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५० लिखी है। इस पुस्तकों थोंडे वर्ष पहिले “श्री जैन आत्मा- | तु नंद सभा--भावनगर * ने गुजरातो अबुवाद सहित प्रकट किया है। पुस्तकर्म के विचार साधारण चुद्धिवाले ओर अस्पाभ्यासी जनों के लियि उपकारक जान कर मेरे मनम इसका हिंदी-भावाय॑ लिखेने का कुछ विचार हो आया कारण यह है कि, चेतांवर जेन संप्रदाय के हिंदी भाषा-भाषी अनुयायियों के लिये-जिन की संझ्या शुजरातीयों की अपेक्षा अत्यधिक होने पर भी-पढने पढ़ाने योग्य पुस्तकें की चहुत ही कमी है-अभाव ही सा है। केवल परमोपकारी श्रीमद्‌ विजयानंदसूरि ( आत्मारामजी ) महाराज के बनाये हुए जैन- तत्वादश आदि उपकारी ग्रंथ ही इनके लिए जीवनाधार हैं ऐसी

हर

दशामें इनके लिए हिन्दी की पुस्तकोंकी बहुत ही आवश्यकता है | हपका विषय है कि पंजाव और मध्यप्रांतके कुछ उत्साही भाईयोंकी : प्रहत्ति इस काये तफ शुरू हुई है। दिल्लीका आत्मानंद-पुस्तक-मचा- *रक-मंढल, उपयोगी और आवश्यक पुरतकें प्रकट करने लगा है। धर्म प्रेमी और सखी ग्हस्थोका करतंव्य है कि वे इस मंडलको <द्रत्य- द्वारा सहायता दे कर अपनी संतान और साधमीव॑धुओं को, परम- पवित्र जेन धर्म का विशेष ज्ञान करा कर, सुकृत उपाजेन करें।

इस भावाथ को लिखने काकुछ विचार तो मेरा प्रथम था ही इतने. में. भद्धरपद परमपूज्य श्रीमान्‌ हंसप्रिनयजी महाराज की विशेष प्रेरणा हुई। अत+ उनकी आज्ञाका पालन कर यह छोटोसी पुस्तक पाठकोंके सम्मुख उपस्थित की जाती है। इसकी भांपा जान कर ही मध्यम. प्रकार की हिन्दी रकखी गई है। क्‍यों कि पाठक छोक राज-८ पूताना, पंजाब, गुजरात और मध्यप्रांत आदि भिन्न-भिन्न भाषा- भाषक भांतों में. रहते है इसलिये सवकी समझ में आजांवे ऐसो भाषा

का होना. आवश्यक है.) इस से विशुद्ध-हिन्दौ-लेखकी की. दृष्टि में कोई वाक्य सखलितसा नजर आदवें तो आशा हें कि उपेक्षा करेंगे

इस पुस्तकके छपानेका खचे, श्रीमान्‌ हंसविजयजी. महाराज के. छशिष्य पंन्यास श्रीमान्‌ संपदूविनयजी गणि के सहुपदेशसे, पाल्‍्हनपुर

निवासी शेठ धाडुभाई लवजी मेहताने अपने पुत्र भश्भुतमछ का पधू घाई-भूरि के पुण्यार्थ दिया है इस लिए पाठकोंकी ओरसे थे घन्प- वाद के पात्र हैं आशा है कि, इस उदाहरण को ध्यानमें रख कर अन्यान्य भ्रावक्र-शआविकार्ये भी अपने द्वव्यका इस प्रकार सदुपयोग (, कर-सम्यग्‌ ज्ञानका आराधन करेंगे। शमस्तु

| जेन उपांश्रय --पुनि जिनाविजय पाटण,.

अनुकमणिका

प्रथम अधिकार .... .... .... ..पत्रांक

दूसरा अधिकार .... .... ...

हे तीसरा अधिकार .... .... -.... ... श१ चोथा अधिकार .... .... .... ... १७ पाँचपों अधिकार ..... .... ... ... १९ छह्ा अधिकार .... ... ... ... १२ सातवों अधिकार .... .... ... .«. २४ आठवों अधिकार ..... .... .... ... २६ नववों अधिकार .... .... .... ... ३६ १० दुशवों अधिकार .... .... .... ... १८

११ ग्यारहयों अधिकार... ०. .... ... ४४ शर्ट वारहवों अधकार .... .... एप «०» . ऐ५६

१३ तेरखवों अधिकार .... .... .... ... "५६ १४ चोदहवों अधिकार .... ..... .... ... ५९ १५ पंदरहवों अधिकार .... ..... .... .... ६४ १६ सोलहवों अधिकार......... .... ... ६५६ १७ सतरहवों अधिकार......... .... .... ७१ १८ अठरहवोँ अधिकार.... .... .... ... ७८ २१९ उन्नीसवों अविकार .... ... .... /.... ८१ २० वीसवों अधिकार .... ... .... .... ८६ दास चचचॉे3....७

श्रीमछिजयानन्दसूरोी खरसदगुरुज्यों नमः जल (>> | | जनदर्वंसचार। जानी श्मिकलक- प्रथम-अधिकार।

अ->न्‍्न-क पे हुए कक ललने

आत्मा ओर कर्का स्वरूप ०6९ 9७9७ संशुद्धसिष्दान्तमघीश सिद्ध श्रीव्ेमान प्रणिपत्य सत्यम कर्मात्मपृच्छो त्तरदानपूर्व किशिद्िचारं स्वावेदे समूदें

छू जनतसलवसार,

20275 २२६ ७९८९८४४४६४४०४/ बन # 25 ४7३४४ ४६ २२ & ६५ «६ ६/४#६४/७४-७ # ह#* है रे 20८5४७ ह४ ४३२ 2७० 5८७ /९/९./५:९#*की

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जि सका सिख्छान्त संशुः्-पूवापर व्रोधादि दोप रहित- हा) है, नो क्वानादि अतिशायों से पूण्ठ प्रकाश युक्त है ऐसे श्री बष्शमान ( महावीर ) तीथंकरकोीं प्रणाम कर, श्वे- आत्माकी बोध करनेके ल्लिए आत्मा और कमे संबंधी कुछ विचार अदर्शित करता हूं

प्रश्ष-आत्मा केसा हे

उत्त-आत् नित्य, पिछू चेतनावान और अरूपी ढे

देव, मनुष्य, तियंच और नरकादि अवस्थाओंम प्योयका परिवतन होनेसे, परयायकी अपेक्ता आत्माकों अनित्य ज्ञी कह सकते हे, परंतु छव्यकी अपकासे आत्मा नित्यढ़ी हे। क्‍यों कि अवस्यान्तरोंम जी जीवस्व-आत्मत्व छव्य तो वही है |

यों तो सामान्यतः आत्मा स्व शरीर हो भे रहता हे; परंतु सत्र व्याप्त होनेकी शक्ति--( जो केवल्लि-समुदधातादिके समय भकट होती ढे) रखने से विज्चु अथात्‌ व्यापक कहल्लाता है

चेतना, जो सामान्य ओर विशेष ( क्लान ओर दशेन ) लप- योगरवरूप हे। वह स्व सर आवरणो-क्वानादि गुणोकी आच्छा- दित करने वाल्ले कंपों-के क्यादिकसे, न्यूनाधिक सब जीवोकों होती है, एस ल्षिए आत्मा चेतनावान है

, _.. रूप अथात्‌ आत्माका कोड रंग या आकार ( आकृति ) दोनेसे चह अरूपी हैं।

प्रथम अधिकार, डरे

[ नोढ-- जेनशाख्रोंम आत्माका ल्क्य अन्य म्रकारसे नी ब्िखा है थथधा--

यः क॒ता कमलेदानां, जोक्ता क्मफक्षस्थ संता परिनिवांता, द्यात्मा नान्यक्कक्षणः अथ--जो मिथ्यात्वादि कल्ुपित परिणामों छारा सुख-छ8/- खादि अनुनवोंकों देने वाह्ले कमोकों लपाजन करता है, अर्जित किए हुए कर्मोंके फक्षकों न्ञोगता हे, कमके विपाकोदयसे नरकादि गतियापें फिरता हे ओर सम्पगरशन, सम्यंगक़ान ओर सम्पक्र चारित्रके अज़्याससे संपूर्ण कमोंका नाश कर मुक्तावस्थाकों नी प्राप्त कर सकता है, वही आत्मा हें; अन्य ह्क्कण वात्मा नहीं। | प्रक्ष--कर्म केसे हें ? लपत्तर--कम जझू, रूपी और पुद्श्न हैं सामान्य और विशेष लपयोग स्वरूप चेतना होनेसे कर्म जम है| रूप अथात्‌ आकार युक्त होनेसे' कर्म रूपी हैँ। पूरण ( पुष्ठ होना ) ओर गल्लन ( क्वीए होना ) स्वन्नाव वाले होनेसे कम पुफ्ल्न हैं | तथा वणे, गंध, रस और स्पशो युक्त होनेसे प्नी कम पुर्रक्ष कहल्लाते हैं।.. इस जगतमें जीव अनंत हे | मुक्त ओर अरमृक्त-सिछः आर संसारी -इस प्रकार लनके दो नेद हैं। जो जीव संपूर्ण कर्पेंसि रहित है थे मुक्त कहक्षाते है। जो कम सहित हें वे अमृक्त कहे जाते ई।

जेनतत््वसार,

(७८७ / ३-० ६/९/९/५४९//१६८६.१६//५/ ९.१ ६४६५६ ६१ ०६/७/५/६/०६३६/५०६/४६४ #*६/१४/०४६१६४१ '१/९/९% / ९४५. $.. 8 ४८६४२६/६८/ ४८ ढ४८ #४१

मुक्त-संसारी जीवोंकी निन्न भिन्न जातिएं हैँ | जो जीव पृथ्वी, पाणी ( अप ), अग्नि (तेजस ), वायु ओर वनस्पति रूप शरीर ( काया ) में रहते हें ओर जो केवल्ल एक स्पश इन्छियका ही विषय ग्रहण कर सकते ढ, वे एकेन्छिय जाति वाह्ले कहे जाते | हैं। चल्नने फिरने वाल्ले प्राणियों में से, जो कृमि आदि जातिके थराणी हैं वे घीन्छिय कहलाते हें, क्‍यों कि इस जातिके जीव स्पशे ओर रसन ( जीह्दा ) इन दो ही इन्छियोंके विषयकों ग्रहण कर सकते हेँ | कीझी (चूंटी ) मकोझा, जू, मांकर, वगेरह जा* तिके जीव, स्परो, रसन ओर प्राए ( नासिका ) इन तीन इमन्छि- यों वाल्ने होनेसे वे त्रीन्छीय कहलाते हैं। जमर, मच्छर, पी ६- त्यादि जातिके प्राशियोंकी, लपयुक्त तीन ( स्पशोन रसन और प्राण ) इन्छियोंके सिवाय चतुय चह्लु ( नेत्र ) इन्छिय ज्ञी हे अतः इस प्रकारके भ्राणी चतुरिन्छिय कहे जाते ह। जिन प्राशियोंको, स्परो, रसन, प्राण, चह्ु ओर श्रवण ( कान ) ये पांच एन्छियां हे वे जीव पंचेन्छिय जातिमें गिने जाते हु देव, मनुष्य, नारक ओर पशु-पक्की आदि .तिरथेच; ये सब इसी जातिके जीव हूँ एकेन्छिय जातिके जीवोंमें से जो वनस्पतिकायमें रहने वाल्ले हे, लनके दो प्रकार है एक प्रत्येक ओर दूसरा साधारण जिस शा- रीरमें एक ही जीव रहता हों, अथात्‌ प्रत्येक आत्माका निन्न

हक.

श्थ्वी वनस्पति णादि पदार्थोमें विज्ञान वेत्ताओं ने, चेतना शक्ति अच्छी तरह सिद्ध की है का

प्रथम अधिकार, ए्‌

जक +१८ #च कह +> है है ६०७२६--६२५/७/०+ जाके ५३$४क १४% >ड हि

जिन्न शरीर हों डे प्रत्येक वनस्पति कहते है | हृक्क, ता, फन्न,

त्यादि एसी प्रत्येक जातिमें गिने जाते है। साधारण वनस्प- ति उसे कहते हें, जो एक ही शरीरमें अनंत जीव समूह रहता हों। कंदमूल्ल वंगेरहकी गणना इसी साधारण जातिकी वनस्त- तिमें हे सीपारण वनस्पतिको अनंतकाय या निगोद * जी कहते है

पृथ्वीकाय, अप्काय, तेजस्क्राय, वायुकाय और साधारण ना* मक वनस्पतिकाय ( निगोंद ) इन सबके, सूहम आर बादर इस पर कार दो दो नेद हैं। एसमें जो सुद्धम-प्रकार वाले जीव हे थे स- मग्र ब्लोकाकाश ( अखिल विश्व ) में व्याप्त है। लनको अब्पक्ष म- नुष्य अपने चमें-चश्ठु छारा नहीं देख सकते | वादर प्रकार वाल्ले पृथ्वीकाय, अपकाय, तेजस्काय ओर वायुकायके णजीवोंके असंझ्य शरीरोंका, तथा बादर निगोदके अनंत शरीरोंका समुदाय-पिंग ही मनुष्यको दृष्टिगोचर हो सकता ढे परंतु पत्येक प्रकार वाले जो वनस्पतिकायिक जीच है, लनका शरीर यदि स्थूज्न हुआ तो वह अकेञ्मा नी मलुष्योंकों दिखाएं दे सकता है; ओर जो सूह्दम ( सू- दम मकार वाक्षा नहीं किंतु मनुष्य दृष्ठिकी अपेक्ता सूद्ृम ) हुआ तो, अनेक या असंझूष शरीरोंका वना हुआ समूह ही नगर सकता है, अन्यथा नहीं | इन सव प्रकारके-सद़्म ओर वादर- जीवॉको सबक परमात्मा अपनी क्लान-इृष्टिते, हस्ताम्कबत्‌ देखते हैं

द६्‌ 'जेनतलसार.

ऋा०-+९./७ ९०७०१ ९.०९१ ६/ ६४ 7९/५१/५४६० ६१ ६१ ६४५१ ५०६० ६.१६ ७४४७ १५ कल

जीवॉकी अपेक्ता कंपोकी संख्या अनम्तगुणा अधिक है। वे सब समग्र ब्लोकाकाश ( अखिल्न ब्रह्माएम ) में, रूव्वीमं झोंट कर नरे हुए अजन ( काजल्न ) की तरह, व्याप्त हें। अधिक क्‍्या। जीवके एक एक प्रदेशमे ( जन शास्रोंमे जीवको असंख्य प्रदेशात्मक माना हे ) शुनाशुन् कर्तोकी अनंत वर्गोष्राएँ-कर्मेस्वरूप पुष्तक्ष राशिए-रढही हुई हैँ। जिस तरह खानमें रहा हुआ सुन्ना-चांदि मिट्ठीसे व्याप्त-दंका हुआ-रहता हे लसी प्रकार संसारी जीव, सं- पूण ह्लोकाकाशमें ठंस कर जरे हुए कमोसे . व्याप-ढंका हुआ-हें

प्रश्ष-- जिन्न जाति-स्वनाववाले कमोंका ओर आत्तमाका से- योग-संचंध-कैसे हुआ ? क्‍यों कि कम तो जड, रूपी आर पुष्नल्ष हैं, आत्मा चेतनावान्‌ और अरूपी-अमूतते-हे

लत्तर--कम्म ओर आत्माका संयोग-संवंध-अनादि सिख हे। जिस तरह खानमें रहे हुए खुवण ओर मृत्तिकाका, अरणि-काष्ठ आर लसमें रहे हुए अभिका, तिह्षोमे तेत्का ओर दूधमें घीका संयोग, इन पदाथके साथ ही-एक हाँ काह्मपे-लत्पन्न होता है, चेछकांत-मणिमें अमृतका ( जलह्बकी ) ओर सूर्यकांत-मणिमें अग्निका मेत्ष नी सदा हीसे है, लसी प्रकार जीव ओर कमेका संबंध भी सदा हीसे-अनादि कह सिछ-हे जेसे, खानमें पहले , सुन्नाआर पीछे मिट्टी, यां पहले मिट्टी ओर पीछे सुनत्ना लत्न हुआ, ऐसा व्यवहार ओर नलेद नहीं कर सकते; बसे पहले आत्मा

प्रथम अधिकार, |

९३०५७३७३%/#९/४७/४ # #5/२४ 27% /+$ ४3 #७ : जे ने

था ओर पीछे लप्तके साथ के ह्ग गये, अथवा; पहले कमे लत्पन हुए और पीढसे आत्माने लनको ग्रहण कर ल्विया; ऐसा व्यवहार ओए चंद ज्ञो नहीं कर सकते दोनों-जीव और कर्मो-- का संबंध अनादि सिज्ध हु

पोग्य सामग्री-साधन-के मिल्नने पर, जिस तरह सुन्रा मिद्टीसे अल्षग हो सकता हे, मिद्दी ओर सुनाका संबंध दूट सकता हे, आर दू्धमेसे घी जुदा हो सकता हैँ, लसी तरह, सम्यग्रदशन स- स्पगक्ञान ओर सम्यक्चारित्र रूप योग्य साधनों छारा, आत्मा ज्ञी कम-रूप पश्नसे मुक्त हो सकता है। अनादि-संवंध होने पर

कप

जी कम और आत्मा जुदा जुदा हो सकते हें

25

२--हितीय-आरउ कार कक अर मर जीवका कम ग्रहण करनेका खजन्नाव ढेँ।

४४००७ जी $ बन्नी अनादि है कम जी अनादि है, तथा जीव हक ओर कमेका संयोग-संबंध-नी अनादि है; यह वोत पहले अधिकारमें बता३ गई हे. जीव और कमेका अनादि संबंध 'होने पर ज्ञो, समय समय पर जोब पुराने क्मोंका त्याग और नये . कर्मोंका ग्रहण करता हे, यह बात इस अधिकारमें कही जाती हे।

प्रश्ष--क्म जरू स्वरूप हे इससे वे स्वयं कीसी अन्य व- स्तुका आश्रय नहीं हे सकते अपने आप जाकर वे कीसी आ- त्मार्कों क्षम नहीं सकते

आत्मा बुछ्य ( चेतनावान"क्षानवान्‌ ) हे, इससे सुखकी चा- इसे तो वह, जानता हुआ. नी सुख देने वाह्ने शुन-कर्मोंकी ग्रहण कर सकता हे, परतु, छःखका तो वह. ( आत्मा ) स्वनाव ही से ' छोपी है। छ/ख तो अक्लानी प्राणी ज्ञी नहीं चाहता। ऐसी हा- झ्तम, आत्मा जानता हुआ अहुन कमोंका ग्रहण केसे कर सकता

बल

द्वितीय अधिकार,

320 2676 64/50/२०26 5 0 जाई कक कत अ्क्चिका + 3 पक कल + दे मिकाक डी फट विजन # धन,

है ! हण्थिमान और खतंत्र ऐसा कौन पहुष्य जान बृछ कर छ/ख देने वाह्मी चीनको हाथ हें £ री कप जे ०३ घि ... लत्तर--जीवके शुन्ाशुन कम ग्रहण करनेमें कितनेक कारण हें.) लन कारणों छारा प्रेरित होकर जीव शुज्ष ओर अहन्न दोनों प्रकारके कर्मोंको ग्रहण करता हैं | वे कारण पांच हे | प्रथम कारण काल ! है, जिस बखत जो वनना ढोता है वह अवृध्य चनता हुं, इस दम कम जिस समय जीवको , जेंसे कर्मोंका प्रहए करना निर्माण हुआ हो, छस समय कम ग्रहण करने ढी पते हैं | दूसरा कारण “स्वज्ञाव? हे) नीवका कमे ग्रहण टी च्षे हि जे जज (0 »., करनेका स्व॒नाव ही हे, इस ब्षिये जैसे कर्म-समूह उसके सम्मुख ल१स्थित होते हैं, वेसोंका वह ग्रहण कर झेता हुँ | तीसरा कारण 'नियति? है-जिसको जवितव्यता नी कहते हें-नो कुछ जावी-ज्ञाव होता है वह अवद्य ही वनता है, अतः नवितव्यता के वश हो कर जीव झुनाधन, कमोंकों ग्रहण ,कर लेता हैं चोथा कारण “पूर्वेक्नत ' हैं, जीवने पूष न्वर्म जंसा कम किया हो डसीके फश्चाइुसार आगामी जन्ममें लसकी प्रहति होती है। पांचवा कारण पुरुषाकार याने लचधम हे) जीव जिस | ह। #

प्रकारका म्यत्न करता है छसी प्रकारका लसे कर्मका वंध या मोक होता है। जीवके कर्म ग्रहण करनेम यही हेतु ( कारण ) हैं इन हेतओंके 852. हो कर जिस प्रकार शुन्न-छुख देने वाल्ले-कमाका बंध करता है उसी प्रकार अज्जुज्-छः्ख देंने वाल्ले-कर्मोका नी बंध करता हे

१० जेनतलसार,

क्‍१/९३१३६/६१९ ४९-१७ #*६/०७ /"5१७.+७ ०६/४./०६-०४६.२६,

इस पर कुछ लदाहरण ज्ञी दिये जाते हं--

जेसे, को१ स्वतंत्र मनुष्य श्रीमंत होकर नी, एच्छाके बढ़ा होकर क्ड़ वरफी जेसा लत्तम नोजन छोर कर जानता हुंआ नी, चने वगेरह तुछ पदाथोका नक्कए करता ढे। कोह मुसाफर ए६४- स्थानपर जब्दी * पहुंचनेके लिये अच्छे रस्तेकों खोंम कर, जानता हुआ नी विपम मागगेकी तरफ जाता हे। चोर, व्यत्िचारी (परञ्वी ह्वंपट ), व्या- पारी, ओर ब्राह्मणादि मलुष्य जो तथा प्रकारकी ज्ञाविन्नावकी प्र- बल्ल भेरणासे पेरित होकर, जान बूफ कर ज्ञी, बुरे कार्मोकों करते हैं। निह्कक तया योगी बंगरह बूखी सक्री त्िक्काको-जेसी पीली

वेसीकी-जानते हुए जी खा ह्लेते हेँ.। रोगी ( विमार ) मनुष्य,

अपने रोगका नाश चाहता हुआ ओर अपथ्यसे जत्पन्न होने ' बाह्ने कष्टके स्वरूपकों सपफ़ता हुआ ज्ञी, इच्छाके वश हो कर अ- पथ्य पदाथंका सेवन करता ह; वेसे, जीव नो, लपर कहे हुए इन 0 कारणोंके निमित्तसे शुन्नाशुन॒ कमोंका ग्रहण करता हे |

अजानपनेमं नी जीवका कमे ग्रहण करनेका खन्नाव है। जिस तरह होह-चंवक पत्थर, नज॒दीकमें पर। हुआ अच्छा या खराव चाहे जंसा झोहा हों; लसकी, अगर वीचमें कीसी प्रकारका ह्यवधान हों तो, अपने पास खैच झेता हंं, लसी. तरह समीपमें रहे हुए :शुनाशुन--कर्म पु्नह्नोंकी काह्मादिकी प्ररणासे .भेरित हो कर जीव, अजान पने/जी, ग्रहण कर लेता है ।. ,- हर

७६ ०८८:७४६७०७.३.००४+-

३--ततीय-अधिकार

अमूत आत्मा मूते कर्मोको ग्रहण कर सकता है -(#ििवतक

प्रक्ष--नीव स्वयं अरूपी-अमूत् हें, तो फिर इन्छिय और ---ठस्त-पाद बगेरहकी सहाय बिना करमका ग्रहण किनके. छारा कर सकता हे ? जब कीसी मनुष्यको कोह_ट चीज क्लेनी देनी पमती हें तो पहल्ले उस चीजको देख ज्ञात्त कर, पीछे हाथ वगे- रहसे, उसे होता देता है, आत्माकी अवस्था वेसी होनेसे, वह कर्मोंकों ग्रहण करता है यह केसे माना जाय

लत्तर--जमगत्कत्ता-यह जगत्‌ धरने बनाया हें, ऐसा-मानने वाले जिस तरह इखरको निरिन्छिय और निराकार मानकर नी,अपनी अगम्य शक्तिषारा वह नक्तोंकों देखता ह, प्राथनादि सुनता हें, पूजा- . दिकास्वीकार करता है ओर ज्क्तजनोंके पापोंका नाश कर,चनका जल-

ज्यार करता हे; एत्यादि कामोंका करने वात्मा मानते ह,तो लसी तरह,

अमूते ओर अरूपी आत्माको ज्ञी अपने अपूर्व सामथ्य और स्व-

जेनतत्व॒सार,

२६/४/९४५/१४/९७२०६८४६० ७० ५/६/६/ ६/४०६० ४४/५७/४४४५ '६४८५/४/७७१५/५/०९/७/५/५४/७०६००५ ४६.९५ /१६१६४५/७/४१६/६०४ /५६ ०६/६४/४४४५ //ध१६/७८५२६/६ ४९ 2६ ८१/४६/६८७४ ४४५४९ #६ ७९.४६ /5 #* *५/९५//५ / /५

नावसे, इ|्छिया दिकी सहायता बिना ही, ज्विष्य काह्ष्ें नोगने ल्लायक कर्मोंको ग्रहण कर लेने वाह्या, मान लेना चाहिये। ... . तथा, ओर नी कितने ही दृष्टांत इस वात पर दिये जा सकते है, जेसे कि-- ओपधिके प्रयोगसे सिद की हुई पारेकी गोली, हस्तादिके होने पर ज्ञी, दुग्घका पान करती है। शीसेका अथवा पानीका शो- पृण करती है शब्द-वेध करनेकी शक्ति देती है, तथा वीगेकी नी इछ्धि करती हे ! जो जरूनूत पारा ज्ञी, इन्छिय वगेरहकी स- हाय बिना ऐसे ऐसे काये कर सकता है तो फिर आत्मा जैसा अ- चिंत्य शक्ति धारक पदार्थ क्‍या नहीं कर सकता ? हकांदि ज्ञी ह- 'स्त-पादादि शून्य हो कर आहारका ग्रहण करते हैं। नाक्षियर प्रकुखके मूलमें पानी राह्नने पर, छसके फन्न तकमें. बह ( पानी ) पहुंच जाता हैं; यह पत्क्क है इतना ही नहीं, माय; सब वस्तुएं अपने आप पानी ग्रहण कर गीश्ची बनतीं हैं। जो. ऐसा कहा जाय कि-“ यह तो पानिकी शक्ति हे जो. अन्य पस्तुका नेदन कर लसके अंदर दाखले हो जाता है तो यह बात संगत नहीं होती क्यों कि इसमें व्यत्विचार ( बाघ ) आता है मुफशित्या (एक प्रकारका अति कठिन पाषाण- होता है ) ओर कररू-कण. ( मं गादि अनाजमें कोई को३ दाना.इस किसमका. आता है.जो कन्ती 'नहीं रंधा जाता ) पानीसे. कन्नी ज्ञी नहीं नेंदे जाते! जिसका स्व- 'जाव, जो, वस्तु ग्रहण कंरनेका हो वही .लस पत्तुकों ग्रहण कर

तृतीय अधिकार, .. १३

६३७४१ ४७४७४७४+७ /०/४५ ४७ #९४९०५ ५७४४७ ७०७३१ ५५७४३ ५५ २७/७९/५७०० ७०७४६ # » क७ २५५७४७३५७ ०५ *५७/५७७१ /५ ४+७६ ०७ #क-४ |

सकता है; अन्य नहीं | ब्ोह-चंंबकका यही सतन्नाव है कि वह अन्य सव धातुओंकी छोमकर केवन्न ल्लोहे को ही अपने पास खीं- चता है। जीव नी जविष्यमें जेसे बनने वाल्मा हो बसी भेरणाके वश हो कर, अन्य पुदक्ष-समूहकी छोर कर केपल्ल कम-पुदलको ही ग्रहण करता हे

जेसे, स्वप्नावस्थार्म मनुष्य क्ानेन्छिय ( स्पशनादि) और क- मेंन्छिय ( कर-पादादि ) की सहायता बिना ही सब काये करता है, वेसे ही आत्मा ज्ञी एन्छियादिकी सहायकी जरूरत रखकर स्वयं क्मका लपाजन करता है यदि कहा जाय कि, स्वप्न तो केवल भ्रम मात्र है उससे किसी प्रकारके कायकी सिच्दी नहीं होती * तो कहना परूेगा कि, यह कथन युक्ति शून्य है, क्यों कि अनेक मतुष्योको, देखे हुए स्वप्नोंका, वहुत बार झुनाहझन फन्ष म्िल्षता है, और शास्रोम नी उनका विस्तार पृवेक वणन है। यदि यह कहा जाय कि, ' जिस तरह, देखे हुए स्वप्नोंका स्मरण मनुष्योंकों होता है बेसे, ग्रहण किए हुए कर्मोका स्मरण क्यों नहीं होता ? ! इसका लत्तर यह हे कि, जसे, सब मनुष्योंको, देखे हुए सन्नी स्वप्नोंका प्रायः स्मरण नहीं होता, किंतु कितने एक मलु- प्योका होता है, बेसे ग्रहण किए हुए कर्मोका न्नी स्मरण सभी भाशणियोंकों नहीं होता, परंतु विशेषज्ञानवान आत्माओंकी अवश्य होता है जैसे कितने एक मनुष्योंकी अच्छे या बुरे सवप्नका फल, पिल्लता है, पैसे ग्रहण किए हुए झुन्न या अशुभ गा फह्न नी जीवको मिल्षता हे जैसे कह एक मलुष्योंका खप्न निष्पक्ष जाता

१४ ' जैनतससारं.

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है, वेसे केवल्नक्ानी योगीयोंकोी. जी, तत्कृणमें नाश हा जानेके का- “रण, .करमोंका फल्न नहीं मिल्लता है लत्पत्ति काह्म से-ह्ेकर अंत समय तक आत्मा - क्या क्या करता हे वह नी विचारने ह्लायक हे. गनेकी अंदर शुक्र. ओर * रज के बीचमें रह कर, यथोचित आहार स्ेकर एइन्छियवत्न के विना ही, अपने आप शीघ्रता पृवेंक सब. धातुओं को पेंदाः करता हे | गनेकी वाहर आकर-जन्म हे कर नी जेसा आहार मिल्षता हे वसे का ग्रहण कर, लसके परिणमन से- हत्पन्न होनेवाल्ले-- धातु आंदिक के छारा शरीरको पुष्ठ करता हे | तथा रोम-छिछों छारा नी आहार हे कर, कचरेका त्याग कर, रसका आश्रय लेता-हे आर लसके मत्मका वार वार वन्न पूषक त्याग वरता हे | सतत रजो आर तपोगुणकोी धारण करता हुआ, सदक्षान, विज्ञान, क्रोध, मान, माया, ह्ोन, काम, हिताहित, आचार-विचार, विद्या, रोग, आर समाधि विगेरहकों नी धाराए करता हे इस -प्रकार आत्मा शरीरके अंदर किस प्रकार क्रियाएं करता हे? क्या .शरीरके अंदर; नप्तके हाथ पर या आंख कान होते हें जिन.के छारा आहारादि प्राप्त कर, तथा प्रकारकी पृथर्कएण करता है ओर मुद॒त प्री होने पर जिस प्रकार घरका माश्षिक चक्ना जाता हे वेसे वह नी निर्केत्ष जाता हे! पुहल्ंसे भिन्न. ओर अमूते आत्पा जब इस पकार शरीरमें स्थित आरे च्याप्तें रह करे क्रियाएं करता है ओर सक् तथा स्थूत्न

छ्योका ग्रहएं-धारण करता हे तो फिर अत्यंत सूहषम- ऐसे उुज्लाका ग्रहण क्या नें कर सके ;

तृतीय अधिकार. श्ए्‌

कक चर

है है »४२००७९-७ २०७७ ५०३०७ #७ ०७

आर ज्ञी, यह जीव रूप तथा हाथ एत्यादिसे रहित हो कर ऐसे रूपी आर स्थृत्न शरीरको आहार पान आदि इन्छियोंके विपयेमि तथा शुन्नाशुन्न आरंन वाल्ले कार्मोम किस तरह प्रवताता हे सो ज्ञी विचारना चाहिए। जो जीवके लघम बिना ही हाथ और अंगादि से क्रियाएं हो सकती हों तो जीव शून्य-मुरदा-शरीर क्यों नहीं हाथ पर हिल्वाता चत्माता ? इपपते सिल्ध होता हे कि झानाशुल 'कम आत्मा ही करता है, अकेशे अंगादि नहीं। एसी अचस्थार्मे 'अरूपी आत्मा, सूक्ष्म परंतु रूपी कमोंको, क्‍यों नहीं ग्रहण कर स- कता ? जिस भकार ध्यानी पुरुष, वाह्मगत इन्छियोंफी मदत बिना इच्छित काये करता है-नीद्वाकी जरूरत रख कर जाप जंपता हे, कानके वगेर छुनता हे और जत्न, पुष्प, फन्न तथा दीप एन छच्योंके विना सदज्ञाव पूजनकों सफन्न करता हे-वेसे यह जीव ज्ञी इन्छिय तथा हाथ पेर की सहायकोी अपेकृता रख कर, कान स्तन्नाव आदि पंच समवायकी प्रेरणा रित हो कर कमंका ग्रहण, धारण ओर मोक्षण करता है प्श्च--जों जीवके एक एक प्रदेशमं अनंत कम लगे हुए हँ तो फिर थे सब पींमीज्ूत-इकट़े हुए हुए दिखाए क्‍यों नहीं देते !

,._ जत्तर--कम पुष्त्त अत्यंत सहम होनेसे चमचक्ल वाले साथा- रण पलुष्योंकी दृष्टिम नहीं सकते परंतु दिव्यदष्टि वाल्ले विशेषज्

योगी अपने क्वान . छारा हलन्हें अच्छी. तरह देख सकते

हेँ | यह बात हृष्टांत दें कर स्पष्ट को जा - सकती - है

१६ जेनतत्सार,

१९ ०१७/१९/१५४५/०९,,>५./०९-५#*५४/०४/१५ /#९/५ #5 ०९५ :५ / १३९, #९ #5७.३९ #5 /#५५/१९//०६,/#९-/५/६ ४५ ३५/९८०६/६-३६३५/९४६/०९३६-४५४५०५७/९३५५१६/५०६५१६१९/४१६ ४५.०५/५५६१६/०५.२९२७ #९ /#९ 2१७४९ ७०: ६/ ५: री.

जप्ते किसी पात्र या वस्धर वगेरहमें लगे हुए छुगंधी अथवा उगधवात्यी वस्तु के गंध पुदल्लोंकी नासिका छारा जान सकते हे परंतु पीसी नूत इकठे होने पर नी आंखोसे नहीं देख स- कते, बसे जीवके क्गे हुए कमे-पुफ्कक्ष नी-सूक्या तम होनेसे-अप- नी दृछ्टमिं नहीं सकते केवल्नक्षानी अपने क्वाननेत्र द्वारा लन्‍्हें देखते हे जैसे सिद्ध किया हुआ पारा छुवणको पी जाता हूं, प- रतु वह सुवश अपनी दृष्टिम नहीं आता और कोई सिख्छ योगी जव, लसे प्रयोग के प्रयत्नसे वाहर निकाह्नता है; तब छप्तका अ- स्तित्व निश्चित होता है, वैसे जीवके ग्रहण किए हुए कमें पुद््ल्ल जी अपनी दृष्टि से अदृह्य हो कर, क्वानी पुरुषों के आप्त वाक्‍्यों से निश्चित होते हैं

जीव ओर कर्मका संयोग

६: ६देट अटल #2

प्र श्ष--जीव अमू्त है और कर्म मूतत है तो फिर इस प- कार साकार आर निराकारका संयोग किस तरह न्यायसंगत हो सकता है ? लिन्न जाति ओर निन्नस्वनाववात्यी वस्तुएं आधा- राषेय नावको केसे प्राप्त कर सकती हैं ?

लत्तर--जीवकी शक्ति ओर कर्मके स्वन्नावके कारण इन-जीव

आर कम का संयोग हो सकता है। युणका आश्रय छत्य होता है। संसारगत भीव-छूव्यका गुण कम है, इससे गुणन्नत कमेको, गु- ऐीमूत जीवका आश्रय लेना उचित ही है अमूते ऐसे आका- क्षफों शासक पुरुष मूते अमृते, गुरु क्ष'्ठ श्वादि सकक पदार्धौका महान आधार मानते हैं तो सोचना चाहिए कि यह अमृत पदार्थ मृते चीजोंको कैसे धारण कर सकता है ! इस प्रकार आत्पा नी अमूते हो कर मृत कमोंको घारण कर सकता हू। तथा जैसे करेबादी-यह जगत्‌ इश्वरने चनाया दे ऐसा मानने बाले-अह्म- पकाह्मके अंतर्म यह संपूंण दरय जगत्‌ इंचरमें क्लीन हो जाता है कब

श्छ जेनतत्त्वसार,

७७/९७/०७०१. 2९ ०*:7%.३७३१ #2%#)3./:९५४ ५५०५.

3७5७ नीच: 3.>के 2रआे३2र९७न्‍ीय #९#ीप अजज #5७०९३१.०९७३१९:०५ ६"९५३५.४०१७३९१९५४०६/०५०११७०७-००५/०९.०४५ #७८०४०७५- ७४४०८६७०

आर फिर काक्नांतरमें प्रकद हो जाता हे; ऐसा मानते हें, तो, जिस प्रकार अमूते हश्वरमें, मृत जगत॒कों अपने अंदर ह्लीन कर- ब्ेनेकी शक्ति मानते हु, वेसे अमू्त जीव्म जी, मूर्त को ग्रहण आर धारण करदेनेकी शक्ति मान लेनी चाहिए।

सिथ्यात्वदष्टि, ज्ञम, कम, मत्सर, कषाय, काम, कद्ा (स्री पुरुष दिकी गीत उृत्य आदि जो कही हें ) गुण, क्रिया आदियें से शरीरमें रहा हुआ आत्मा क्या क्‍या नहीं धारण करता ? यदि कहा जाय कि ये गुण तो शरीरका आश्रय झेकर रहे हुए हेँ तो पूठा जायगा कि,शरीर जब जीव रहित हो जाता हूं तव ये (गुण) क्यों चहीं दिखाई देते ? इससे यही सिज्य होता हे कि ये गुण शरीरका आश्रय ब्ेकर नहीं रहे हैं किंतु जीवका ही आश्रय श्षे- कर रहे हुए हैं अन्य दूरकी वातें क्‍यों देखनी चाहिये, इतना ही विचारना चाहिये कि, इस दृश्यमान शरीरकों अच्दय आत्मा किस तरह धारण कर रहा हे ? इतना विचारने ही से जीव ओर कमेका संयोग केस हो सकता है; यह कोतुक दर हो जायगा जसे कपूर आर हिंगकी फेज्यी हुई अच्छी या बुरी गंध, आकाश- को आश्रय बनाकर, रहतो हे, वेसे कम, जीवकों आश्रय बना कर रहते है घल दृष्टांतेंसि निश्चित होता हे कि, गुण स्वरूप कम, जीव छब्यका आश्रय श्लेकर रहते हेँ ओर इसीसे कपयुक्त जोष

# संसारी कहल्लाते हें। इस प्रकार आत्मा ओर कपका आश्र- याश्रेय-आधाराधेय जाव सिख होता हे |

इज है « कै +०+-..ललललललल

५-पंचसम-अधिकार

कितजकरेस्स भय.

मुक्त जीवोंको कर्मबंध नहीं होता.

मि-- चतुर्थ अधिकारमें सिछ किया हुआ आत्मा और 22 कमेका आश्रय-आश्रेयन्नाव-आधार-आधेय ज्ञाव-जव य- थाथ हे तो फिर परम्रेष्ठी संक़ा वाले और अनंत कान, अनंत दृ- शन, अनंत वीये और अन॑त सुख से दीए एसे सिद्धांकों कमेका ग्रहण और मोक्कण (छोरूना ) क्यों नहीं होता? मुक्तात्मा कमे ग्र- हुए क्यों नहीं करते? क्यों कि जीव तो वे ज्ञी हे जब हनन्‍्हें छुख है तो फिर कर्मोंका निषेध कोन कर सकता हे?

लत्तर--सिद्छोंकों कम ग्रहण घट नहीं सकता। क्यों कि कर्मोंका ग्रहण, सूक्ष ऐसे तेनत ओर कामेण शरीर छारा हो सकता है। श्न दोनों शरीरोंका सिद्योको अनाव होनेसे वे कम अहण नहीं कर सकते | सिष्दात्माओंकों ्योतिष, चिद ओर आनंदके अर समूह से सदा तृप्ति रहती हे छत छःख आदिकी भआापिके क्ारणनूत, काक्ष, स्वनाव आदि प्रयोजकॉका सिद्छात्माओंको -अ- नाव ढहे। सिख्छात्मा निरंतर निष्किय हैं। अथवा, सिष्छात्माओं-

श््ण जेनतत्वसार-

का सुख, वेदनीय कर्मके नाशसे लत्पन्न हुआ हे अत; वह अनंत है ओर कम तो सांत-अंत वाल्ले हैं, इस ल्लिए नी-परिप्राणमें न्यू- नाथिकता होनेसे नी-सिज्ोोंके अनंत सुखके हेतु कम नहीं हो सकते मतंज्ब कि, सिख्छात्माओंकों कमेग्रहण नहीं होता, क्‍यों कि, लनको कर्मग्रहण करनेका कोई निमित्त नहीं है। नेसे जगतमं कथा ओर तृषा से मुक्त ऐसे स्वयं सुतप्त मनुष्यके तृप्तीकी काह्मम- योदा नद्ीं होती, जितेन्छिय संतुष्ठ योगिको किसी ज्ञी वस्तुके प्र “हुए करनेकी अन्निज्ञांपा नहीं होती, अथवा जेसे किसी बस्तुसे यूए ऐसे को१ पात्रमे अन्य को१ चीज मा नहीं सकती, वेसे चि- दानंद रूप अमृंतसे सदा पूण्ठ सिच्छात्मा ज्ञी कमेग्रहण नहीं कर- ते। जेसे मतुष्पफो अदनूत तत्यके दशनसे सुख होता हे वेसे सि- 'आोकी, विश्वके दररयोंकों देखनेसे अत्यंत सुख मिल्नता हे

पक

पु भ--सिख्छोंको कर्मेछिय या क्लानेंछिय वगेरह तो .को हं नहीं तो फिर वे, अनंत सुख केसे प्राप्त कर सकते हें | लत्तर--जगतूमें, जब कोई मनुष्य ज्वर आदि रोगसे. पोडफित हुआ होता हे ओर वहुत दिन तक निद नहीं ले सकता है, आर फिर कन्नी व्याधिके कम. होने पर जो घेंटे दो घंदें छसे- की आंख भिन्न जाती हे तो छलस समय जसके - पासवाल्ले संबंधी नुष्य अली इसे जगाना मत, यह सुखंम सोया हे; अनी _ ' इसे सुख पिल्ल रहा हे इत्यादि कहां करते हैं जेसे निछा- ' चस्था्े इंड्चियजन्य सुख या करपादादिकी कोई-क्रिया नहीं दिखाई

पंचम अधिकार 9१

4.० 25, ऑल बम 8. ७२७३ 25०4 #९७५०६५४/ ४१५ +९/ ५४६३९ २१०० २००७#७ /% +५०१/४६३६/७/७०५९%/४०७ +५.|+* 5 लगे कक. हर ७०५ अल>- ? 20 ०7९८ ९० कक

देती हू तो जी सोये हुए मनुप्यफो छुख मिल्ष रहा हे ऐसा कहा जाता हें, बसे जाग्रत-क्लानादि लपयोग स्वरूपमे रमए करनेवात्े-सिच्धों की सदा सुख मिल्नता हैं। तथा, आत्मझ्ञान और अपध्यात्मदशाममें रमए करते हुए किसी संतुष्ठ ओर जिर्तेद्रिय मुनिको को अन्य मनुष्प जब पूछता है कि महारान आपको कसा हें! ! तब बह योगी यही जवाप देता हें कि ज्ञाइ | परमानंद हे पू्ण सुख है छस समय उस मुनिको, कोई अच्छी वस्तुका स्पशे, स्वाछ पदा्थोंका आस्वाद, सुगंधी चीजकी सुवास, रमणीय हृडय- का दशेन ओर पिय शब्दका श्रवण नहीं होता, तथा हस्तपादादि की क्रिया ज्ञी को३ नहीं होती तो नी संतोपजन्प छुखाठुलपके कारण वह योगी वारंबार कहता है कि परमानंद है इससे यह नहीं समजना चाहिए कि वह योंही परमानंद कह देता हे, परंतु डसे वास्तविक सुखानुनव होता ढें। उसके कान जन्य सुखका साकात्कार वही कर सकता हु; अक्कान मनुष्य लसू- का स्वरूप नहीं जान सकते इसी प्रकार सिच्छात्माओंमे इम्छियोंके विषय ओर क्रियाओंके बिना ही अनंत सुख हे, उनके सुख-समू- हको वे ही जानते हुँ अन्य कीए मनुष्य लनके खुखेंका स्ररूप नहीं कह सकता है, क्‍यों कि वह अवएनीय हे

६-पष्ठम-अकि

न्‍ . *»/७ ०७८ जीव ओर कसेका अनादि संबंध जी छूट जाता है। , आम हा हु गे पि है ग्रे/क्ष-जीवका जो कम ग्रहण करनेका स्वनाव हे तो फिर

वह मूल स्वन्ञावको ढोरकर सिद्ध केसे हो सकता है ! लत्तर-नीष और कमेका यद्यपि अनादि-संबंध है तथापि योग्य सामग्रीके मिल्लने पर जीव, कमे ग्रहण करनेके मूल स्वन्नावकों छोमकर सिप्ठ हो सकता है | इस पर दांत 'दिये जाते हें। पारेका सूलल बे चेचल ओर अभश्निके संबंधसे लम्जानेका है परंतु योग्य पदा्थोके संयोगले वह अपना मूल्ल स्वज्ञाव छोमकर अम्निके संबंधर्म ज। स्थिर रहता है अग्निका मूह स्वन्ाव दा- हक स्वरूप. हे; परंतु तथाप्रकारके प्रयोगोंसें-संत्र-अयोग _ वा ओपधि-अयोग छारा अग्नि-वंधन- करने पर लसमें. प्रवेश करने वाले मनुष्योंकी दाह नहीं होता | चकोर पक्की अग्निका नक्कण कर- जाता हे परंतु अग्नि-अपना स्वन्नाव बदल्ल जानेसे-छसे जद्माता नहीं तथा अज्ञक, सुबर्ण, रलकंवल्ल और सिख्छ किया हुआ - प्रा ज्ञी अग्नि नहीं बल्लता इन पदार्थोके संयोगसे, अग्नि जो मूल दहन शक्ति है वह नष्ट हो जाती है अतः वह अपना

[

पप्ठम अधिकार, ५३

23७ ७जा ०८७७७०७०५/९ २९०९० ९: , ३०१ ७०७/१४३९ 2९३७ ००७३ ९०३० ७. '७७५/५/५३७-३५२९०७/ ५७१ ०६४५३ ८+२४६//९७, ९३०/५३५७ -+० + 2 कक, '3मी जात ७० फत न, परी आक 3 जमनप अंक ४०24

स्वन्ाव छोम देता है ज्लोह-चंवक पत्थरका सहज स्वन्नाष, झोढेफी अपनी तरफ खांचनेका हे, परंतु जब वह अग्निमें जन जाता है अथवा अन्य किसी एसी वस्त॒ुके साथ वह रखा गया हो कि जिससे लसकी शक्ति दव गह हो तो फिर वह अपने स्वनावकों अमद्में नहीं क्षा सकता, ऐसी अवस्था वह ब्योढेकों अपने पास नहीं खींच सकता वस, इसी प्रकार सिख्छावस्थार्मे जी, जीचका जो मूल्ल स्वन्ञाव कप ग्रहण करनेका हें चह नए हो जाता हे | अनाज बगेरहके दानेंमे, जब॒तक लसके मृत्त खन्नावपें फ्रक नहीं परुता तव तक ही, लगनेकी-अंकुरोत्पत्ति करनेक्ी- शक्ति रहती हे ओर जब लसमभें विकार जत्पन हो जाता है तो फिर बह लग नहीं सकता | इसी तरह सिझके जीवषेमि ज्ञी, संसारी अवस्थामं जो कम ग्रहण करनेका स्वन्नाव था लसमें, अन्य संयोगोंके कारण परिवतेन हो जानेसे, कमवंध नहीं द्वोता ! वायुका सहन स्व॒नाव चंचत्न पना हे परंतु नव लसे मशक बगेरहमें भर- दिया जाता हे तव वह रवजाव कहां चह्मा जाता हें ! इसी प्रकार सिख्छात्माओंका ज्ञी कम ग्रहण करनेका सहज खन्नाव नष्ट हो जाता हे इन लपर कहे गये दृश्ंतोंम वया और नी अनेक पदा- थेमिं, संयोगोकी विचित्रतासे मूक्ष-स्वन्ञावका परिवतेन हो जाता है यह पत्यक्त सिष्छ है तो फिर सिच्धावस्थार्म, जो जीवका दम ग्रहण करनेका सहज स्वन्ताव हें; चह परिवतेन हो जाता हे इसमें क्या आश्रय हुं

+: अनिल दिन 2 | नपैस्नतिणख धिमासदुप+

9--सप्तम-अधिकार मुक्त-स्थान कन्नी पूर्णतया नहीं ज़र सकता ओर संसार ज्ञी कज्नी जव्यशुन्य नहीं हो सकता

|

पथ्र॒ >क्ष-जेन शास्तोंम क्षिखा हे कि, मोक्षमागे अनादि का- »>. अषसे, नदीके प्रवाहकी पाफक बहता चल्मा आता हे और ज्ञण्यिमें जी इसी तरह सदा बहता रहेगां। अर्थात्‌ अनादि काह्से, इस संसारमेंसे ्व्य जीव कमबंधनसे मुक्त हो हो कर सिज्णावस्थाको प्राप्त कर रहे हें ओर जविष्यपे जी इसी प्रकार करते रहेंगे। ऐसा होनेपर जी की यह संसार जव्य-जीव-शुन्य

नहीं होगा, यह युक्ति विरूष्छ वाक्य केसे संगत हो सकता है .. ., छत्तर-जैन शास्रोंमं जो यह वात ब्विखी है सो स्वेया सत्य हे, क्‍यों कि, लसके प्ररूपषक सत्यवादी सबक जगवान है | अल्पक्ष अनुष्योंकी जो यह बात असंगत माह्युम देती हे उसका समाधान इस प्रकार है। जेसे पहार आदिम जरे हुए पानिके छहमेंसे नदी निकल्नती है, और छस नदीका प्रवाह अखंर रीतीसे बहता हुआ

पप्तम अधिकार, प्ए्‌

'६२५५२५३५+ +3/०९७३१५-३१५.९४९०० की ५० ९-० ५३९११ ७०१. ७रयज १०३ २८६ प०३स २. १०१ जक "8-२९ ९-१८ े.१ ३० €५५५.+ज ७० ७० 9.7 स्रककाबकबर रैब #९५०१५ ५४ फल टी 2० हरान + छरीषमी

समुछमें जाकर पिल्लता है तो ज्ञी वह मृत्ष छह कनी खाद्मी नहीं होता, नदीका प्रवाह बंध नहीं होता ओर सम्रुर नी पानिसे क्र नहीं जाता -। बसे संसार रूप छहमेंसे निकन्न कर जव्य जीव मुक्ति- मागका आराधन कर भोक्क स्थानकों पहुंचते हैं। इस मकार मोक्ष- याग सदा चन्नता रहता हें तो जी करती संसार खाली नहीं होता जव्यनीव खूट नहीं जाते ओर मुक्ती जर नहीं जाती

इस क्दारणसे लपरकी शेकाका समाधान ठीक हो सका- ता है ओर जनशास्तेमि क्षिखी हुईं बरातकी सत्यता अच्छी तरह प्रतीत हो जाती है| एक दूसरा नी छष्टांत इस वात पर दिया जाता हैं। जंसे, कोह अद््चुत मतिन्नाशाह्यी मनुष्य, संसारके अने- के धर्मोके, अनेक देशोंके ओर अनेक नापाणओंके असख्य शाद्धोका अश्रान्त हो कर निरंतर अभ्यास आर पाठ जो असंख्य वर्षों वक करता रहे तो जी कनी डसका हृदय, पढित शास्तोंके अक्वरोसे जर नहीं सकता, शास्रोंके अक्र खूट नहीं सकते ओर शास््र खाल्मी नहीं हों सकते इसी प्रकार संसारमेसे चाहे जितने भव्य मुक्तिमें चल्ले जाय तो ज्ञी मुक्ति कन्ो नजर नहीं सकती, अच्योंकी कमी नहीं हो सकती ओर संसार जीवॉसे शून्य नहीं हो सक- ता। मतक्भव कि मोक्षमागे सदा चहता रहता दें ओर संसार ज्ञी जीवॉसे जरा रहता है| इस प्रकार अनेक लदाहरण इस वात पर दिये जा सकते हें जिन्हें विक्ष पाठक स्वयं विचार क्लेंगे |

००% ७608 5२७

*“अटठस-आधकार

"०७9७० ईश्वरनिरूपए-इस जगत्‌का कर्ता कोई नहीं $ 7९

5 भर < क्ष--परत्रह्मका स्वरूप केसा हे ७५९५९

लत्तर--परांपकार पारायण ऐसे सर्वक्ष स्वदेशी वीतराग अगवानले परन्रह्मका निरूपण इस तरह करा हे--

प्रत्रह्म निर्विकार, निष्क्रिय, निर्माय, निर्मोह, निमेत्सर, निरहंकार, निःस्पृढ्, निरपेक, निगुण, निरंजन, अक्कर, अनाकृति, आअनंतक, अप्रमेय, अप्रतिक्रिय, अपुनन्व, महोदय, ज्योतिर्मय चिन्मय, आनंदमय, परमेष्ठी, विज्ञु, शाश्वत, स्थितियुक्त, रोध वि- रोध रहित, भन्नासहित, जगत्‌ जिसका निसेन करता हे. जिसके ध्यानके प्रभावसे ज्क्तजनोंकी निहत्ती होती ढे, ऐसा इश्वरस्वरूप हे

प्रक्ष--क्या परब्रह्म सृष्टिका कारण हे और युगान्त (प्रत्न- यकाक्ष) में परत्रह्ममें ही जगत्‌ क्षीन हो जाता हे ?

लत्तर--परबह्मको सृष्टि रचनेका कोश कारण नहीं हे तथा

अषप्टम अधिकार, पथ

लसको, इसे विषयमें कोई भेरणा करनेवात्या ज्ञी नहीं है। जो पर- बहने सृष्टि रची हों तो, ऐसी क्यों रचे ? यह जगत जन्म, मरण, व्याधि, कपाय, जुगार, काम और छगेतिके मरसे अत्यंत व्याकुश् है परस्पर छोह और भपतिपक्षसे संयुक्त हें। सिंह, सप॑ और वीहू आदि प्राणनाशक प्राणीयोंसे व्याप्त हैं। पारधी, मच्छीमार, आर कसाईयेसि संचित है चोरी और जारी आदि विकारोंसे पी- झित है। कस्तूरी, चामर, दांत ओर चममेके ल्लिए हरिण, गौ, हाथी, और चिताओंका नाशक हें छर्जिकू, छमारी और विम- बपरादिसे कब्नित है। छजाति, छर्पोनि और कीरूसे पूरित हैं। विष्ठा, छर्गन्ध ओर मुरदोंसे अंकित है। छप्कमको उत्पन्न करने- वाल्ले मेघुनसे अंचित है। सप्त धातुओंसे बने हुए शरीरोसि समा- थ्रित है प्रचएम पाखएरंघटासे विरंबित है नास्तिको करके सहित ओर मुनीशों "धारा निंदित हूँ। पितकेके संपरकवाले कुतकों से ककेश हेँ। वर्णोश्रम के भिन्न निन्न धमे और पम्दशेनके आचार विचारोंसे आमंवर युक्त हें। नाना प्रकारकी आक्ृतियोंवाल्ले देववाओंकी इसमें पूजा होतो हे पुएय ओर पापसे लत्पन्न होनेवाले कर्मोके न्नोगोंकों देंनेवात्मा हें स्वर्गापवगोदि नवांतरोंका इसमें लद॒य-परिवतेन होता हूँ। श्रीमंत आर निधन, आये और अनाये आदि न्नेदोति नरा हुआ हैं 'इसमें कितनेक परबव्रह्मके साथ बेर रखनेवाले, लसका खंमन करने- वाले ओर हास्य करनेवाले हैँ, तो कितनेक परत्रझ्मकी पूजा करने*

घर जेनतत्तसार,

वाले, लसका मन करनेवाले ओर स्तवना करनेवाले हें | इसका विस्तार करनेसे क्या ? क्यों कि जो कुछ दिखाई देता है वह पिप- रीत ही नजर आता है। परव्रह्मके स्वरूपसे विल्वकुल्ष भिन्र ही मालूम देता है| विधान ह्लोग तों कहते हे कि, कार्येमें लपादान कारणके गुण होने चाहिए संसारमें जो अनित्य वस्तुएं दिखाई देती हैं वे जो, सह्टिके समय परबहाममेंसे लत्पन्न हुई हो तो योगि- जन लनको निंददीय ओर जुगुप्सनीय समन कर लनका संसमे क्यों गोमते हैं ओर वेराग्य हृत्ति क्यों घारण करते हे ? जो राग- छेषादिसे विरूप स्वरूपवाल्या ऐसा जगत, लत्तम प्रकारके योगवे- त्ताओंके त्याग करने ह्ायक होता है, चह, थुगांतमें परव्रह्मकों : अपने अंदर ह्लीन करनेके श्लायक केसे बन सकता है ? इससे तो यही कहना पमेगा कि या तो परन्रह्ममें विवेक होगा, या शुका- दि-योगियोंमें ! जो परब्रह्मको-धारण करने योग्य होता हे वह , अन्य मनुष्योंको-झुकादि योगियोंकों त्याग करनेके योग्य होता हे ! रुष्टि ब्रह्ममेंसे लत्पत्र हुए है ओर प्रह्षय नी जसीमें होगा, ऐसा कहनेवाल्ले “ब्रह्म अति मृढ है ! क्या यह नहीं कहते ? क्या इसमें ब्रह्मको वांताहतिका-वमन किये हुए को खानेका-कुत्सित दोष नहीं ह्गताः क्लोकर्म एक आधे ब्राह्मण आदि मनृष्यका घात हो जाय तो वी जारी हत्या गिनी जाती हे तो सम्ग्र सृष्टिका संहार करनेवाले तह्मको केसी हत्या लगती होगी ? परमद्यात्षकी कितनी निदेयता!. अपनी वना३ हुई छ्टिका संहार करते हुए परब्रह्मको हिंसा नहीं ब्गती ऐसा कहा जाय तो फिर पुत्रोंको पेदा कर कर मार माद्वने-

अप्टम अधिकार, 9९

वाल्ले निदय मनुष्यकों ज्ञी पाप नहीं ल्वगता, ऐसा मानना पमेगा ऐसा-सजन ओर संहार करना यह तो त्रह्मकी ज्लीक्षा है अतः लसको पाप नहीं क्षणता; ऐसा कहा जाय तो फिर शिकारी मलु- प्योकी जी शिकार करने पर पाप नहीं झ्गना चाहिए, बये कि लनकी ज्ञी यह-शिकार खेब्ना ह्ीक्षा ही है ! सन्नावसे अथवा काह्षकी भेरणासे प्रेरित होकर ह्वरकी झष्टिका संहार करनेसे पाप नहीं क्षणता और इस अनुचित संहारमें वल्षिए्ठ स्वन्नाव और कान्न ही इश्वरकों यदि पेरित करता हों तो फिर छह)्टि-संहारमें खन्नाव और काक्ष ही को हेतु रहने दो | युक्तिम आवबे ऐसे ब्रह्मकी क्‍या जरूरत है ? जो ज्लोक सपह्टिफा समन और संहार ब्रह्मार्म आरों- पित करते हैं वे ब्रह्माकी महिमा प्रकट नहीं करते किंतु निह्ृंपएंमें दूषणका आरोप करते हैं ब्ह्मको निष्क्रिय कह कर हसीकी फिर जगत॒का कर्तों कहना, यह तो ' मेरी माता वंध्या है ऐसे कीहने- वाह्ेके समान हुआ जो कोई विज्ञानवान्‌ हे वे सब ब्रह्मका चिं- तन करते हैँ | जो वे स्त्रय॑ं जब ब्रह्मके अंगरभूत हों तो फिर लनमें आर ब्रह्ममें क्या नेद हुँ? वे किस क्षिये लसका चिंतन करते हें? वे भीच जो ब्रह्मांश होंगे तो ब्रह्म ख्य लनको अपने पास, -विना दे परिभ्रमके हे जायगा | जो ब्रह्मक्ी प्राप्तिफे किये निरागता, नि।- स्पृहता, निर्लेपता, निष्कियता, जिर्तेद्रियता ओर समानता ध्त्यादि का सेवन करना आवश्यक हों और अप्मकी इन ही में प्रीति हों तो फिर ब्रह्म निष्कियत्व सिर्छ हो छुका। यदि ऐसा कहा जाय कि, ब्रह्मका स्वनाव ही इस प्रकार सक्रियनिष्क्रियादि रूप हे,

३० जेनतत्त्वसार,

१३२७००३४५५१३९२५७० ५२५४१९/६७३५५० ५७३ ९५/५/७०३७२५३७०५७६७००७३६४६५ ९०७१७३७३ ७४

९०० ९०८ च३गि५८१न्‍क,

तो फिर कहना पड़ेगा कि, कतेत्व संबंधी अनेक स्वन्नावों के कारण कदाचित्‌ इस ( ब्रह्म ) में अनित्यता नी जायगी। छेपी जी हो जायगा! शग नी जायगा ओरे दृष्टि से ज्नी दिखाई देगा ! / ब्रह्म नित्य है। एक स्वभाववात्ा होने से क्‍्यें| कि, जो एक स्वनाव- वाह्या होता हे वह नित्य ही होता है, जेसे आकाश ब्रह्म नी बसा ही है| अतः चह नित्य है इस प्रकार जो पंचावयव वाक्य से करी गई व्याप्ति है वह ज्ञी नही बनेगा सहिके- समन समयमें आर संहार समयमें करतीं के मनमें रही हुए जो सक्रियता हे वह स्पष्ट ही पाह्मम देती हे ओर अन्य समयमें-सजन आर संहार के अतिरिक्त काह्ममें-निष्क्रियता रहेगी ! तथा जीवोंको नो सुख छ/ख दिखाए देता है उससे इसमे राग छेष नी सिय्छ होता है अथवा कहा ज्ञाय कि, जीव जैसा कृत्य करता हे छंसीके अनुसार सुख छुशख पिल्लता हे तो फिर इसमें कतांका क्या पराक्रम * तब तो निश्चित होता हे कि स्वतः पुएय पाप ही सुख छः/्खके हेतु हें जो जीव ब्रह्मके अंशनूत है| तो ब्रह्मांश समान होने से वे सब समान स्वरूप वाले ही होने चाहिए। जब जीव सुखी छखी इत्यादि बहुत प्रकारके दिखाई देते हैं तव इस नेदका करनेवात्मा, अ्रह्मसे कोर अन्य ही निश्चित होता हे। जो जीव बंहसे जिन हों ओर सुंख छःखका कता ब्रह्म हों, तो फिर जिस हेतुसे ब्रह्म. सुख 5$खका कतो हूँ लस “हेतुका-पुएयः पापका कदो जी वही (ब्रह्म) होना चाहिए। बह्मकोी (निरंजन, नित्य, अमृत और अक्रिय कह कर लसीकों फिर को, संहतों और रागछेषादिका पात्र कहना: प्ररुपर

अप्टम अधिकार, ३१

विरुष्ध होने से, यह जगत्‌ नी न्ित्न है और ब्रह्म जी जिन्र है नि कक ७०. री कि के कु गी ]

ऐसा मनियोनि स्वीकार किया है और इसी लिए संसारस्थित मुनि-

गए मुक्तिकी भाप्मिेके क्षिए पर ब्रह्मका ध्यान करते हैं |

कितनेक ह्ोक हेखवरकी ( विणुकी ) मायाकों जगतकी रचनामें हेतुभूत कहते हैं; उनको विचारना चाहिए कि, ईश्वर मा- यामें आश्रित है या माया इखरमें आश्रित है ? माया जम होनेसे अपने आप किसे अन्य वस्तुका आश्रय हेनेमें समर्थ नहीं हें। श्वर अह्मरूप होनेसे जानता हुआ माया जेसी जम बस्तुका आ- श्रय हे, यह हो नहीं सकता। क्यों कि चेतन, परतंत्र होता हें तय ढी जम वस्तुका आश्रय झेता हे | दूसरा यह ज्ञी विचारने ह्वा- यक्र है कि झेख्वर मायाको एक ही वखत प्रेरित करता हे कि हर एक जीच पति प्रथक्‌ प्रथक्‌ प्रेरित करता हे ? जो मायाको एक ही दफे भेरनी परती हो तो लसको एक खरूपता के कारण तीनों ह्ोक-खगे, मृत्यु और पात्ताल-एक रूप ही होने चाहिए। अथोत्‌ , या तो सब सुखमय ही होने चाहिए या सव उःखबाले ढी। निन्न स्वरूप वाह्ले तो नहीं होने चाहिए। जो मायाकों हरएक जीवप्त्ति जुदा जुदा मेरनी परुती हों तो फिर मायाकी अनंतता भाप्त होगी क्यों कि; जीवराशी अनंत है ऐसा होने पर माया अनेक प्रकार की हो जायगी ओर जीव ज्ञी भिन्न रूप वाले | अगर कहा जाय

: कि, / चाहे ऐसा हो, इसमें कया आपत्ति है ? तो ज्ञी विचा-

रना चाहिए कि माया जर-स्व॒रूप है; वह क्‍या कर सकती हैं ?।

इ्प जैनतखसार«

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