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बाल-मनोविज्ञान

लेखक

लालजी राम शुक्र, एम० ए०, बी० टो०

[ सरल मनोविशान, नवीन मनोविशान, बाल-मनोबिकास, एलोमेंद

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भ्रव एजूकेशनल साश्कालाजी प्रभ्ृत अंथों के रचयिता ] श्रसिस्टेंट प्रोफेसर टीचर्ज ट्रेनिंग कोलेज काशी हिंदू विश्वविद्यालय

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समतपेणः

विद्यादान- यज्ञ के अग्रगण्य पुरोहित मातृभाषा हिंदी के परम पोषक हिंदू विश्ववद्याल्य के प्राण देशपूज्य

महामना पं० मदनमोहन मालवीय के कर-कमलों में

सादर समपित

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भूमिका

भारतवष में आधुनिक काल में सवंतोमुखी जागृति हो रही है हरएक नागरिक का कठंव्य है कि इस जागृति में भाग ले | भारतवर्ष का प्रत्येक व्यक्ति इस देश को स्वतंत्र राष्ट्र बनाना चाहता है। हम दूसरे देशों से ्रपने आपको नीचा रखने के लिये तैयार नहीं हैं। हम चाहते हैं कि हमें भी दुनियाँ में वही संमान मिल्ले जो दूसरे देश के निवासियों को मिलता है। यह संमान ओर स्वतंत्रता हम तभी प्राप्त कर सकते हैं जब हम अपने आपको उसके थोग्य बनाएँ हमें दुनिया के राष्ट्रों की बराबरी करने के लिये अपने देश की सब प्रकार से उन्नति करना है। सब जद्नति का मूल मातृभाषा की उन्नति है--- निज भाषा उन्नति श्रहे, सब उन्नति को मूल बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटे द्िय को श्ूल्

' भारतेंदु बाबू हरिश्वंद्ध का उपयुक्त दोहा .हरएक भारतीय को सदा मन में दुहराते रहना चाहिए हमारे कितने द्वी देशवासी हैं जो आपस में अपनी भाषा में बातचीत करना अनुचित समभते हैं। जब उन्हें कोई बढ़े ' सुंदर भाव प्रकाशित करने द्वोते हैं तो वे अँगरेजी का प्रयोग करने छगते हैं। एक समय ऐसा था जब कि शअँगरेज लछोग भी अपनी भाषा में पालियामेंट में व्याख्यान नहीं देते थे तृतीय एडवर्ड के पहले हँगल्लेंढ में राज्य-कार्य में फ्राच भाषा का प्रयोग द्वोता था फ्रेंच को छोड़कर उस समय की यूरप की सब भाषाएँ असभ्य समझी जाती थीं। यदि अँगरेजों का अपनी मातृभाषा के प्रति वही पुराना भाव बना रहता तो क्‍या शेक्सपियर, मिल्टन जैसे कवि उस देश में अपनी प्रतिभा दिखा सकते ! जन भाषा का निर्माण भी गत दो सौ वर्षा में हुआ है इसके पहले जर्मन भाषा भी असभ्य भाषा समझी जाती थी

( )

भारतवफ की जागृति का प्रथम शुभ लक्षण यह है कि यहाँ का शिक्षित समाज मातृभाषा का आदर करने छगा है। हमने विदेशी भाषा के द्वारा अनेक विषयों का अ्रध्ययन किया है, पर अपने ज्ञान का थोढ़ा सा भी अंश हम अपनी भाषा में प्रकाशित नहीं कर पाते हमारे अँगरेजी पढ़ने का फल यह होना चाहिए था कि हमारे देशवाले हमारे ज्ञान से ज्ञास उठा सकते देश के बहुत थोड़े ही लोग अँगरेजी पढ़ सकते हैं पर यदि अपनी भाषा में उस ज्ञान को सुल्लम कर दिया जाय तो उसका लाभ सभी लोग उठा सकते हैं। *. इस पुस्तक का यही उद्देश्य है। यह पुस्तक प्रथम उन पाठकों के लिये लिखी गईं है जिन्हें अगरेजी भाषा का बिलकुछ ज्ञान नहीं अथवा अपर्याप्त ज्ञान है और जो मनोविज्ञान के अँगरेजी भाषा में लिखें गए ग्रंथों को स्वयं पढ़कर नहीं समझ सकते इस बात को ध्यान में रखते हुए लेखक ने जिन अनेक अंथकारों के विचार उल्लिखित किए हैं उनके ग्रंथों के नाम तथा पृष्ठ-सूची नहीं दी गई है। इस पुस्तक को लेखक ने एक स्वतंत्र पुस्तक बनाने का प्रयक्ष किया है

बारू-मनोविज्ञान एक बड़ा विषय है, अतएवं इस पुस्तक का उद्देश्य उस विषय में रुचि मान्न पैदा करने का है। यदि लेखक को अपने इस्त प्रयास में प्रोत्साहन मिला तो मातृभाषा की अनेक प्रकार से सेवा करने की आकांक्षा पूरी करने में उसे सुविधा मिलेगी

इस पुस्तक की भाषा साधारणतः बोलचाल की भांषा है। संस्कृत शब्द वहीं प्रयुक्त किए गए हैं जहाँ प्रचक्तित हिंदी शब्द नहीं मिलते अँगरेजी शब्दों को जहाँ तक बना है अलग किया गया है। यदि लेखक बार बार अपने भाव समझाने के छिये अँगरेजी शब्दों की शरण लेता तो उसका मूल उद्देश्य ही नष्ट हो जाता हिंदी भाषा में सरलता से पश्चिमी भाषाओं में प्रकाशित जटिल भावों का प्रकाशन करने इंस पुस्तक के लिखने में मुख्य उद्देश्य है लेखक को विश्वास है कि हिंदी मिडिल तथा प्र।इमरो

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( )

स्कूल में पढ़ाने वाला प्रत्येक शिक्षक इस पुस्तक की भाषा श्रौर भावों को समभ सकेगा यहाँ यह कहना अप्रासंगिक होगा कि लेखक ने इन्हीं बातों को कालेज के छात्रों को पढ़ाया है। ये विषय अँगरेजी भाषा में लिखे रहने के कारण इतने जटिल हो जाते हैं कि एक साधारण ग्रेजुएट इन्हें प्रोफेसर की सहायता के बिना समर नहीं पाता वही बातें मातृभाषा में होने के कारण एक साधारण व्यक्ति भी भल्ती भाँति समझ सकता है। वास्तव में जहाँ अँगरेजी के प्रचार से हमारे देश की अनेक प्रकार से उद्न ते हुई, वहाँ यह भी सत्य है कि उस भाषा में जीवन की मौलिक बातें सिखाई जाने के कारण हमारी बुद्धि की भारी क्षति हुई।

लेखक ने कई एक नए शब्दों का प्रयोग किया है। आशा है पाठक गण लेखक के भावों को समझ जायँगे एक बार भावों को जान लेने के बाद उनका दूसरे शब्दों में प्रकाशित होना सरल हो जाता है। भावी भारतीय मनोवैज्ञानिक नए शब्दों का निर्माण करेंगे उसके अनुसार इस पुस्तक में प्रयुक्त शब्दों में परिवतन होता रहेगा हिंदी भाषा के लेखकों को इस काल में इस स्वतंत्रता की आवश्यकता है कि वे नए शब्दों को किसी विशेष- भाव को प्रगट करने के लिये उपयोग में छा सके यदि हिंदी भाषा कोष पर ही आधारित द्वो जाय तो उसका विकास रुक जायगा हमें सदा नए शब्दों को ग्रहण करते रहना चाहिए तथा पुराने शब्दों का - नए भावों को प्रकाशित करने में उपयोग करना चाहिए यदि हम अँगरेजी भाषा के वैज्ञानिक को देखें तो ज्ञात होगा कि लेखक किसी भी नए भाव के साथ एक नया शब्द भी गढ़ता है भाषा के पंडित लेखक से इतनी ही आशा करते हैं कि वह अपने प्रयुक्त शब्द का अर्थ अपने लेख में स्पष्ट कर दे पुराने शब्द भी वैज्ञानिकों द्वारा नए-नए र्थों में प्रयुक्त किए जाते हैं

इस पुस्तक के लिखने के पूर्व लेखक ने कुछ लेख भारतवर्ष की कुछ पन्निकाओं में इस विषय पर छिखे | उल्लेखों के पाठकों छइसेकु थे

( ४)

और प्रोत्साहन मिला; अतएव लेखक को यह साहस हुआं कि वह अपने विचारों वा अध्ययन के फल को पुस्तक रूप में जनता के समत्त रखे लेखक उन सब पत्नों का, विशेषकर 'बालहित? और “वीणा' का अनुगृहीत है।

श्रद्देय श्री पंडित रामनारायण मिश्र जी की कृपा से ही क्षेखक का संकल्प सफल हुआ वास्तव में पंडित जी ने ही लेखक को लेखक बनाया। हमारे देश में कितने ही ऐसे प्रतिभाशाली व्यक्ति हैं जिनकी प्रतिभा अपना प्रकाश दिखाने का अवसर पाने के कारण श्ञांत हो जाती है; कितने ऐसे उत्साही नवयुवक हैं जिनका जोश स्वार्थी एवं अभिमानी शक्ति- संपन्न लोग अ्रपनी उपेक्षा द्वारा ठंढा कर देते हैं। पंडित रामनारायण मिश्र जी उन व्यक्तियों में हैं जो अपने आप ऊँचे उठकर सदा दूसरों को भी ऊँचा उठाने और प्रोत्साहित करने में लगे रहते हैं। आप नागरीप्रचारिणी सभा के जन्मदाताओं में से हैं। हिंदी भाषा के आप स्तंभ हैं और अनेक युवकों को आपने हिंदी भाषा का लेखक बनाया। यह ग्रंथ आपके प्रोत्साहन का ही फल है।

अंत में लेखक अपने गुरु रायबहादुर पंडित लज्ञाशंकर का के प्रति कृतज्ञता प्रकट करता है जिनकी कृपा से उसे बाल-मनोविज्ञान में रुचि पैदा हुईं और जिनके कारण बालकों की समस्याओं का अध्ययन करने का डसे सुअवसर प्राप्त हुआ

काशी विश्वविद्यालय, |

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परिच्छेद क्रम , बाल-मन के जानने की आवश्यकता « बाल-मन का अध्ययन

» बाल-मन के अध्ययन के उपकरण

, वंशानुक्रम ओर वातावरण

« बालकों का स्वाभाविक व्यवहार

« मूल प्रवृत्तियाँ

» बालक की मूल प्रवृत्तियों का विकास . अनुकरण

. निर्देश

, खेल

. खेल ओर शिक्षा

. संवेग

« बालकों का भय

, आदत

, बालकों का झूठ

« बाज़्कों की चोरी की आदत ; , बालकों का इंद्रिय-ज्ञान और निरीक्षण * « ब्रालक की कल्पना

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विषय सूची

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परिशिष्ट

भाषा और विचार विक से बुद्धिमाप |

बालक के विकास की अ्ंबसधाएँ ||

[१] बुद्धिमापक प्रश्नों के नमूने [२] बड़ों के जानने योग्य कुछ बातें शब्दावली

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बाल-मनो विज्ञान

“- ... पहला परिचलेद बाल-मन के जानने की आवश्यकता

बालक को सुयोग्य बनाना--कौन ऐसा पिता द्वोगा जिसे अपने पुत्र को सुयोग्य, चरित्रवान्‌ तथा प्रतिष्ठित व्यक्ति बनाना अच्छा लगता हो कौन ऐसी माता होगी जो अपने बेटे को सदा सुखी देखना चाहेगी, ओर कौन ऐसा शिक्षक होगा जो अपने शिष्य की धन, बल, कीतिं एवं ऐश्वय की वृद्धि ' सुनकर प्रसन्न होगा। हम सब यही चाहते हैं कि हमारी . संतान और हमारे संरक्षकों की हर बात: में दिन दूनी और रात चौगुनी वृद्धि हो, उनका भविष्य - उज्वल- हो और उनको मसान-मर्यादा बढ़े। माता-प्रिता अपनी सुयोग्य संतान, से आदर पाते हैं और संसार में उनके कारण ही स्मृत. रहते हैं. तथा शिक्षक॑ लोंग अपने शिष्यों के कारण अमरत्व को प्राप्त करते .

हैं। आज हम दशरथ-कोशल्या, नंद-यशोदा, शुद्धोदन-माया. .

. तथा शाहजी-जीजीबाई का नाम - कदापि. सुनते यदि उनके. . राम, कृष्ण, बुद्ध और शिवाजी . जैसे सुयोग्य . पुत्र न.होते। इसी ..

५...)

तरह वशिष्ठ, शतानंद, रामानंद, रामदास का नास उनके शिष्यों के कारण याद रहता है। जो व्यक्ति किसी समाज वा राष्ट्र का सुधार करना चाहता है उसे चाहिए कि उसके बालकों पर ध्यान दे। किसी भी समाज में 'सुयोग्य बालक अपने आप 'नहीं हो :जाते। समाज के वयरक लीग ही भत्ते बालकों का 'निर्माण करते हैं। माता- पिता तथा शिक्षक लोग यदि योग्य हों और कतंव्य का पालन / भल्नी भाँति करें तो यह कदापि संभव नहीं कि उनकी संतान . दुराचारी और दुःखी बने। . बालक के स्वभाव के विषय में अनभिज्ञता-- हम सभी लोग. बालकों का पालन-पोषरँ करंते. हैं पर हमारा बालकों हा स्वभाव के विषय में कितना परिमित ज्ञान है इसके : बारे में हमने कभी विचार ही नहीं किया है। इतना ही नहीं, हम. इस ज्ञान; के प्राप्त करने की उत्सुकता भी. नहीं रखते हम अपने आपको इस विषय में अज्ञ भी नहीं मानते अज्ञान का एक लक्षण यह है कि उससे आवृत बुद्धि में मनुष्य को यह भावना भी नहीं होती कि वह अज्ञ है। हम सोचते हैं कि हम .. सभी एक समय बालक रहे हैं. अतएव हमें अपना अनुभव याद - : ही है, अब ओर नया क्या जानना है। दूसरे, हमें अपने दूसरे _ ... कामों. से फुरसत भी नहीं मिछ्ती कि हम बालक की साधारण : क्रियाओं.पर ध्यान दें। वे इतनी तुच्छ दिखाई देती हैं.कि.उन : पर ध्यान आकर्षित होना संभव नहीं।. . ;: “पर हमें जानना चाहिए.कि हम बालक के मंन के. विषय '. :: -में बहुत ही कम ज्ञान, रखते 'हैं। हम अपनी बाल्यावस्था के . . चझजुभवरों को विस्मृत कर चुके हैं, ओर जो कुछ हमें याद भी. :/::« है बह परिवर्तित रूप में याद है। हम बालकों के अनुभवों

( )

को अब बालक की दृष्टि से नहीं देखते, बल्कि प्रोढ़ दृष्टि से देखते हें। हम ,उनके जीवन की छोटी छोटी बातों का महत्व नहीं जानते इन्हीं छोटी बातों में बालक के बड़प्पन की जड़ है |

. जानकारी को इच्छा .का दमन--एक नन्‍हा बच्चा सदा किसी किसी चीज को पकड़ने की कोशिश किया करता है। हम उसके हाथ से अनेक चीजें छुड़ाया करते हैं। बालक एक नई चीज को जब देखता है तब उसकी ओर दौड़ता है, उसे पकड़ने की कोशिश करता है; जब वह हाथ . में जाती . है तब उसे मसलता है, जमीन पर उसे पटकता है और फिर उठाता है। यदि वह तोड़ने योग्य चस्तु हुईं तो उसे तोड़ डालता है। उसे इसमें प्रसन्नता होती है। हम बच्चे को यह सब करने से प्रायः रोका करते है, पर यह हमारी कितनी भूल है, इसे बाल-मनोवेत्ता भली भाँति जानते हैं। बालक का . बाह्य जगत का ज्ञान उसकी अनेक प्रकार की क्रियाओं से ही बढ़ता है। संवेदना तथा स्पशेज्ञान की मित्ति के ऊपर और सब प्रकार का सनुष्य का ज्ञान स्थित हे। और स्पशेज्ञान हमारी अनेक प्रकार की शारीरिक क्रियाओं पर निभर है। जो बालक जितना

## . चंचल होता है वह संसार के बारे में उतना ही अधिक ज्ञान आप्त करता है।

.. दमन का दष्परिणाम--जब हम किसी बालक की

-चंचलता को डॉँट-डपटकर रोक देते हैं तब उसके मन में हर '. एक नई वस्तु के प्रति एक प्रकार का अज्ञात भय हो जाता है। उसकी स्वाभाविक क्रियात्मक वृत्तियों का अवरोध - होने, लगता है। वह जब बड़ा होता है तब हरएक काम करने में दिचकिचाने - . ज्लगता है। उसके मन में एक प्रकार की प्रंथि पैदा ही जाती

( ४)

है, जिसके कारण वह संसार में आगे पेर रखने में सदा डरता है | वह बहुत से मनसूबे करके भी कुछ भी चरितांथ नहीं कर पाता वह बुंद्धि-हीन, उत्साह-हीन तथा श्रकमंण्य बनकर अपना जीवन व्यतीत करता है दूसरे सभ्य देशों से तुलना--किसी व्यक्ति के बढ़प्पन की नींव उसकी बाल्यावस्था में ही पढ़ती है। संसार के दूसरे सभ्य देशों में बालक के मन का कितना अध्ययन किया जाता है और उसकी जानकारी के अनुसार बालक के छालन पालन में क्‍या क्या बातें की जाती हैं, इसका भारतवर्ष के निवासियों को थोड़ा भी पता नहीं। वे लोग अनेक प्रकार की रंग-बिरंगी चीजें छोटे छोटे बच्चों के सामने टाँग देते हैं जिससे उनका रंग का ज्ञान बढ़े। अनेक प्रकार के खिलौनों का आविष्कार करत हैं जिससे उनका स्पर्श-ज्ञान बढ़े और उनके 'सनायु पुष्ट हों। बालकों की शिक्षा-प्रणाली में भी नए नए आविष्कार हो .रहे हैें। इन सबका जानना हमारा परम कतेंव्य है शिक्षक और बाल-मन--शिक्षकों को बालक के मन की जानकारी की विशेष आवश्यकता है। शिक्षक का कतंव्य यही नहीं है कि वह बालकों की किसी विशेष विषय में जानकारी बढ़ा दे। उसका यह कतंव्य तो है ही, पर उससे भी अधिक उस्रका कतव्य यह है कि वह अपने संरक्षण में रहने वाले बालकों 'का चरित्र-गठन करे जो बालक सब प्रकार से बली होता है वही सुखी रहता है| शिक्षकों का कतंव्य बालकों का शारीरिक : . बल और बुद्धि-बल बढ़ाना है। पर उन्हें विशेष ध्यान चरित्र.

*. पर देना चाहिए। जिस व्यक्ति में चरित्र-बल नहीं वह दूसरी

सब प्रकार की विभूतियां का सदुपयोग नहीं कर पाता, अतंएंव

( )

'उनके रहते भी दुःखी रहता है। चरित्र-हीन व्यक्ति अपनी सत्र

'विभूतियों को अंत में खो देता है चरित्र-गठन--बालकों का चरित्र-बल शिक्षा द्वारा ही

बढ़ाया जा सकता है। पर मनोविज्ञान की जानकारी के बिना 'सुयोग्य शिक्षा संभव नहीं। वास्तव में शिक्षकों में मनोविज्ञान की अज्ञता के कारण शिक्षाल॒यों से ऐसे व्यक्ति निकलंते हैं जो अपने शिक्षकों को अनादर की दृष्टि से देखा करते हैँ, उनमें 'लोकोपकार का तो भाव ही रहता है और योग्यता जिस व्यक्ति की बाज्ञपन में भली आदतें नहीं बन जातीं वह सदा अपने जीवन को भाररूप बना कर ढोता है। जहाँ भलो आदतें नहीं बनतीं वहाँ बुरी आदतें अपने आप बन जाती हैं। वह मनुष्य अपनी बनाई जंजीरों में ऐसा जकड़ जाता है कि उनसे उसका मुक्त होना असंभव हो जाता है। शिक्षकों को चाहिए कि वे बालकों की अनेक प्रकार की चेथ्टाओं, क्रियाओं और मानसिक शक्तियां का अध्ययन करें। बिना बालक के मन को जाने, उसमें होने वाली अनेक गुप्त क्रियाओं को बिना समझे बालकों का चरित्र-गठन संभव-नहीं। जो शिक्षक इस. विषय में 'ज्ञितनी जानकारी बढ़ाता है, वह उतना ही अपने आपको शिक्षा के काय के लिये योग्य बनाता है।

बुद्धि-विकास---जिस प्रकार चरित्र-गठन के लिये बाल-मन 'के जानने की आवश्यकता है, उसी प्रकार साधारण बोद्धिक शिक्षा देने.के लिये भी .शिक्षकां को बाज्-मन का भली भाँति अध्ययन करना आवश्यक है। फ्रांस के सुप्रसिद्ध विद्वाव्‌ रुसो अपनी इमील नामक पुस्तक में लिखते हैं कि बालक का मन ही शिक्षक की पाठ्य... पुस्तक है जिसे उसको पहले प्रृष्ठ से लेकर अंत तक भली भाँति अध्ययन करना चाहिए। जो शिक्षक बालकों की साधारण

( ६)

सानसिक क्रियाओं के बारे में ज्ञान नहीं रखता वह बालकों के मन में /कोई ज्ञान कदापि इस प्रकार नहीं बेठा सकता जिससे वह चिरस्थायी रहें ओर उसके जीवन में समय समय पर काम आए वर्तमान समय में बालक एक कक्षा में बैठकर पढ़ते हैं यदि पाठ रुचिकर नहीं होता तो बालकों का ध्यान उसपर आकर्षित होकर इधर उधर दौड़ता है। यदि केवल कुछ लड़कों का ध्यान इधर उधर दोड़ा तो सब लड़कों का ध्यान भंग हो जाता है। इसलिये शिक्षकों को यह जानना अति आवश्यक है कि वे अपना पाठ कैसे रुचिकर बनाएँ। इसके लिये उन्हें. बाल-मन का अध्ययन करना चाहिए। उन्हें बालकेा की स्वाभाविक भ्रवृत्तियां को जानना चाहिए। उनकी स्वाभाविक श्रवृत्तियां के आधार पर ही पहले पहल उनका ध्यान आकर्षित किया जा सकता है।

इसी तरह शिक्षकों को बालकों के इंद्रिय-ज्ञान, स्पर्श-ज्ञान, कल्पना, स्वृति तथा विचार करने की प्रक्रियाओं का पूरा पूरा ज्ञान होना चाहिए। शिक्षकों को यह जानना आवश्यक है. कि बालक की अनेक मानसिक शक्तियों का विकास किस. प्रकार होता है और वे शक्तियाँ किन किन बातों पर निर्भर हैं वातावरण ओर पैत्रिक संपत्ति का मनुष्य के विकास में क्‍्यां स्थान है। उन्हें यह भी जानना है कि प्रखर बुद्धि वाले तथा साधारण बुद्धि और मंद बुद्धि वाले बालकों को कौन कौन सी भिन्न भिन्न रीतियों से पढ़ाया जाय कि वे शिक्षा से अधिक से अधिक लाभ उठा सकें |

.. दूसरा परिच्छेद बाल-मन का अध्ययन

.. शिक्षकों का यत्न--बालमन का अध्ययन कई प्रकार के छोगां ने किया है। बालमन का वतंमान ज्ञान उन्हीं लोगों के अध्ययन के आधार पर है। पहले पहल इस ओर शिक्षक लोगों की दृष्टि गई। शिक्षकों का कई प्रकार के बालकों से संपर्क होता है। उनमें कितने ही प्रखर बुद्धि वाले होते हैं और कितने मंद बुद्धि वाले। असाधारण बालक की ओर. शिक्षक का ध्यान अवश्य आकर्षित होता है. क्योंकि हर एक असाधारण बालक शिक्षक के लिये समस्या बन .जाता है। साधारण बुद्धि वाले बालकों को शिक्षक जैसे तैसे पढ़ा लेता है पर मंद बुद्धि वाले बालकों को वह कैसे पढ़ाए फिर कोई कोई बाह्यक : बढ़े उत्पाती होते हैं। उनको काबू में रखना भी शिक्षक के छिये एक भारी समस्या रहती है। जब और सब बाढ़क अपने पाठ.सीखने. में छगे रहते हैं. तब उत्पाती बालक दूसरे के साथ कुछ शरारत करने की योजना बनाते हैं उन्हें दूसरे: बालके और शिक्षक को चिढ़ाने में मजा आता है।! कई; बालक झूठ बोलने; चोरी करने, गाली देने और. मार -खाने: में भी विचित्र प्रकार का आनंद. अनुभव करते . हैं। ऐसे

( )

बालक हर एक शिक्षक को मिछा ही करते हैं। साधारण शिक्षक उनकी बुराइयों के कारण ढूँढ़ने में असमर्थ रहता है। पर कुछ प्रखर बुद्धि वाले शिक्षकों ने इन बातों की खोज करना ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया है। किसी शिक्षक की दृष्टि मंद बुद्धि वाछे बालक की ओर आक- षिंत हुई तो किसी की उत्पाती बालक की ओर। उन लोगों, ने अपने परिश्रम से ऐसी खोजें की हैं जो भविष्य में सब शिक्षकों के लिये उपयोगी होंगी। बेलजियम में सिगमंड ओर इटाड तथा इटली की सुप्रसिद्ध मेडम मांटसोरी उन व्यक्तियों में हैं. जिन्होंने. अपनी खोजों के द्वारा अल्प बुद्धि वालों तथा शिशुओं के लिये नई शिक्षा-प्रणाली- की रचना की. है.।: इसी 'तरह- डाक्टर. ह्ोमरलेन और -सिरियिल बर्ट ने भी. उत्पाती' बालकों के बारे में बहुमूल्य बातें बताई हैं। .. - | - . डाक्टरों का यत्र--शिक्षकां के अतिरिक्त डाक्टर छोंगों..

ने भी बालमन के ज्ञान के लिये बहुत प्रयत्न किया. है-। इनमें डॉक्टर :विने, फ्राइड, होंमरलेन के नाम प्रसिद्ध हैं। डाक्टरों को बालकों की अमेक प्रकार की बीमारियों की. जानकारी रहती है। उन्हें उन बीमारियों का कारण खोजना पड़ता है। डाक्टरों को प्रायः हम॑ लोग शारीरिक रोगके निवारण के लिये ही चुलायाःकरते हैं। वे छोग इसके लिये! कुछ ओषधि हमें देते हैं अश्ववा यदि कोई फोड़ा फुंसी हुई तो चीरफाड़ करते हैं; घर कह एक शारीरिक रोग ऐसे भी. होते हैं जिनकी जड़. मेन में रहती है; जो कितनी ही दवा करने से भी अच्छे नहीं होते /जब कुछ डाक्टरों का ध्यान ऐसे रोगों पर गया तब वे

सनुष्य के मन का अध्ययन करने छगे। उनके यत्न से बालक. ...

... के मन के बारे में हमारी जानकारी बहुत कुछ बढ़ गई।

( )

डाक्टर बिने ने मंद बुद्धि वाले बालकों का अध्ययन किया और बुद्धिमाप का तरीका निकाला है.। आधुनिक काल में बुद्धि- “माप एक वैज्ञानिक वस्तु समझी जाती है।'बालकों की बुद्धि माप कर हम,उनको अपने भविष्य का. काय निमश्चित करने-में सहायता दे सकते हैं यूरोप में मंद बुद्धि ओर अल्प बुद्धि वाले बालकों के लिये विशेष प्रकार के. शिक्षालयों का. प्रबंध है और शिक्षा का क्रम भी विशेष. रहता है। बुद्धिमाप का, विचार डाक्टरों से : ध्राया। तो भी आज इसे मनोवैज्ञानिकों ने अपना लिया है। डाक्टर फ्राइड, डाक्टर. युंग और दूसरे लोंगों ने. उन्‍्माद रोग़ का; अध्ययन किया-। कितने > मानसिक रोगों की जड़ बाल्य- काल- में रहती है। अतएव इन-लोगों को बच्चों, के जीवन का भी भलो भाँति अध्ययन करना पड़ा। डाक्टर फ्राइड एक विज्ञान के निर्माता माने जाते हैं जो चित्त-विश्लेषण . विज्ञान के नाम से प्रसिद्ध है।. चित्त-विश्लेषण द्वारा कितने: ही: वयस्क . व्यक्तियों का - बाल्यकाल जाना. गया: है,। , इन - को बारूक के. मन के बारे में हंमारी जानकारी: विशेष: ' | :... मनोविज्ञान-वेत्ताओं का यत्न*-शिक्षको' और डाकटरें

न्नें ज्ञो काम किया उससे बाल-मनोविज्ञान' बनाने में बड़ी सुविधाः .. ' पढ़ी॥ : उनकी खोजों को: बाल-मनोविश्ञान - में रुचि: रखने बाल - ..

ध्वयक्तियों ने एकत्रित किया. और स्वयं भी कई“लई7 खोजें:कीं)

. इस प्रकार एक नए बिज्ञान की रचना दो गई जों संसार के लिये! पा अति उपयोगी है। वास्तव में शिक्षक ओर डाक्टरों में ही बढ़े...

बड़े. मनोवैज्ञानिक हुए हैं। पर इनके अतिरिक्त भी, कुछ ऐसे . “लोग हैं जिन्हेंने बालक के मन का अध्ययन किसी दूसरे काये में . विधा पाने के. लिये नहीं किया वरंन्‌ उस विषय में ही रुचि

( ९१० )

रहने के कारण किया है। इस काय में यूरप की महिलाओं का कार्य बड़ा प्रशंसनीय है। कितनी ही महिलाओं ने बांजक की

खेल की प्रवृत्ति, नई बातें जानने की उत्सुकता, अनुकरण को. प्रवृत्ति तथा भाषा सीखना आदि बातों का बड़ी लगन तथा परिश्रम

के साथ; बड़ीं सूच्तम दृष्टि से अध्ययन किया है

शिक्षित माता-पिताओं का यत्न---बाल-मनोविज्ञान के. रचने भें उन लोगों का भी हाथ है जिन्हेंने श्रपनी संतान केविषय में छोटी-छोटी बातें की जानकारी रक्खी और उनको लिखकर '

डायरियाँ बनाई'। वास्तव में शिक्षक, डाक्टर और वैज्ञानिक

बालक की भावनाओं ओर. श्रनेक चेष्टाओं के विषय में ' उतना नहीं जान सकता है. जितना कि उसके माता-पिता जाने सकते. हैं। शिक्षक को अवश्य बालक के मंन के विषय में” अधिक जानने का अवसर मिलता हैं, पर हर एक बाज्क कें' घर की अवस्था एक शिक्षक के लिये जानना संभव: नहीं। तथा बांरूंक शिक्षक के सामने उतना. स्वतंत्र नहीं रह सकता जितना” वह. अपने माता-पिता के सामने रहता है। अतएव उसकी

अनेक स्वाभाविक क्रियाओं का अवरोध होता है। शिक्षक के लियें बालक का पूरां स्वभाव जानना उतना सहज नहीं है जितना माता-पिता के लिये है। फिर किसी अपरिचित व्यक्ति के लिये तो- बालक का स्वभाव जानना और भी कठिन है। अतएब डाक्टर ओर मनोवैज्ञानिक: बालक की. चेष्टाओं के बाह्य रूप को ही देख:

. पातिं हैं। उनके लिये उसकी: अंतरःभावना को सममना बहुत ही... सासने आते ही बालक की सहज क्रिया... रुक जाती हैं।। इसलिये वे: बालक के असली: स्वभाव को: नहीं:

द् कठिन होता है: उन्तके!सा

जान पाते

|

माता-पिता की. बालमन. जानने;की सरोग्यंता-- यदि; . हा

( ११ )

माता-पिता ही बालक के मन का अध्ययन करें तो अवश्य बालक के मन के बारें में सच्चा ज्ञान पेदा हो। पर माता- पिताओं से भी अपनी संतान की चेष्टाओं के समझने में. भूल हो सकती है। वे अपनी संतान के कामों को निष्पक्ष: भाव से नहीं देख पाते। अपने बालक की. बुराइयें की ओर माता-पिताओं , की दंष्टि नहीं रहती। अतएब -साधारण माता पिता इस योग्य नहीं ज्ञो मनोविज्ञान के लिये. उपयुक्त: बांतें बाठमन के विषय में बताएँ। दूसरे, उनसे बाछूक की क्रियाएँ देखने. में! तथा उनको याद रखने में कई ऐसी भूलें: हों सकती हैं' जिनके कारण एक विश्वसनीय विज्ञान का निर्माण

नहीं हो सकता पर यदि मांता पिता को इस प्रकार की शिक्षा मिलतेः

जिससे कि वे निष्पक्ष दृष्टि से अपनी संतान की क्रियाओं. का विवेचन कर सकें तो अवश्य उनकी बातें बाल-मनोविज्ञानः के रचने में बहुत सहायक होंगी। जब स्वयं मांता-पिता ही मनोवैज्ञानिक होते है तो. अवश्य उनका निरीक्षण बाल-मनों- विज्ञान के रचने में लाभकारी होता है। डाक्टर: स्टन और उत्तकी पत्नी ने अपने दो बच्चों को अनेक चेष्टाओं से उनकी:

शारीरिक और मानसिक वृद्धि के. विषय में बारीकी के साथ,

ध्यान दिया, उनको. एक डायरी में छिखा। .इस प्रकार “दोनों:

«बालकों, की विस्तृत जीवनी तैयार हुई। इसके आधार पर को | डाक्टर स्टूने ने बालकों के मन के बारे में अनेक उपयोगी :.

खोजें की हैं

हर. एक मांता-पिता अपने बालक की अनेक चेष्टाओं हु

का अध्ययन कर सकता है ओर उंसके आधार पर समाजोपयोगी अनेक अच्छी अच्छी बातें बालक की मानसिक क्रियाओं के बारे में बता सकता है।

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चित्त विश्लेपकों का यत्न---आधुनिक कार में चित्त- “विश्लेषण-शासत्र बहुत उन्नति कर रहा है। इसके द्वारा बहुत सी मानसिक बीमारियाँ अच्छी को जा रही हैं। असाधारण स्म्र॒ति “व्यक्ति-विच्छेद, हिस्टिरिया इत्यादि रोग इससे अच्छे किए जाते ःहै। इन बहुत से रोगों की जड़ शैशवावस्था के संस्कारों में है। अतएव विश्लेषण में भी बाल-मनोविज्ञान की विशेष आवश्यकता है ओर इस ज्ञान के बढ़ाने में चित्तविश्लेषण-शासत्र ने पर्याप्त 'काय किया है। चित्तविश्तेषण के द्वारा. किसी भी व्यक्ति के 'बाल्यकाल के अनुभव को जो कि विस्मृत हो चुका हो, स्मृति में 'त्ञाया जा सकता है। चित्तविश्लेषण-शासत्र के अनुसार हमारे 'किसी भी अनुभव के संस्कार नष्ट नहीं होते वे गुप्तावस्था में रहते हैं और समय आने पर अपना काम करते हैं।इन “संस्कारों को पुनः स्मृति में छाने से बहुत सी बीमारियाँ आराम 'हो जाती हैं | | चित्तविश्छेषण-वैज्ञानिकाों के अनुसार बाल्य-काल ऐसा 'समय है जब कि बहुत सी मानसिक ग्रंथियाँ पड़ जाती हैं ओर वे हमारे अव्यक्त मन में स्थान पा लेती हैँ। चित्त-विश्लछे चण की खोज ने हमारे बालमन के जानने में बड़ी सहायता दी है। उनके प्रयत्न के विषय में हम आगे किसी परिच्छेद मेँ विस्तारपूबक कहेंगे

तीसरा परिच्छेद

बालमन के अध्ययन के उपकरण

मानेवैज्ञानिक लेग मन की क्रियाओं के अभ्रध्ययन के ढिये" प्राय: निम्नलिखित उपाय काम में लाते हैं--

(१ ) अंतदंशन

(२) निरीक्षण

(३ ) प्रयोग

(४ ) प्रश्नावली

(४ ) डायरी

(६ ) तुलना

(७ ) चित्त-विश्लेषण

अंतदशन--अंतदेशेन का अथे अपने अंदर देखना:

होता है। यह उस क्रिया का नाम है जिससे एक व्यक्ति: अपने मन के भीतर होने वाले विचारें, संवेगां और अनेक क्रिया- - ' के ऊपर ध्यान देता है। इसलिये यह उपकरण विशेष कर प्रौद़ छोगों के मन के अध्ययन में अधिक सहायता देता है। फिर भी बाल-मन के अध्ययन में भी यह उपकरण गौण रूप से सहायता देता है। वास्तव में वह क्रिया प्रौढ़ व्यक्ति को बाल-सर्न की क्रियाओं ओर विचारों के व्यक्त करने में सहायता देती है।:

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'जिस व्यक्ति को अंतदेशन की आदत है उसे जब क्रोध आता है तब वह क्रोध के संवेग का अनुभव तो करता ही है, पर उस संबेग के ऊपर विचार भी करता है। क्रोध आना तो 'हर एक व्यक्ति का अनुभव है, पर क्रोधित अवस्था में क्रोध पर 'बिचार करना किसी बिरले ही मनुष्य का काम है। ऐसा करने में अपने आपके प्रति एक प्रकार का साक्षीभाव आना चाहिए। इस साक्षीभाव के आए बिना अपनी मानसिक क्रियाओं के ऊपर दृष्टि डालना संभव नहीं। भारतवर्ष में तो अंतर्निरीक्षण की क्रिया के होने की संभावना में कोई संशय 'नहीं उठता, क्‍्येंकि यहाँ की संस्क्ृति में योगाभ्यास के प्रति श्रद्धा भरी है। योग में चित्तवृत्तिनिरोध का मांगे दर्शाया गया है “योगश्रित्तबृत्तिनिरोध:” अतएव चित्तवृत्ति क्‍या है और उसका निरीक्षण किस प्रकार हो सकता है--इसके बिषय में हमें संदेह नहीं पर पश्चिम में ऐसे प्रश्न उठा करते हें। अतएव ऐसे छोग मनोविज्ञान की इस रीति को योग्य नहीं समभते

पर हमें तो यहाँ इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि बालमन के अध्ययन के लिये मनोविज्ञान के इस विशेष उपकरण की उतनी आवंश्यकता नहीं होती जितनी कि दूसरे उपकरणों की। पर हाँ, इसके बिना भी काम नहीं चल सकता। जिस व्यक्ति को साधारण मनोविज्ञान का ज्ञान नहीं उसके लिये बाल-मनो विज्ञान का समझना भी कठिन होता है वास्तव में हम अपने मन . की क्रियाएँ समभकर ही दूसरें के मन की क्रियाएँ जानते हैं। यह बात अवश्य है कि हम बालक के मन से बहुत दूंर अतएव उसके मन में होने वाली अनेक क्रियाओ' के समभने में हमसे भूल हो सकती है। पर यह कदापि नहीं कहा जा

हि

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सकता कि हम अपना . मन समझे बिना दूसरे लोगों का मन सममे सकते हैं. अथवा: बालक के सन के विशेषज्ञ हो सकते हैं। अतएवं कुछ कुछ अंतदशेन की आबश्यकता बाढूमन

. के अध्यन में अवश्य है।यह उपकरण किसी भी प्रकार हेय

अथवा अवांहनीय नहीं समभा जा सकता। वरन यह कहा जा सकता है कि यह उपकरण बाल-मन का अध्ययन करने में अपना विशेष स्थान रखता है। -

निरीक्षण---यद््‌ बाछ-मनोविज्ञान के लिये सबसे मुख्य उपकरण है। इस उपकरण द्वारा मनोवैज्ञानिक बाछक के अनेक व्यवहार जानने की चेष्टा करते हैं, ओर अपने निरीक्षण में आई हुई बातों को लिखते जाते हैं। बालंक स्वाभाविक रूप से

अपनी चित्तवृत्ति ओर भावनाओं के अनुसार काम करता रहता...

है। उसका उठना, बैठना, बोलना अथंबा हाथ पैर हिलाना आदि जितने व्यापार हैं, सब वह स्वभावतः करता रहता है। इन व्यापारों में उसकी आयुबव्ृद्धि के साथ साथ परिवतेन होता रहता है। निरीक्षक को सिर्फ इतना ही करना होता है कि वह बालक के काय में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप करे उसका काम केवल बालक के कार्यों का निरीक्षण करना और उन्हें लिख लेना है। निरीक्षक को इस बात का अवश्य ध्यान रखना

,+ चाहिए कि बालक और हम (प्रोढ़ ) भिन्न भिन्न अवस्था: में ; :रहने वाले हैं और बाछक हमारे .लिये एक बाहरी अनजान

व्यक्ति है। इसलिये हमें यह भली!भाँति. जानना चाहिए. कि बालक: किस प्रकार अपने भावों, ओर विचारों को व्यक्त करता है। हम. लोग प्रायः यह: समभते हैं. कि बालक का: मस्तिष्क

.. बढ़ा.साधारंण है और उसका समभना भी सरल है; पर बालक

के, स्वभाव की सरढरूता और भोलेपन के ही. कारण. उसे सममभना

_ जड़

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कठिन हो जाता है। बालक के भावों और विचारों को समझना बड़ा कठिन है। साथ ही साथ बालक का अनुभव नहीं के बराबर होता है। ऐसी हालत में बालमन के अध्ययन में निरीक्षण के उपकरण को काम में लाते समथ निरीक्षक को बहुत सावधान रहना चाहिए। मनोवैज्ञानिकों ने निरीक्षण करने के: लिये कुछ बातें बताई है जिनपर ध्यान रखना चाहिए। उनमें से कुछ बाते' हम नीचे देते हैं--

(१) निरीक्षक को चाहिए कि बच्चो' को जैसा-जैसा व्यापार करते देखे वैसा ही लिखे और उन क्रियाओ' का जो अथ वह लगाए उसको भी अलग-अलग लिख ले। इसमें असावधानी नहीं करना चाहिए

(२) अपने निरीक्षण का अथ लगाने में निरीक्षक को बालक की सरलता तथा स्वाभाविक स्वतंत्रता पर पूरा ध्यान रखना चाहिए ओर यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि उसे इस दुनिया का कुछ भी अनुभव नहीं है। ऐसा ध्यान रखते हुए उसे अपने निरीक्षण के नतीजे पर पहुँचना चाहिए

(३ ) निरीक्षक को किसी व्यापक नत्तीजे पर पहुँचने के लिये: उसकी वास्तविकता को ठीक-ठीक समझ लेना चाहिए

हमने ऊपर तीन बातें ऐसी बतलाई हैं जिनका ध्यान निरीक्षकें को. रखना आवश्य है। साथ ही साथ' इस बात / पर अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि निरीक्षण करते समय ! बाछक के स्वतंत्र तथा स्वाभाविक क्रिया-कलाप में किसी*भीं

|. प्रकार की अड़चन न.पड़े क्योंकि किसी प्रकार की भी. अड्चन - »आ जाने से बाछक का व्यापार- स्वतंत्र: नहीं रह: जाता॥ “यह

£अड्चन खास तौर से बच्चोको उस समय पढ़ती है। जन्न उनके: “आदर लज्ञा अथवा मेप की भावना जाती है | जब कोई

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अपरिचित व्यक्ति बाछक के पास आता है तो वह सहम जाता' है, जिससे उसके स्ततंत्र और स्वाभाविक कार्य में रुकावट और बनावटीपन जाता है। इसीलिये मनोवैज्ञानिकों

उपकरण का प्रयोग माता, पिता अथवा घनिष्ठ संबंधियों द्वारा ही करने का आदेश दिया है इनमें भी माता सबसे उपयुक्त है क्योंकि माता के संपक में बालक जिस स्वतंत्रता से अपने स्वाभाविक आचरण का प्रदशन करता है उतनी स्वतंत्रता और किसी के संपक में नहीं दिखाता | हाँ, यह अवश्य है कि इस निरीक्षण के लिये माता की इस विषय की जानकारी बहुत जरूरी है। बिना विषय के ज्ञान के माता ठीक-ठीक निरीक्षण नहीं कर सकती। इसलिये इस विषय के लिये माता को खास तरह की शिक्षा की जरूरत है; क्येंकि इसके बिना माता- पिता के अंदर स्वभावत:ः अपने बच्चों के प्रति पक्तपात की भावना जाती है और वे अपने बच्चों के विषय में कोई: ऐसी बात नहीं लिखना चाहते जो निरीक्षण के अंदर तो आती है पर अपने बच्चों के लिये वैसा लिखना प्रतिकूल या अशुभ जान पड़ता है। ऐसी दशा में सच्चा निरीक्षण नहीं हो सकता। माता-पिता के बाद घनिष्ठ संबंधी तथा अध्यापकगण अच्छे निरीक्षक कह्दे जा सकते हैं। संबंधियों और अध्यापकों से बच्चे दिलेमिले रहते हैं और इसलिये उनके स्वतंत्र व्यापार में अंतर .नहीं पड़ता अध्यापक बालकों के साथ अपना शिक्षा का काम करता रहे और, निरीक्षण का कार्य भी करता रहे बाछक को यह बात

ज्ञात हो। इसी प्रकार डाक्टर, वैद्य तथा होशियार दाइयाँमी ....

अच्छी निरीक्षक हो सकती हैं हे निरीक्षण की सुविधा के लिये मनोविज्ञानिकों ने कई रीतियाँ बतलाई हैं--जैसे निररीक्षण-शाला का प्रयोग | इसके छिये मकान

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का एक खास कमरा चुन लेते हैं जिसमें बच्चे की सुविधा की सभी चीजें मौजूद रहती है। बच्चा उसमें स्वतंत्र रूप से छोड़ दिया जाता. है ओर उसकी क्रियाएं निरीक्षक लिखता जाता है। बच्चों को स्वतंत्र रूप से काम करने की हालत में तरह-तरह के फोटो भी लिए जा सकते हैं।

निरीक्षण का काम जैसे एक बालक के साथ किया जा सकता है वैसे ही एक उम्र के कई बालकों के साथ भी हो सकता है। एक उम्र के कई लड़के एक स्थान पर खेलने के लिये छोड़ दिए जाते हैं। निरीक्षक उनके क्रिया-कल्लापों को लिखते जाते हैं। भिन्न-भिन्न उम्र वाले बालकें का भी निरीक्षण एक साथ करके उनके कामों में जो अंतरः पड़ता है उसे निरीक्षक सावधान होकर लिखता हे। इस प्रकार के निरीक्षण से आयु-बृद्धि के. साथ-साथ बच्चों में जो विकास होता है उसका पूरा पता चलता है

बच्चों के जीवन पर रहन सहन की दशा, अआर्थिक दशा, खेल-कूद के तार-तरीके तथा साथियों आदि का बड़ा प्रभाव पड़ता है। यदि कोई बच्चा गरीब खानदान में पेदा हुआ और उसके खेलने कूदने की सामग्री भी मामूली है तो इस बच्चे के जीवन में ओर इसके विपरीत-दशा वाले बच्चे के जीवन में बड़ा अंतर जाता है। निरीक्षक का ध्यान इन बातें की ओर अवश्य जाना चाहिए। एक दशा में निरीक्षण करने के बाद उसी बालक को दूसरी अच्छी दशा में रखकर निरीक्षण करना चाहिए। जेसे किसी गरीब बालक का निरीक्षण करना है; उसके पास खेलने की पूरी सामग्री भी नहीं हैं. ओर तो खाने पीने का समुचित प्रबंध है। ऐसे बालक का एक दशा में निरीक्षण करने के बाद उसे दूसरी परिस्थिति में रखकर निरीक्षण करना चाहिए, उसके पास खेल्षने के छिये पूरी सामग्री हो और खाने पीने के लिये

पे पे कक हे

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अच्छा प्रबंध हो ओर घर की हालत अच्छी हो। अब निरीक्षक को मात्ठम हो जायगा कि परिस्थिति का कितना भारी प्रभाव बच्चों के ऊपर पड़ता है। परिस्थिति के अनुसार एक ही बच्चे के कार्यों, भावों ओर विचारों में बड़ा अंतर जाता है। ग्रयोग---प्रयोग के उपकरण ने भी बालमन के अध्ययन में बड़ी सहायता पहुँचाई है। प्रयोग भी एक प्रकार का निरीक्षण ही है, पर निरीक्षण और प्रयोग में एक बड़ा अंतर है। निरीक्षण के अंतर्गत बच्चें को पूरी स्वतंत्रता रहती है; पर जिन दशाओं में निरीक्षण किया जाता है उनपर हमारा अधिकार नहीं होता। प्रयोग में बच्चो' को पूरी स्वतंत्रता तो नहीं रहती पर जिन-जिन दशाओ' में प्रयोग की क्रिया की जाती है उनपर हमारा अधि- ' कार होता है। इस उपकरण द्वारा बालकों की चित्त को एकाम्र रखने की शक्ति, स्मरण शक्ति, बुद्धि-विकास और थकाबट इत्यादि के विषय में अनेक मूल्यवान्‌ बातें ज्ञात हुई हैं परंतु इस उपकरण का उपयोग परिमित है। प्रयोग के अंदर इतनी क्त्रिमता होती है जिससे बालक की स्वतंत्रता में बाधा पड़ती है। जब प्रयोग की क्रिया की जाती है तब बच्चा अपने को अस्वाभाविक॑ अवस्था में पाता है जिससे उसके कार्यों में भी बनावटीपन जाता है। साथ ही साथ प्रयोग-कर्त्ता और बालक में उतना संभंध नहीं रहता जितना माता-पिता ओर बच्चे में होता है। इसलियें' बच्चे के अंदर लज्जा, केप इत्यादि भावना जाती है लिंससे उसकी स्वेतंत्रता. तथा उसके स्वाभाविक व्यापार में विन्न पढ़ता... है और बालमंन का अध्ययन ठीक तरह से नहीं होता। इसलिये... इस उपकरंण को कास में लाते समय निरीक्षक 'के छिंये उपयुक्त बातों को ध्यांस में रखना आवश्यक है।... यह सब होते हुए भी मनोवेज्ञानिकों नें प्रयोग की क्रिया

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द्वारा बालमन का अच्छा अध्ययन किया है। बालको' के मन का अध्ययन डाक्टर मेरिया मान्टीसोरी ने अच्छा किया है। मान्‍्टीसोरी ने बताया है कि खेल द्वारा बच्चो' की अनेक मानसिक शक्तियो' का विकास होता है। बच्चो' के खेल किस प्रकार के होने चाहिएँ, इसका बिस्तारपूर्वकक वशन हम आगे करेंगे। प्रयोग की क्रिया द्वारा मनोवैज्ञानिको' को दो बातें. मालूम होती हैं; एक तो यह कि बच्चो' के अंदर कौन-कौन-सी स्वाभाविक शक्तियाँ किस मात्रा में मौजूद हें और दूसरी यह कि इन स्वाभाविक शक्तियो' का उपयोग कैसे किया जा सकता है।

प्रश्नावली--मनोवैज्ञानिक लोग बालमन का अध्ययन.

करने के लिये कुछ चुने हुए प्रश्न भिन्न-भिन्न लोगो' के पास भेजे

देते हैं| वे प्रश्न बालको' के विषय में पूछे जाते हैं और उन प्रश्नो' के उत्तरो' द्वारा बाल-मनोविज्ञान का अध्ययन किया जाता है| प्रश्न दूर-दूर स्थानो' में भेज दिए जाते हैं जिनका उत्तर लोग अपने-अपने निरीक्षण तथा अनुभव के आधार पर भेजते हैं।' प्रश्न बच्चो' के बाल्यकाल से संबंध रखने वाले होते हैं; जैसे, आपके बच्चे किस प्रकार के खेल पसंद करते हैं, करिन-किन वस्तुओ' से विशेष रुचि रखते हैं, किन-किन चीजो' से डरते हैं--- इस भ्रकार के प्रश्न पूछे जाते हैं। ऐसे-ऐसे प्रश्नो' के उत्तर भिन्न- भिन्न परिस्थितियो' में रहने वाले बच्चो' के अभिभावकों से साँगे जाते हैं। इस उपकरण का विशेष रूप से प्रयोग स्कूलो' में किया जाता है। स्कूल के अध्यापको' के पास प्रश्न भेज दिए जाते हैं और अध्यापकगण बच्चो' का निरीक्षण करके उत्तर भेजते हैं। इस प्रकार हम बच्चें की कल्पना, उनकी पढ़ने की रुचि,

उनके भाव और विचार तथा खेल आदि के विषय में जानकारी

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श्राप्त करते हैं। इस उपकरण में कुछ अंतर्दंशन ओर विचार को आवश्यकता होती है अर्थात्‌ उत्तर देने वाले को अपने बचपन के श्पनुभवों को फिर से अपनी स्मृति में ल्ञाना होता है और .उसी के आधार पर वे प्रश्नों का उत्तर देते हैं यह उपकरण बालमन के अध्ययन में कुछ काम तो आता है. पर उसकी उपयोगिता सीमित है। प्रथम तो नवयुवक प्रश्नों का व्यापक उत्तर देने में कुशल नहीं होते। इसलिये उनके उत्तर अधिक विश्वसनीय नहीं हो सकते। साथ ही साथ इस विषय में रुचि होनी चाहिए। बिना रुचि के यह काम ठीक नहीं हो सकता। जिनको इस विषय में दिलचस्पी नहीं होती वे प्रश्नों का उत्तर नहीं भेजते ओर बहुत से ्ञोग बिना बिचारे जो कुछ सन में आया, लिखकर भेज देते है। कभी कभी लोग अपने उत्तर को रोचक और कलापूरण<