचित्‌ छाप है। नागपुरी क्षेत्र मे पचपरगनिया गीतो का भी प्रत्यधिक प्रचार है।इस बोली के दो उल्लेखनीय कवि विनन्दिया तथा गोरामिया हुए इनके

गीतो का सग्रह सिलली के राजावहांदुर श्री उपेच्रनाथ प्रिंहदेव ने "भ्रादि कूमर संगीत”

(१६५६) नामक पुस्तक में प्रकाशित करवाया है कहा जाता है कि विनदियां वस्तुतः

सिल्ली के परमार क्षत्रिय राजकूल में उत्पन्न हुए, जितका वास्तविक नाम विनोद सिह

था। इन गोौतकारों के सम्बन्ध मे पुस्तक के “पूर्वाभास” में कहा गया हैं--"प्रस्तुत -सम्रह मे गौरागिया और विनदिया के नाम से दो गीतकारो के सरस गीतों का सकतत॑

है। दोनो मे वही मक्ति-वेतना और प्रेम-माघुरी है, जो भारत के भिन्‍न-भिन्‍न वैष्णव

प्रवेशकत १५४

सत्ो की वाणी भें है। यह सग्रह स्पष्ट कर देता है कि भावधारा में, पद लाछित्य मे, सामगयिक चेतना मे झर साहित्य-प्रणयन मे, यह प्रदेश भी भारत के भ्रन्य प्रदेशों के पाँवों से पांव मिलाकर ही चल रहा था। यह कभी पिछडा रहा था झौर ग्राज नभीहै।" नाययुरी के श्ृगारिक कवियों में जगनिवास नारायण तिवारी अद्वितीय है। इनकी अप्रकाशित पुस्तक “रस-तरगिणी” भे लगभग ६०० गीत हैं। तिवारी जी ने छन्द तथा अलकार छास्त्र का अध्ययत किया था, यही कारण है कि उनकी रचनाग्ो में वह 'क्लिप्टता गई है, जो सामान्य पाठकों या श्रोताओं के लिए वोधगम्य नही, पर गीतो की कलात्मकता तथा उनमे भावों का जो गु फन है, वे सहृदय साहित्यानुरागियों का मन सहज हो मोह लेते है ताग्रपूरी में यो तो अनेक गीतकार हुए, पर उनकी रचनाएँ उपलब्ध नही हो पाती | जिन गीतकारों की हम्तलिखित या मुद्रित रचनाएँ प्राप्त होती है, उनमे महंतदास, लोकनाथदेव, बुधु, उदयानाथ साथ, भुलुराम, प्रानन्‍्द, पूरण, बोधन, चन्द्रभानु, ठिज जीतनाथ, प्रयाग दास, तुलाम्बर साय, विशुनाथ साथ, फन्हैयालाल, अजु न, देवचरन, गरही, बुधुवा, राधेकात, गणेशदास, माघों, भ्रधीन, लछुमत, भोला, वसुदेव सिंह, रघुनाथ दास, नारायण दास, रुक्मिणी, रतन, महिपति, नन्‍्दलाल, रामकिप्टो, नरोत्तम, मधु, कान्दोराय, मोहितनन्दन, डोमन, विक्षताथ, हरि, रामा, उदित नारायण सिंहदेव, रघुनाथ शरण सिंहदेव, गोपीनाथ मिश्र, दिवाकरमणि पाठक, +मधृ्प', माकुरुगढी, जगधीप नारायग तिवारी, वनमाली नारायण तिवारी, रामूदास, दैवधरिया, हुलास राम, एतव उराँव, कवि बालक, वानेश्वर साहु, करमचन्द भगत, डोमन राम, जगरनाथ सिंह, लक्ष्मण सिह, प्रद्यम्त राय, खुदी सिह तथा कपिल मुनि श्राठुक श्रादि हैं हि धनीराम बवशी नागपुरी के अनन्य सेवक, गीतकार तथा गद्य लेखक हुए। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने यदि खडी बोली हिन्दी को व्यवस्था प्रदान की थी, तो धनीराम बक्‍्श्ी ने नागपुरी के विखरे हुए साहित्य को लुप्त होने से बचा लिया। अरईबासा मे रहकर बक्‍्शीजी ने अपनी तथा नागपुरी गीतकारों की अनेक पुस्तिकाएँ अकाक्षित की, जो छोदानागपुर के घर-घर में फैल गईं। इन पुस्तिकाप्नो के कारण सोगो में एक जागृति तथा सुरुचि उत्पन्त हुई श्रौर यहाँ के लोगो ते भ्रपती तागपुरी आपा तथा साहित्य का महत्व समझा नाग्रपुरी में गद्य-लेखन का प्रारम्म सन्‌ १६०० के भ्रास-पास ईसाई मिक्षनरियों ने किया भर इसके श्रग्नदृत रेवरेण्ड पी० इंड्नेस हुए। धवीराम बक्‍्शी की तरह काथलिक मिद्दन के