भूमिका

= % ^ उसका कहतेहैकिजोकतोक करनेसेही कियाजाय। जैसे - देवदत्त. कटं कगेतीस्यादि यहा कतां के किय विना चटाई कदापि चह चन सक्ती

कतां उसका कते है कि जा खाधौन साधनो युक्त होकर क्रिया करन म॒ स्वतन्त्र हावे जेसे--देवदत्त कता, चटाई कमं रर करना क्रिया है। इसमे विशष यह कि इद्‌ विचा्थैते- भावकमेकनत्तर सावेधातुकाथा वा स्यर्विकरणा्था वेति एवं तदहींद

|

स्यात्‌- यद्रा भ।वकमेणोलेस्तदा क्तरि विकरणाः यदा कत्तेरि

1 जाता

लस्तद्‌ा मावकमेणरिकरणाः [ इदमस्य यदेव स्वाभाविकमथापि वाचनिक प्रक्रतिप्रस्ययो प्रत्यया सह ब्रत इति | चास्ति सभवों

11

1 ता 8

यदेकस्या प्रकरृतद्ेयानानाभथयोयगपदनुसहायी भाव स्यात्‌ एव

छृतैकपन्तीभूतमवद्‌ भवति--सावेधातुकाथो एषेति ] महाभाष्य ०३) पाट ९। सुट ९७५।

यह्‌ विचारना चाहिये कि भाव,कम श्र _कतां तिङ्‌ प्रत्ययो के अथहे?वा विकरण रप आदि के इस की व्यवस्था इस प्रकार समनी चाहिये कि जब भाव कम अर्थो मे लकारो तवतो फत्ती.मे विकरण ओर जब कन्त मे लकार हो तच भाव कम॑ अथां मे विकृरंश॒ ह्योत ! यह ठी नही, क्यो।क तिङ्‌ रौर विकरण श्रा प्रत्ययो च्छी अथाः. कहन को शक्तं चाह स्वाभाविक हा चाह कन्न ( सत्र कार दारा साकेतित ), दोनो अवस्था भ्रकृति रौर

सरक्िर एकाय का करते है इसलिए यह॒ सम्भव नहीं कि एक प्रप्त त्रिभिन्नाथेकं प्रत्ययो के साथ सम्बन्ध हो अतः इस विषय मे दो पन्च उठ दही नही सकते, एक यही प्न दै भावः) कमे अर कत्त ये सावधातुक के ही अथे है

भूभिश्षा ( ^ धातुश्मो से लकार किनश्र्थो मेहोतेहै!

\८उन्तर अकमक धातुश्रो से भाव श्रौर कत्ता थे मे तश्रा सकमेक घातुष्यो से कमे नौर कत्त श्रथे मे होते है

( प्रश्न ) चअकमेक श्रौर सकमेक धातुश्रो का कया लक्षण है

( उत्तर ) जिन धातुच्रो का सम्बन्ध कमे साथ होता हे वह सकमक कहाती है, नौर जिनका सम्बन्ध कमे के साथ नही होता अकमेक होती है सकमेक, जैसे- पुस्तकं पठति, प्रामं गच्छति, अदनं पचति इत्यादि यहा पठ का पुस्तक, गम का भ्राम श्रौर पच का ओदन के साथ सम्बन्ध है | श्रकमेक, जैसे--भवति, बिधत, हसति इत्यादि यहा भू, विद श्रौर हस धातु का किसी कमेके साथ कोड सम्बन्ध नही है अरत ये श्कमेक है %

1) पः (भ४७क७४

दः सकमंक ओर अकमक धातुमो की व्यवस्था प्रकार से समक्ची जाती है सुख्य तो यही है कि जिस प्रकरणमें प्रथु कियाद उसका अथ किसी कमे के साथ सम्भवितद्ोवे तो सकमक, नहीं त्तो भकम्क | भौरजोधातु सकमकदैवेषह्ी कमी देश. काल नर | केष मेद से भकमक ओर अकम्म्क सकमेक भी दहो जाते जितने चातु भकमक वे सव किंसी पदाथ के नाश्रयते हि हौ नाते जैपे--भध्वानमस्ति यह भास धातु अकमक है हसक कमहोजातादहे। इस प्रकरण को कारकीय ग्रन्थ के करक करण म॑ मी ङ्स चुके हं अथौत्‌ निस जिस की कमं सक्ता वहा करी हे। डस उस अथकानिस जिस धातुके साथ सम्भवकशेउस उसको | सकमक भन्य सब नकमेक जानने चाहिये |

भूमिका

क्रिया का लक्ञषणए-- “का पुन क्रिया ? दृहा का पुनरीहा

, शष ए, 1 1.

चेटा का पुनचष्टा ? व्यापारः! सवेथा मवान्च्दैरेव शब्दान्‌ ग्या किंचिदथेजातं निदशेयस्येवं लातीयका क्रियेति क्रिया

0 1

नामेयमत्यन्ताऽ परिदृष्टा, अशक्या _पिर्डीभूता निदशेयितुम्‌ यथाऽसौ गर्भो निद्ेठितः साऽसावनुमानगम्प्रा को ऽसावनुमानः इदं सबु साधनेषु सननिदितेषु यदा पचतीत्यतद्भवति सा नून क्रिया | श्रथवा यया देवदत्त इह भूत्वा पाटलिपुत्रे भवति सा नून क्रियाः? | महाम म> १1 पा ३। सूर आ०

क्रिया उस को कहतहै कि जो दुखं आत्मा, मन, प्राण, इन्द्रिय रौर शारीरमे चेष्टा हाती है, जैसे कोह मलुभ्य चलते हए हाथको देख कर अनुमान करता है कि जिससे यह हाथ चलता है वही क्रिया है जो अनुमान जानने योम्य है वह आंख आदि इन्द्रियो मे ग्रहण करनमे केसे सकती है? किन्तु विज्ञान ही से दिखलाई देती है

धातु श्रौर प्रत्ययष्य अनुबन्धो के प्रयोजन--जिन घातुश्रो उदात्त श्च, श्रा, इ, ३, उ, ॐ, ऋ, ल्‌, श्रो, ये अनुबन्ध इतसंज्ञक होते है उनसे परस्मैपद्‌ रीर जिन के पर्वोक्तं ही अनुदात्त अक।रादि स्वर इतसंज्ञक हो उन ओर व्यनो मे डकार जिन का इत्‌सन्ञफ हातां है उनसे आत्मनेपद होता है '। जिस का स्वरित षदे तथा व्यकार इतूसज्ञक हों उनसे आत्मनपद्‌ च्रौर प्रस्मरति होत है !* जिनका श्राकार इत्‌ जाता है उन भौर जिन का ईकार इतं जाता है उन से परे निष्ठासज्ञक प्रत्ययो का इटं

५, अनुदात्तडित अआस्मनेपदुभ्‌ ।! ना० ९७ सखरितजित कतृभिप्राये क्रियाफरे अः० १०५

दे भूभिका

का आगम नही होताः जिनका इकार इत्‌ जाता है उनको चुम का श्मागम ह्येता हैः | जिनका उकार इत्‌ जाता है उन सेपरे क्त्वा प्रत्यय को इट का आगम विकत्पः करके रौर निष्ठा प्रत्यय को हंडागम नही" होता जिनका ऊकार इत्‌ जाता है उत से परे सामान्यं आधधातुक प्रत्यय काडइंट्‌ का आगसः विकस्पः करक अर निष्ठा प्रप्ययकोङ्कट का आगम नही ^ होता| जिनका हु ऋच्छार इन जाता है चडपरकणिच परे हो तो उनष्छे उपवा कां हस नदी होता ° जिनका लुरार इत्‌ जाता है खन से परर चि

प्रत्यय के धान मे अड आदेश होताहै। जिनक्रा एकार इत्‌ जाता है उनको इडादि सिच के परे परस्मैपद मे वृद्ध नशे होती 2६ लिन का अकार इत्‌ जाता है उन से परे निष्ठा के तकार का नकार मादे होता है'° | जिनका जि इत्‌ जाता है उन से परे बतेमान कालमे क्त प्रत्यय हाताहैः'। जिन का डु इत्‌ जावा दैडन से परे अअरभुच प्रप्यय होता| जिनका

इत्‌ जाता हैन सेक्ति प्रत्यय होतादहै'<) चीर जिनकाष इत्‌

जाता है उन लिङ्च मे अड प्रत्यय दीता है, इन्यादि प्रयोजन जानो __

आरर--आदितदच। आ० ११७० ईंकार-श्वीदितो निष्ठायाम्‌ अ!० ११७५ इदितो बम्‌ धातो आ० १२८ 13 उदितोवा जा० १८५४४ यस विभाषा जा० ११६२ स्वरतिसृतिसूय- तिधूनदितो वा आ० १७४० यस्य विभाषा ११६२। ७.नागरोपिश्चास्टृदिताम्‌ जा० ४६७ 1 पुषादिदय॒ताद्यलूदित (म्न चदेष भा० २१७ ह्ययन्तक्षटव सजागृणिरश्येदिता केषडेकृ १० ओदितश्च | आ० ११५६ ११-जीत क्त. भा० १२३१। १२ टिवतोऽथुच्‌ भा० १४७० १३ डिवतः क्र, जआ० १४६३९ १४ षिद्भिदादिभ्योऽड आ० १४६३

भूमिका

च्व संक्तेप से प्रत्ययश्थ अनुबन्धो के प्रयोजन कहते है-- जिन- का ककार, गकार ओर उकार इत्‌ जाताहै वे प्रत्ययपरेहोतो ङ्गक र्ण च्मौर वृद्धि नही" हाती' [ कित्‌ परे रहने पर | चवि छप [ बौर यज] आदि घातुन्रो को सप्रतारणरच्मौर अन्तादाद्त स्वरञ्मीहोना हे, मोर कित्‌ उत्‌ के परे प्रह शमादि धतुच्राका स्म्रमारण भी हाता है", श्रौर ब्ित्‌ शित्‌ प्रत्यय के परे अजत अङ्ग तथा उग्घाभूत अकारको वृद्धिः हाती अर प्रकृति को आयुदात्त खरः भी हतादहै। चित्‌ का श्रन्तोदात्तस्वर प्रयोजन्‌ हेः टित्‌ का प्रयोजन डीप्‌ प्रत्ययर, डित्‌ का प्रयोजन टिलोपः, तित्‌ का प्रयोजन स्वरितस्वर'° होता है|

आगमो [ अनुबधो ] के प्रयोजन-रित्‌, त्‌ ओर मित्‌ ये तीन प्रकार के आगमहोतहे। इनके नियमय है करि प्रकृति छर प्रत्यय के समुदाय मे टित आगम जिसको विधान करे उस के मादिका अवयवः, क्रित्‌ आगम जितत का विधान करे उस के शन्त का अवयव ओर मित्‌ आगम जिसको विवान करे उसके अन्त श्रव परे" होता है।

(प्रश्न) रादि रौर अन्त का क्या लक्तण है!

[1 1 7 ` कि | कि कि

५५५७१५५० 1 1

इह्ित्ति जा० ३४ २, बवचिस्वपियजादीना शित आ० २८३। क्रितं सो ३६1 ४, म्रहिश्यावयिव्यभि० जआ० २८६) -नोऽन्णिति आ० ६१। जअत उपधायाः। आ० १२७ निनस्जनदििम सौ २९। चित. सौ० २४६८, टिड्ढा- णजूट्रयसभ्दू्लन मात्रच्‌ स्तरे ३५ ति धिश्वतेडिति अष्टा० १४२। १८, ततिष्खरितम्‌ सौ० ७४७ ११ भाचन्तौ टक्रितौ सन्धि० ८०

१२ मिदचोऽन्व्यात्‌ पर सन्धि० ८१।

< भूमिका

_ उत्तर ) “यस्मात्‌ पूवे नास्ति परमस्ति आदिरिप्युच्यत स्मात्‌ पृवेमस्ति परं नास्ति सोऽन्त इत्युच्यते" महाभाष्ये सभ्याय १! पाद्‌ सूत्रम्‌ २१

जिसके पूवे कु नहो रौर पर हो बह आदि कटातादै, ओर जिस के पूवे कुल्‌ है खरौर पर नही है उसको अन्त कहत है ( अश्न) कौन कौन धातु खट्‌ श्रीर्‌ कोन कौन श्रनिट्‌ होते हे !

( उत्तर >) “परथ कं एनरनुदात्ता- 2 अदन्ता अदरिद्रा इवणान्ताशचाध्रि-त्रि-डी शी-दीधी वेवीड उकारान्ता- यु--णु-क्ु-

क्णु-म्नृणुवजेम्‌ कऋदन्तश्चाऽजाग-वड--च्यः खकरि कवग-

तो ति जजन

न्तानाम्‌ | पचि-वचि-सिचि-प्रुच-रिच-विचि- म्रच्ि-यजि-भजि-

7 ता 8 |

भ्जि-रख्ि-घजि प्यजि-मुजि-घररिज-मस्जि-रुजि-गज-णिजि-विजि-

~~ ता ता ता 1

सखजि--स्वरञ्जयश्चवगन्तानाम ऋअदि-सदि-रशदि-हदि-खदि-ठ्‌दि्‌- नुदि-ग्िदि-भिदि-स्कन्दि-कचुदि--ष्िद्यति-पद्यति-विन्दि-विन्ति-विद्यति-

गधि-युधि-वुधि-डुधि-कुधि-रुधि-सापि-त्यधि-जन्धि-सिध्यति-ह नि-मन्य-

तयस्तवगन्तानाम्‌ तपि-तिपि-वपि-शपि-द्ुपि-खपि-लिपि स्वप्यापि- स्िपि-छप-तपि-टपि-यभि-रमि लभि-यमि-रमि-नमि-गसय पत्रगोन्ता

नाम रुरि-रि्चि-दिकि-त्रिजि-लिशि-स्प्ररि-ररशि-कूरि-ृ दि-टंरि

पृष्यनि-त्विषि-कृषि-रिलपि-विषि-पिषि-रिषि -डुषि-ठषि-दुषि-द्षिः

घनमि-वसि-दहि-दहि-वहि-दुहि-नहि-रहि-लिहि-मिहयश्च पिना; म्‌। वसि. प्रसारणी महात्ख०७५। पा) मुर १८ |)

्रकारान्यां मे पएकदरिद्र घातु काष्टाड शप सत्र श्रानर्‌ हे इवणौन्तो धरि, श्वि, डा, जी, द्रीधी, नेवी इन ह॑ धातुत्रा

भूमिका

को छोड के शेष श्रनिट्‌ , उवणन्तो मेयु,र,णु.ष्ठ)श्षणु, स्तु; उणो इन सत धातुञ्रो कोड्ाड्‌ के शेष अनिट्‌, ऋनरीन्तो मे ग, वृड^ वृञ्‌. धातु्मो को छद के बाकी. अनिट्‌ [ है 1 कवगान्तो एक शकि घातु अनिट्‌ नकी सब संट्‌ , चवगान्तो मे यथाक्रम से पठति पचि त्रादि बाईस २२) धाठुं अनिट्‌ बाकी सव सेट्‌, ततगान्ता मे यथापठित अदि आदि अहा (२८ ) घातु अनट्‌ ्नन्य सब सेर्‌ पवगन्तो मे तिपि चादि यथापठित बीस ( २० ) धातु श्रनिट्‌ अन्य सब सेट श्रीर उष्मान्त, त्रथात्‌-राषसश्रीरह जिनके अन्तमे हा उनमे रशि आदि इकन्तीस ( ३१ ) धातु अनिट्‌ अन्य सबसेट्‌ | इनमे वम धातु वह समम्ना चहिये कि जिस का सम्प्रसारण हाता है श्रथोत्‌ आच्छादनाथवाची का ब्रहण॒ नही समना पूर्वाक्त सेट्‌ अनिट्‌ धातुच्रो कौ व्यवसा महाभाष्यकार ने इक प्रकार लिखी है परन्तु उसमे सव धातुत्ो का इकप्रत्ययान्त निरे कियाद इस बातका बोध ठीक ठीक नही हाता, मो इसके विशेष व्याख्यान गण्य धातुश्ो मे देखने विदि हागा। इस विषयमे किन्ही प्राचीन शिष्ट रँ वैयाकरणो की बनाह कारिकाभीहैसो अगे लिखत है.-

अनिट्‌ स्वरान्तो भवतोति दश्यताम्‌ ,

इमास्तु सेटः प्रवदन्ति तद्विद्‌) तमृदन्तस्तास्च बृङचृलौ

भ्विडीड्विशेष्वथ शीङूधिघ्ावपि

ये अनिट्‌ कारिकाए्' आचाय भ्याघ्नभूति विरचित £ देषो माघवीय। धातुदत्ति-शिष धातु एषठ ११२, क्रक घातु प्रष्ठ १५२।

धूमिका

गणस्थसूदन्त्ुतां ्स्तुवौ, ल्ुबन्तथो्णोतिमथो युणुरणएवः इति खरान्ता निपुणं सप्ुचितास , ततो दलन्तानपि सन्निबोधत २॥

धातु दो प्रकार के होत है--एक खरान्त, दुसरे व्यञ्जनान्त डनमे स्ररान्त एकाच्‌ धातु सब श्रनिट्‌ होते है परन्तु अकारान्त, दीधे ऋकारान्त, हस्व छक।(रान्ता म-बृड घृञ्‌ , इवशोन्ताम रशि डीड रीड ओर श्रि, गणो मे पदे सब ऊकारान्तं तथा उवरणन्तो मे--रुस्नुष्ुज्णेयुणु ओर दणु, इन सबको होड के [ सब अनिट्‌ होत है ] अथौत अकारान्त आदि जो गिनाये है सब सेट है इस के श्ागे हलन्तः--

शक्षिस्तु कान्तेश्व॑निडे₹ इष्यते,

धसिञ सान्तेषु बरखिः प्रसारणी रभिस्तु मान्तेष्वथ मेथुने यभिस , ततस्तलीयो लभिरेव नेतरे ३॥

--- ~ ~ ~~ ~ ~ ~~

स्वरान्ता से महामाष्यक्रार अनेकाच वै अपेक्षा छोड के आकारान्तो मे दरिद्रा मौर इवणीन्तो मे दीधीड , वेवीद्‌ घातु गिनये दै, भौर कारि बनाने वारो का अभिप्राय यह है रि "एकत्व उपद्श्च नु०) (आ० १९० ) सूत्रमे जो एकाच्‌ महण है उसा मपरे दरर ये धातुर्‌ जीर अनिट्‌ रे अर्थात्‌ दोना प्रकारका व्याख्यान ठीक है इससे महाभाष्य नौर कारिकाभो परस्पर विरोध नही भासशूता

भूषिका ११

ककारान्तो मे एक शक, सकारान्तोमे घस मौर निवासाय वाला वस तथा भकारान्तो मे रभ, लम ओर सैथुन अथं वाला यभ, ये तीन धातु अनिट्‌ है बाकी सव सेट्‌ समभन चाहिये

घमिजमन्तेष्वनिडेक इष्यते, रभिश्च यश्च श्यनि पठयते मनिः नमिश्चतुर्थो हमिरेव पञ्चमो, गमिश्च षषः प्रतिषेधवाचिनाम्‌ ॥४॥ मकारान्तो मे यम, रम, नम, गम ये चार अर नकारान्तो मे हने तथा दिवादिगण मे पढ़ा मनयदौो वातु अनिट्‌ है।

पचि वचि विचिरिचिरञ्जिप्रन्दुतोन्‌ + निजि सिचि मुचि भजिमन्जिशूल्लतीन्‌ स्यजिं यजि युजिश्जिसडिजमज्जतान्‌ ,

खुलिं स्वनिं खलिविजी विद्ध्यनिर्‌ स्वरान्‌ ५॥।

चकारान्तो मे पच, वच विच, रिच, सिच, सचिये हः छंकारान्तो

मे एक प्रच्छ, जकागन्ता रंज, निज, भज, भञ्ज, भ्रस्ज, त्यज

यज, युज, सज, सञ न, मस्ज, ज), स्वञ्ज, सज, विज पन्द्रह धातु अनिट्‌ है वाशी सब सेद्‌ समना चाहिय

तात ना ५०७ मा ५००५०१०१ ०५४ नामन

कष्ठ कहा ` यामयमन्तष पार दह्‌।

कही की 'सृजिश्जी' पाठ है वह ठीक नही, क्योक्रि णन्‌ ऋतु छदितं होने से विकल्प से इट्‌ का जागम{ मा० ९४० ) होता है अनुदात्त का दृस्तरा फर "नम्‌ नागम ( जा० २७५) भी इससे नही देखा नाता सहाभाश्य के पूर्वत पाठ मे स्पष्टख्प पे “विजि ग्रहण स्याह

१९ भूभिक्ा

अदिं हदि न्दिभिदिच्किदिच्तुदीन्‌ , शदिं सदि स्वि्लिषद्यतीलिदिम्‌ तुदि सुदि विश्यति षिन्तं इत्यपि, प्रतीहि दान्तान्‌ दश पञ्च चानिटः ॥६॥ दकारान्तो अद्‌, हद, स्कन्द, भिद, छिद, ष्लुद, शद, सद्‌, खिद्‌; पद, विद्‌ तीनो दिवादिगण तथा विद्‌ स्धाद्गिण का भी खिद, तुद्‌, नुद्‌ ये पन्द्रह धातु अनिट्‌ है | ख्धिस्छराधियधिवंधिसाघयः, कधिद्खुघी शुध्यतिवुध्यती व्यधिः इमे तु धान्त दश्च येऽनिये मनास्‌, ततः परं सिध्यतिरेव नेतरे ७॥ धकारान्तो मे रुध, राध, युध, बन्ध, साध, क्रध, शुध, दिवादि

गण का ज्ुध बुध तथासि [यतान] ओर व्यध ये ग्यारह धातु अनिटहै

तपि तिपि चापिमधो वपि स्वपि,

लिप लुपि तुप्यनिटष्यती खपिमर।

स्वरेण नीचेन शपि द्ुषि दिषि,

प्रतीहि पान्तान्‌ पठितांखयोदश पकारान्ता तप, तिप, आप, वप, खप, लिप, दुपे, दिवषः गण के तृप, दप्ये दा, सरप,रप, छुप, किप तरद्‌ वातु अनि है

1 शा

1 1

तुप ओरदप को अनुदात्त पठनेका ध््योजन केवर "भम्‌ः आगम (आ० २७५) हं रादु केनियम (जा ००७) सेद्र्‌ का विकल्प पोता है

भूमिका १३

दिशि दृशि दंशिम्थो मृशं स्एशिम्‌, रिशि, रशि कोशतिमषटम विधिम्‌ लिशि शान्तानज्निरटः पुराणगाः; पठन्ति पाठेषु दशेव नलरान्‌ ॥8॥ रशकारान्तो दिश, सश, दक्ष, मक्ष, स्प्का, रिश, सशरः कुश विश, लिक ये दश धातु अनिट्‌ शिषिं पवि श॒ष्धतिपुष्यती त्विषिम्‌, बिषिं श्छिषि तुष्यतिहष्यतो दिषिम्‌ इमान्‌ दशैवोपदिशन्त्यनिडषिधी, गणेषु षान्तान्‌ कृषिकषेती तथा १०॥ षकारान्ता मे शिष, पिष, पिष, पिष, श्लिष, दष दिवादि गण के शुष, पुष, तुष, दुषय चार श्रौर तुदादि श्रर भ्वादि दोनो गण का कष, ग्यारह ध्रातु श्रनिर्‌ हे दिहिढैहिर्भेहतिरोहतो वहिनेरिस्तु षष्ठो द्- तिस्तथा लिः

इमेऽनिरोऽष्टाविह सुक्तसंश्या, गणेषु हान्ताः प्रबिभञ्य कीसिताः॥ ११॥

हकारान्तो मे दिह, दुह, मिष, रह, वह; नह, दह, लिह ये धातु अनिट्‌ हं

जहा सेट गिनयि है वहा बाकी अ्ननिट श्नौर जहा अनिर निनार्येहै वहा बाकी सेट्‌ सम लेना चाये इस भ्रन्थ मे जितने सेट्‌ श्चनिट धाठ्‌ है उन सब की व्यवस्था मुख्य तो यही सममनी वाहये ओर उदात्तोपदेश से सेर श्रौर अनुदात्तोपदेश से अनिट समते है जो धातु उपदेश में उदात्त है उन पर कोड विहन नष्टौ

१४ भूमिका

होता ओर जो उपदेश मे अनुदात्त हाते है उनफ़े श्रारि वणे के नीचे अनुदात्त की तिद्ध रेला कर देते थ, चरर परस्मैपद आत्मनेपद के लिए यह संकेत था कि जिना अन्त्य वणं अनु्रात्त चिहिनत इत्‌ ह्मे ओर जो उपदेश मे डित हो उनसे आत्मनेपद, शेषो से परस्मैपद्‌ शौर जिन अन्त्य बणे स्वरित्‌ संज्ञक इतहो उनसे तथा जो उपद्र चित्‌ ह्यो उनसे उनमयपद सममते थे, इससे बहत लाघव फे साथ मबवबोधदहो जाचा था अब विद्याकी प्रवृत्ति कम हो जाने के कारण यह परम्परा बिगड गड है! अब इस प्रन्थ मे अनुदात्त से अनिट, अनुद तेत्‌ आत्मनेपद अर उदात्त से सेट उद्‌।ततेत्‌ से परस्मैपद सममने है, फिर भी आमनेपदी गीर परस्मै शब्द भी सवत्र अत्यन्त सुगम होने के लिए लिख दिरिहै कि जिससे किसी को धम पड सके इन सब प्रकारो से इत्संज्ञक वर्णो ओर सेट अनिट्‌ की व्यवस्था को टीक जान के पदन पटाने बलि सब लोग शुद्र प्रयोगो से व्यवहार ओर अथज्ञान से उपयुक्त हो जो धातु उपदे मे उदात्त = सेट्‌ है उन से परे आधे-

केयर, हरदत्त, दीक्षित आदि सव अवाचीन वैयाकरण ^जचुद्क- टिषति, मे सन्‌ के डिद्रत्‌ अतिदेश (आ ३४५ ) से प्राक्त होने चाले जारमनेपद्‌ को हटाने ट्ष्‌ उपदश्य का अनुद्रृत्ति मनते है परन्तु उनङा कथन टीक नही दे, क्योकि उपदेश फे अनन्तर दत्‌ सज्ञा होती है--उपदेकोत्तरकारमित्सन्ता ( महाभाष्य १।१। २५) जब इत्‌ सन्ता ही उपदेश्च के अनन्तर होगः तब उपदेश्च मे डित्‌ कैसे हो सक्ती ह~. महाभाष्यकार ने उक्त पादु मे व्मनेपद की निदृत्तिके ल्यि सेक्ठम्यतत सेवति माना हे ( महाभाष्य १।२।१ सिद्धन्तु पूवस्यसा्यातिदेशात्‌ ) अत दनि परे रहने पर जो रय होः रउक्तीके प्रति सन्‌ इत्‌ होगा, किल्कोजो कायं हो उस्रकेप्रहि।

भूभिका १९

धातुक प्रत्ययो को इडागम हो जातादहै च्रीर जा उपदेश मे अनुदात्त = अनिट्‌ है उनसे परे आद्धेधातुकसज्ञक व्यया को इडा- गम नही होता है

टस भ्र॑थ म्यारह लकार अयात्‌ लट, लिर्‌, टट; लट्‌, सेट्‌ लाट, लड, लिड, लिड, ड, लृड क्रम से लिखि है, अन्य मन्थो मे लेट्‌ लकार ¦ जो ] केवल वैदिक प्रयोग विषयक हसा नही लिखा है, यहा विस्तार पृयेक इसके प्रयोग लिखेगे, लिड दा बार इसलिए लिखा है कि इसके दो प्रकारके र्थो मेकेदा प्रकार प्रयोग होते है ओर दङगण अथात्‌ भ्वादि, श्रदादि, जुहोप्यादि, दिवादि, स्वादि, तुदादि, रुधादि, तनादि, क्रयादि श्रौ चुरादि करम से {ले है इसक पीहु वारह प्रकिया % अशात्‌ णजन्त, सन्नन्त, यड डन्त्‌, यड टुगन्त.नामघातु+करडव। दिप्रसययमालाच्रासमनेपद,परस्पैपद, भावकम्‌, कमेकत्तो ॐौर लकाराथ, ये मी ऋम विस्तार पूवेक लिखे जावेगे श्रौर इतना ही तिडन्त का विपय है इसी को शमास्यात' मी कहते है, रीर जा सूत्र सामान्य करक सत्र वातु्मो मे लगते है उनका प्रथम-

1 ~ [0 शा नभ सल ~

त्‌

वस्तुत. खकार दशदहीहं। ्डकेदोभेद होन ते इन्हे पथक्‌ पथक्‌ गिना हे

धऽ सर्कारविधि के वेदारम्भसस्कारान्तगत '्पडनपाटन ग्यवस्था' प्रकरण मे खिलि है- ""चातुपाड जौर दक्ष करारो के रूप सधवान्‌ तथा दश्च प्रक्रिथा मी सधवानीःः यहा सिद्धातकौञ्ुदी आदि अवाचीनं ग्भोके अनुसार व्याख्या की षे अतएव त्मनेपद्‌, भावकम आदि कन्प्थर्क निद्श ण्या दे वस्तुतः रषि दयानन्द को प्रत्येक धातुके दशो प्रक्रिया के रूप लधवाने इ६्ह | धातुपाठ की क्षीरतरङ्गिणी, धातु- प्रदीप जर माधवीया घातुद्त्ति आदि प्रारीनः भ्यो मे चाष दयानम्दं अभिमत क्रमद्ी उपरन्ध होता दै सस्छारविधिः निदि्ट द्य प्र्नियष्

१६ स्यमिका

प्रथम एक ही वार लिखेगे रीर जो किन्ही विरोष धातुश्मा में लगते है उन का 'एकब्‌।र लिखकर पी जहां उनका सम्बन्ध होगा वहा इस अन्थकी सूत्र संख्याजो उनके गे लिखी ह्योमी, व्याख्या मे रख पिया करेगे, उसके अनुसार उन सूत्र का सम्बन्धं सब लोग चषा देख लवं

इति मूभिका |

भिना ०७७०७००० अत 1 1 1 1 ता

ये हे-१ कतृ प्रक्रिया ( इस मे यथापा्च परस्मैपद, भार्मनेयद्ु ), कम प्रक्रिया, भाव अरनिया, कम॑कतु प्रक्रिया, सन्नत प्रक्रिया, यडन्त प्रक्रिया, यदल्ुगन्त प्रक्रिया, णिजन्त प्रक्रिया, ^ परत्ययमारा, १० नामधातु प्रिया} यदा यह ध्यान रहे निस प्रकार छुद्ध धातु की कत-कमे-माद-कमेकनृं चार प्रफिया मे ख्प सथधवाये जाते उसी श्रकार सद्धन्न, यटन्न जादि सव वे, चारो प्रक्रियातो ख्य सथाने चाष्टियं

आरम्‌

दथ आख्यातिक.

१. [ भू' ] सत्तायाम्‌ उदात्त उडात्तत्‌ परस्मेभाषः' ! यह धातु परस्मैपदी है मू रब्द्‌ सन्ताः = होने अथं का वाचक है इस अथ को कहने के योग्यहोनेसे भू शब्द समथ है जो इससे किसी रथं का बोधन हाता तो असमे समा जाता, फिर असमथ से कोड कायं भी नही हो सकता इस विषय की परिभाषा “समर्थं

तिन ति

धातुके स्वरखूपमे सश्यनदहो इसषिये “भूः आद्‌ धातुभो मे विभक्ति का नदेश नही क्या।

परस्मैभाषा यह परस्मैपद्‌ की पूचाचार्यो की सन्ता है

धातुपाठमे धातुभो केजो अथंदिये घे प्राय उपरक्षणाथं महाभाष्य(अ०१।३।१९॥६।१।९) मे रिखा है-- "बहधा अपि धातवो भवन्तिः अथौत्‌ धातुषु बहत अथं वारी भी होती हे। श्वातुपाठ मे मी कुदं खुद गुढं गुद कीडायामेवः (भ्वादि ०२९-२४ ) मे एव- चार से अथ का जवधारण करना इस बात काकज्ञापक सत्रकारनेमी °गन्धनावक्षेपण०ः (अ० १। ~। ३२) इत्यादि सूत्रा मे अनेक अर्थां का निदश्च पिया है। इसव्ि शक्षीरभोजिन्याः श्रुतन्धर, पुत्रो भवति वाक्य मे ,“उ.पत्ति", "अशुह्क पट खड्को मवतः मे अभूततद्ाव ( पहिले नदो पीछे होना) आदि अथ देखे जाते सुखसञ्ुभवात, हिमवतो शङ्का प्रभवति, सेना पराभवतिः इत्यादि वास्योमे जो विभिन्न अथं प्रतीत होते है वे “भू धातुके ही है! उपसगं केवर अन्तित धात्वर्थ के द्योतक होते हे,

ख्यातिकः

(1

पदविधिः” सन्धिविषय ° मे लिख चुके दे, भौर शब्द का लक्तरए भी नामिक कौ भूमिकाः मे लिखा है। मू शब्द सत्ता अथं के साथ समथे हा तो इसक्टी धातुसंज्ञा होकर छत्‌ प्रत्ययो की छतपत्ति आदि काये हते हे। १--भ्रुवादयो धातवः ॥४ १।३।१॥ भू शब्द से लेकर जो दशगणो मे शब्द पदे है इन सबकी धातु संज्ञा होती है इस से भू शब्द की धातु संज्ञा होकर-- २--धातोः ३। १।६१॥ [ यह अधिकार सूत्र है आगे कहे हए ] सब तव्यत्‌ आदि प्रत्यय धातुसंज्ञक शब्दो से होते हे ३--कृदतिङः ३। १। धातु से विहित [ तिडमिन्न ] जो प्रत्यय है वे छृत्‌सज्ञक हो यहां तिङन्त की चपेत्ता मे- ठे-वतंमाने लट्‌ २) १२३॥ आरम्भ से लेकर जब तक क्रियाकी समिन ही तब तक वतमान काल सममना चाहिये वतमान अथे के वाचक धातुश्रो से लट्‌ प्रत्यय हो अव ये कृत्‌सन्ञक लट्‌ आदि भत्यय माव, कमं प्मौर कता इन तीन अर्थो मे सामान्य करके होते ,है उनका विभाग- ४७ [ | -लः कमणि भावे चाऽकमेकेभ्यः ४।६६॥।

इन तमनो अङ्गौ मे से पिरे से अध्याय, दूसरे से पाद ओर तीसरे ते सूत्र सख्या समञ्चनी चाद्ये

१, पष्ठ २५। २, पर्ट५।

भ्वादिगणः ञे

1)

सकमेक धातुरश्रो से कमे ओर कतां अथे में तथा अकमक धातु्रो से भाव च्रौर कत्ता रथे मे लक्रार होने यहांभू धातु सरे कती अथै मेँ लट आया 'भू-लद्‌) इस चवरस्था

&- हलन्त्यम्‌ | १।२।३२॥ उपदेशा मे धातु आदि के समुदाय काजो अन्त्य वणे है वड इत्‌ संज्ञक होवे ७--तस्य लोपः १।३।8॥ इत्‌ संज्ञा वाले बणे का लोपो जाता है। यहां टकार को इतसंज्ञा यर लोप हा कर प्रत्यय के श्चादि लकार की भी इतसंज्ञा ८“लशकतद्धिते"' सूत्र से प्रपि है सो अगले सूत्र ल्छार कं स्थान मे अदेशविधानरूप ज्ञापक से नही होती लस्य २।५।७७॥ लकार के स्थान मे वक्ष्यमाण आदेश हो &-तिएलस्‌ भि सिपएथस्थमिव्‌वस्मस्ताताज्‌ थासाथान्ध्वमिङ्वाहमदहिङ ७८ तिप, तस) भि, सिप, थस, थ; मिप, वस, मस, त; आताम्‌ फ; थास, आथाम्‌, ध्व } इट्‌, वहि, महिड १८ अठारह आदेश लकार के स्थानमे होत १०- लः परस्मपदम्‌ | १।४।६८)} लश्छीर के स्थानमे जो आदेश हे बरे परस्सैपदसंज्ञक हों इससे सामान्य करके विधान है. परन्तु उसके अपवाद “'तडमना०२ १) सूत्र से तङ आदि नव की आल्मनेष्द्‌ संज्ञाकादहै, इससे तिप्‌ [ से १, आऽ २०, ना० २१३ २, जा० ९४]

स्यातिफ

0 का वा का का कि

५. 1

मस्‌ ] पयेन्त नव की परस्मैपद सज्ञा जाना अव भू धातु से परस्मैपद हो वा आसमनेपद्‌ इस सन्देह को निवृत्ति के लिय- ११- शेषात्‌ कतरि परस्मेपदम्‌ १।६।७८॥

जिन धातुश्रो से आत्मनेपदसंज्ञक प्रत्यय के है उनको छोड़ शष धातुश्मो से परस्मैपदसंज्ञक प्रत्यय हा। यहामू से तिप रादि नव प्रत्यय प्राप्र हुए १२- तिङ्स्त्रीणि चीणि प्रथममध्यमोत्तमाः॥ १।द। १९० तिड्सम्बन्धी जो तिप शमादि प्रत्यय है बे यथाक्रम से तीन-तीन म्थम, मभ्यम चनौर उत्तम स्क हो अथोत्‌-तिप्‌ , तस्‌ , भिः प्रथम सिप्‌, थस्‌, थ, मध्यम च्मौर मिप, बस, मस; उत्तम पुरुष जानो

१३--तान्येकवचनद्विवचनबहुवचनान्यकशः

१।५७।१०१॥

उन्ही तिडसम्बन्धी तिप्‌ आदि तीन-तीन के समुदाय मे प्रत्येक एकवचन्‌, द्विवचन चर बहुवचन सङ्क हो, अथात्‌ तिप्‌ एकवचनः, तस्‌ द्विवचन ओर मि बहुवचन इसी प्रकार क्तिप्‌ श्चादि मे जानो

---------~---"------------ वि 0

इस प्रकरण मे एक सक्ञा का अधिकार हे जो सन्ञा अनवकाश या परे होती है वह सावकाश्च या पूवं सन्नाको बाध खेती दहै। अत “तिप्‌” से "मस्‌ पयन्त प्रत्ययो ओर श्ातृ, ` शानच्‌ की ही परस्मैपद्‌ सक्ता होती है |

यहाँ प्रथम रन्द्र समास होता है तत्पश्चात्‌ एकशेष यथाः- प्रथमश्च मध्यसश्च उत्तमश्च प्रथममध्यमोत्तमा` प्रथममध्यमोत्तमाश्च प्रथम- सभ्यमोत्तमाश्च प्रथममध्यमोत्तमा. इससे दोष नव आत्मनेपद स्तक प्रत्ययो मे भी कमश. तीन-तीन की श्रथम, मध्यम ओर उत्तम सन्ना हो जाती है।

भ्वादिगणः

१०-युष्मद्युपपद समानाधिकरणे स्थानिन्य- पि मध्यमः॥ १।४।१०४॥ तिडनन्तक्रिया के समानाधिकरण युष्मद्‌ शण्ड्‌ उपपद्‌ के रहते हुए युष्मद्‌ शब्द्‌ का प्रयाग होवानदहाचाभी घातुसे मध्यम पुरुष दो १५- अस्मद्युत्तमः ।; | ४) १०६॥ तिडन्त कं साथ एकाधिकरण अस्मत्‌ शब्द्‌ उपपद्‌ हो, उस काप्रयोगदहोवानदहोले भी धातु से उत्तम पुरूष दहो) ` दे-शेषे परथमः १। ४। १०७॥ तिडन्त के साथ युष्मद्‌ ओर अस्मद्‌ भिन्न एकाधिकरण नाम उपपददहो, उसका प्रयोगहो वान होतोभी धातुसे प्रथम पुरुष हो ! यहां शेष कतो की विवन्ञा मे लकार के स्थानमे जो तिप आदि नादे है उन मे से प्रथम पुरुष का एकवचन तिप्‌ ° रया भभू-तिपः' इस अवस्था मे- १७-यस्मातं प्रत्ययबेधिस्तदादि प्रत्यये-

ऽङ्गम्‌।। १। १२

जिस धातु वा प्रातिपादिक से जिस प्रत्यय का विधानदहा उस धातु वा प्रातिपदिक का आदयक्तर जिस के आदिमे ही उस सञ्दाय की अप्ययक्त पर रहने पर अङ्ग सज्ञा होती है अथोत्‌ कति श्रौर प्रत्यय के षीचमेजोिकरण प्रत्ययहैउसकीभी द्धः खंक्ञा हो जवे ° |

द्येकयोर्िवचनैकवचते ( ना०९ ) इस नियम से

२. सून् के (तदादिः पद्‌ मे उन्तरपदरोपी समास है--तस्य आदि तदादि , तदादिरादिंस्य तत्‌ तद्‌ादुयादि तत्‌ = प्रति, तस्थादिस्त

्ाख्यातिकः

का का मिपि

१८-निङशित्‌ सावधातुकम्‌ ॥३। ४। ११३॥ धातु के अधिक्रार मे कदे जो तिङ्‌ श्चौर शित्‌ प्रत्यय { है] बे सावेधातुरसंज्ञक हो इस तिप्‌ आदि की सादधातुक सज्ञा हृ १६-कनरि शप्‌ ३। १।६द क्तावाची सावधातुक परे हो तो धातु से परे शप प्रत्यय हो इससे भू श्र तिप्‌ के बीच मे शप्‌ प्रत्यय हो कर ५भू-शप-- तिपः इस अवध्णमे दानोहल पकारोकी (&) से इतसज्ञा होकर (७) लीोपहाकर "'मू-र-तिःः रहा २०-लशक्वतद्धत १।३।८॥ ्रस्यय के अदि मे जो लकार, शकार ओौर कवगं [ है ] उन की इत्‌सज्ञा होवे इस से “शाः की इत्‌सज्ञा होर्र(७)से लोपदहा गया ५मू- अतिः, इस अवा मे-- २१-साचघातुकाधंघातुकयःः ७। ८४॥ गुण बृद्धि आदि स्न्ञा श्योर इक्ही के सथान मे नियम होना सन्धिवरिषय मे लिख चुक है! सावधातुक अौर आधधातुक संज्ञक प्रत्यय परे हो इगन्त अद्ध के स्थान मे गुण आदेश्च हो इससे उकार का अन्तरतम ओकार गुण दाकर "भो-अ- तिः इस अवसा म- २२-एचोऽयवायावः ७६ दादि, = प्रकृति का पू वणं, तदादिरादिर्यस = वह वर्णं आदि. मेह जिस समुदाये उस की भङ्ग सक्ता होती है। १. एुणसषला-- सन्ध १९ ब्रादधसनज्ञा- सान्ध० १८ इक का नियम- सन्धि ७८

भ्वादिगणः

एच्‌ पस्याहार के खान्‌ मे अथ्‌९.अब्‌, चा आच्‌ ये चार ्रादेक यथासंख्य करके हों ओकार को अव्‌ होकर-मवति द्विवचन की रिवच्छु मे ५भव-तस्‌" ।. तड्‌ प्रत्ययो की विभक्ति संज्ञा नामिक १मेदहो चुकी है! यहा तस्‌ के सकार की इत्‌. संज्ञा प्राप्र ३, उसका निषेध करते दै-- २३-न विभक्तौ तुस्माः १।३।४॥ विभक्ति मे जो तवमै, सकार ओर मकार [ | वे इत्‌सन्ञक नह | तिडन्त की पदसंज्ञा भी कर चुके है नामिक ˆ २४-ससज्षो सूः ।॥ ८} २। ९६६ पदान्त सकार अर सजुष्‌ शब्द के अन्य वणे को रं आदेश हो।

२४.-उपदेशेऽजनु नासिक इत्‌ १।३। उपदे मे जो अनुनासिक अच्‌ है उस की इतसज्ञा हो ङस से उकार की इत्संज्ञा होकर -+*भव-तर्‌ २६-खरवसानयोर्विंसजनीयः ॥८ ३। ९५॥ खर प्रस्याहार के परे तथा अवसान मे वेमा जो रेफ उसके स्थान मे विसजेनीय आदेश हो इस से रेप को बिसगे होकर- मवतः)! “भव -- भि यहा २७--ोऽन्तः ७। १।३॥ प्रत्यय के आदि अवयव मकार को अन्त अदेश्य होवे तकार न्रे अकार उच्चारण है, किन्तु आदेश्च हलन्त ही होता है। ¢मव--अन्त्‌-इ' दोनो अकारो को पररूप एकादेश ˆ होकर बन्ति मव +-सिप्‌= भवसि, भव ~ थस्‌ = भवथः, भव 1 = अवथ \ भव ~+ मिप्‌-

१,ना०८। २. ना० १६३। ३. सन्धि° १५३

प्ख्यातिकः

[क [0 10 भ्‌ [म की च्छ” 1 किप 3

२८-अतो दीघो यञि ७।३।१०१॥ यत्यादि सा्वेधातुक प्रत्यय परे हो तो अदन्त अह्लको दीधे अदेशा होवे यहां शप्‌ के श्र कौ अङ्ग संज्ञा कौन सर दीष होता है--भवाभि, भव ¬-वस्‌ = भवावः, भव +-मस्‌= भवामः | भवति; तौ मवतः, ते भवन्ति, स्व मवति; युवां भक्थः, युं भवथ, अह्‌ भवामि, यावां भवाव, बयं भवामः इन लकासो का क्रम बणक्रम से चलाया करत है जैत्त-लट , लिट्‌, छट, लृट्‌ लट्‌ लोदये &द्दित्‌ ओर एेसाही क्रम डित्‌ लकारा [ लड , लिड्‌ छड लड | जाना इस करम के अ्तुसार लट्‌ थ्ागे लिट्‌ प्राप्र हुमा जितने सूत्र प्रम लकार मे लिख दिय उन का अव नहा लिखेगे; जो जो विशेष आत जार्घेगे उन का खगे [ लिर्‌- २६--परोक्ले लिट्‌ २।२। १११५ यहा भूत श्र अनद्यतन की अनुवृत्ति आती है परात्त अन- द्यतन भूतकाल मे हुए कार्यो के वाचक धातुध्यो से लिट्‌ लकार होवे परोज्ञ {न्द्का सथं

का०-परो मावः परस्यान्ते परान्ते लिटि दश्यताम्‌ उर्व वाऽड्देः परादच्णः सिद्ध वाऽस्मान्निपातनात्‌ पहा ३।२।११५।

जिसस विषयो के साथ ज्ञान की व्यापि हो उसका (यत्तः कहते हे अथौत्‌ पोच ज्ञानेन्द्रिय का ग्रहण अक्त शब्द से समना चाहिय रीर इन्दरयोसे जो परे हो उस को परोत्त कहत & चछ्त शाब्द परे "परः राव्द्‌ को "परा, आदे, यथवा अकार को उकार वा परोत्त ङ्द का प्रषोदरादि मान के इस सूत्र निपातनः

+ ॥)

भ्वादिगस्‌

10) ^) ^ 0 [क हि 0 1

भा०~कथं जातीयकं पुनः परोक्तं नाम ? 1 % केचित्‌ तावदाहूवषशतच्रक्त परोच्भिति अपर #॥ |. 4 [ नाः आहवेषंसहसखवृत्तं परोक्षमिति अपर आहुः कुड्यकटान्तरितं परोक्षभिति। अपर आहुदरःयहवृत्त =यहवन्त वेति ` पहा ३।२। ११५॥ प्राक्त जो अपनै सामनेन हृ्ाहो, उस की किदनी अवधि समनी चाहिये, हस विषयमे ऋषि लोगो का बहुत भिन्न भिन्न विचार है कोई कहत है करि जा १०० सौ वषे पहले हो चुका हो; कोई कहते है कफि जो १००० हजार वपे प्रथम हौ गया हो; कोट कहते हे छि जा भित्ति अग चटाई के डमे हो ओर कोई कत हेषफिदा बा तीन दिन पहल हृ्रा हो उस का परोक्त सममना चाहिय सो यह्‌ सव प्रकार से परोक्त हया सकता है, क्योकि सख्य परोक्त के साथ सब का सम्बन्ध हो सकता है “*भू- लिटः, यहां टकार इकार की इत्सक्ञा रौर लोप होकर लकार के स्थान मे तिप्‌ अदि नवहो जाते है,

३०-लद्‌ ३।४। ११५॥ यह सूत्र सावेघातुक सज्ञा का अपवाद है लिट के८खान मे जो तिप्‌ आदि यादेश है वे अआधेधातुकसज्ञक हो यहा एक सज्ञा का अधिकार तोदहैदही नर्हा, इस कारण पत्त सावधातुक सज्ञा भी प्राप्र हे, इसलिये एव दव्द्‌ की अनुवृत्ति, समभनी चाहिय कि स्माधेथातुक संज्ञा ही हा, अन्य नही ]

ख्डः शाकटायनस्यैव (अ०३।४। ११९१) सूत्र सते मण्डूक- ति-न्याय से “एवः की अवृत्ति समन्षनी चाहिये अथवा--““छन्द्‌- स्युभयथाः” ( ज० ३) ४। ११९७ ) सूत्र मे (उभयथा के रहण 8

आख्यात्तिकः

नि 7 000 हि

का पाते

३१-परस्मेपदानां णलतुसुस्थलथु सणल्वमाः

२।४।८२॥

धातु से पर लिट्‌ लकार के श्थान मे परस्मैपदसंजञ जो तिप्‌

आदि अदेश है उनको रल्‌ आदि नव आदेश्च यथासंख्य करके हो जवे ^ -णएल्‌-

२२--चुषट्‌ १।३।७॥ अत्यय के चादि जो चवे, टवगे उन की इतसन्ञा हो यहां रकार लकार कौ इत्‌सक्ञा चर लाप होकर--*“भू-ख, इस अवश्या मे

[त

९२--इन्धि भवतिभ्यां १।२।६ श्िभीर भू धातु खे परे जो लिट बह कितूसंज्ञकः ° हो { यह पूर पित्‌ लिट्‌ के लिये है 1} इस से णल्‌ को कित्‌ होकर--

-----

१० ७-८०७

पिति होता है कि इस प्रकरण भं सावधाहुक ओर आधधातुक दोनो साक्ञाओ का समवेश्च नही होता अन्यथा वेद मे दोनो स्ञाभो ङे थुच्जय के स्यि छन्दसि चः इतना ही सूत्र बना देते |

१. पतञ्जलि ने "गाङ्कटादिम्योऽन्णिन्‌डिनत्‌"' ( अ०१।२।१ ) शृत्र कं भाष्य मै प्राचीन वृत्तिकारो ढे चार पक्ष दशाये हे 9 भावना, संबन्ध, संज्ञा, अतिदेश देस अन्थ में तृतीय प्च के अनुसार जहां छित्‌ किति का विधान किया है वहां उन की डित्‌ कित्‌ सक्लाए मानी है। यही संक्तापक्च प्राचीन दश्षपादी-उणादि-दृत्तिकार ने-भी माना है देखो हमारी रपादित गवन॑ेण्ट सस्छृत कारेज बनारस से प्रकार्य द० उ० इतति प्रष्ठ १९, २१, ४७, ५९ इत्यादि २. इन्धेः संयोगा हण भवते; पिदथंम्‌ ( महा० ।२।६ )

अथात्‌ इम सूत्र मेँ “इन्धिः का अहण सयोगान्त होने से भौर “मवति का अहण पित्‌ ठिट्‌के ल्पि किया हे।

भ्वादिगणः १९

कलमो

३४-क्‌ङ्ति १।१।२०॥ कित्‌, गित्‌ चर डित्‌ प्रत्यय परेहोतो इक के सथानमे गुण च्ृद्धिनहा। गुण का निषेध हो गया [ अथवा «मू-खः; इस अवस्था मे ] द्विवचन, यणादेश, गुण, बृद्धि आदि कायमी श्राप हैँ इन सव का बाधक बुक्‌ होता है

६५-खुवो वुग्‌ लङ्लिरोः अजादि टड्‌ ओर लिट्‌ लकारपरेहोतोभू अङ्गकोवुक््‌का आगम होता है उकमाच्र की इत्सज्ञा होकर भूव-ऋअ

२क-एकाचा द्रं प्रथमस्य ।६।१।२१॥ यह अधिकार सूत्र है धातु के प्रथम एकाच्‌ अवयव को द्विख हाव | १..यत्‌ कृतेऽपि प्राप्नोव्यज्रतेऽपि तच्निव्यम्‌' इस नियमसे बुक्‌ निय है, क्योकि चह यणादेश, गुण ओर बृद्धि के होने पर भी प्राक्त हता है ओर होने पर भीं परन्तु यणादेश, गुण, बृद्धि ये दुक हौ जाने पर प्राक्त नष्ी होते अत, वे अनित्य है | नित्य ओर अनिप्यमे निस्य बर्वान्‌ होता है (पारि० ३८) इसय््यि बुक्‌ यणादि को बाध रेता है यद्यपि द्विर्वचन बुक्‌ करने पर भी प्रास होता है तथापि वह शब्दान्तरस्य श्रशरुपन्‌ विधि- रनित्य, ( पारि० ४२ ) इस नियम से अनित्य है, क्योकि वु होने पर भूवः को दहिवच्न की श्रास्ि होती है ओौर उक्‌ होने पर “भूः मात्र को। इसी प्रकार चुकमी अनित्यहे। यदि द्विवचन पहरेदौ तो भू-भू सङ्दाय छो वुक्‌ प्राक्च होता है ओर यदि द्विवचन से पहले बुकहोतो भूः मान्न वो 1 अतः वोनो के अनित्य होने पर “पूवं ते पर बर्वान्‌ शता है" (पारि० ३८) इस नियम से चुद्‌ द्विवचन को परत्व के कारण अआधता दे

१२ पख्यातिकः

२७--अजादद्वितीयस्य १।२॥ यहां भी एकाच्‌ की अनुदृत्ति आती है अ्रजादि धातुचमोके द्वितीय एकाच्‌ अवयव को द्वित होवे

रे८--तिटि धातोरनभ्यासस्य ॥६।१।८॥ लिट्‌ लकार परे हो ता अनभ्यास धातु फे प्रथम एकाच चौर अजादि घातुके द्वितीय एकाच्‌ अवयव को द्विवचन हषे इस मे विरोष यह्‌ दै कि जहां धतु मे अनेक अच्‌ होते है वहां थम एकाच ओर द्वितीय एकाच्‌ अवयव का कहना बन सकता है, ओौर जिनमे एक ही अच्‌ है वहा उसी एकाच्‌ | को व्यपदेरिवद्‌ भावं से प्रथम एकाच्‌ सानकर ] दिख हो जाता है ¦ यहां भी एकाच अवयव (भूव्‌! मात्र को द्विवचन होकर मूव-मूव्‌-अ" यहां- ३९--प्वांऽभ्यासः ६।१।५॥ विवेचन काजो पूेमाग है वह अभ्यास सं्ञक हो प्रथम (भूव की अभ्यास सज्ञा होकर - ४०--हलादिः शेषः ७। ६० अभ्यास कारादि हल्‌ शेष रहे, अन्य हलोका लोपहो जावे इस से प्रथम भ्भूवकः के ^ त्‌ का लोप होके-मू-. मूब्‌-अ ` .2१-- हस्वः ७! ४। ५६॥ अभ्यास कं अच्‌ को आद हो हृ उकार टा | ४२-- भवतेरः ४।७३ लिट्‌ लकार परेहोतोमू धानु के अभ्यास को अकार यद् हो हस्र उकार को प्रमाणत ्रान्तये से हस्र अकार होकर-- भ~मूव-च्

+त [दमण

~ न~~ ~ + ^

३--अभ्यासे चच | ।४।५४॥ ्मभ्यासर मे जो माल उनको चर ओर जरा आदेश्च हो यहा अकार को धकार हो जाता है।.

92 -अआसद्धवदचत्रामात्‌ ।४। २२॥ इस सूत्र से लेकर इस पाद की समा्िपयेन्त एक प्रयोग मे दो [ समानाश्रय ] कायं प्राप हों तो आभात्‌ शाञ्लीय कायं करते मे च्ाभात्‌ शासनीय काय असिद्ध हो जावे इस से वुक्‌ के आगम को असिद्ध मान कर उवड' अदेश प्राप्त होता है इसलिये-

५१--वा० बुग्युटावुवङ्यणोः कत॑व्ये सिद्धौ वक्तव्यौ & ४।२२॥ उवड श्र यणादेश करने मे बुद्ध रौर युट्‌ का आगम यथास्य करके असिद्ध माने जावे, किन्तु सिद्ध ही समभने व्वाहियं इस से उवड नही हाता बभूव ''भू--अतुसखः यहां गुण प्राह ४द-असयोगाद्िद्‌ कित्‌ १।२।५॥ असंयोगान्त धातुम से परे जो अपित्‌ लिट्‌. वह्‌ कित्‌ सज्ञक होवे तिप, सिप्‌ , मिपके ष्थानमे जो आदे है उन को दोडकर अन्य ्पित्त्‌ समने चाहिये इससे कित्‌ होकर (२४) से गुण नही हता [अथवा पूववत्‌ गुण आदि को बाधकर "बुक हौ जाता है ] भूव +अतुस्‌ = बमुवतु, बभूव +उस्‌ = बभूवुः, बमूव्‌-यल्‌-- ४७--चाधंधातुकस्येड्‌ बलादेः ७।२। ३५॥

१, अचि य्नुधातुभ्रुवा य्वोरियड्वड (जा० १५९ ) सूत्रते।

१४ आख्यातिकः

नि,

अङ्ग से परे जो बलादि आधधातुक उस को इट्‌ का आगफ हो थल्‌ आदि मे इद्‌ होकर -“बभविथः, “बूच + अथुस्‌ = भूवथुः, बभूत्‌+ = बभूवः अभूव + एल्‌ = बभूवः, बभूव + इद्‌ = बभूविव, बभूव + इट्‌ ।-म = बभूविम ईस के पञ्चात्‌ क्रमः से प्रप्र दुर्‌- ४८--अनद्यतने लुट्‌ ३।३। १५॥ पूवे रात्निके मध्यसे लेकर अपर रात्रि के मध्य पर्यन्त अद्यतन काल कहाता है, वह जिसमें हो उस को अनद्यतन कहते है, सो मूत, भविष्यत्‌ दोनो के साथ सम्बन्ध॒रखती है भविष्यत्‌ अनद्यतन के अथं के वाचक धातु से लुट्‌ लकार होवे ¢ 41 -- ट्ट! ४&--स्यतासी ल॒लुटोः॥ ३। १। ३३

यहा किसी अनुबन्धविशेष की सूचना नही की इस से “लु करके लृट्‌ ओर लृङ्‌ दोनो का बोध होता दै ओर यह सूत्र शष्‌ आदि विकरण अत्ययो का अपवाद है [ लु श्नौर ] छट लकार परे होतो धातुसेस्य ओर तासि प्रत्यय यथासंख्य करे हो # यहां खट्‌ के परे तासि हा ५मू-तासि-छट्‌ |

५०--आधधातुकं शेषः ३।४। ११४ धा्वधिकार मे कहे तिङ ओर शित्‌ प्रत्ययो मे भिन्न जो प्रत्ययं

(4.

वे आधेषातुकसंज्ञक होते है इससे चासि प्रत्यय की आधधातुक संज्ञाः ओरछट्‌ के खान मे तिबादि आदेश हीकर--५मू+

१, अहरुमयतोऽधरात्रमेषोऽयतन कार इति पूं वैयाकरणा

द° कोशिका १1 २। ५७

भ्वादिगणः १५ ता्ति--तिपः यहा "(तासिः मे अनुनासिक इकार की इतसंज्ञा छर लोप होकर -

१, तासि के इकर की इत्स होने से “मन्‌--त्‌-जा ( आत्मनेपद की ) इस अवस्था मे ““अनिदिता इर उपधायाः कडिति? ( आ० १३९ >) सूत्रसे नकार का रोप नही होता, क्योकि “मनूत्‌,” अङ्ग इदित्‌ है। महाभाष्य (८६।४।२१) के सिद्धान्तानुसार ““असिद्धवद्राभाव्‌" ( आ० ७४ ) सूत्र मे “जाड” अभिविधि अर्थम है तदनुसार नकार रोप करने मेँ टिरोप के असिद्धहो जनेषे नरोप की प्रािही नहीं है, पुन उसकी रक्षा की क्या चिन्ता जब “आः को मर्यादा अर्थं मे मानकर ““म-अधिकार से पूवं" एेसा अथं करते है तब रिखोप को असिद्धत्व की श्राति नहीं होती, उस अवस्था इकार की इत्सन्ता मानना युक्त है। अन्योंका मत है कि “क्रसो- रछ्छोपः” ( आ० ३५२ ) सूत्र मे अकार का तपर करना (असिद्ध वदत्राभात्‌” नियम के अनित्यत्व का ज्ञापक है ( तपर करने का प्रयो- जन यही है कि "आसीत्‌" इत्यादि मे आकार रोपन ह्यो। अकार रोप करने मे (आमात्‌ नियम बते "जाद्‌ः असिद्धदही हो जायगा, नः उसकेखोप की प्रापि ही नही। इस प्रकार तपर करना व्यर्थं न्होकर ्ञापन करता है कि आभाच्छाखीय असिद्धत्व अनित्य है ) उसके अनित्य होने से “मन्ताः आदि मँ नकारकी रक्षाके य्यि इदिव्‌ करना चाहिये यह मत भी ठीक नही, क्योकि ज्ञापक से दष्ट प्रयोगो की सिद्धि मान्न होती है ( ज्ञापकादिष्टसिद्धि.), ज्ञापक को मान कर छिसी प्रयोग मे दोषोद्धावन नही फिया जाता, यदी समस्त वैयाकरणं का मत है ऊच वैयाकरणो का कथन है कि इकार उच्रारणार्थं है यह भी ठीक नही, उनके मत मे सकार की इत्सज्ञा का निषेध कैसे दोगा महि ने इस सूत्र के अष्टाध्यायीभाष्यमे इकार का प्रयोजन “सकार की रक्षाः छिखा है चह युक्ततर है

१६ प्ख्यातिक

1

^+ 1 [0 9) 0 |) रि "1

५१-- लुटः प्रथमस्य डारौरसः २।४।८१॥ लुट लकार के प्रथम पुरुष कोडा, रौश्रौर रस्‌ आदेश यथासख्य करके हो तिप्‌ के स्थान मडा आदेश टीकर डकार की इत्‌ संज्ञाहोने से तास प्रत्ययके आस्‌ मात्र का लोप हौकर--'न--इ--त्‌-- आः यहा-

५२-- पुगन्तलघूपधस्य ७।३। ८82 ।।

सावधातुक ओौर आधधातुक प्रत्यय परे हो तो पुगन्त मौर लघु बणे जिसङ्मी उपधा मे हो उस [ अद्ध ] को गुण हो इस से इट्‌ के आगम को लघूपध मान कर गुण प्राप्त हुमा, इसलिये-