प्रकाशक

मंगल प्रकाशन गोविन्द राजियों का राज़्ता, जयपुर-१

मूल्य १५-०० [ पन्द्रह रूपए मात्र |

प्रथम संस्करण (पुनःसंस्कारित] १६७४

सुद्रक मंगलप्रेस साहर गड़ रोड़, जयपुर-१

समपंगा

प्रद्धे डॉ० माता प्रसाद गुप्त ग्रध्यक्ष हिन्दी विभाग [ राजस्थान विश्ववियालय, जगपुर ] की सादर

श्री

अपनी बात

यह श्रादिकाल है हिन्दी साहित्य का श्रादिकाल, जिसे विद्वानों ने श्रमेक नामों से अभिहित किया है इलाहाबाद विश्वविद्यालय से मुके इस काल पर शोध करने का अवसर मिला है और 'आदिकाल का हिन्दी जेन साहित्यः विषय पर एक प्रधिनिबन्ध प्रस्तुत कर चुका हूं मुके इस काल के साहित्य के सम्बन्ध में श्रधिक कुछ नहीं कहना है, समय श्राने पर उससे श्रादिकालीन साहित्य के श्रनुसंधित्सु स्वातकों को पर्यात्त सन्‍्तोष होगा यहाँ तो केवल अपनी इस प्रस्तुत कृति के सम्बन्ध में थोड़ा सा परिचय मात्र दे रहा हुं प्रादिकाल की कृतियों में, यू' तो श्रनेकों प्रसिद्ध काव्य रूप हैं काव्य रूपों से मेरा तात्पर्य साहित्य को उन प्रसिद्ध विधाग्रों से है, जिसमें श्रनेक प्रबन्ध काव्य लिखे गए हैं। ऐसे ही काव्यों में एक श्रति प्रसिद्ध काव्य रूप है “रास्र ?!। हिन्दी साहित्य के इस तथाकथित वीर गाथा काल में! इस साहित्य के इतिहासकारों से श्रमेक रासों की ओर इंगित किया है। जिन पर कई बार चर्चाए हुई हैं और उनसे विद्धानों ने कई निर्णय लिए हैं पर कुल मिला कर श्राद्यावधि यह निष्कर्ष निकला कि तथाकथित वीर याथ 7 काल में कोई भी ऐसी रचना नहीं हैं जिनके ग्राधपर पर इस काल का तामकरण “वीर गाथा काल” किया जाय खेर इस तरह यह चर्चा भी पुरानी हुई हम्मीर रासो, वीसल देव रासो, १रमाल रासो, तथा प्रथ्वोराज रासो, प्रभुति, रास काब्यों की प्रामारिकता भी संदिग्ध हो गई और अभी भी ये कृतियाँ शोध का विषय बनी हुई हैं कालान्तर में सम्भव है इनके सम्बन्ध में कुछ महत्वपूर्ण तथ्य स्थापित किये जायें हमें उनकी प्रतीक्षा है पर तब तक श्रादिकाल के सम्बन्ध में जो नया साहित्य उपलब्ध हुआ है, उसमें उपलब्ध रास-काव्यों की क्या स्थिति है; विद्वानों का ध्यान भ्पने इस नये प्रयास की भोर श्राकपषित करना चाहता हूं इन नये रास काव्यों का संक्षिप्त वर्णन-विवरण इस छोटी सी हूृति में प्रस्तुत कर रहा हूं ये उपलब्ध रास काव्य श्रादिकाल के हैं। इन रासों ने श्रादिकाल के साहित्य की प्राचीनतम निधि को सुरक्षित रखा है। इन रास हृतियों के लिये मुक्त- कण्ठ तथा पूर्या हृढ़ता से इसलिये भी कहना चाहता हूं कि इतकीं प्रामारिकता, रचना- काल शभौर रचनाकारों के सम्बन्ध में विवादास्पद स्थिति बिलकुल नहीं है ये प्रचलित लगभग सभी गत्यविरोधों से मुक्त हैं | इनकी प्रामारिगक मूल हस्तलिखित प्रतियां उपलब्ध है | गुजरात भर राजस्थान के अनेक भंडारों में इन रास-कतियों की प्रतियों का परीक्षण भेली प्रकार से किया जाता है साथ ही इनकी प्रवृतियां भी पूर्ण स्पष्ट है उसकी स्थित्ति बहुत सुलभी हुई है इनके लिये कहीं भी सन्देह को स्थान नहीं

दिखाई पड़ता श्रतः इन्हें एक दम विश्वसवीय माना जा सकता है। बस्थुतः दनन्‍्हीं कृतियों के श्राधार पर इस काल का सम्यक्‌ परीक्षण होना चाहिये प्रस्तुत कृति में श्राए लगभग सभी “रास काव्य! मेरे विचार से हिन्दी साहित्य के पाठकों के लिये एकदम नवीन तथा अज्ञात से हैं। यह इसलिये भी सत्य है दि इन पर ग्राज तक किसी शोध-स्नातक ने श्राँख नहीं उठाई इन में से ढाई प्रकाशित भी हुए पर उन्हें साम्प्रदायिक समका गया हो अभ्वथवा किसी विद्वान ने भाषा के कारण इन्हे हिन्दी के क्षेत्र में दूर का समझ लिया हो क्योंकि ये सभी प्राचीन राजस्थानी श्रववा जूनी गुजराती के हैं जो हो, ये रासकाव्य इसीलिये अपेक्षित पढ़े रहे श्राज जबकि हिन्दी साहित्य श्रपने प्राचीन गौरव की सुरक्षा के लिए इन क्ृतियों की श्लोर देखने लगा है, श्राज जवक्कि उसका परिसर इतना विद्याल हो रहा है, प्राज लवकि बहु उत्तर अपश्रश (2000 औ007छ७77859) की लगनग सभी ऋृतियों को अपनी कह कर सन्‍्तीष की सांस ले रहा है ; मुझे हिन्दी जगत के सामने इनको एक ही इति में एक साथ सामान्य परिचय दे कर रखते हुए पर्याप्त हप का श्रनुभव हो रहा है | श्रव उत्तर प्रपश्नश्ष की कइृतियां राजस्थानी अथवा प्राचीन गुजराती की ही नहीं हिन्दी के श्रादि- काल की मान ली गई है, श्री राहुल. सांहृत्यायन, डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी; डॉ० माता प्रसाद गुप्त तथा गुजरात के अनेक विद्वानों मे इस ओोर पर्याप्त प्रकाश डाला है भ्रतः ऐसी स्थिति में इन कृतियों का मूल्यांकन होन चाहिये एक प्रश्न भर है उसका स्पष्टीकरण भी आावश्यक लग रहा है शऔर वह यह कि इन< कृतियों के अधिकांश लेखक़ कवि जेनी श्रथवा जैन धमावलम्बी हैं, इसलिये इनमें साम्प्रदायिकता अथवा धामिकता या उपदेशात्मकता मात्र हैं ऐसे सवाल कई बार उठाये गये हैं ; परन्तु इन सब बातों का निर्णय विद्यात्‌ और सुधी पाठकों के लिये छोड़ रहा हूं" कवहुं कि काँजी सीकरन्हि छीर सिन्धु बिलगायाँ इस त्तरह के दोपरोपण तो साहित्य की पनेकों ऋृतियों पर किए जा सकते हैं इसके सच्चे श्रालोचक तो थे हैं, जो सुनो सुनाई बातों पर विश्वास कर इनके रूपस्वरूप के अन्तरातल् में प्रविष्ट होकर इसका नीर क्षीर विवेक करेंगे। मेरे विचार से धर्म श्रौर उपदेश इनमें केवल मात्र प्रेरणा के रूप में हैँ वस्तुतः ये रचनाऐ साहित्यिक संकल्प लिए हैं ; अन्यथा इस संहृाान्तिकाल की कोई स्थिति ही सामने नहीं पाती 'श्रादिकाल के श्रज्ञाव हिन्दी रास काव्य” में में कुछ ही प्रसिद्ध रास कृतियों का विश्लेषण प्रस्तुत कर रहा हूं यों तो इन काव्यों पर और भी विस्तार में विचार किया जा सकता है अनेक रचनाएं इसलिये छोड़ भी दी गई है। सामान्यतः इनसे एक सहज परिचय हिन्दी साहित्य के विद्वानों छात्रों, पाठकों तथा शोध प्रेमी मित्रों को हो बस इसी उद्द श्य से इनको सामने ला रहा हू इनमें कई रास ऐतिहासिक . कई पौराशिक कथाग्रों पर प्राधारित तथा कई कवियों के जीवन गत सत्यों पर आलोचना के साथ ही इन ऋृतियों में से तोन रास काव्यों ........ भरतेश्वर बाहुबली रास, पश्च पाण्डव चरित रास तथा कुमार पाल रास .... का पाठ जेसा भी जिस रूप

में उपलब्ध हैं साथ में दे रहा हु ताकि तत्कालीन श्रन्य लौकिक रचनाग्नों के साथ इनकी भी गणना हो सके इन काव्यों की श्रालोचना का अधिकांश भाग मेरे शोध भ्रन्थ में संग्रहीत है केवल कुछ कृत्तियों का विवरण तथा रासों का पाठ इसमें श्रौर जोड़ कर प्रस्तुत कर रहा हु इन कृतियों के एतिहासिक, सामाजिक, धामिक, सांस्कृतिक तथा साहित्यिक सभी पहलुओं पर मैंने यथा-सम्भव्व प्रकाश डालने का प्रयास किया है, फिर भी कई महत्वपूर्ण तथ्यों पर शायब चिन्तन नहीं हो सका हो; उनके लिये पाठकों के सुझावों का विनम्रता से सदेव स्वागत करू गा। रास काव्यों के ये पाठ मुझे प्रकाशित तथा कठिनाई से उपलब्ध होने वाली कृतियों से मिले हैं सभी रचनाझ्ोों का पाठ इस छोटी सी कृति में देता सम्भव भी नहीं था यों इन पाठों में पाठविज्ञान के जिज्ञासु स्नातकों के लिये पर्याप्त सामग्री है ऐसा मेरा विश्वास है। इनका पुननिर्माण भी एक बहुत बड़ी श्रावश्यकता है प्राशा है, वे इस श्रोर प्रेरित हो कर ऐसी श्रनेकों श्र-प्रसिद्ध, भ्रद्ञात तथा भंडारों में दबी पड़ी श्रादि कालीन कऋृतियों के पाठोद्धार कार्य को वैज्ञानिक रूप से सम्पादित कर प्रकाशित कराने में रूचि लेगें। इन कृतियों को पुस्तक रूप देने का सारा श्रेय भाई उमराव सिंह मंगल को

है जिन्होंने श्रथक परिश्रम से इसका प्रकाशन किया है इस के लिये उनका श्रनुग्रहीत हूं श्रेद्धेय ग्रुरूवर डॉ० माताप्रसाद ग्रुत्त इसके मल में रहे हैं विद्वद्वर श्री श्रगरचन्द नाहठा की ऋपा से इन में से अनेक ऋतियां तथा उनके पाठ उपलब्ध हुए हैं भर- तेश्वर बाहुबली रास तथा 'कुमार पाल रास” का पाठ उन्हीं के स्नौजन्य से उप- लब्ध हुआ तथा श्री डा० भोगीलाल सांडेसरा डायरेक्टर, गआ्रारिएन्टिल रिसर्च इन्स्टीस्य बड़ौदा, से 'पंच पाण्डव चरित्र रास! का पाठ प्रकाशित-करने की अनु- मति दे कर उत्साह बढ़ाया है, इस के लिये में इन दोनों विद्वानों का हादिक ऋतज्ञता ज्ञापन करता हू रासों की श्रालोचना के लिये जिन राजस्थानी तथा' ग्रुजराती विद्वानों की ऋृतियों से जो सहायता मिली है उसके लिये उनका हादिक धन्यवाद करता हूु' साथ ही साथ भ्रपने स्वेही मित्र प्रो० हरिराम आचारये श्री मंगल तथा प्रो० एच, एल. भारद्धाज का झ्राभारी हु जिन्होंने इस ऋहृति के प्र,फ देखे हैं, प्रिय चन्द्र प्रकाश तिवारी, करूणा एम० ए०, प्रकाश वाजयेयी तथा शील सचेती सभी की श्रात्मीयता ने इस कार्य में प्रेरणा दी, और यह प्रयास सामने सका। यों तो सारा ही श्रेय मंगल प्रकाशन! को है। यदि हिन्दी साहित्य के श्रादिकाल में ये रास काव्य कुछ श्री वृद्धि कर सके और सुधी पाठकों को परितोष दे सकें, तो प्रयास्त को प्रेरणा उपलब्ध होगी

४. लक्ष्मी राम का बाग, हरीश?

मोती डूगरी रोड, जयपुर

१-विषय प्रवे १०-२० २-भरतेश्वर बाहुबली रास २१-३६ ३-भरतेश्वर बाहुबली रास (मूल पाठ). ३७-४४ ४-चन्दन वाला रास ५५--४५८ ५-स्थूलि भद्र रास ४९--६५ ६-रेवंत गिरि रास ६६--७४ ७-नैमिनाथ रास ७५---७८ ८-गयसुकुमाल रास ७६--८२ €-कच्छूली-रास ८३-६६ १०-मयणरेहा रास 8६६९--६७ ११-श्री जिन पदससूरि पट्ठाशिषेक रास ह८+--१०० १२-कुमार पाल रास १०१--१०६ १३-कुमार पाल रास (मूल षाठ) १०७--१ १३ १४-पम्व पाण्डव रास ११४--१२५ १५-पद्द पाण्डव रास (मूल पाठ) १२६--१५८ १६-गौतम रास १५६--१ ६३ १७-कालिकाल रास १६४--१६६

१८-सोलहकारण रास १७६--१७२

विषयप्रवेश

झ्रादिकाल :--

हिन्दी साहित्य का श्रादिकाल विभिन्न काव्य रूपों के उद्भव और विकास से सम्बद्ध है। काव्य रूपों को विभिन्नता इस साहित्य की मौलिकता है। यों तो अपश्र साहित्य में अधिकांश काव्य रूपों की श्र खला के बीज विद्यमान हैं, पर उत्तर-अ्पश्न या पुरानी हिंदी के इस साहित्य ने काझरूपों के इतिहास में नवीन क्रांति उपस्थित की है इस तरह एक शोर आदिकाल में जहां विभिन्न प्रकार की काव्य प्रवृत्तियों का समुचित विकास और पूर्ववर्ती साहित्यिक विधाश्रों की परम्परा का निर्वाह मिलता है, दूसरी ओर काव्य के विभिन्न रूपों में असा- धारण विविधता के दर्शन होते हैं | श्रद्यावधि बिद्वानों एवं आालोचकों ने काव्य रूपों को ख़ण्ड-कराव्य, महा-काव्य और प्रवन्धे-काव्य आदि का रूप देकर ही उनका अ्रध्ययन किया है परन्तु आदिकालीन उपलब्ध साहित्य ने काव्य रूपों की दृष्टि से नये मोड़ प्रस्तुत किये हैं ये काव्य रूप छुन्द प्रधान भी हैं और विषय प्रधान भी यद्यपि ये काव्य खण्ड-काव्य, कथा-काव्य, एकार्थ-काव्य और प्रबंध काव्यों श्रादि के अन्तर्गत वर्गीकृत हो जाते हैं, पर विशुद्ध रूप में शेली और शिल्प की दृष्टि से इनका पूर्व कृत वर्गीकरण बहुत समीचीन नहीं प्रतीत होता। अस्तु-- काव्य रूपों पर नये रूप में विचार किया जा रहा है। वस्तुतः आदिकालीन साहित्य में जिस विश्ञाल संख्या में काव्य रूप मिलते हैं वह अपने श्राप में आदि- काली की एक बहुत ही बड़ी उपलब्धि है। इस काल में शताधिक से अधिक काव्य रूप उपलब्ध हुए हैं ।' जिन पर विस्तार में अन्यत्र विचार विश्लेपण गया है यहाँ उन विशिष्ट काव्य रूपों में से केवल मात्र “रास” पर ही विचार किया जा रहा है। यों तो शेली की दृष्टि से रास संज्ञक रचनाग्रों को खंड-काव्य, प्रबंध- काव्य आदि के अन्तर्गत रखकर उनका मूल्यांकन प्रस्तुत किया जा सकता है परन्तु ऐसा करना बहुत संगत नहीं प्रतीत होता, वस्तुतः काव्य रूपों के अन्त- गत आने वाले जो अनेक रूप या विधाए हैं, उनसे प्रत्येक पर स्वृतन्त्र रूप से अध्ययन अपेक्षित है। रास, फाग्रु, चरित, चउपई, प्रबंध, पवाड़े, विवाह-वेलि,

१- देखिए लेखक वश शोध प्रवन्ध श्रादि काल का हिन्दी जैन साहित्य' अप्रका- शित (इलाहाबाद यूनिवर्सिटी लाइब्न री में संग्रहीत)

( )

चर्चरी आदि अनेक नाम उदाहरणार्थ दिए जा सकते हैं जिनका विस्तार से भ्रध्ययन प्रस्तुत किया गया है। यहाँ हम उनमें से रास काव्य रुप का ले रहे हूं 'राप्त के शिल्प पर विचार करने के पूर्व उसकी पूर्व प्रचलित परम्परा का क्रमिक अध्ययन आवश्यक प्रतीत होता है जो इस प्रकार है। रास परम्पराः--- रास परम्परा श्रत्यन्त प्राचीन परम्परा है इस परम्परा को सम्पन्न बनाने वाली रात्त संज्ञक रचनाए' वहुत ही विशाल रूप में प्राप्त हुई हैं रास परम्परा का अ्रध्ययन करने के लिए इसे तीन कालों में विभाजित किया जा सकता है :- १, संस्कृत काल या प्रारंभिक काल २. अ्रपश्न ज्ञ काल ३. अपश्र गेंतर काल इन तीनों कालों में रास के मान दण्डों में विभिन्न प्रकार के परिवर्तन दिखाई पड़ते हैं, तथा इसी परम्परा में रास, रासक, रासा और राखी श्रादि कई दद्दों का निर्माण हुआ है। रास साहित्य के इस विकास का श्रध्ययन अत्यन्त महत्वपुर्ण रोचक प्रतीत होता है। भारतीय साहित्य में जहाँ तक “रास” बब्द की उपलब्धि का प्रश्न है, यह वहुत ही प्राचीन लगता है। संस्कृत काल में “रास” दब्द का परिचय पुराण साहित्य से ही उपलब्ध होने लगता है रास परम्परा के इन तीनों कालों को दृष्टि में रखते हुए रास के तेत्कालीन स्वरूपों, विद्वानों द्वारा की गई उतकी विभिन्न परिभाषाश्रों तथा रास के उत्तरोत्तर बदलने वाले मान दण्डों का अध्ययन करने में संस्कृत के विभिन्न ग्रन्थों अन्तर्वाद्य च्ोतों से वड़ो सहायता मिलती हैं संस्कृत साहित्य में रास की स्थिति:--- संस्कृत साहित्य में रास” की स्थिति का अध्ययन अ्रपेल्षित है। वस्तुतः सर्वे प्रथम भरत मुनि ने अपने नास्य शास्त्र में रास शब्द का उल्लेख किया है रास का सम्बन्ध क्रीड़ा नृत्य से स्पष्ट करते हुए उन्होंने इसे क्रीड़नीयक? कहा है।* भास के वालचरित नाटक में भी रास के समानार्थी झब्द हल्लीसक

का प्रयोग मिलता है जिसमें गोप-गोपिकाश्ों का साथ-साथ क्रीड़ा करने का उल्लेख है। +

१-नाव्य-शास्त्र, प्रवम अध्याय: क्रीड़नीयकमिच्छायो हृ्य॑ श्रव्यं यद भवेत्‌' २-देखिए-भासनाठक चक्रम: सी. देवधर ए० ५६८ ०४० का संकर्पण-दामक; दामोदरः आदि का यह संवाद- दामक :-झ्राम भट॒ठा पव्व पराणाद्धा झा अदा दामोदर :-घोप युन्दरि | वनमाले चद्ध रोबे | मृकाक्षि घोष वात्त स्वानानुर्पों य॑ हल्लीसकां नृत्तवन्ध उप-युज्यंत्ताम्‌'

रा,

“हरिवंश पुराण”! और विषा पुराण * में भी “रास” शब्द की ओर कुछ संकेत मिल जाता है। धन्तंजय ने अपने दशरूपक में रास पर प्रकाश डाला है

”. भहाराज भोज के सरस्वती कण्ठाभरण और श्यगार प्रकाश में भी रास संज्ञा का उल्लेख मिलता है।

इस उबत विवेचन में हल्लीसक शब्द विशेष हृष्टव्य है। हल्लीसक शब्द के साथ भास के नाटक और पुराण साहित्य में गोप-गोपिकाग्रों का साथ होना और क्रीडा करना तो स्पष्ट होता है पर श्रन्य संगीतात्मकता अथवा उसके अन्य किसी शिल्प जन्य वेशिष्टय का उल्लेख नहीं मिलता। अतः यह लगता है कि इन ग्रन्थकारों के समय रास क्रिया शारोरिक अवयवों से सम्बन्धित जन-तुत्य या क्रीड़ा मात्र थी वस्तुतः उस समय रास का सीधा सम्बन्ध पुरातन नृत्य मात्र से रहा होगा सम्भावना है कि आदिम नृत्य भी इसी रास का एक रूप रहा होगा | यह भी सम्भावना है कि संगीत के तत्कालींन शास्त्रीय नियमों के विधान का अभाव ही इसका मूल कारण रहा हो। जो भी हो, यह स्पष्ट कहा जा सकता है कि उस काल में यह जन-नृत्य या वच्य-नृत्य अथवा लोक-तृत्य-विशेष के रूप में प्रचलित रहा होगा एक आलोचक ने इसी सम्भावना पर रास शब्द का अर्थ जोर से चिल्लाना स्पष्ट कर उसे जंगली या आदिम युरुषों की शारीरिक क्रिया या वन्य-नृत्य बताया है ।<

१-देखिये :-हरिवंश पुरारा; विणाए पर्व, अध्याय २०, के ये उद्हरणः- (क) एवं ऋष्णों गोपीना चक्रवालैरलंकृतः (ख) चक्रवाले ? मण्डल ? हल्लीसका क्रीड़नम एकस्य पुसौ बहुमिःस्त्रीभिः क्रीड़न सेव रास क्रोड़ा | इस विवेचन से विद्वातु टीकाकार ने “चक़वाल”” शब्द का अर्थ सम्भवतः “रास” किया है २-विष्णु पुराण, (गीता प्रेस) ४।१३।४७, ५० के ये उद्हरण (क) ररास रासगोष्ठीमिरूदार चरितो हरि: (ख) हस्तेन गृह्म चेकेकां गोपिनां रासमण्डलम ३-देखिये:-टाइस्स आफ संस्कृत ड्रामा, १४१-४४ में श्री कंकड़ की यह उक्ति- 48 70540 08 68ए86६ 77070 रस, 05 707 रास 9७ 700 पए१00 रढक्का8 00 87ए 8076, फ्ाठा आए ॥8669777 50 96 एर७७ए ऊर्णणातए8 4077 0 ४08 तैंछत806 छ60 96 छ97090४ीणा रण पापरष्ठ5 ढ& छक्ीशा6 ॥70ए0767#68 गाछ्ए

70 ##७ए8 38097 80] #6४॥।०७॥७ 9800 ज्ञो]शा + 7705 77ए७ ए687 078ऊा86वदे 8 छत दंक्वाठछ7,

|. 8.

हल्लीसक शब्द की व्याख्या व्यवहृति अनेक संस्कृत के विद्वानों ने की है रास में गीत, नृत्य, क्रीड़ा संगीत का समन्वय सिखाने वाले अनेक विद्वानों ने रास के शिल्प का विवेचन किया है जिससे रास के उत्तरोत्तर परिवर्तित होने वाले रूप का पर्यवेक्षण किया जा सकता है | वस्वुतः यह हल्लीसक शब्द विभिन्न विद्वानों के द्वारा भिन्न-भिन्न अर्थो में प्रयुक्त किया गया है जिससे “रात” में अनेक नवीन तत्वों का समावेश होता है उनका संक्षेप में विवेचन इस प्रकार है

वाणभद्‌ट ने श्रपने समय तक रास में नृत्य की आयोजना होना बताया है इस तरहे के विशिष्ट नृत्य के आयोजनों के प्रमाण हर्ष चरित” में अनेक मिल जाते हैं रास के इन मण्डलों को हरिवंश पुराण के टोकाकार ने जिन्त प्रकार “चक्रवाल” की संज्ञा दी है उसी प्रकार वाणभद्ट ने रासक मण्डल के लिए आावर्त्त * शब्द को उपमान छुवा है। इस प्रकार इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि वाण के समय में “रात नृत्य” जन साधारण में प्रचलित हो गया था अतः बाणभट्ट ने इसे एक “उपरूपक-विशेष”” कहा है

काम के सूत्र प्रशेता वात्स्यायन ने भी हल्लीसक अयवा रासक नृत्य के साथ गान के आयोजन का भी उल्लेख किया है।४ भावप्रकाशकार शारदातनय ने रासक में नाथिकाशओ्ं के रासक के प्रायोजन में नायिकाग्रों की संख्या का विधान किया है। उनका कहना है कि पिण्डी वन्‍्ध के साथ नायिकाएं १६, १२ तथा की संख्या में जो नृत्य करती हैं, उसे रास कहते हैं ।* अभिनव गुप्त ने “मण्डल” में जो नृत्य किया जाये, उसी को हल्लीसक कहा है ।४ रासक को उप रूप्क बताते हुए वाणभव्ट ने लिखा है कि डोम्विका- भार-प्रस्थान-भारिका-प्रेरणं-शिड्ष्गक-रामा क्रोड़ हल्लीसक श्री गदित रासक गोष्टी प्रभुतीनि-गेयानि ।* इस परिभाषा से ये तथ्य स्पष्ट होते हैं:-- १--तप्तामान्यतः ये रूपक गेय हैं २---इन रूपकों में से रासक भी एक रूपक हैं

१-हर्ष चरित एक सांस्कृतिक अध्ययन-चतुर्थ अध्याय

२-वहो, सवर्तें इव रासक मणप्डले सरोमांच इव भूपण मणि करणे

३-हल्लीसक क्रोड़नकर्गावने:

४-धोड़क्ष द्वावशाहरों यस्मिन्दृत्यन्ति नायिका : पिण्डी वन्धादि विन्यहै ? रासके तदुदाहुतम-भावप्रकाश-शारदातनय | |

२५-मण्डले नतुयन्तृत्य॑ हल्लीसकमिति स्मृत्तम्‌

६-देखिय वास्भटठ कृत काव्यानुगासन, छु० १८० |

६५० 2.)

३-इनमें संगीत तत्व का पूर्ण समावेश है

४>नृत्य और अभिनय भी इसमें प्रधान हैं

हल्लीसक के विपय में एक संकेत बशोधर कृत्त काम शास्त्र की जयमंगला टीका में मिल जाता है; वह “मंडल' में होने वाले स्त्रियों के उस नृत्य को जिसमें एक नायक होता है, हल्लीसक कहता है और प्रमाण में वह गोपियों के हरि का उदाहरण देता है ।' हेमचन्द्र के काव्यानुशासन (पु० ४४५-४४६) में हल्ली- सक और रासक शब्द का उल्लेख मिल जाता है। उपदेश रसायव्‌ रास के टीकाकार ने रासक के शिल्प की सरलता के सम्बन्ध में बतलाते हुए लिखा है कि चर्चरी और रासक थे प्राकृत प्रवस्ध इतने सहज सरल हैं कि कोई भी विद्वान प्ररुप इन पर टीका नहीं लिखना अाहता /)

श्रीमद्भागवत्त की रासपंचाघ्यायी तो प्रसिद्ध ही है? श्रव्दुल रहमान के संदेश रासक में रास की जगह रासय या रासउ मिलते हैं जो सम्भवतः रासक का ही अपभ्र है | शुभंकर ने गोप क्रीड़ाओं को ही रास कहा है ।* और जय देव तो 'रासे हरिहर सरस वसंते' तक कह डालते हैं

एक नया तथ्य उपदेश रसायन रास के टीकाकार ने रास को राग या गीतों की भांति गाया जाने वाला कहकर भी बताया है। जिससे स्पष्ट हो जाता है कि प्राकृत भाषाओं में रची गई चर्चरी और,रासक संज्ञक प्रवन्ध प्रर्याप्त सरल होते थे और वे देश्य भाषा में श्रनेक रागों में गाये जा सकते थे टीकाकार ने उसमें अनेक छंदों का होना भी बताया है ।* रासक शब्द के लक्षणों का विस्तृत विवेचन वाग्भट्ट ने और स्पष्टता से किया है ।$ जिसके अनुसार ये परिणाम निकाले जा सकते हैं:---

१-रासक समृरा रचना थी २-इसमें श्रनेक नतिकाए' होती थी

१-मण्डलेन यतस्‍्त्रीणां नृत्त हल्लीशर्क तु तेत नेता तन्न भवदेको गोप स्त्रीणां यथा हरि। २-चर्चरी रासक प्रव्ये प्रवन्धे प्राकंते किन, वृत्ति प्रवृत्ति नाधत्तै प्रायःको5 अ्पि विचक्षेण | ३-शआरीमद्भागवत-दशमः स्कत्धः | ४- किचिद्भ्वदस्ति गांपानां क्रीड़ारासक मत्यवि”” ५-अन्न पद्धटिका बच्चे मात्रा पोपश पादगा; अयमसर्वेपु रागेपु गीयते गीतकाविदे। ६-पअनेक नर्तकी योज्यं चित्र ताल लयान्वितप्त्‌ आचतु: पष्टि युगलाद्रासकं मस-णोद्धते-वागमट्ट; काव्यानुशासव, पृ, १८०।

३-यह उद्धत गेय रुपक था

४-अनेक तालों से समन्वित होता था

५-इसमें एक निश्चित लय होती थी

५-क्रीड़ा करने वाले युगलों (जोड़ियों) की संख्या ६४ तक होती थी

गेय रासक के विकसित स्वरूप को उस काल में “राग काव्य” की संज्ञा भी दी गई थी।" शौरसेनी प्राकहृत में भी रास साहित्य का उल्लेख मिलता है, परन्तु यह आधार युक्ति संगत नहीं प्रतीत होता ।*

उक्त समस्त विवेचन हल्लीसक, रास और रासक शब्दोंके संस्क्र--कालोन स्वरूप अर्थ और परिभाषा को समभने के लिये किया गया है। “रास” शब्द किस प्रकार कालान्तर में श्रपना शिल्प परिवर्तन करता गया इसके क्रमिक विकास के अध्ययन में सुविधा हो इसी दृष्टि से संस्कृत काल के प्रभरव, विद्वानों के विविध उदाहरणों द्वारा प्रस्तुत करना उचित प्रतीत हुआ

“रास” के संस्कृत काल में जहाँ बाण के हर्प-चरित में रास का श्लील विवेचन मिलता है वहाँ अश्लील रासक पदानि' को उल्लेख भी आता है। उस काल में गणिकाश्रों द्वारा उनके कलाकुशल दरिद्व प्रेमियों के लिए जिनका विश्येप ना विट था, अश्लील पद गाने का उल्लेख है |? परन्तु डॉ० वासुदेवशरण अग्रवाल ने एक दूसरी बात हल्लीसक के सन्वन्ध में कही है कि उसका उद्गम इस्वी सन्‌ वे आस-पास यूनान के नृत्य विशेष-इलीशियन-से हुआ है। कप्ण के रास नृत्य और हल्लीसक नृत्य इन दोनों की परम्पराओं में सम्भवतः किसी समय परस्पर संबंध हो गया *

पर यह तथ्य कहाँ तक सत्य है, यह नहीं कहा जा सकता, इस सम्बन्ध में अन्य कोई अन्तर-र्बाहय प्रमाणों और जनभ्र्‌ तियों का भी अभाव है। इन दोनों बातों में हल्लीसक के उद्गम वाली बात तो संदिग्ध ही दिखाई पड़ती है हाँ यह अवश्य कहा जा सकता है कि रास-तृत्य का सम्बन्ध सम्भवतः किर्स ज॑गली जाति अथवा गोप जाति से अथवा अहीरों आदि से हो गया हो | जो भ॑ हो, अब तक इतना अवश्य स्पष्ट हो गया है कि बाण के समय तक रास

जज जलन अऑिजननय--++

१-लयान्तर प्रयोगेण रागेश्वापि विचित्रतम्‌ नानारसं सूनिर्वाहयं कथ्थंकाव्यं इति स्पृतम्‌-हेमचन्द्र; काव्यानुशासन, पृ, ४४६ २-देखिये गुजरात्तों एण्ड इट्स लिटरेचर-श्री के० एम० मुन्शी, पु० ८७ | ३-कीकिला इय मंद काकली कोमलालापिन्यों विटानां कर्शमुतान्य इलीर रासक पदानि गायन्त्य: | देखिए:-हर्पअरित्र एक सांस्कृत्तिक अध्ययन | ४-वहो ग्रन्थ, पु० ३२-३३ |

की,

में नृत्य के साथ गेय तत्व पूर्णतया प्रचलित हो गया था और हल्लीसक या रासक के शिल्प में उक्त सभी विद्वानों के विचारों में युगलों, लग्रों तालो और गोप गोपियों का सम्बन्ध परिलक्षित होता है। अतः रास के अ्रपश्रश काल के पूर्व नृत्य क्रीडा रूप और गेय रूप ही अधिक प्रचलित प्रतीत होते हैं। श्री मद्‌- भागवत में वरणित कई स्थल रास के गेय रूप की पुष्टि करते हैं। रास शब्द का प्रयोग भी हृष्टव्य है! तथा कुछ श्लोकों में तो रचनाकार ने रास में संगीत व्‌ रागों का उल्लेख भी कर दिया है ध्र्‌ पद राग पर भागवतकार ने उस प्रसंग में प्रकाश डाला है ।*

परवर्ती काल और रास :--

संस्कृत काल के पदचात्‌ रास में इन तत्वों का समावेश किन अ्र'शों में बना रहा, यह कहना बहुत कठिन है तथा साथ ही यह भी नहीं जाना जा सकता कि उसके शिल्प में उक्त तत्वों से इतर किन तत्वों का समावेश हुआ, और वह भी किस अनुपात में, पर इतना अवश्य कहा जा सकता है कि आगे की कई शताव्दियों तक, (जब तक कि रास, रासक, अपभ्रश काल में नहीं पहुँचे) उसमें उक्त दोनों तत्वों का समावेश आंशिक अथवा स्पष्ट अस्पष्ट अनुपात में अवश्य मिलता रहा है। संस्कृत काल के इन रासों की परम्परा की एक महत्वपूर्ण कड़ी राजस्थान में उपलब्ध-विक्रम सं० ६६२ का “'रिपुदारण रास” है ।३ जो अ्रद्यावधि उपलब्ध रासों में सबसे पुराना है और यह रास संभवतः हेमचन्द्र से भी बहुत पहले का है रासकर्ी के शिल्प पर राजस्थान में उपलब्ध होने वाले रासों में प्राचीनतम होने से यही अच्छा प्रकाश डालता है | पर अभिनय, नर्तत और गान ये तीन तत्व रिपुदारण में भी मिलते हैं | श्रतः राजस्थान में मिलने वाले रासों में प्राचीनता की दृष्टि से भले ही इस रास का महत्व हो, पर शिल्प में इसका कोई नवीन यीगदान नहीं लगता

जन ++.2 वनाओ+ ऑनजजज+ + “४+ ७5

१-श्री मद्भागवत; दशम स्कन्ध, तेंतीसवें अध्याय के निम्न इलोक :--- (क) तत्नारभत गोविन्दो रासक्रीडामनुब्रते: | २। (ख) रासोत्सवः सम्प्रवृत्ती गोपीमण्डलमण्डितः (ग) सप्रियाणामभृच्छव्दसतुसुलो रासमण्डले ॥॥६।। २-(क) स्विद्यन्मुर्प:ः कबररसनाग्रन्थय ऋष्णबवो गायन्त्यस्तं तडित इब ता मेध चक्रे विरेजुः | वही, इलोक सं० ८। *. (ख) तदेव श्र वमुस्तिन्ये तस्ये मान बहवदात्‌ु-वहीं, इलोक सं० १० ३-देखिये:-मरुभारती, वर्ष४, अक २, में “रिपुदारण रास” निबंध: डॉ० दशरथदार्मा, पृू० ५७

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ऐसी स्थिति में अपश्नद्ञ अपन्र बेतर थे दी काल ही ऐसे हैं, जिनमें रासों के अनेक प्रकार मिलें। श्रपश्र गेतर साहित्य में विंधाल संख्या में विविध मान दण्ड प्रस्थुत करने वाले रास ग्रन्व उपलब्ध हुए हैं जिनके जित्प में संस्कृत तथा, प्राकृत के रास ग्रन्यों की अपेक्षा अधिक प्रगति ब्ृतनता है

उपदेश रसायन रास के ३६ वें पद्म में 'ताला रासु” लकुटा था लड़ड़ा रासुः नामक दी प्रकार के रासों का उल्लेख मिलता है।' कथू रमंजरी में भी तानारामु' और 'लड़ड़ा रासु” का संकेत मिलना है ।* डॉ० जे० पीच० वॉगेल ते ग्वालियर बाग की एक पेटिग में चित्रित 'लडड़ा रास! का वर्णन किया है ।3 इन तथ्यों से यह श्ष्ट होता है कि अ्पश्रश काल में रात्त कीड़ा में तालियों और डंडियों से खेलने की प्रथा भी प्रचलित हो गई थी

कालास्तर में रफ् क्रीड़ के सप्दस्द भें यह मी उल्लेज् खिला) है फिः जैन मंदिरों में श्रावक आदि लोग रात्रि के समय में तालनियों के माव (ताल देकर) रासों को गाया करते थे ।४ उसमें जीव हिंसा की सम्भावना के कारण रात्रि में ताला रास का निपेध किया गया है। इसी प्रकार दिल में पुरुषों का स्त्रियों के साथ लग्रुडा रास करने (डंडियों के साथ #वत्य करते हुए रास गाने) को भी अनुखित वताया गया है जेन मन्दिरों में थे राज़ १४ वीं दताव्दी तक खेले जाते थे ।५ एक महत्वपूर्ण वात यह भी है कि उपकदिशों के गेय रूपों को भी जो,

१-साहित्य संदेश; जुलाई १६५१, में रातों के श्र्थ का क्रमिक विकास लेख डॉ० दशरथ दर्मा

२-तालारासु विदिति रयरिहिं दिवर्सिवि लड़ड़ा रसु सद्ठें पुरिसिहि-

उ० २० रा० छन्द ३६ |

३-(क)खेलंती तालाणुगदप्प झ्राञ्नो तुहगणे दीसदि दण्ड रासो (ख) लड्डाडा रु जहि परुरियुवि दितिउ वारियइ चर्चरी छुंदे | कप मंजरी ४।१०-२०

४-8 709 0076 600 6 40प7फ 50678 79968 42. 200एशं४#798 णए9% १0फ्ी8 हुए07) 0 [७छशे७ कापथशंछंशार, 8 व6%# 9976 87077 ७077797868 58ए७४७ ज0ाक्या #8704ी77 8-:०ए- गत छा छंश+ प8प78, 6एंतशावए & 887087, .... 796 7685 ह788 7प्रडंछक्रा8 ७78 896) €ए88880 77 09889708 [७४7 0 जछ00०प०४ #ठेए ठशोहढते वेक्रादे॥ क्‍9 गत 8ण्वे पुल क्‍9 0ककीए, ?क78ंगछ 5ए 70%, 7. 79. ५४०४)७ 9928 49-6.

५-देखियेः-ना० प्र० पत्रिका; वर्ष ५८, श्रक ४, पए० ४२०, श्री अगर-चन्द नाहटा का लेख

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कि जैन घुनि प्रस्तुत करते थे रास! संज्ञा दी जाने लगी उपदेश रसायन रास में जिनदत्त सूरि के अनेक गेय उपदेश रास बन गये हैं | स्त्री और पुरुषों के एक साथ रास नहीं खेलने के जो उल्लेख मिलते हैं ।* उनसे यह बात तो स्पष्ट हो ही जाती है कि रास क्रीडा अ्पश्र॑श और अपश्र शेतर कालों में स्त्री पुरुष दोनों में समान उत्साह के साय सम्पन्त होती थी और रास विशेष अवसरों पर जनता उललसित होकर खेलती थी अ्रतः नृत्य और गीत तत्व रासों में समान अनुपात से ११ वीं शताब्दी तक तो देखने को मिलता है।

यहाँ यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि नृत्य और गीत में से कालान्तर में रासों में गीत मात्र ही क्यों रह गया ? नृत्य क्रियां क्‍यों शिथिल हो गई ? इसका कारण जैन रासो रचनाश्रों के शिल्प का परिशीलन करने पर मिल जाता है अपश्र शेतर काल में जेन मुनि जिन उपदेशों को देश्य भाषा में जनसाधारण को गा-गा कर सुनाते थे, उनकी रसीली गीति और चर्चरी संज्ञक उपदेशात्मक रचनाए' धीरे-धीरे रास बनती गईं। जेन साधकों को शग प्रधान जीवन बिताने से विशेष उल्लास और राग, रंग, नृत्य, अभिनय से वेराग्य रखना पड़ता था ग्रतः नृत्य का तत्व धीरे धीरे उपेक्षित होने लगा प्रनुश्नू तिबद्ध परम्परा के कारण ये गीतियां इतनी घनीभूत होकर प्रचलित हुईं, कि जन सानस रसमय हो उठा और नृत्य को लोग उपेक्षा की दृष्टि से देखने लगे ग्रन्यथा कपू मंजरी के विचित्र बन्ध में ताल, लय, प्रकम्पन के आधार पर नृत्याभिनय करती हुई नायिकाग्रों का वर्णन मिलता है ।) इन नर्तकियों की समवाहु, समाभिमुख आदि अनेक भिन्न-भिन्न मुद्राओं का भी उल्लेख मिलता है।३ वस्तुतः ११वीं शताब्दी तक पहुँचते-पहुँचते रास गेय काव्य” सात्र रह गया। क्योंकि इन गीतियों श्रौर चर्चरियों को ही जनसाधारण में अत्यन्त श्रधिक प्रच- लित देखकर जेन म्ुनियों ने उपदेश का माध्यम छुना और ये चर्चरियां और गीतियां इतनी अ्रधिक प्रसिद्ध हुई, कि इसके वामों से विभिन्न छन्द विश्येपों का निर्माण हो गया कालान्तर में चर्चरी और गीत नाम से स्वतन्त्र छन्द ही बन गये अब जनता इन रासों को खेलने की अपेक्षा श्रवण करने में अधिक रस

१-देखिएः-अ्रपश्र दा काव्यत्नयी; श्री लालचन्द भगवान गांधी, पु० ३६ २-साहित्य संदेश; जुलाई १६५१, में डॉ० दशरथ ओ्रोका का 'रासो के श्रर्थ का क्रम विकास'-शीरषेक लेख ३-कंपु मंजरी; ४४१०-११ का यह उद्धरण:- सम॑ ससीसा सम वाहुहत्था रेहा विंसुद्धा श्रवराउदेंति पंतीहि दोहि लग्मताल बंध प्रपरोप्परं साहिमुही हुवंति।

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लेनेगलगी और इसीलिए श्रव्य काव्य की उत्त्ति.कां उल्वेख ११वीं शती' कहा गया है ।* विद्वांव्‌ आलोचक ने इस कयर्त की पुष्टि भी की है कवि हर्न्ह उपदेश वहल रासों के कारण. गेय रास केवल अन्ततः श्रत्य रास गान्र रह

नृत्य से उनका सम्बन्ध सर्वता विछिन्न हो गया

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११वीं शत्ती तक तो रास रासक की यह स्थित्ति रही पर हेमचद्र के

समय तक जन मानस ने रास को रूयक का दे दिया और ऐसा लगता है कि तत्कालीन वस्तु स्थिति को देखकर ही हेमचद्ध ने प्रेंटय काव्य के अन्तर्गत रासक को गेयब रूपक के भेदों में से एक मांना है जिसका उल्लेंख ऊपर किया जा चुका है। मंसण, उद्धत और मित्र ये तीन भेद थे इन तीनों के अन्तर्गत ही नि डोश्विका, भाणण, प्रस्थान, शिग, भारिका, प्रेरण, रामाक्रीड़, हल्तीसक, रासक, गोप्टी आदि उपभेद किये है। इनमें रामक और हल्लीसक उद्धत गेप रुपक के श्रन्तर्गत आ्ाते है इनमें उद्धत तत्वों का समायेश अधिक था और मसणे का झ्रांशिक भरत: अनुमानतः यह कहा जा सकता है कि रासक और हल्लीसक में उद्धत तत्व की अधिकता हो जाने के कारण उसकी क्रीड़ा में या रास जन्य शिल्प में दर्व या वीरत्व का समाविप्ट हो गया होगा और ज्यों-ज्यों उसकी रण प्रधांन प्रवृत्तियां बढ़ती गई, ये रासक वीरत्व प्रधान काव्य बनते गये और दूसरी ओर वे रासक जिनमें मसणता का तत्व आंणिक था थीरे धीरे कोमलंता प्रधान होते गये फेलतः कोमल प्रवृत्तियों वाले ये रासक 'रास' रूप में चलते रहे श्रौर यह परम्परा आज भी हमें 'फाग्र' के रूप में सुरक्षित मिलती है।

वस्तुतः: जन रुचि के इस बदलते हुए प्रभाव के कारण रासक में उद्धत तत्व की वृद्धि, गेबता -तथा नृत्य होने से वह एक गेग्रता प्रधान उपरूपक हो गया ।३ अ्रतः १२वीं शताब्दी से ही रास उपर्पक माना जाने लगा। नास्य दर्षण जैसे प्रसिद्ध. ग्रथों को देखने पर उसमें “नाख््य रास और रासकः का उल्लेख मिल जाता है ।४ रास़क में अभिनय की प्रधानता बढ़ी और साहित्य- दर्षण में भी नास्य राखक और रासक छाब्दों का उल्लेख देखकर यह कहा जा सकता है कि उस समय जनता में रासक का रूपक के रूप में पर्याप्त प्रचलन हो गया था। रत्नावली नाटिका में भी “रास को गीति नाख्य की संज्ा दी गई है।

२--च्ाहित्य संदेश; जुलाई १६५१, “रासो के अर्थ का क्रमिक विफास' लेख २-वही अड्डू, वही लेख

३-हिन्दी साहित्य का आदिकाल; डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी पु० ६०-६१।

४-ताख्य दर्पण (प्राच्य-विद्या मंदिर बंड़ोदा संस्करण), पृ. २१३-१६।

6 ११ ))

पर यहाँ तक रास के पास कोई नया विषय नहीं था। वही नृत्य, गाने और अभिनय हो घुमा फिरा कर उसकी विपय वस्तु बनता जा रहा था। अतः १२वीं शतात्दी ने विपय वस्तु के रूप में भी एक नई उत्क्रान्ति प्रस्तुत की गीतियों में चर्चरी मूलक रास रचनाम्रों में धीरे-धीरे कथा तत्व का समावेश होने लगा अतः कथा तत्व के आने से चरित्र-संकीर्तन बढ़ने लगा | विशेष रूप से अपश्र गेंतर जैन रासे में ऋषभ देव, नेमीनाथ, महावीर, ज॑म्वू स्वामी, गौतम स्वामी, स्थुलि भट्र, आदि के वर्णन मिलते हैं साथ ही श्रेष्ठ श्रावकों दानवोर पुरुषों के ऊपर यथा-वस्तुपाल, तेजपाल, पेथड़, समरसिह तथा तीर्थों आदि के नाम पर भी अनेक कथा प्रधान रास रे गये जिनका विश्लेपण आगे के पृष्ठो में किया जायंगा श्रतः कवि इस कथा तत्व को विविध छंदों में वांधकर श्र्थात्‌ “रासावंध”” रूप देकर जनता के समकक्ष रखने लगे। अरपश्न शेतर इन रासों में छुंदों की इस विविधता के साथ-साथ रासावंध के कारण “रास या रासा” श्रागे चलकर एक छंद ही हो गया एतदर्थ यह कहा जा सकता है कि क्योंकि हर एक रास में गेय ठत्व रसमय तत्वों की प्रधानता रहती थी और इस गेय तत्व ने जब अनवरत वृद्धि पाई, तो यह समस्त रास ग्रन्थ एक रास छंद के लिए ही रूढ़ हो गये हीं वस्तुतः यह रास छंद इतना प्रचलित हुआ कि तत्कालीन लोक काव्पों में भी इसका समावेश हो गया

इस प्रकार १२वीं शताब्दी तक में गिलने वाले इस विशाल जेन साहित्य के शिल्प, उसकी मुख्य प्रवृत्तियों, विशेषताओं और उसके विकास की कड़ियों का श्रब्ययन विभिन्न दृष्टियों से किया जा सकता है

१--संगीत नृत्य कला के रूप में २--छंदों की दृष्टि से

३--चविपय की हृष्ठि से ४---सहित्यिक रूपों की दृष्टि से ५--धर्म की दृष्टि से

१. जहाँ तक संगीत का प्रश्न है, उक्त विवेचन में हमने यह चर्चा की है कि अनेक युगों तक संगीत रास या रासक का एक भ्रधान तत्व था। संस्कृत काल और अपभ्रग॒ काल के संधि युग में तो रास में उसका संगीत तत्व ही प्रधान होगया था इसके वाद भी जेन कवियों ने जो उपदेश प्रधान चर्चरियाँ और गीतियाँ नाई हैं, वे संगीत तत्व की उत्कृएता से रास का प्रचार करने जन- कण्ठ हार बनने में सहायक हुई थी एक आवश्यक बात यह भी है कि “रास”! को रासा छंद बनाने में सप्भवतः संगीत ने भी सहायता की हो | वस्वुत्तः उक्त

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अनेक विद्वानों ने “गीत, लय श्रौर ताल” का महंत्व रास या रासक के लिए स्पष्ट किया है। अतः रास और संगीत परस्पर अन्योन्याश्रित हैँ श्री ध्यामविद्यारी गोस्वामी रास को एक नृत्य विशेष मानते हैं तथा एक प्रकार का काव्य और रूपक भी श्राचार्य हेमचन्द ने तो रास काव्यों में विभिन्न राग-रागनियों की व्यवहृति होने से रास के विकसित स्वरुप को राग-काव्य ही कह दिया था। इसके अ्रतिरिक्त “रास” जब गेंय उप रुपक का प्रकार था, तो उसमें अ्रमेक दोटें- छोटे उमि गीतों का समावेश श्रावश्यक था श्रीर वही उमि-गीत संग्रीत्त के अ्रनृछे अ्रंश थे जो रास नाम से प्रयुक्त हो रहे ये अतः स्पष्ट है कि रास ने संगीत कला के क्षेत्र की भी उन्नति की ओर बढ़ाया

नृत्य कला का भी रात से पर्याप्त सम्बन्ध हृष्टिगोचर होता है। नृत्य कला को प्रगति के चरम पर पहुँचाने वाला तत्व नर्तकी या नृत्यकार होता है श्रौर रास में नृत्य श्राववरयक था। “अनेक नतंकी योज्य॑ चित्रताल-लवान्वितम्‌? उदाहरण से यह स्पष्ट हो जाता है | हल्लीसक श्रौर रासक को हेसचद्र ने देशी ताम माला (८-६२) तथा धनपाल ने पाइयलच्छी नाममाला ( शब्द ६७२ ) में सामान्यतः गोप-गोपियों को क्रीड़ा कहा है--“'रासयम्मि हल्लीसो रासको, मण्डलेन स्त्रीणा नृत्य” अ्रतः स्त्रियों के नृत्य का उल्लेख स्पष्ट मिलता है भ्रव तक रास नाम से जानी जाने वाली सबसे प्राचीन क्रीड़ा कृष्ण गोपियों की ही रही है। उसी प्रकार नटराज शंकर भी अपने उद्धत ताण्डव नृत्य विभिन्न रूपों में स्वयं मुख्य नठेश्वर वनकर करते थे। परन्तु श्रीकृष्ण के इस मस॒ण रास का सम्बन्ध “लास्य” नामक नृत्य से भी पर्याप्त सम्बन्ध रखता है। श्रागे रास को लास्य भी बना दिया गया ऐसा उल्लेख मिलता है रास या लास्य रसपूर्ण गीत मात्र ही नहीं, उसमें नृत्य के साथ अनेक वाद्यों का भी समावेश्ञ होते है हेमचन्द्र सूरि के शिप्यों ने ११वीं शताव्दी में रे नास्य-दर्पण में लास्य के अवान्तर भेदों का उल्लेख किया है ।* औौर जिसमें विशिन्न देश्य रूचि ही लास्य के भेद उपमेदों में परिवर्तत करती रही है। स्वयं थार्गधर ने अपने ग्रन्थ संगीत- रत्नाकर में सं० १२०० ई० के आस-पास सौराष्ट्र की नारियों के रास नृत्य का उल्लेख किया है। अतः लास्य नृत्य भी कालान्तर में रास का स्थान ग्रहण किए रहा लास्य की परम्परा में संगीत-रत्नाकर में वरणित ऊपा-अनिरूद्ध, अ्रभिमत्यु

१-देखिये वत्रिपथगा? श्रक्टूवर; १६५७; वर्ष ३, श्रद्धू १, पृु० ५३ पर श्री श्याम विहारी गोस्व्रामी का 'स्व्रामी हरिदास श्रौर रासलीलानुकरण' शीर्पक लेख २-भाव भेदाद लास्य भेदा बहुधा मन्यते बुध: तदेव नियमैहीन देशे रूच्य प्रवर्तितम्‌ “-नास्य दर्पण

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की पत्नी उत्तरा का बड़ा हाथ रहा है। स्वयं अजु के ऊपर भी. नृत्य-रास के संस्कार का प्रभाव पड़े बिना नहीं रह सका। मणिपुरतृत्य, लास्य-इत्य का ही प्रकार माना जाता है। सौराष्ट्र और ग्रुजरात प्रदेशों में लास्य या नृत्य की परम्परा अत्यन्त प्राचीन तथा स्वरूप में एक ही रही है। सौराष्ट्र में श्राज भी “रासड़ा लेवा” बब्द अ्रव भी प्रचलित मिल जाता है क्योकि रास ने नृत्य कला को पर्याप्त सहायता दी है, अतः संगीत की भांति नृत्य अभिनय रासक में एक दम अन्योन्याश्रित हैं। यह भी सम्भव है कि नृत्य की अनेक कलाएँ वाद्य तथा संगीत-रासक में समाविष्ट रही हों अतः रासक ने लास्य को लास्य ने रासक को परस्पर वड़ा ही बल प्रदाव किया है अश्रतः नृत्य-कला भी रामसक का प्रमुख रूप रही है ।' छुंदों की दृष्टि से-- रास का मूल्यांकन छंदों की दृष्टि से भी किया जा सकता है। ११वीं शताब्दी तक ये रास गेय रूप में इतने अधिक प्रचलित हुए कि “रास” नामक एक छुँद विशेष ही बन गया। यों विद्वानों ने रास छंद में केवल एक छंद का विवेचन कर अनेक छुंदों का समाहार किया है। अ्रतः यह स्पष्ट है कि रास परम्परा में अनेक रास छंंदों की दृष्टि से भी लिखें जाते थे। उदाहरणार्थ संदेश रासक में प्रयुक्त रास छंद। इस प्रकार छंद की दृष्टि से रास या रासक कहलाने वाली रचनाग्रों के लिए छंद एक विचार-सारणि या कसौटी ही वन गया ध्यान से देखने पर यह लगता ही है कि रासो ग्रन्थों में रासा छंद प्रमुखता से प्रयुक्त हुआ है | रास छंद के इस प्रभाव से तत्कालीन सभी काबव्यों में यह विश्ेपता उनके नाम में ही गई और वहुधा वे नाम उनके शीर्षकों के अनु- सार विविध काव्य-रूप बन गये-उदाहरणार्थ-पेघड़ रास, समरारास श्रादि में रास छुंद प्रमुख है, तो चतुष्पदिका में चउपई और स्थूलि भद्र फागु तथा अनेक मेमिनाथ फारों में “फागु” छंद मिल जाता है। रास छंद का शास्त्रीय अध्ययन करने श्रथवा रासक के काव्य रूपों शिल्प के विपय में हमें विरहाँक के “वृत्त जाति समुखय” (४२६९-२७) और स्वयंभू के छंद्स से बड़ी सहायता मिलती है इन दोनों छेद शास्त्रियों ने रासक की परिभाषाएं दी है। विरहांक के अनुसार रासक श्रनेक अडिल्लों, दुव-हवों, मात्राओ्रों, रह्ढाशों और ढोसाश्रों से मिलकर बनता है इसके अतिरिक्‍त मात्रा, रहा दोहा, अडिल्ला तथा ढोता की उसने अलग परिभाषाएं दी है सम्भवतः विरहांक ने रासको की दो प्रकार की लोक- प्रियता बताई है तथा यह लिखा है कि-रास वन्ध के वाद ही उन्होने “रासा”?

१-गुुजराती साहित्य नां स्वरूपो; प्रोण म० २० सजुमदार, ४० ४१३-१६॥।

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तामक॑ स्वतन्त्र छंद की परिभाषा दी-है जिसकी कुछ मात्राएं -डॉ० हरिवल्लम भायारी ने संदेश रासक की भुमिकां में देकर'दोहा, छड टशिया, पहुद्धिया, घत्ता चौपाई, रहा, ब्रोढसा, अडिल्ल आदि अनेक छंदों का बहुतावत से प्रयोग करने वाली रचनाश्रों को रासक नाम दिया है। इस प्रकार सभी परिभायात्रों में प्रयुक्त तथ्यों को कसौटी मान कर चलने में जब हम श्रादिकालीन हिन्दी जेस साहित्य की रास रचताश्रीं में “रास” छंद को दूढ़ते हैं तो हमें रास छंद इन लक्षणों से प्रलग ही छंद लगता है. श्रौर इस स्वतन्त्र छंद का दोहा, ढीसा, अडिल्न भ्रादि छंंदों से स्वतन्त्र रूप सिद्ध होता है तथा परस्पर कोई साम्य भी नहीं दिखांई पड़ता श्रतः यही “कहा जा-सकता हैं कि इन विभिन्न *छंदों की कृतियों को रासक नाम दें दिया जाता होगा रासक औझऔर रास छंद के लिए श्रद्यावधि प्राप्त प्रमाणों के आधार पर इससे श्रधिक कुछ कहना बहुत संगत नहीं लगता, पर यह स्पष्ट है कि रासक और रास संज्ञक अनेक कृतियों में “रास” एक छंद विज्येप के रूप में खूब मिलता है

. : अपश्र जेतर काल में रासों के विपयों में विस्तार हुए। अनेक विपयों पर रास रचना-हुई जिनमें से कुछ प्रमुख विपय अग्रार्कित हैं :-

१-उपदेगमूलक (यथा-उपदेश-रसायन-रास) २-चरित प्रधान (यथा-पेथड रास) ३-प्रवज्या वा दीक्षामुलक (यथा-अंबू स्वामी, गौतम स्वामी और स्थुलि- ' भद्र रास) ' ४-उत्सव वेभव-वी रता-मूलक (यथा-भरतेश्व र-बाहुबली-रास) ५-छंद प्रधान रास (यथा-भरतेश्वर-बाहुबली-रास) ६-कथा प्रधान-रामायण महाभारत पर (पंच पांडव चरित रासु) | ७-तोर्थों पर तीर्य यात्राओं एर-प्रथा रेवंतगिरि-रास तथा आवू-रास, सप्तक्षेत्रीय रास। के प-सिंघे वर्णाव (यथा-समरा रास) ६-संकीर्तन-जम्य तथा सेद्धान्तिक (यथा-सोलह-कारण-रास) १०-ऐतिहासिक-रास (यथा-समरा रास) इस प्रकार चरित्रों के गुणों का वर्णन करने, उनके दोपों को हटाने, यात्रा वर्णन करने, कथा निर्गाण करने, मन्दिरों का जीर्णोद्धार करने, दीक्षा उत्सव हेतु जब घीप आदि के लिए ही इन रास ग्रन्थों की रचना की जाती थी इसके अतिरिक्त वे भोगोलिक, सामाजिक, राजनेटिक तथा चरित मूलक होते थे ऊन रासा साहित्य जितना ही चरित मूलक होता था उतना ही ऐति- हासिक भी होता था

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इस प्रकार रास ग्रन्थों के विपय में व्यापकता गई और विपयों की सीमा का कोई बन्धन नहीं रहा अतः इन जेन साधकों ने लोक साहित्यपरक अर्थात्‌ जन भाषा में ओर शास्त्रीय भाषा दोनों में रारा रचनाएं कीं विषय की हृष्ठि से--- रास परम्परा में वेष्णव जेने इन दोनों धर्मो मे बड़ा योग दिया है। देष्णव धर्म में कृष्ण भक्ति शाखा के गोप 'मण्डल कृष्ण गोपियों ने रास को चरम पर पहुँचाया और ब्रज के रास तो शताब्दियों से प्रसिद्ध हैं इनमें श्व॑गार- परक, -भक्ति-परक भर कोमल सभी- प्रकार -के-रास मिलते हैं जेन धर्म ने भी विशाल संख्या मे संक्रांतिकाल” के रासों को सुरक्षित रखा है | अनेक वीतरागी जैन सुनियों तथा राजपुत्रों के दीक्षा ग्रहण करने के अवसर पर भी रासों की क्रीड़ाए' होती थीं स्त्री ओर पुरुष इन रासों को बड़ी श्रद्धा से खेलते थे और अपनी प्रकृति प्रदत्त अनुभूति को श्रमिनय संगीत में ड्ुबों कर साकार सार्यक करते थे। मुनिवर रान्यास ग्रहण ही नहीं करते थे, उनका संयम-श्री के साथ विधिवत्‌ विवाह होता था और इन जेन-रासों में से अ्रनेक रासों का उद्देदय आचार्य-ध्री का संजमसिरि से वरण कराना होता था यथा- जिनेश्वर सूरि दीक्षा-विवाह-वर्णन रास | इस शुभ अवसर पर अथवा पर्व पर उनके अनुयायी श्रावक्र भला कव मानते ? वे उत्फुल्ल होकर नृत्य, लय, ताल, गीत आदि द्वारा आचार्य-श्री को श्रद्धांजलि देते थे श्रतः राम का आाग्रोजन होना स्वाभाविक था। - साहित्यिक रूप और शिल्प योजना | साहित्यिक दृष्टि से मूल्यांकन करने पर रास या रासक संगीत्त, नृत्य लय, ताल, छुन्द, क्रीड़ा, अभिनय, उक्त सभी श्रगों के समन्वय का समृह है। वस्तुतः रासक का सम्बन्ध उक्त अंगों से ऊपर दिखाया जा चुका है। रासक या रास का स्वरूप उद्धत-गेव-उपरूपक के रूप में उल्लास प्रधान होता है श्रतः साहित्यिक दृष्टि से इसके शिल्प जन्य तत्वों का विवचन इस प्रकार किया जा सकता हैः--- नि ;ं १--रासक गेय उपरूपक है, जिसकी कथा गद्य में कम पद्य में अधिक अर्थात्‌ ग्रधिकांश पच् में ही होती है २-उसमें अनेक नर्तकियाँ हों ३-विभिन्न रागों का समावेश हो ४-अ्नेक छत्द हो ५-लय ताल का