प्रकाशक * मंत्री--श्री श्रखिल भारतवर्षीय साधुमार्गी जैन रांठ रागडी मोहल्ला, बीकानेर (राजस्थान)

९) पार

प्रथम संस्करण + १६६४

हल

मुल्य ;

दो रुपये पचास नये पैसे

मुद्रक : रामस्वरूप शर्मा, राष्ट्र भारती प्रेस कूचा चेलान दिललौ--६

प्ाक्कथन

प्रीमज्जैनाचाय श्री गणोशलाल जी म० सा० श्रमण-सस्कृति के ज्योति- थूठज है उनके प्रवचनों का यह सग्रह 'जेन सस्कृति का राजमार्ग आद्यो- पानत देखा जैन-दर्शन के तात््विक विवेचन के साथ-साथ जैन-संस्क्ृति का स्पष्ट एव प्रेरणादायक निरूपण इन प्रवचनो हारा हुआ है इन प्रवघनों मे स्पष्ट, सरल शैली में ज्योतिपुझ्ज श्राचार्य श्री गणेशलाल जी महाराज ने श्रपती साधना की श्रनुभव प्रणीत चेतना को भ्रभिव्यक्त किया है। शभ्राचार्य श्री ने श्रपने जीवन की निस्पृह साधना द्वारा जो सत्यानुभव किया, उसी के उद्गारों का यह उपयोगी समुच्चय है

भारतीय धर्मो प्रोर घामिक संस्कृतियो का उद्भव मनुष्य की भावना के विरनन्‍्तर उद्येय 'के शमव के लिए ही हुग्ना है। भात्म-शुद्धि भ्रौर प्रात्म- लाभ का मूल भ्ाश्रय इतना ही है कि मनुष्य सत्य, शाइवत नियमों के श्रनु- सार भपना जीवनयापन करे शोर अश्रविचल पूर्णीत्व प्राप्त करे इस प्रयास का एकमात्र श्राधार धर्म है, नियमं-ज्ञान नही। नियम ज्ञान होते हुए भी सनुष्य भ्रपती सहज प्रवृत्तियो के कारण श्रनियमित हो जाता है। भ्रनियमित होने की मनुष्य की इस स्वाभाविक कमजोरी के निराकरण के लिए घामिक भैरणा की धावश्यकता रहती भ्राई है। समाज-शास्त्रियो को श्रभी यह जानना चाहिए कि मनृष्य ज्ञान शौर विद्या प्राप्त करते हुए भी 'पालन” के लिए क्षमतावान्‌ किस प्रकार होता है। जीवन की सभी कोमलताएं प्ननु भव से प्रयूत होती है भर क्षमता का यह प्रसव धर्म-पालन द्वारा ही होता है

धर्म भावना शपने श्रत्यन्त सुधड़ स्वरूप मे श्रद्धा है बुद्धि-प्रक्रिया छझीदव के भोग का उत्तेजन तो करती है, परन्तु पूर्णतः: शमन नही कर पाती यह छामव तो घर्म भावना द्वारा ही हो पाता है। मनुष्य श्रनन्त भ्ौर असकीर्णा शाइवत जीवन की कामना करता है, जिसकी तृप्ति धर्म भावना

ढं

द्वारा ही होती है। इस श्त्तीन्द्रिय घारणा के स्वानुमव के लिए हमे ज्ञान, विद्या श्रोर विज्ञान पक सीमा के बाद प्रागे नहीं ले जा सकते हैं धर्म भावना ही हमें इस क्षेत्र में प्रवेश देती है और यही कारण है कि ससार की श्रतुल्य ऋष्धि-सिद्धियो के रहते हुए भी घामिक महापुरुषों का प्रभाव सदियों तक मनुष्य के समूहो मे घर किये रहता है

श्राचार्य श्री गणेशलाल जी म० के प्रवचनों में उतत घर्मं भावना का व्यवहारिक प्रतिपादन किया गया है शोर जैन सस्कृति के सच्चे स्वरूप को सरलता से चित्रित किया है। साथ ही एक शभ्राकर्षण यह है कि इनमें विद्वत्ता का प्रभिमान कहीं नहीं है सि्फे जीवन के अपने भ्रनुभवों का कथन है। जैन दर्शन के भ्राघारो को अपने प्रवचन के प्रत्येक छाब्द मे प्रतिफलित करने का प्रयास किया है

श्राचाय॑ श्री गणोंशलाल जी महाराज का व्यक्तित्व एक सत्यान्वेषफ का व्यवितत्व है जैन दर्शन का उनका ज्ञान श्रौर उपदेश सासारिको के पथ प्रदर्शन के उपयुक्त है एवं श्राचार प्रादर्श जीवन के सत्य को प्रगठ करता है। यही कारण है इस भौतिकवाद के वातावरण में श्राज भी हम श्राप श्री जैसे श्राचाययं के दर्शन कर सकते हैं

“--जनादेनराय नागर उपकलपति राजस्थान विद्यापीठ, उदयपुर

प्रकाशकीथ

श्रीमज्जैनाचार्य पूज्य श्री गशंशलालजी म० सा द्वारा दिये गये प्नेक महत्त्वपूर्ण प्रदचनो मे जैन-सस्कृति से सग्वन्धित प्रवंचनों का यह सम्रह “जैन-सरक्त्ति का राजमार्य के नाम से प्रस्तुत करते हुए हमे हपष॑ हो रहा ६। इन प्रदचनों भे जेनघर्स के सुख्य-सुस्य सिद्धास्तो की सरल सुबोध भाषा में विदेघना की बई है भ्लौर जिनकी मौलिकता ग्रभीरता एव विपदता का मूल्याकव पाठक स्वय कर सकेगे |

प्राचायंश्री के भ्रममोल प्रवचन जनमानस मे जेनसस्कृति की महत्ता का प्रचार करने मे सक्षम हैं, इसी भावना से प्रेरित होकर इस प्रवचन संग्रह के प्रकाशन मे निम्नलिखित विदुषी बहियो ने श्राधिक सहयोग प्रदान किया है--

श्रीमती भूरीदाईजी सुराना, रायपुर ५००)

श्रीमती उमरावदाईजी मूथा, मद्रास ५००)

इसके लिए पश्लाप दोनो धन्यवादाई हैं श्रोर श्राशा है कि श्रापकी भावना से प्रेरणा! लेकर घत्य बन्धचु भी साहित्य प्रचार भे श्राथिक सहयोग प्रदान करेंगे

यहाँ यह भी स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि श्राचार्यश्री “के प्रवचन साधु-भाषा में होते थे। फिर भी प्रमादवश संपादक या सग्राहक द्वारा भाव या भाषा सम्बन्धी कोई भूल हो गई हो तो उसके उत्तरदायी संपादक या सग्राहक है ध्रोर ज्ञात होने पर झागामी सस्करण मे सुधार हो सकेगा

पुस्तक की प्रस्तावना लिखने के लिए राजस्थान के जाने-माने साहि- त्यन्ष श्री जनादेनरायजी नागर के हम सघन्यवाद प्राभारी हैं

इस पुस्तक छा प्रकाशन एक दूसरी दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है पाचार्यत्री के ध्रादर्शो के स्मरण को श्रक्षुण्ण वनाये रखने के लिये झाप श्री गे स्मृति में स्थापित होने वाली “श्री गणेश स्मृति ग्रंथमाला' का शुभा-

४६:

रम्म श्राप श्री के महत्त्वपूर्ण प्रवचनों से हो रहा है। जिससे हमारी यह -मावना साकार हो रही है कि ग्रथमाला के उद्देश्य--जैनवर्म श्रीर झाचार के

शाश्वत सिद्धान्तो का लोकभाषा में प्रचार करना--में हम सफलता प्राप्त “करेंगे

निवेदंक-- जुगराज सेठिया, मंत्री सुन्दरलाल तातेड़, सहमंत्नी महावीरचन्द घाड़ीवाल, सहमत्री श्री श्रखिल भारतवर्षीय साधुमार्गी जेन संघ, वीकानेर

प्रकाशन में सहयोगिनी बहिनों का परिचथ

श्रीमती भूरोबाईजी सुराना, रायपुर --श्रीमती भूरीवाईजी सुराना राय-

पुर स्वर्गीय श्री भ्रगरचन्दजी सुराना की घमंपत्ती हैं श्राप रायपुर स्था० जैन महिला सघ की उपाध्यक्षा हैं। जीवन सादा श्रौर सरल है। भ्रापके दो पुत्र भ्रोर दो पुश्ियाँ हैं। दोनो पुत्र श्री चम्पालालजी सोहनलालजी घ॒मंप्रेमी, समाजसेवी, कर्मठ कार्यकर्ता श्रोर सफल व्यापारी हैं। भापके फर्म का नाम 'भगरचन्द चम्पालाल' शोर 'श्रगरचन्द सोहनलाल' है। रायपुर में कपड़े के सबसे वड़े व्यापारी हैं। आागर एजेन्सी मे मिलो के साथ कपड़े का थोक व्यापार का काम होता है। श्री भ्र० भा० साधुमार्गी जैन सघ को श्रापका और श्रापके सुपुत्तो का तन-मन-घत् से सक्तिय सहयोग प्राप्त है

श्रीमती उमराददाई जी मृथा, रद्रास--श्रीमती उमरावबाई जी मुथा स्वर्गीय श्री सज्जनराज जी मूथा मद्रास की घमंपत्नी हैं। छोटी उम्र मे ही भ्रापको वंधव्य का दुःख सहना पड़ा भ्रापका जीवन घामिक, सरल भौर सादा है। शभ्रापका दयालु स्वभाव भौर ल्वघर्मी वात्सल्य प्रशसनीय है भ्रापके ससुर श्रीमान्‌ बीजराजजी सा०» मृथा का श्री भ्र० भा० साधुमार्गी जैन संघ को तन-मन-घन से सक्रिय सहयोग प्राप्त होता रहता है

संघ की शोर से हम शझ्रापका प्लाभार मानते हैं श्लोर भ्राशा है भ्रागामी प्रकाशनो के लिए प्रापका सक्रिय सहयोग प्राप्त होगा

मंप्री, थी शभ्रखिल भारतवर्षीय साधुमार्गी जनसंघ

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विषय-सूची

अध्याय जन-सस्कृति की विशालता महावीर का सर्वोच्च स्वाधीनता जन भ्रहिसा और उत्कृष्ट समानता

« स्थाद्वादर सत्य का साक्षात्कार « कमवाद का भश्रन्तरंहस्य

» भ्रपरिग्रहवाद याने स्वामित्त्व का विसर्जन « शास्त्रो के चार पभनुयोग

« जन दशुंन का तत्त्ववाद

- सर्वोदिय-भावना का विस्तार

१०. (११.

जैन धर्म का ईश्वरवाद कसा ? जन सिद्धान्तों में सामाजिकता

१०

पृष्ठ

१६ २६ ३१ ४१ ]

३० श्प १०६

जेन-संस्कृति की पिशालता

मैं आप के समय आज जैन दर्शन एवं सस्कृति की विद्ञालता पर कुछ प्रकाश डालना चाहता हूँ यह समभने योग्य बात है कि जहाँ अन्य दर्शन वा सस्कृतियाँ एक खास घेरे मे अपने को सीमित करती हुई चली वहाँ जैनदर्शन का आधार अत्यन्त व्यापक गुणो पर श्राधारित रहा है इसमे कभी सकुचितता कृत्सित साम्प्रदायिकता का प्रवेश नही हो पाया मूलमत्र नवकार मन्न से लेकर ऊँचे-मे-ऊचा सिद्धात्त श्रात्मा के विकास की वुनियाद को लेकर निर्मित हुभा है

जनद्शोन मे तो ज्यक्ति-पूजा को महत्त्व दिया गया है, ही सकुचित घेरो मे सिद्वान्तों को कसने की कोशिश की गई है। श्रात्म-विकास के सदेश को सिर्फ समूचे विद्व को बल्कि समूचे जीव-जगत्‌ को सुनाया गया है।

'जैन' शब्द का मूल भी इसी भाषना को नोव पर श्रकुरित हुआ है मल ससस्‍्क्ृत धातु है 'जि', जिसका भश्रर्थ होता है-जीतना जीतने का अ्रभिप्राय कोई क्षेत्र या प्रदेश जीतना नही बल्कि भ्रात्मा को जीतना, श्रात्मा की बुरा- शयो श्रौर कमज़ोरियो को जीतना है। आप अ्रभी बालक है, फिर भी कभी अ्रवध्य महसूस करते होगे फि जब कभी श्राप भूठ वोलो या कि कुछ चुरा लो तो श्रापका मन कॉँपता होगा, फिर उस गलती को सोचकर एक घृणा पैदा होती होगी श्रौर उसके बाद आप लोगो में से जो मजबूत इच्छाशक्तित के छात्र होगे, वे मन मे निश्चय करते होगे कि अब आ॥ञागे से कभी ऐसी बुराई नहीं करेंगे यही एक नरह से जीतने की प्रक्रिया है

मनुष्य की धात्मा में वातावरण से, सस्कार से यानी कर्म-प्रभाव से पाप छार्य करने वी प्रद्धत्ति होती है तो उस समय उसकी सम्यक्‌ प्रतिक्रिया रूप जिस उत्यानवारी भावना फा विस्तार होने लगता है भौर ज्यो-ज्यो चहु

क्।ा। 7१४५१

१० ज॑न-सस्कृति का राजमार्ग

भावना वलवती होती जाती है तो समझना चाहिए कि उसकी आत्मा में जीतने का क्रम शुरू हो गया है मन के विकारों को नष्ट करते हुए ज्यो-ज्यो आत्म-विकास की सीढियाँ ऊपर चढते जाते है,जीतने का क्रम भी ऊपर चढता जाता है श्रौर एक दिन उस भब्य आत्मा का मुक्ति के महाद्वार में प्रवेश होता है

तो यह है हमारे यहाँ विजय का स्वरूप, जिसमे विजेता आत्मा होता है किन्तु विजित कोई नहीं होता इस प्रकार जो अपने कमंशत्रुओं पर, विकारों पर पूरी तरह से विजय प्रार्त कर लेवे जिन! कहनाते है। वजय के इस क्रम को हमारे यहाँ ग्रथा गया है गुणस्थान की श्रेणियों में आत्मा की विचार-सरणियो के साथ गुरणास्थान की श्रेणियाँ चलती है, जिनका चरम विकास “जिनत्व' में होता है

ऐसे “जिन! भगवान ने चरम विकास के धरातल पर चढकर अपने ज्ञान-दर्शन-चारित्र से उदभूत जिन सिद्धान्तों पर प्रकाश डाला, वे कहलाये ज॑न-सिद्धाग्त और उनके अनुयायी जैन। तो जैन का सम्बन्ध है अपने आत्म-शत्रुओं पर विजय से, अपनी आत्मा के गुणों के विकास से सलिए जैन की कोई जाति, कोई वर्ग या कोई घेरे वाली बात नही है जैन कोई भी व्यक्ति हो सकता है जो अपनी कोशिशो को अपने मन को ऊपर उठाने में लगाए, आन्‍्तरिक गुणों को चमकाए | जैनत्व का सम्बन्ध किसी खास क्षेत्र, व्यक्ति या समूह से नही, बल्कि मुख्यत गुणों से है और गुग्यो क। क्षेत्र सर्देव सर्वेब्यापी और विभालतम होता है

इपलिए जैनधर्म को समभने के लिए सर्वप्रथम यह समझना आवश्यक है कि जैनधर्म के सिद्धान्तों में साम्प्रदायिकता को कतई स्थान नहीं है ग्रमुक समाज या व्यक्ति ही इसके पालन करने का अधिकारी हैईस क्षद्रह्त्ति से अछूता रहना ही यह दर्शन सबसे पहले सिखाता है वह धर्म, धर्म नही जो विकारी भेदभाव की नीव पर खडा हो। धर्म का सम्बन्ध जाति या देश से नही, गुणों से होना चाहिए जो व्यक्षित अपने जीवन में

जेन-संस्कृति की विशालत्ता ११

धामिक गुरो का झ्राचरण करता है, वही सच्चे अर्थों में धामिक है, वरना यह कहना गलत होगा कि एक जैन इसलिए जैन है कि उसने जैन घराने मे जन्म तो ले लिया है किन्तु जैनत्व का पालन नही करता

स्मरण रखे कि जब-जब किसी भी धर्म या सस्क्ृति ने अपने अनुया- यिग्यो को ययायोग्य मुक्तत चिन्तन का अवसर नही दिया श्रौर उन्होने कथित सिद्धास्तो के कठोर घेरे मे वधि रखने का प्रयास किया तो वहाँ कदाग्रह फंला है जहाँ बिना दिमाग के दायरे को खोले हुए एक हठ की जाती है, एक गलत आग्रह बनाया जाता है, वहाँ हमेशा घेरेबन्दी का कदाग्रह फंलता है श्रौर कुत्सित साम्प्रदायिकता पनपती है | क्योकि कुत्सित साम्प्रदा- यिकता की बुनियाद गुणो पर नही बल्कि, बेसमझली की गुटबन्दी पर होती है झौर गुटवन्दी खडी होती है व्यक्ति-विभेष के आश्रय पर क्योकि एक ब्यक्ति या तो अपनी कोई जिद पूरी करना चाहता है या अपने आग्रह को दूसरो पर बलातू लादना चाहता है, तब वह अपने प्रशसको का एक गुट बनाता है श्रौर वह गुट सिद्धान्तों को नही देखता, गुणो को नही परखता, सिर्फ अपने नेता का कदाग्रह पूरा करना चाहता है और उसी प्रयोजन से हरसभव प्रयत्त करना चाहता है यही है साम्प्रदायिकता की बुनियाद, जिसमे गुणों का कोई सम्बन्ध नही होता क्योंकि जो प्ररुत्ति गुणों पर आश्रित होती है वहाँ कभी भी गुटवन्दी नहीं हो सकती जैनधर्म गुणों के कारण ही व्यक्ति को महान समभता है, जन्म जाति की हृष्टि से नही उत्तराध्ययन सूत्र मे र्पप्ट कहा हैं कि जाति से नहीं, वरन कम से ही क्षत्रिय, कर्म से ही छडाह्मण और कम से ही वैश्य शूद्र माना जाना चाहिए | कितना विशाल है जैनदर्थन जहाँ व्यक्ति का व्यक्ति के नाते कोई मोल-महत्त्व नही, महत्त्व हैं तो उसके विकास का, उसके गुणों का

एक महत्त्व की वात बताऊ कि जैन दर्शन सस्कृति के प्रणेताग्रो प्रवतेको में भी कितनी विज्ञाल उदारता थी किसी भी श्रन्य दर्णन का बन्दना-मत्र लौजिए, उसमे नाम से किसी-न-किसी महापुरुष की वन्दना पे गई होगी, किन्तु जैन-दर्णन का वन्दत-मत्र जो उसका महामत्र नवकार

श्२ जन-संस्कृति का राजमार्ग

मत्र कहलाता है, इस भावना का प्रत्तीक है कि निजत्व का व्यामोह जैन-

सस्क्ृति को कभी छूआ तक नही है | देखिए यह है हमारा नवकार मत्र--

“शामो अगस्हिताण/--उन महापुरुषों को नमस्कार है जिन्होंने राम-द्वे भ्रादि शत्रुओं को नप्ट कर दिया है और चरम वीतरा- गता को प्राप्तकर पर्पूर्ण समदर्शी सर्वज्ञ बन गए है इसमें भगवान ऋषभदेव या महावीर किसी का नाम से उल्लेख नही है। वह आत्म-विजेता कोई भी हो सकता है | जैन तो इस गुणवारी सभी महापुरुषो को नमस्कार करना चाहता है

“णमो सिद्धाण “उन महापुरुषों को नमस्कार है जिन्होंने अपने आत्म- विकास को सिद्ध बना दिया है, जो मुक्रतिगामी हो गए है, जो निराकार, ग्रव्यावाध सुख वाले है

“णशमो आयरियाण---उन सभी अआचार्यों को नमस्कार हैं जो अपने पच महात्रत आदि ३६ विशिष्ट गुणो के आधार पर आचार्य बने है और आचायंत्व को निभाते है

“गामो उवज्कायाण”--उन उपाध्यायो को नमस्कार है जो पच महाव्रत्त आदि गुणों से युक्त होकर मुख्यतः वीतराग्रप्रहपित शास्त्रों के अध्ययन--अव्यापन में सलग्न हो

“शमो लोए सब्व साहूुण”-लोक ( ससार ) में सर्व साधुओं को नमस्कार हैं साधु वह जिसमे साधुत्व-सयम और साघना के गुरां हो यहाँ यह उल्लेखनीय है कि श्राचायं, उपाध्याय या साधु सभी में गुणों का समावेश मानकर वन्दना की है।

जैनवर्म उस सृत्रिकतृ त्व में भी विश्वास नहीं रखता, जहाँ यही मान्यता हो कि ईश्वर तो एक है और वह हमेशा ईईवर ही रहेगा, दूसरे प्राणी चाहे धिकास की किसी भी सीढ़ी पर चढ जाएँ, ईश्वरत्व प्रागत नहं कर सकते जैनधर्म इसे एक तरह से दासता मानता है कि प्रत्येक प्रागी

जन-पंस्कृति की विशालता १३

जोबन पयंन्त दास ही बना रहेगा और ईश्वर से मिन्नते ही करता रहेगा उसे उन मिन्नतो के बदले मे कुछ सुख-सुविवाएँ तो मिल जाएँगी कि तु बह रहेगा गुलाम-का-पुलाम ही

जनदर्णन अपने उत्थान-पतन का कर्ता एवं अपने सुख-दु का प्रणेता अपने ही आत्मा को मानता है। वह ईश्वर और भकक्‍त के बीच हमेशा स्वामी-सेवक की खाई बनाकर नही रखता वह आत्मा के निज के पराक्रम का प्रज्ज्वलित करता है और निष्ठा के साथ यह कहना चाहता है कि प्रत्येक आत्मा मे परमात्मा की शक्ति छिपी हुई है। आवश्यकता है कि उस शक्ति पर जो विकारों का मेल चढा हुआ्ना है, उसे समम और साधना से धो दिया जाय तो विकास की वह उदच्चता उस आत्मा को भी मिल जाएगी जिस उच्चता पर हम ईदवर को प्रतिष्ठित मानते है तब वह आत्मा भी ईश्वरत्व में परिणत हो जायगा। श्र्थात्‌ ईश्वरत्व ग्रात्म-विकास की वह चरम उच्चता है जो सभी भव्य आात्माओं को प्राप्य है श्रौर उसी को शआ्रादर्श मान- दार ससार में साधना-मार्ग की गतिशोीलता बनी रहनी चाहिए। प्रत्येक पझ्ात्मा विकास करता हुआ ईश्वर वन सकता है और वह ईवइ्वर बनता है नो दूसरो पर स्वामित्व रखने के लिए नहीं किन्तु अपने ही आत्म-स्वरूप की परम उज्ज्वलता को प्रकट करने के लिए ऐसी विचारणा झवश्य ही मनुष्य वी रचनात्मक साधनाणशील प्रद्धत्तियो को जागृत करती है कि वह भी ईध्वर बन सकता है | इसके विपरीत श्रन्य दर्शनों भे रही ईश्वर की था णा मनुष्य को शिथिन बनाती है, क्योकि वह हमेशा भक्त ही रहेगा, दास ही रहेगा तो उसकी साधना को बल श्रौर उत्साह कहाँ से मिलेगा *

जनदर्णन की मूलाघार श्रमण-सस्कृति है। 'समण' णब्द प्रतकृत का है सस्कृत मे इसके तीन रूप हाते है--श्रमण, समन और शमन | श्रमण शब्द “प्रमु नपसीखेदे च” धातु से बना है। इसका अर्थ है श्रम करना। इस- लिए जेन-सस्क्ृति की मूल निष्ठा श्रम है नियति - भाग्य के आश्रय पर बेठने वाले निश्चित रूप से अ्रकर्मण्य बनते है और झपने पतन को निकट लाते हैं। यदि प्री उन्नते करता चाहते हो सो पुरुशार्थ करो, श्रम मे

१४ जन-सस्कृति का राजमार्ग

इतने तल्‍लीन हो जाओ कि किसी तरह पराश्रयी रहकर स्वाश्रथरी बन सको और यह जो पुरुषार्थ--श्रम-- करना है, किन्ही दूसरो को दवाकर अपना सिर ऊंचा करने के लिए नही अ्रथवा दूसरों का ओपणा करके अपना पेट भरने के लिए नहीं बल्कि अपने आन्तरिक शत्रुओं एवं मनोविकारों को नष्ट करने के लिए जब आत्मा में श्रमण-द्त्ति जागती है तो वह अपने आपको व्यापक हित के लिए विसजित कर देता है, अपना सुख करुणा और साधना में बिखेर देता है वस्तुत पुरुषार्थ ही मानव को प्रगति के पथ पर अग्रगामी बनाता है। जो व्यक्ति स्वावलम्बी रहता है, वही सुखी बनता है और जो पराघीन है वह चाहे सारी सुख-सामग्री के बीच खड़ा है, तो भी सुखी नहीं हो सकता जो सस्क्ृति स्वतत्रता को आ्राघारस्तम्म बनाकर खडी है, उसकी व्यापकता एवं विशालता की तुलना किसी अन्य छिछली सस्क्ृृतियों से नहीं की जा सकती जैन-सस्कृति का मूलाधार 'श्रमण' है

'समण' का दूसरा दब्दार्थ होता है--समन इसका ग्रर्थ है प्राशिमात्र के प्रति साम्यभाव रखना सबके सुख-दु को अपने सुख-दुख के समान समझकर उनके प्रति व्यवहार करना क्र में पडे हुए प्राणी को देखकर उसे कप्ठ से मुक्त करना और उसकी रक्षा करना--यह सहज द्वत्ति आत्मा मे जागे उसे समन कहा है। इसकी सच्ची कसौटी आत्मानुभव है यह विचा- रणा मनुप्य को झात्मिक सौन्दर्य का दर्शन कराने वाली है। फ्योक्रि इस विचारणा के अ्रनुसार आचरण करने वाला कोई भी क्‍यों हो, उसके मन में अ्शान्ति का विपैला वातावरण कभी भी पैदा नहीं होगा जब वह किसी प्राणी को कध्ट से मुक्त करेगा या करुणा कर के सहयोग देगा तो उसके मन में एक भ्रसीम शान्ति का अनुभव होगा जो उसे सुखदायक लगेगा |

तीसरा भअब्दार्थ है--शमन अर्थात्‌ दबाना दवाना है अपने कुविचा रो एवं अ्रपनी कुप्रहधत्तियों को ताकि सद्द्त्तियाँ पनर्पे और आत्मा में सुविचार पैदा हो जिस व्यक्ति में अपने व्यवहार का ज्ञान होगा वहीं व्यवित दूमरों के प्रति सद॒व्यवहार कर सकेगा और श्रसदुव्यवहार का शमन करेगा किस्तु जिसका ग्रपनी दृत्तियो या प्रदृत्तियों पर नियत्रण नहीं है, जीवन की

जैन-सस्कृति की दिशालता | ०) 3 | १५

गतियो पर अधिकार नही है, वह अपने जीवन मे श्षु बना रह जाता है आज मनुष्यो की भ्रधिकतर यह प्रद्धत्ति देखी जाती है कि वे अपनी ओर लक्ष्य देकर दूसरों को नियत्रित करने का ज्यादा रूयाल करते है श्रौर इसी से पतन हो रहा है। अगर अपने आप पर नियत्रण रखने की पहले कोशिण की जाय तो स्वय उसकी प्रद्धत्तियाँ जब सन्तुलित हो जाएँगी तो सारे समाज मे ही स्वयचालित नियत्रण सन्तुलन होने लगेगा और वह कप्ृप्रद नही रहेगा जिसने अपने जीवन पर अधिकार कर लिया, भावना की हृष्नि से उसका जगत पर अधिकार हो जाता है तो जैन-सस्क्ति तीन प्रमुख बिन्दुओ पर झ्ाधारित है और वे तीन बिन्दु है--श्रम, समता और सद्व्त्ति श्रमरा शब्द का सार इन तीनो बिन्दुओं मे है। एक तरह से श्रम सत्य है, समता शिव है श्रौर सद्द्धत्ति सौन्दयं है ये तीनो सीढियाँ. जीवन को पूर्ण बनाने वाली सीढियाँ है और ऊँन-सस्क्ृति जो गुणो पर भ्राधारित है, प्रेरणा देना चाहती है कि आपका विकास आपकी मुट्ठी मे है सकल्‍प करो, निष्ठा से श्रम--पुरुषार्थ में जुट जाओ प्रापकी विशाल शक्तियो को प्रकट होने से कोई नही रोक सकेगा उन शक्तियों के प्रकाश मे झापको अपनी आत्मा का स्वरूप स्पष्ठ दिखाई देगा और तभी श्राप दूसरी शभ्रात्माओं में भी समानता देख सकेगे और एक साम्यदत्ति जागेगी सभी के प्रति जागी हुई समानता की भावना आपको सदेव सद्दृत्तियो की राह पर बलपूर्वक ले जाए्गी और आप अनुभव करेगे कि श्रम, समता झौर सद्दतत्ति की सीढियाँ श्रापफे जीवन को ऊपर उठाती जा रही है यह है जैन-सस्कृति वी विशिष्टता जिसमे गुणों का ही महत्त्व है।

जिसमे गुरा है, वह किसी भी अवस्था में हो--गरीब या घनी, साधु या ग्रेहटस्थ--प्ृजनीय है जिसमे गुण नही, जो जीवन-कला को नहीं जानता

दह यदि साधुवेष भी घारण किये हुए हो तो भी वन्दनीय या पूज- नाय नहा हा सकता झाडम्बर व्यक्ति की कसौटी नहीं, वह कसौटी तो डसभः गुणावगुरा है श्रमण शब्द का श्रर्य यही है कि श्रममय जीवन यापन

१६ जेन-सरक्ृति का राजमार्ग

करना, प्रारिमात्र पर साम्यहप्नि रखता और अपने आत्म-विकास में बाधक रूप असते्‌ प्रद्कत्तियों का शमत करना- यही साधुत्व है

इस सिद्धान्त की वास्तविकता को भी समझे लोजिए कि गुणों की स्थिति और गुणों का विकास भी मूलत भावना पर ही टिका रहना है। गुणों के पक्ष में भावनाओं का ढलान और निर्माण यदि मजबूत बन जाय तो फिर उसके कार्यान्‍्वय में कभी दुर्बलता नहीं सकेगी | इसलिए भावनाओं के निर्माण की पहली आवश्यकता है

हमारे यहाँ एक कपिल केवली का द्त्तान्त आता है कपिल एक गरीब ग्राह्मणा था, इतना गरीब कि वह अपने खाने-पीने के साधन भी मुश्किल में ही जुटा पाता था उस नगर में राजा प्रात सर्वप्रथम दर्शन देने वाले ब्राह्मण को एक स्वर्णमुद्रा दान में देता था | तीन दिन से भूखा-प्यासा कपिल दर्शन देकर स्वणंमुद्रा प्रात करने की अ्रभिलाषा से रात को १२ बजे ही घर से निकल पडा प्रहरियों ने उसे पकड लिया और दूसरे दिन दरबार में कपिल को पेश किया गया कपिल ने जब सत्य-सत्य स्थिति राजा को दताई तो वह दया से द्वावित हो उठा। उसने कपिल से इच्छा हो सो माँग लेने को कहा कपिल ने सोचने के लिए समय माँगा भौर वह बाग में बंठकर सोचने लगा--जब माँगना ही है तो एक कया दस स्वर्ण॑मुद्राएँ माँग लू फिर दस ही क्यो सौ, हजार, लाख स्वर्ण-मुद्राएँ माँग लू * लेकिन जब राजा ने कहा ही है तो उसका समूचा राज्य ही क्यों माँग लू ** किन्तु इस विचार के साथ ही उसके हृदय को धक्का लगा और उसकी भावना जागी- मै कितना क्षुद्र हें, राजा की उदारता का यह बदला देना काहता हे कि उसका राज्य ही छीन लू वह अपनी ग्ात्मा को घिक्कारने खगा और आत्मिक विचारग्या में डूबने लगा कुछ क्षग्गों मे ही कपिल की आवना इतनी ऊँची चढ गई कि उन्हे केवलज्नान प्राप्त हो गया

कहने का गअभिप्राय यह है कि भावना के निर्माण पर ही गुणों का विकास हो सकता है | भावना के धरातल पर गुण विकर्दे और

जैन-संस्कृति को विशालता १७

गुणों से आत्मा चर्म विकास की ओर गतिशील हो, यही जैन दर्शन एव सस्कृति की मूल प्रेरणा है

मुझे श्राप नवबुवकों से यही कहना हे कि आप जैन दर्शन एवं सस्कृति की इस विश्ञालत्ता एव महानता को हृदयगम करन एवं उस प्रकाश में अ्रपने जीवन का निर्माण तथा विकास साधे अभी मैने “समरण छाब्द का जो श्र्थ व्ययन किया, वह केवल साधुओं के लिए ही नहीं है। आप लोगो को भी शास्जका रो ने 'समणोपासक' कहा है प्रर्धात्‌ समण-सस्क्ृति की उपासना करने वाले समण-दत्ति के अनुसार आचरण करने वाले

ग्राप लोगो ने जैन सोसायटी नामक सस्या स्थापित की है तथा जैन- सस्‍्कति के प्रचार की वान आप सोच रहे है यह अ्रच्छा है, लेकिन इन कार्यो में अपने प्रत्यक कदम पर जैन दर्शन एवं सस्कृति की सूल भावना का सर्देव स्यान रखना जो हृप्चिकोण मैने आपके सामने रखा है, उसके अनुसार यदि श्राप जन-सस्कृति का प्रचार करते हो तो प्रत्येक धर्म सस्क्ृति के सत्याशों का स्वत ही प्रचार हो जाएगा। क्योंकि जैनदर्शन का कभी आग्रह नही कि उसका अपना कुछ है-- बह तो सदाश्ययों का पुज है, जहाँ से सभी प्रेरणा पा सकते है ब्राह्मण-सस्क्ृति पाश्चात्य देशों में भी अहिसा, सत्य एवं पुरु- पार्थ के जिन रप्रो का प्रवेश हुआ है, उसे जैन-सस्कृति की ही देन समझना चाहिए। गादी जी ने भी श्रहििसा को साधन बनाकर देश के स्वातत्य- आन्दोलन को मज़बूत बनाया, वह भी जैन-सम्कृति की ही विजय है।

भगवान महावीर ने किसी प्रकार की गुट्वन्दी, साम्प्रदायिकता फैलाने का कमी नही सोचा उन्होंने तो श्रम, समता, सदृद्त्ति की सन्देश-वाहक श्रमण-मस्कृति का प्रचार करके गुण-पूजक सस्क्ृति का निर्माण किया और भनेवान्त के सिद्धान्त से सवका समस्वय करना सिखाया। इसलिए इस संस्कृति वा प्रचार करना है तो सयम को कभी मत भूलना सस्कृति के दिवस का मूल सयम है जैनवर्म यही शिक्षा देता है कि सयम के पथ पर लेकर साधा हुआ विकास ही सच्चा विकास है जहाँ श्रपनी दृत्तियों पर

श्ध जन-संस्क्ृति का राजमार्ग

नियत्रण नही, विलासिता परमुखापेक्षी भावना है, वहाँ पर तो विकास ही सधेगा और प्रचार ही होगा

इसलिए झाप नवयुवक भावना से गुगोपासक बनकर अपनी दत्तियो प्रद्धत्तियों मे सयम का प्रवेश कराएँ और उसके बाद निए्ठापूर्वक महान एवं विशाल जैन दर्शन तथा सस्क्रेति का समुचित प्रचार करे आपको अवश्य ही सफलता मिलेगी और झाप उनकी विद्ञालता का परित्रय दूससो को दें सकंगे स्थान- महावीर भवन, चांदनी चोक, दिल्‍ली

(जैन सोसायटी दिल्‍ली के विद्यार्थियों के समक्ष दिया मया व्याट्यान )

महावीर की सर्वोच्च स्वाधीनता

महावीर प्रौर बुद्ध ने जिस गणतत्न के स्वतत्र वातावरण में स्वय का विकास साधा और कोटि-कोटि जन को जीवन के स्वाघीनतापूर्ण विकास की और उन्मख किया आज भारत में उसी गणतत्र की ज्योति चमक उठी है परतत्रता की श्र खलाओो को काटकर जन-जन का जीवन जो आज स्वत्तत गगतत्र के उल्लास से परिपूस्ति हो उठा हे, उसके ही प्रतीकस्वरूप आज चारो और मनाए जाने वाले समारोह है मे भी आज के दिवस के अनुरूप ही इस विषय पर कुछ प्रकाश डालना चाहता हूँ कि महावीर का सर्वोच्च स्वाघीनता का सन्देश कंसा अनुपम है और उस उत्कृप्ठ स्वाधीनता की ओर हम भारतवासियों को किस उत्साहपूर्ण भावना में गत्ति करनो चाहिए ?

महावीर ने जो कहा पहले उसे किया और इसीलिए उनकी वाणी मे कमंठता का ओज भावना का उद्रेक दोनों है हिसा के नग्न ताडव से सब्तप्त एवं शोषण भत्याचार से उन्पीडित जनता को दु.खो से मुक्त वारने वे लिए भगवान महावीर ने स्वय अ्रहिसा धर्म की प्रव्नज्या लेकर प्रहिसा वी क्रान्तिवारी तथा सूखकारी श्रावाज़ उठाई | स्वार्थोन्मत्त नर- पिशाचो वो प्रेम, सहानुभूति, शान्ति एवं सत्याग्रह के द्वारा उन्होंने स्वाधीनता वग दिव्य पथ प्रदर्शित किया

माया-सग्रह रुप पिश्ञाचिनी के कराल जाव मे फसे हुए मानवों को उन्होंने पथश्नप्त विलासिता के दन-दल से निकालकर निग्नेन्थ अपरिग्रवाद का प्रादर्थ दवाया | उन्होंने स्वयं महतो के ऐश्वय राजसुख का त्याग कर निम्न॑न्थ साधुत्व को वरण किया तथा झरने सजीव झ्ादर्श से स्पष्च किया वि भौतिक पदार्थो के इच्छापूर्ण त्याग से ही झ्ात्मिक सुख का स्रोत फूट सवेगा धयोकि ग्रथि (ममता) को ही उन्होंने समस्त दु खो का मूल माना,

२० जैन-संस्कृति का राजमार्ग

चाहे वह ग्रथि जड द्रव्य-परिग्रह मे हो, कुटुम्ब, परिवार में हो या काम, ऋब लोभ, मोहादि मनोविकारों मे हो--यह ग्रथि ही नित नवीन कष्ठो का सृजन करती है इसी लिए महावीर ने हृता से आह्वान किया---

“पुरिसा, झत्ताण भेव श्रभिणिगिज्ज्ञ एव दुबखा पमोगखसि ।” “-पश्राचाराग सुत्र, श्र० ३, सुत्र १६

हे पुरुषी | आत्मा को विपयो ( कामवासनाओं ) की ओर जाने से रोको, क्योकि इसी से तुम दु.खमुक्ति पा सकोगे

समस्त जैनदर्गन महावीर की इसी पूर्ण स्वाधीनता की उत्कृप्न भावना पर आधारित है। परिग्रह के ममत्व को काटकर सग्रहद॒त्ति का जब त्याग किया जायगा तभी कोई पूर्ण अहिसक श्रौर पूर्ण स्वाधीन बन सकता है। ऐसी पूर्ण स्वाधीनता प्राप्त करना ही जैनवर्म का मृतभूत ध्येय है स्वाधीनता ही आत्मा का स्वधर्म अथवा निजी स्वरूप है ।'मोह, मिथात्व एवं अ्ज्ञान के वशीभूत होकर आत्मा अपने मूल स्वभाव को विस्म्र॒त कर देती है और इसी लिए वह दासता की शा खलाओ मे जकड जाती ह। आज गरातत्र की स्वाधीनता पहले ग्रात्मा की स्वाघधीनता को जगाए, ताकि अ्रत्मा की स्वाघीनता जाग्रत और विकसित होकर गणा की स्वाधीनता को सुहृठ एवं सुचार बना सके |

आत्मा की पूर्ण स्वाधीनता का ग्रर्थ है-- धीरे-बीरे सम्पूर्ण भौतिक प्रदाथों एवं भौतिक जगत से सम्बन्ध-विच्छेद करना अन्तिम श्रेणी में शरीर भी उसके लिए एक बेडी है, क्योकि वह अन्य आत्माओं के साथ एकत्व प्राप्त कराने में बाधक हैं। पूर्ण स्वाधीनता की इच्छा रखने व,ला

विश्वहित के लिए अपनी देह का भी त्याग कर देंता है। वह विश्व के

जीवन को ही अपना मानता है, सबके सुख-दु में ही स्वय के सुख-दु का अनुभव करता है, व्यापक चेतना में निज की चेतना को सजो देता है एक शब्द में कहा जा सकता है कि वह अपने व्यप्टि को समाष्टि में! विलीन

महावोर फी सव ौच्च स्वाघीनता २१

कर देता है वह आज की तरह अपने अधिकारों के लिये रोता नही, वह काये करना जानता है और कतेंब्यो के कठोर पथ पर कदम बढ़ाता हुआ चलना जाता है जैसा कि गीता मे भी कहा गया है--

"क्रम ण्येवाधिकाररते, भा फलेघु कदाचन

फल को कामना से कोई कार्य मत करो, अपना कतंव्य जानकर करो, तब उस निष्काम कर्म मे एक आत्मिक ब्लानन्द होगा और उसी कर्म का सभ्यूर्ण समाज पर विशुद्ध एवं स्वस्थ प्रभाव पड सकेगा कामनापूर्ण कर्म दूसरों के हृदय मे विश्वास पेटा नही करता, क्योकि उसमे स्वार्थ की गन्ध होती है श्लौर सिफं स्वार्थ, परार्थ का घातक होता है। *वार्थ छोडने से परा५ की भावना पैदा होती है श्रौर तभी झ्रात्मिक भाव जागता है

महावीर ने स्वाधीनता के इसी अ्रादर्श को बताकर विश्व मे फैली बरे-छोटे, छूत-श्रद्धत, धनी-निर्धेन श्रादि की विषमता एवं भौतिक अक्तियों के मिथ्याभिमान को दूर हटाकर सबको समानता के अधिकार बताए यही धारणा है कि ढाई हजार बर्फ व्यत्तीत हो जाने पर भी महावीर के अहिसा और त्याग के अनुभावो की गू वराबर बनी रही है | महात्मा गाघी झादि प्रश्नति राप्ट्रीय नेताओ ने, कोई सन्देह नही कि इसी गज से प्रेरणा प्राप्त वी एवं उनके सन्देश को जगत में पुनप्रंतिप्ठित किया चाहे बाह्य हृष्नि से ये नेता जैन वहलाये, हो महावीर के शिप्य, किन्तु अपन्ग्रिह और प्रहोसा के सिद्धान्तो को जो सामाज्वि महत्त्व इन्होंने दिलाया उसे हम इनका ज॑नत्व ही माने क्योंदि आप जानते ही है कि जैनत्व किसी वर्ग, जानिया क्षेत्र के साथ बधा हुझा नही है तथा ही इसका नाम से ही सार्थक महत्त्व 8 | शुद्ध हृष्ठटि तो जैनत्व वहाँ ही माना जायगा, जहाँ तदनुरूप बाय॑ का अस्तित्व है अग्रेजी साम्राज्य के विस्द्ध जो स्वातब्य-सघर्ष झ्राज तक किया गया, उसमे अ्हिसा और त्य,ग को सर्वाधिक महत्व दिया गया हैं लथा उसी भावना का परिणाम हैं किश्राज भारत स्वतत्न से गणतत्र भी हो रहा है। नो जिस पध पर चलकर इतना विकास सम्पादित किया जा सका है, महावीर वाणी कहती हवि इसी ५थ पर श्रागे बटो, ताकि आात्मविकास

न्शॉं

बज

२२ जेन-मम्कृति का राजमार्ग

की सनी स्ववतता वे उसके निर्मत प्रकाश में समृह की गणनत्नता प्राप्त की जा सके |

भारत को स्वनत्र हुए दो वर्ष बीत चुके और झआज वह गगातत्र भी वन रहा है | अब भारत किसी व्यपि विश्येप का होंकर समप्नि का बन गया हू। जैतता के द्वारा निर्वाचित प्रतिनिश्रि राष्ट्रपति ही देश का प्रभामन चलाएँगे जनता को नागरिकता के पूर्ण अधिकार प्रात होगे इस तन्‍ह राजनीतिक हृश्विकोण से जनता स्वतत्र हो गई हूँ

किन्तु जब तक जनता में सभी हृप्नियों से स्वावलम्बन पैदा नहीं होगा तब तक स्वाधीनता नहीं आएगी चाहे तो निर्वाह के साधन हो या मानसिक विकारों का क्षेत्र हो, परतत्रता को मिटाने पर ही जीवन में नया उत्साह भर सकेगा झ्राज जो यह याज्रिक प्रगति सामाजिक न्याय के बिना बेरोक-टोक की जा रही है, वह तो योजनाबद्ध कही जा सकती है, ही समाज के लिए सुखदायक इस व्यवस्था से श्राथिक विषपमता बढ़ रही है और जापरा अ्रन्थाय भी उसी परिमारा में तीव्रतर हो रहा है। क्योकि एक ओझोर तो लाभाश कमाने वाला शोषक समाज अविक सशद्ध होता हह्मा विनासिता के रगै में डूब रहा है तो दूसरी ओर शांपण अन्याय से उत्पोडित वर्ग कप्ता से विचलित होकर विकृति हिसा के मार्ग पर कदम बढा रहा है | दोनों प्रकार से सारा समाज अनेतिकता की राह पर झागे बढ़ रहा है | त्यागमय सस्क्रति के क्षीर्ाा होने से वैभव की भूख बलवती हो रही है, जो समाज की स्वस्थ प्रगति के लिए शुभ लक्षण नही हैं। इसलिए सबसे पहले इस दूषित व्यवस्था से मुक्ति पाए बिना झाप में सच्चा स्वावलम्बन नही फैल सकता है।

ऐसी अवस्था में आज के युवक पर इसकी महान जिम्मेदारी है, किन्तु उसकी भी सस्तोबजनक स्थिति नहीं है आज के युवक के पास बोलने के लिए जिद्दा है, शब्दकोश है किन्तु हाथों के लिए कर्तव्यपरायणता और पाँवों के लिए कर्मठता नहीं है। परिशाम यह है कि युवक आज के राज-समाज की आलोचना तो करता है किन्तु उसे सुहतता से बदल डालने के लिए त्यागमत् जोश से श्यते आय को वडू काटेबद्ध नठ्ठी कर पाता है विचार

महादौर की सर्वोच्च स्वाधीनता २३

और बागी जब नक कर्म में पर्णित नहीं हो सके, वे अपने आप में प्रभाव- माली नहीं होते यृवक्रों को यह सोचना चाहिए कि वर्तमान परिरिथतियों में वे समाज की गतिशीलता में क्या और विस प्रकार योग दे सकते है कि सर्वोच्च स्वाघीनता की ओर हमारे कदम वढलते चले जाएँ ?

आज मै राष्ट्र के विभिन्न राजनीतिक दलों की कार्यप्रणाली पर भी हृष्रिपात करता हूँ त्तो उसमे वागूविलास ही दिखाई देता है | वजाय इसके कि उनकी कार्यप्रणाली मे नवनिर्माण की रचनात्मक प्रवृत्ति दिखाई दे भारत के एक चिन्तनण्ञील कवि जगन्नाथ ने जो यह अन्योक्ति कही है, उससे ऐसा प्रतिभास होता है कि वह सभवत वर्तमान परिग्थिति को हो इंगित करके वही गई हो--

पुरा सरासि मानसे विकचसार सालिस्खल-

पराम मुरभिकृते यस्यथ यात वय'

से पलवल जलेष्घधुनालिलदनेक भेकाकुले,

मरालकुल नायक कथय रे कथ बतंताम्‌

-+भामिनीधिलास प्रथत्‌ कमलो से श्रान्छादित, भरते हुए पराग से सुगन्धित एवं मधु से भी मधुर मानसरोवर के शीवल जल और चमकते हुए वहमूल्य मुक्ता का पान वरता हुभा सुन्दर-सुन्दर कमलो पर क्रीडा केरके अपना जीवन- यापन वरने वाले राजहस को ऐसी छोटी-सी तलेया पर बेठा देखें, जिस तेलया भे पानी तो थोडा हो और मेढक अधिक हो, जो राजहस के भ्रन्दर चोच ट।नलते ही पृदव-पुदककर पानी को गदला बना डालते हो और राज- रेस वो पानी पीने से वचित रख देते हो तो ऐसी दू खावम्था को देखकर कवि हैंदय टोल उठता है कि है मानसरोवर के झादिवासी राजहस, तम्हारी यह खद दक्या केंसे ? रन्धुआं। | जराघ्यान से भारत के गौरवपूर्ण अतोत पर नजर डालिए कि वह

हमेशा मानसरावर पर रहाहँ झौर यहाँ ऋषभ, शान्तिनाथ, राम, कृष्ण,

श्ड जेन-सस्क्ृति का राजमार्ग

वीर जँसे राजहस होते रहे हैं। जिन्होंने स्देव सत्सिद्धान्तों रुपी मुक्ताओं का चयन किया और उन्हे समग्र भारतवासियों को भेट किया फिर आज यह दुर्भाग्य क्यो जो मानसरोबर के राजहस ओरो द्री कतहपर्ण राजनीति की ग्रे तलेथा पर बैठे है श्रौर जनता को मेढक बना रहे है। गणतत्र दिवस पर महावीर का त्यागमय सन्देश हृदय में ग्रहण कीजिए, तव आप भलीभाति अनुभव कर सकेगे कि आज का युग ईप्या, विग्रह एवं आलोचना का नहीं, प्रेम, सहानुभूति एवं कर्तंव्यवर्मों के पालन करने का है झव तक राज- नीतिक रूप से ही सही, लेकिन जनता के जो हाथ-पाँव बचे हुए थे, वे मुफ्त हो गए है और अवसर आया है कि अपने अथक कार्यों से देश की त्यागमय संस्कृति का घबनल प्रकाश फिर से विश्व में फैला दे जिस विह्ववप्रेम का पाठ ढाई हजार वर्ष पूर्व भगवान महावीर ने पढाया था उसी पाठ को ब्रतमान समय मे निम्नेन्ध श्रमण-सस्कृति के सत जनता को पढा रहे है भौर गाधीजी सरीखे पुरुषो ने विद्वप्रेम को अहिसा के नाम से व्यवहारिक राजनीतिक क्षेत्र मे भी प्रसारित किया है, जो कि आज सबके सन्मुख है झौर मेरा भी झादेश है कि मानव, मानव की आत्मा के साथ शुद्ध भ्रहिसामय प्रेम स्थापित करे, अन्य सभी कर्मजनित सकुचित दायरों से ऊपर शुद्ध मानवता के अनुभाव का पूर्ण विकास हो। विचार-भिन्नता होने पर भी कार्य॑-नत्र में भिन्नता नही होनी चाहिए, मतभेद मतभेद को पैदा नही करे जो राजनीतिक स्वतत्नता प्राप्त हई है, उसका उपयोग महावीर की सर्वोच्च स्वाघधीनता के लिए होना चाहिए इसी में देश का गौरव है और गौरव है शुद्ध कर्मण्य- शक्ति का

महावीर ने दम धर्मों का वर्णन किया है, उसमे राष्ट्रवर्म का भी उल्लेख है राष्ट्र अपने आप मे भौगोलिक सीमाओं से बधा हुआ घर्मं एव संस्कृति का एक बडा घटक होता है और उस सीमा तक कि वह धर्म विश्व- प्रेम पर आधात करे। र्ट्र के प्रति निष्ठा एव भक्ति भी पूर्णतया आवश्यक है आज वही निष्ठा एव भक्ति भारतीयों के हृदयों मे पैदा होनी चाहिए कि देश का सम्मान बढ़े जापान देश की एक छोटी-सी घटना बताई जाती

महादीर की सर्वोच्च स्वावीनता २५

है कि वहाँ एक भारतीय अपनी इच्छा के फल मिलने के कारण जापान के प्रति निन्‍्दात्मक बाते कह रहा था, जिसे एक गरीब जापानी ने सुन लिया। वह वडा विक्षब्ध हुझ्ना ौर कही से खोज-खाजकर चह फलो की टोकरी ले ध्राया और उसने उस भारतीय को दे दो भारतीय जब उसे दाम देने लगा सो उसने बडा मासिक जवाब दिया -महाशय, मुझे पैसा नही चाहिए, देश का मान हमारे लिए बडा है, जन्मशूमि का सम्मान हमे अपने जीवन से भी श्रधिक प्यारा है। श्रापसे इन फनो की मे यही कीमत माँगता हूँ कि भाप प्रपने देश में जाकर मेरे देश जापान की किसी प्रकार निन्‍्दा करें | राष्ट्र के प्रति व्यक्त किया जाने वाला यह सम्मान देशवासियों में गौरव का भाव उत्पन्न करता है गौर यही गौरव का भाव' सकठों मे धैय॑, देनव मे नम्नता तथा कर्म मे कर्मठता को वनाए रखता है। जिन्हे अपनी प्रात्मा का गौरद होगा, वे कभी उसे पतित नही होने देंगे, चाहे कितनी ही विवशतापूर्ण परिस्थितियाँ उनके सामने आकर खड़ी हो जाएँ ! झपनी धात्मा का यौरव दनाइए, उसे विभाइए और अपने साथियो के गौरव की रक्षा वीजिए, फिर देखिए समाज भर राष्ट्र का सौरव बनेगा और वह दिव्व के गौरव मे ददलता जाएगा। छोटे से लेकर समूहो तक के जीवन दिवस वी यही कहादी है। प्राज श्राप लोग भी स्वतत्ता के प्रतीक चक्रयुक्त तिरंगे कड़े का घधशिदादन कर रहे हे, स्वतत्नता पर भाषण-ग्रभिभाषण हो रहे हैं किन्तु दाषह्म क्रियाओं मात्र से स्वतत्रता का रक्षण होने वाला नही है इसके लिए तो अपने स्वार्थो का वलिदान चाहिए और चाहिए हैं वैसी कर्ंठता जो त्याग की भूमि पर सुहृदता से गति कर रही हो भ्रगर ऐसा नही हुआ पो पया यह राजनीतिक स्वतत्रता टिक सकेगी श्रौर क्या महावीर की सर्वोच्च न्वाधीनता की साधना की जा सकेगी ? इसलिए बन्धुओ, गरातनत्र दिवस

पर प्रतिज्ञा वीजिए कि श्राप सर्वोच्च रदाधीनता की श्न्तिम सीमा तक गति दःरते ही रहेगे। शाति अुतदत्त टॉफीड, घागरा २६ जनवरी, १६५७

जेन अहिंसा ओर उत्कृष्ट समानता

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“जय जगत्‌ शिरोमणी, हु सेवक ने तु धणी प्राथंना मे कहा गया है कि हे जगत के शिरोमणि, हे प्रभु, तुम्हारी जय हो ! मै तुम्हारा सेवक हूँ और तुम मेरे स्वामी हो मे आपसे पूछ कि पफया हमारे कहने से ही परमात्मा की जय हो और हमारे कहने से उसकी जय नही हो ? झ्ापको यह प्रश्न कुछ भ्रठपटा लगे किन्तु उतर स्पष्ट है | हमारे जय' कहने या कहने का परमात्मपद पर्‌ कोई ग्रसर नहीं पडता और ही जिस श्रेणी मे सिद्ध विराजमान है, उनका हम सासारिक प्रारिययो से किसी प्रकार का कोई सम्बन्ध है यह जब तो हम अपने आत्मिक-जागरण के लिए कहते है कि उनका प्रदर्शित पथ हमारे श्रन्तर्‌ मे रम सके और हम उनकी जय भी इसलिए कंहते है कि वे पूर्ण पुरुष है अपूर्ण की जय नही कही जाती पूर्ण विजेता ही जबवान्‌ होता है जिस तरह कुम्हार का कच्चा घडा या रसोई मे रखा कच्चा सामान तृपा क्ुवा सन्तुष्टि मे सहायक होकर पक्‍का घडा पक्‍वान्त ही वंसे हो सकते है। तो उस प्रभु की जय इसलिए कहते है कि हम उसके प्रति वफादार बन सके सेवक अगर स्वामी के प्रति वफादार बन सके तो फिर उसका सेवकत्व ही क्या ? फिर परमात्मा का सेवक होना तो कोई छोटी बात नहीं है साधारण स्वामी को तो अप्रत्यक्ष तरीफे से छला भी जा सकता है लेकित त्रिकाल ज्ञाता सर्वज्ञ प्रभु के प्रति वफादारी का प्र है कि अपने जीवन में एक निश्चित विधि से निश्छल साधना की जाय और इस साधना का प्रमुख रूप है कि परमात्मा के सभी सेवको की इस सृष्टि में हम समा- नता की स्थिति पैदा करें सभी परमात्मा के सेवक है--फिर उनके बीच

पेन प्रहिसा भौर उत्छ्ृष्द समानता २७

भदभाव और विपमता क्यो ? एक सेठ का नौकर भी जव सेवा का कार्ये करता है तो पुरस्कार पाता है और काम बिगाडता है तो तिरस्क्ृत होता £। फिर हम भी परमात्मा के सेवक बनकर यदि सृष्टि का सुधार करेगे तो ऊँचे चढते जाएँगे तथा अपने साथियों का श्रकल्याण करेंगे पहले तो धमारा ही पतन होगा ?

अत परमात्मा की जय बोलते हुए इस सृष्टि मे उसके प्रति वफादार रहने का एक ही मार्ग है और वह है श्रहिसा का मार्ग इसीलिए जेनवर्म छा हृदय है श्रहिसा--“अहिसा परमोषमम ।”

उस यृष्टि में रहते हुए सृष्टि को सुधारने वाला जो यह अश्रहिसा का निद्धान्त है, वह क्‍या है ? यह गभीरता से सोचने भ्रौर समझने लायक है पहिसा के पथ पर जो भी चला, उसने अपने विकास की चरम श्रंणी प्राप्त कर ली श्ानन्द देकर जो झ्ानन्द मिलता है, उसी के प्रकाशमान स्तभ श्रहिसा पर हम यहा विचार करंगे |

ज॑नधर्म मे श्रहिसा का जो स्वरूप-दर्शन तथा निरूपण किया गया है, वह सर्वाधिक यूध्म है यो तो अहिसा को मान्यता सभी धर्म देते है किन्तु साथ-ही-साथ “पामिकी हिसा हिला भवति” का तक देते है अ्रथवा साधुत्रो को भी सकट में मासभक्षण का निर्देश करते है वहाँ जैनधर्म की धात्मा भ्रहिसा हैँ “जय चरे, जय चिट्ठ हर कार्य इतनी यतना से होना चाहिए कि वह किसी भी प्राणी को तनिक-सा भी प्लेश देने वाला नही हो

देसे 'अहिसा' शब्द स्वीकारात्मक होकर नकारात्मक है। जहाँ हिसा नही,वह भ्रहिना हिना की हमारे यहाँ व्याख्या दी गई है--“प्रभत्तयोगातु शणज्यपरोएण हिला--प्रमाद के योग से किसी भी प्राण को हनना या पलेश पहुंचाना हिसा है वैसे यह व्याख्या बहुत सीधी है, किन्तु मै यह स्पप्ट करना चाहता हैँ कि जैनवर्म में अझहिसा के सिर्फ इस नकारात्मक पएहयू पर गवार प्रकाश डाया गया है वरन्‌ भ्रहिसा के स्वीकारात्मछू ५हनू वा सविस्तार प्रध्ययन किया गया है।

कद जन-संस्कृति का राजमार्ग

किसी भी प्राण को क्लेशित करने का नाम हिसा कहा गया है तो प्रश्न पैदा होता है कि प्राण क्या ? जीवधारी की जो सजीवता है वही उसका प्राण हूँ प्राण का धारक होने से ही वह प्राणी कहलाता है प्राण १० प्रकार के बतलाये गए है--- १. एकेन्द्रिय बल प्राण - बैइन्द्रिय बल प्राण « तेइन्द्रिय बल प्राण « चौइन्द्रिय बल प्रारा « परचेन्द्रिय बल प्रारा मन-बल प्रण « वचन-बल प्राण . काया-वल प्रारा €. इ्वासोच्छुवास बन प्राण १०. आ्रायुष्य बल प्रारा प्र्थात्‌ प्राणी एकेन्द्रिय (पृथ्वी आदि) से लेकर पचेन्द्रिय (पशु, मनुष्य आदि) तक अपनी इन्द्रिय घारकता से होते है | इन्ही प्राणियों में काया सूदम या स्थल सबके होती है तथा मन और वचन की द्ाफ्ति किन्हीं प्राणियों मे होती है और किन्‍्ही में नही होती श्वासोच्छुवास और ब्रायुष्य का सम्बन्ध