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रक्त के बाज

मन्मथनाथ गुप्त

मेटे

चेतना प्रकाशन लिमिटेड

प्रकाशक: देवेन्द्रकुमार गो स्वामी मैनेजिंग डायरेक्टर चेतना प्रकाशन लिमिटेड हेदराबाद

प्रथमसंस्करणु ९६५९ सर्वाधिकार लेखक द्वारा सुरक्षित मूल्य २॥)

मुद्रक: केदार शर्मा व्यवस्थापक, कमशियल प्रिटिग प्रेस हेदराबाद

राज भक्त ह।

क्रांति का मुहृते ११ आंति भग १६ हृतिद्दास से बाहर ष्ट्‌ कलाकार का जगत ३६ न्‍्याय की गति ४७ प्रेम की विभिन्न गति रा भाग्य की चआाभी द्८ खिलोना कारपो रेशन द८

नींब की इंट ३७६

राजभक्त

अँग्रेजो के जमाने की बात हे

रायसाहव हरनामदास कई दिन से देख रहे थे कि सड़क के उस पार एक मकान में कुछ नोजवान संदेहजनक रूप से आते जाते थ्रे। उन दिनों क्रान्तिकारियों का बोखवाला था | रायसाहब ने समझा, हो हो, ये क्रान्तिकारी ही हों पर वे कुछ निश्चय पर नहीं पहुँच पाते

आज जो एकाएक उसी मकान में एक घड़ाका हुआ, तो वह जरूदी से उठकर टेलीफोन के पास गये टेल्लीफोन गाईैंड दखकर सब से पास के थाने का नम्बर देखकर बोले, 'हलो, हाँ....नम्बर टू भी टू... ....!

जल्दी ही उनका कनेक्शन थाने के साथ जुड़ गया उन्होंने उत्तेजित स्वर से टेलीफोन के चोंगे के भ्रन्द्र कहा, 'हलो . भाप दारोगा जी हैं... हो आपसे ही जरूरत थी ... में रायसाहब हरनामदास ...३१, हीवेट रोड़ से बोल रहा दूँ...हा हो, जरूरत थी, तभी तो बुल्लाया...मेरे मकान के सामने के मकान में कई दिन से क्रा।तिकारी लोग श्राते जाते हैं...अभी एक बम फटा है... मेंने अपने कान से सुना है . ऐसे थोड़े ही कह रहा है

नहीं, टायर-वायर फटने की श्रावाज नहीं हे...क्या पूछ रहे हैं ?

पहले क्‍यों नहीं खबर दी ?...इसलिए नहीं दी कि पहले में निददिचत नहीं था...आज बम फटने पर निश्विचत हुआ हूँ ...क्या पूछ रहे हैं !... कि में क्‍या चाहता हूँ ?...में ग्रह चाहता हूँ कि क्षाप आकर उल्हं गिरफ्तार करें...क्या कहा ? . श्राप कुछ नहीं कर सकते !...भाप नहीं कर सकते तो फोन करेगा ?...क्या कहा, यह आपके इलाके के बाहर है | भापका कहना यह हे कि यह मकान दूसरे थाने में पड़ता है ?... तो क्या

हुआ !...है तो ब्रिटिश साम्राज्य के अन्दर ही !...में... हाँ... क्या मुझ से आप कहद्द रहे हैं !...कि दूसरे थाने में फोन करूँ ?.. !

उधर से रिसीवर गिरा देने की आवाज हुई श्रपमान के ज्ञोभ से, क्रोध से रायसाहब का चेहरा लाल पड़ गया उन्होंने रिसीवर छोड़ दिया “ये दारोगा भी कितने नालायक हैं कि कहते हैं कि इलाके के बाहर पड़ता है, इसलिए कुछ नहीं कर सकते | यहाँ जब तक इलाके की बहस हो रही है, तब तक शायद मुजरिम भाग जाएँ ।” रायसाहब अपने को दारोगा से अधिक राजभक्त समझते थे उन्हें बहुत बुरा मालूम हुआ टहलते-टहलते उन्दोंने सामने मकान की तरफ एक डड़ती दृष्टि डाली

अरे यह क्या ? एक तांगा खड़ा था और कुछ युवक उत्तेजित मुद्रा में एक घायज्ञ युवक को डठा कर तांगे सें रख रहे थे रायसाहब का यह हाल हुआ कि जैसे उनकी आँख के सामने एक महान अ्रनर्थ हो रद्दा हे, ओऔर वे कुछ नहीं कर पा रहे हैं उनका दम घुटने लगा उन्दें केवल राजभक्ति की बात नहीं, बल्कि वे डरते भी थे कि कह्दीं कहा जाय कि तुमने इस बात की रिपोर्ट क्‍यों नदीं की अब भी अगर पुलिस भा जाती

उन्होंने जल्दी से फिर टेलीफोन गाइड खोला, और दूसरे थाने का नम्बर मिलवाकर वहाँ के दारोगा से कहा, 'हलो.. श्राप... ?...आप दारोगा जी हैं १...में ?... में रायसाहब दरनामदास हूँ... क्या कह रहे हैं १...कहाँ से बात कर रहा हूँ !...अपने मकान से...३१ नम्बर हीवेट रोड ...घटना क्या हे पूछ रहे हैं ।...घटना यह हे कि मेरे मकान के सामने एक लाला बनमालीदास ...बनवारीदास नहीं बनमालीदास का मकान हे...पता नहीं डाक्टर हैं कि सौदागर हैं |... ...हा तो श्रसली बात सुनिए... उनके मकान में एक बम फटा...झुकलाकर टायर नहीं, कह रहा हूँ कि बम फटा...केसे जाना कि बम फटा ?...ऐसे जाना कि एक आदमी घायल हो गया... श्रभी-श्रभी ... पनद्रह मिनट हुआ होगा... क्या कह रहे हैं ।. ..खबर देने में इतनी देर क्यों हुई ?...देर यों हुई

रक्त के बीज

कि मेंने नजदीक जानकर दौलतगंज सें फोन किया था। ...डन छोगों ने कहा कि षे कुछ कर नहीं सकते, क्योंक्रि यह उनके इलाफे के बाहर है ।...जरूर उन्होंने कहा हे...वाह में कद्द रहा हूँ, उन्होंने यह कहा .. अच्छा तो आरा रहे हैं, आइए...' रूट से रिसीवर गिरा दिया गया।

रायसाहब टेलीफोन से हट गये, श्रोर उत्तेज्ञित हालत में चहलकदमी करने लगे | वे एक एक बार सामने के मकान की तरफ देखने जाते और भोहें तानते जाते थे, “इन क्रान्तिकारियों ने देश का सर्वेनाश कर डाला | किसी भी तरीके से इनका दमन होना चाहिए। उचित अनुचित सब तरीके से देश के प्रत्येक ब्यक्रि का यह कर्तव्य है कि इस काय में हाथ बटावें | इसके साथ किसी प्रकार के भावुकता में श्राकर रियायत करना बिलकुल देशद्रोह हे चाहे क्षपना लडका ही हो उसे पकड़ा देना चादिए ये क्रान्तिकारी बड़े गेर जिम्मेदार होते हैं, कहीं पुलिस पर गोली चलाई तो कोई मुसाफिर ही मर गया | इनक साथ कभी रियायत हो। भारत- वे तो अदिसा का देश है, यहाँ इन्दोंने अच्छी तूफानी बत्तमीजी चला रखी है ।!

रायसाहब इन बातों के साथ साथ यह भी सोचते जाते थे कि इस '०रगुजारी के लिए अब की बार पहली जनवरी को रायबहादुरी का खिताब जरूर मिलेगा सितम्बर हे, जनवरी में कया देर है ? अभी दखते- देखते नया साल लगता है जब खिताब, मिलेगा तब मेजिस्टेट मिस्टर मोरगन उनऊे साथ केसे तपाक से द्वाथ मिलायेंगे हा, हा, दा, हा | श्राम के ग्राम और गुठली के दाम | देश का काम भी किया और खिताब भी मिला गांधीजी ने भी तो कद्दा है कि ये छोग दुश का उपकार कर रहे हैं ! जरूर

वे चहलकदमी करने लगे

उनके डाइंग रूम के भेड़े हुए दरवाजे को शोर के साथ खोलते हुए उनका मेकऊा लड़का अजीत उत्तेजित अवस्था में एक पोटली लेकर भीतर श्राया | उसने यह भी नहीं देखा कि रायसाहब उधर टहल रहे हैं।

राजभक्त

उसने झट से एक श्रालमारी खोली और उसमें वह पोटली रख दी

'हो क्‍या रहा है ? अरे हमारी क्रिताबों की आ्रालमारी में इस मेली पोटली को क्‍यों रख रहा हे ? तो कया आखिर में हमारी आ्रालमारी में तुम्हारे कबूतरों का दाना रहेगा स्टुपिड ! श्रभी ले जाओो ।”...रायसाहब हरनामदास ने क्रोध में अ्रधेय होते हुए कहा...

सायसाहब ने जिसे इस प्रकार डं.टा, लेकिन इसका जवाब उसने फुसफुसाकर दिया, चुप रहिए, बाबूजी चुप रहिए ।.. बनमालछीदास के घर में तलाशी हो रही है | पुलिस सुन लेगी /

रायसाहब क्रोध के साथ आलमारी की तरफ बढ़े, वार, “नही नहीं यह सब नहीं होगा, यहाँ तुम क्रान्तिकारी साहित्य नहीं रख सकते। थोड़े दिनों से में दख रहा हूँ तुम बहुत बिगड़ते जा रहे हो में इन्हें उठाकर फेंक देता हूँ ।!

मेकले लड़के ने उसी प्रकार कानाफूसी में, जहाँ तक चिलाया जा सकता हे; चिल्लाकर कहा, 'छुदर मत, छुट्दएर मत, नए ढंग का बम है, टी, एन, टी, दीनिदो ठोलिओल अभी श्रभी रमाकान्त...हा जरा सा फटा था, उसी से एक आदमी की क्‍या हालत हुई, अगर आप उसे देखते ...!

कहाँ रायसाहब रायबहादुरी का स्वप्न देख रहे थे और कहाँ अपनी ही आालमारी में अ्नारकिस्टों का बम वे ऐसे पीछे हटे जेसे सौंप की फन पर पर रख दिया हो एक छल्लांग में सात हाथ दूर पहुँचे और दीवार से पीठ लगाकर खड़े हो गयग्रे भय क्रोध, लज्जा से उनकी ऐसी हालत हो रही थी कि वे कागज के झंडे वी तरह थरथर कॉप रहे थे बड़ी देर तक उनके मँद्द से बात ही नहीं निकली उनकी धिग्धी बैंध गई

जब वे बोलने लायक हुए तो चुने हुए शब्दों में लगे लड़के को डॉटने। जिसका सर्वेस्व खो चुका हे वह जैसे कौसता हे, ऐसे वे कोसने छगे। लेकिन लड़का पिता की गालियों की भोर ध्यान नहीं दे रहा था वह सामने के मकान की ओर बीच-बीच में देख रहा था | रायसाहब गुस्से में कहते जा

हा रक्त बं(ज

रहे थे, 'तुझको में अपना लड़का नहीं मानता | निकल्न जा मेरे मकान से तेरे ऐसे लड़के का बाप होने से सो जन्म तक पुत्र ही रहे सो अच्छा है दम लोग खानदानी राजभक्त हैं। तू इसमें कहाँ से भा गया में जानता था कि साहित्य ही पढ़ता हे, पर यहाँ तक ? दूर जा, मैंने तुमे त्याज्य कर दिया। में तेरा मैंह नहीं देखना चाहता नाछायक....

रायसाहव यहीं तक कहने पाये थे कि एकाएक लड़के ने उसी प्रकार फुसफुसाकर कहा, 'शान्त हो जाइए पुलिस उस मक्रान की तलाशी ले चुकी, अब हम लोगों के मकान की तरफ थ्रा रही है हाँ इसी तरफ आा रही हे आप शान्त होकर एक कुर्सी में बेठिए किसी प्रकार यह दिखलाइये कि आप उत्तेजित हैं, नहीं तो चोपट हो जायगा |...

रायसाहब हरनामदास फोरन पुत्र की आज्ञा मानकर एक कुर्सी पर बेठ गये और छगे एक पुस्तक उलठने मानों कुछ हुआ ही नहीं

खटपट करते हुए एक दारोगा रायसाहब के नौकर के साथ कमरे में घुस आया और रायसाहब को ग्रुड मानिंग करते हुए एक कुर्सी में जम गया इस बीच में रायसाहब का पुत्र कहों से खिसलक गया था

दारोगा जी ने कुछ भूमिका बाँघे बगेर कहा, 'रायसाहब आप बहुत भारी गलती में थे, तलाशी में कोडे आपत्तिजनक वस्तु नहीं मिली आपने धड़ाका सुना होगा, पर टायर फटने का भी ऐसा ही धमाका होता है | क्या कद्दा ? कोई घायल हुआ था वहाँ तो कहीं कोई चिन्ह तक नहीं मिला | हाँ आपने तो अ्रच्छे मकसद से खबर दी थी, पर दम हेरान हुए, और अभी क्या हे ? अभी तो बहुत कम हैरान हुए बाद को ओर हेरान होंगे भाजकछ बात-बात में प्रांतीय असेम्बली में प्रइन की झड़ी लग जाती हे लेने के देने पढ़ जाते हैं...फिर कुछ रुककर बोला ... पर हमारा जवाब तो तेयार है हम झापका नाम बता देंगे कि झापने

राजन प्‌

फोम किया था, उसी पर हम झाये ये जो कुछ भी द्वो मामज़ा कुछ अच्छा नहीं रहा ।!

दारोगा जी ने रायसाहब की तरफ एक अद्भुत तरीके से मुह बना- कर देखा मानो कदह् रहे थे कि तुम रायसाहब हो, छोड़ दिया नहीं तो तुम्हें बताते। रायसाहब अब बड़ी अजीब परिस्थिति में थे। पहले कुछ शायद शक भी था पर श्रब तो सारा प्रमाण आलमारी के पीछे रखा था श्रब तो उन्हें कुछ सन्देह्द नहीं था

दारोगा के अ्रविश्वास से रायसाहब को इतना क्रोध भाया कि उन्हें यह प्रबल इच्छा हुईं कि अभी बम को आलमारी से निकालकर अपनी सचाई का प्रमाण दे दें, पर दाँत से दाँत दबाकर वे चुप रद गये। दारोगा कद्दते ज्ञा रहे थे, 'मेंने बनमालीदास से ज्यों ही बम की बात कही, त्यों ही वह खूब कद्दकहे छूगाने लगा उसने कद्दा एक साइक्रिल का टायर जरूर फटा है, पर बम तो यहाँ कहीं नहीं हे सामने ही एक पंकचरवाली साइकिल रखी हुई थी, फिर भी मैंने समझा कि शायद घोल दे रहा है, इसलिए मेंने खूब श्रष्छी तरद्द मकान की तल्लाशी ली | पर यहाँ बस ही क्‍या एक सुई भी नहीं मिली साहब यदद मामला ठीक नहीं हुआ बहुत ही खराब रहा ।!

इस बोच में रायसाहब का मेंझला लड़का फिर भा गया था उसने बीच में नाक सिकोढ़ते हुए कहा, 'ऐता जी आजकल श्रक्सर ऐसी गलती करते हैं उस दिन मध्य रात में उठाकर बोले कि कोई दरवाजा खटखटा रहा हे, हम लोगों ने कहा कि कदाँ कुछ सुनाई तो नहीं देता फिर भी नोकर लोग लालटेन लेकर गये, तो देखा कोई नहीं है / मैकले लड़के ने यद्द जो घटना बतलाई यद्द बिलकुल कपोल्लकल्पित थी, पर इस समय रायसाहब खीझते हुए भी चुप रहे गये और प्रबल भावावेश के कारण थरथर कॉँपने रंगे | बहुत कोशिश करने पर भी इस कम्पन को गेक सके |

रायसाहब श्रन्द्र ही अन्दर खून का घूँट पीकर चुप थे, पर अब

रक्त के बींज

उनसे सहन हुआ्रा बरस पड़, 'देखा साहब आजकल के लड़कों की हालत श्रगर भूल हुई तो हुईं, इसमें ऐसा क्या अनर्थ हो गया ?... कहकर वे स्वर को चढ़ाते हुए लड़के से बोले, यहाँ से दूर हो जा मैं कोह बात सुनना नहीं चाहता ।” अब उनको एक बहाना मिल गया तो अपना श्रसली गुस्सा उसी बहाने उतारने लगे

अबकी लड़का सचमुच चला गया

रायसाहब काफी देर तक चुकने के बाद दारोगा जी से बोले, 'मुझे दुःख हे कि मैंने आपको कष्ट दिया, पर विश्वास रखिए भापको हेरान करने का उद्देश्य नहीं था कहकर उन्होंने अपना छुटकारा करना चाहा

यों तो रायसाइब पुलिसवाले या इस किस्म के लोगों की सोहबत को पसन्द करते थे, पर श्रालमारी में जो चीज रखी हुई थी, उसके कारण वे इस समय यद्द चाहते थे कि दारोगा जल्दी से जरदी तशरीफ ले जायें। पर दारोगा तो टेकक्‍्चर देने की मानसिक परिस्थिति में था। वह भोर दारोगाओं की घूसखोरी श्रोर अपनी इमानदारी पर देर तक व्याव़्यान देकर तब बिदा हुआ जाते समय उसने रायसाहब से करीब करीब कद्द- लवा लिया कि वे जिला मजिस्टेट मिस्टर मौरगन से दारोगा की तारीफ करेंगे रायसाहब क्या करते राजी हो गये

जव दारोगा जी चले गये तो रायसाहब ने नौकर को बुलाकर कहा कि मेझ ले लड़के को बुछा लाझओओ, मकला लड़का उस दिन घर ही पर क्लाया वह यह सोच कर घर नहीं श्राया कि रायसाहब बहुत नाराज हैं और पता नहीं गुस्से में क्या कर बैठें

रायसाहब रात दस बजे तक बेठे-बेठे बम को अगोरते रहे घटना संध्या से पहले की थी, इसलिए यथा समय नौकर वहां अंधेरा देखकर, स्विच दवा कर बत्ती जलाने झ्ाया, पर रायप्ताहब ने उसे मना कर दिया, कोर साथ ही यह भी कद्द दिया कि अगर कोई उनसे मिलने आवे, तो कह दे कि वे घर पर नहीं हैं

वे अंधेरे में बठे-बेठे इन्तजार करते रहे कि कब छड़का आये और

राजभकछ है.

उससे कहें कि बम ले जावे | वे मन ही मन गालियों का एक लम्बा-सा वाक्य भी तयार करते जाते थे, पर जब रात के दुूस बज गये, घर के सब लोग खा-पी चुके, वे खुद भी डराईग रूम में ताला डाल कर घर के अन्द्र से खा क्षाये पर लड़का नहीं आया उन्होंने सोचा कि श्रब खुद ही कुछ करना चाहिए ऐसा तो नहीं हो सकता था कि उनकी तरह एक प्रसिद्ध राजभक्त के मकान पर रात भर बम रखा रहे नहीं, कभी वे ऐसा होने नहीं दे सकते

वे सोचने लगे कि अब क्या द्वो ? इच्छा हुई कि जाकर खी से कुछ सलाह पूछे, पर उन्हें स्त्रियों पर विश्वास नहीं था मारूम किससे कहती फिरे कि घर में एक बम झाया था, औ्रौर उसे क्‍यों फक दिया और त्यों फेंक दिया श्रोर यदि बात घूमते-घूमते मिस्टर मौरगन के कानों में पहुँचे, तो ऊँचे-ऊँचे अफसरों में उठना बेठना भी मारा जाय

उन्होंने बाकी दो लड़कों के विषय में सोचा तो ऐसा मालूम पड़ा कि इन लोगों से कहने से कुछ फायदा नहीं होगा। ये लोग श्रपनी बीबियों से कहंगे, भोर वही बात होगी जिसे बचाना है

रायसाहब के घर में कई नोकर थे, जिनमें से एक बहुत पुराना था, श्रोर किसी जमाने में उनके बहुत से गुप्त काम क्रिया करता था उन्होंने उसको बुलाया इतनी रात गये मालिक ने उसे क्‍यों याद किया इससे उसे बड़ा ताज्जुब हुआ वद्द श्राकर प्रश्नसुचक दृष्टि से ताकते हुए मालिक के सामने खड़ा हो गया मालिक उसे बहुत ध्यान से देख रहे थे। नौकर ने पूछा, 'हुजूर क्‍या हुकुम हे ?'

रायसाहब को एकाएक कुछ नहीं सुझा, कम से फम उन्हें यद्द हिम्मत हुईं कि बम के सम्बन्ध में कुछ कदें, पर कुछ कद्दना तो था ही, इसलिए बोले, 'श्राजकल मुद्दब्ले में बहुत चोरी द्वो रही है। समझे, बहुत द्ोशियार रद्दा करो | . ...!

नोकर ने मालिक को खुश करने के ज्षिए कद्दा, 'हुजूर तभी भाज पुलिसवाले भाये थ्रे ?'

2 रू के बाज

शयप्ाहब की भेंदें तन गहे, बोले; “रो जिसलिए भी आये थे, तुम जाओ अपना काम करो /

नौकर चला गया |

झब रायसाहब बड़ी िम्ला में पड़े के क्‍या हो अन्त सें इन्होंने जब देखा कि घर के सब लोज सो गये हैं, तब उन्‍होंने जूता डतार डालर, चूक रेशमी चादर ओोढ़ ली, और सावधानी से श्रम की पोटली को एनिकाला फिर चादर के अन्दर घम को छिप कर ये डाइईंग रूम के किवाडद के सामने खड़े होकर देखते रहे कि कहीं कोई लगा हआा ते बहीं है फिर वे यहाँ से निकल्वकर बैंगले के बाहर गये, और कीरे-धीरे बिना फिसी उद्देश्य के चलने लगे वे एक-एक कदस चलते थे और तीन दफे चोंक कर आगे-पीछे देख रहे थे। इस प्रकार वे कुछ दूर निकल गये तो उन्हें ऐसा मालूम दिया कि कोई आहर मारूम हो रही हे, बस उन्होंने फौरन पोटली को दीचार के पास रख दिया और उत्लटे पाँच भागे। रायसाहन इस बुढ़ौती में इतना दौद सकते हें, थह किसी को विश्चास नहीं हो सकता था थे एक मुहत्त में अपने बंगले में पहुँच गये। पर ज्यों ही बे चँगले में घुसे, त्यों ही डब के डसी नौकर रासगुलग्म का सभा हुआ डंडा उनकी पीट पर पढ़ा |

पर र्यसाहब ने तुरन्त अपना य्रिचज दे दिया खेरियत यह हुई कि ंडा पीढ के चर्बीले श्रेंश पर पड़ा था, इसलिए कोई विशेष चोट नहीं आहू। फिर शयखसाहब इस समय इतने खुश थे कि उनको चोट भधिक मार्म नहीं हुईं | बह तो इस बात से खुश थे कि उनकी राजभरिू पहर

घजब्बा नहीं ऋाया

अगले दिन शाम के श्रखवारों में यह खबर निकली कि क्राम्ति-

राजभक्क टू

कारियों ने दौलतगगंज थाने के पीछे एक भयानक बम फिट करके रख दिया था, एक राउंडवाले सिपाही ने गलती से उस पर पेर रख दिया तो बड़े जोर का घड़ाका हुआ, और वह सिपाही बहुत बुरी तरह घायल हो मया, शायद जीवित हे

पर यह खबर गलत थी। कम से कम इस बार किसी राजद्रोद्दी यह क्रान्तिकारी ने यह नहीं रखा था एक रायसाहब ने यह घम रखा था पर इसे किसी ने जाना.

१० के बीज

ऋष्ति का मुहत्त

१8४२ का जमाना था। ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस पर प्रहार किया, तो सारा देश ही कांग्रेस हो गया | ऐसा युग था कि बड़े बड़े कायर भी रात भर में बहादुर हरे गलु सूम और -मक्खीचूस धन लुटाने छगे | डसी युग की कहानी हे | राइसाहब हरनामदास किसी ऊँचे खरकारी ओहदे पर थे, पर उनके रिटायर हुए कई साल हो मए थे सुना जा रहा था कि वे फिर से नोकरी सें घुाये जायेगे, स्थोकि आदमियोों की कमी थी, और खूब हड्टे-कट्टे बने हुए थे। इन दिनों वे रिस्यर होकर जौनपुर में अपने बंसले में रहते थे बंगले के साथ लगी हुईं बहुत जमीब थी, उसी में वे बाम- चरनी करते रहते थे

बेगले के परस ही रेल ऊाइन थी वे रोज सबेरे उसी पर टहलने जाया करते। कभी-कभी उनके साथ उनकी छोटी लड़की कालेज की छात्रा लिली भी रहती थी, पर लिली रहे या रहे, वे तो नित्य टहलने जाते थे

जब तक टहलकर वापस आते, तब तक घर में चाय आदि तेयार हो जाती झ्ञाकर वे नाश्ता करते, हिर बागवानी सें जुट जाते। दूर-दूर से छोग उनके पास पौधा सौंगने आते | सचमच यह बाण ऐसा था, जिस पर उन्हें नाज हो सकता था।

रायसाहब पुस्तकों के श्री शोक्ीय थे, दो-तीन भग्यबार भी मेंगाने थे बागवानी से शक जाते तो अखबार पढ़ते, अखबार से ऊत्रते तो बाग में जाते लिली तो धोड़े पर भी चढ़ती थी

रायसाहब की बेठक में कभी-कभी राजनीतिक बहस भी छिद

ख्यन्ति का सुहूत्ते १९

जाती पास द्वी थाना था, वहों बड़े दारोगा नन्‍्दुलालसह भी कभी; कभी काते | इन बदसों में रायसाहुब तथा ननन्‍्दुलारू हमेशा सरकार की लरफदारी करते, और लिली विरोध में रहती थी. लिली की कई सखिय: भी छाती थीं, वे भी लिली के पक्ष में रहती थीं। लिली की एक सखी का भाई अमोलकचन्द तो लिली से भी अआगे बढ़ा हुआ था, दारोगाजी के सामने तो वह खुलता नहीं था, पर अन्य समयों में वह ऐसे बात करतः था मानो ठह किसी भयेक्र ऋत्तिकारी दर का सदस्य हे। लड़कियों: को वह सरदार भगतसिंइ, काकोरी के शहीद आदि जब्त किताबें पढ़ाया! करता था छिली की आंखों में तो उससे बढ़कर बहादुर छोकरा कोई होः ही नहीं सकता था| उससे जब्त किताबें लेकर लिली अपनी तरफ से अऋपने कालेज की लड़कियों को पद़ाती रहती थी

अज्दालन जितना ही तीत होतड़ जा रहा था, रायसाहक उतना. ही उसऊके विरुद्ध जहर अधिक उमलते जाते थे ण्क दिन उन्होंने अमोलक- चन्द के मुंह फर करीक-करीक चुनोती के रूह जे में कह दिया, “छोटे महः बड़ी बात अच्छी नहीं होती, कातों से कहीं ऋ्तियाँ नहीं हुआ करती ।'

यों रायसाहब हमेशा ही. विराद में कुछ कुछ कहा करते थे, पर अयज उन्होंने जिस लहजे में ॥रत॑ कहीं, उससे सब देगः रद्द मूये। कुछ दर तक बेठक में सन्‍नाय रुद्दा, फिर सब एक-एक करके उठ कर चले गए रायसाहक की दीबी लक ने इस लद्दज को नाफ्सन्द किका। अकेले सें बोली, “तुमने त्मे श्रमोरक को; डॉट-सा दिया कितनी मुश्किल से दो उसे बुद्मती हूँ, कितने बड़े खानदान का लड़का हे, तुम्दें कया ये लोग बात करते हैं तो, यह उम्र तो कात करने की होती ही हे |

रायसाहक खिसिया कर बोले, “ये लोक बात करेंगे, तो काम कौन करेगा ? फढ़ती हो देश: में. कया, हो रह है, ज्यादा कक णत्छी नहीं होती।'

उस दिन बात वहीं तक रह गई। दो-तीन दिन बाद रायसाहक सत्ेरे टहल कर लौट रहे थे, तो देखा कि दूर में थाने के पास कुछ भीड़

०4 रक्त के बीज

जमा है। वे कौतूहलवश वहीं पहुँचे। उनको सभी जानते थे, वे एकदम भीतर चले गये दारोदा ने डनका अपने कमरे में छुला कर कहा, धबर मिली कि पास के गाँव में क्रान्तिकारियों ने प्लास बॉटे हैं, कस इसी खबर पर श्राज सबेरे मेंने भरमपुर की क्लाशी ली तो एचास के फरीब प्लास निकले ।?

*लास क्यों बाटे १! रायसाहब ने पूछा

(रेल लाइन उखाइने के लिए ।?

अच्छा ।' राय साहब बोले

रुगाजी ने श्रपनी बुद्धिमानी दिखाने के लिए कहा, आज राव जारह बजे इस लाइन से एक मिलिटरी गाड़ी जाने बाढी हे, तभी क्रान्तिकारियों ने प्लास बॉट दिये पर वे डाल-डाल हम पात-पात...में सारी बात समझे गया तरकादशी हरे तो पलास निकले हा ह। दा हा, 'कुछे चायशाय मंगाऊं ??

रायसाहब उठ पड़े, बोले, “नहीं, में जरदी में हैँ...फिर सोच कश चोले, भाई एक बात है, मुझे एक प्लास दे दी, बाग के नल खोलने खन्‍्द करने में काम आयेगा। हो, श्रगर कोई दिक्कत ने ही तो... .......

दारीगा ने कहा, “जरूर, जरूर ले आइए.......”

राससाहब को एक प्लास मिल गया, और वे खुशी-खुंशी घर गये अर वहीं बाग के सब्र नों को पछास से खोल-खोल कर ठीक करने स्तगे बहुत खुश हुए कि शेज फी एक हाय किछकिल दूर हुई

संध्या समय उन्होंने लिली से कहा, “चली बेटी 2इल श्रार्वे ।”

यद्यपि वे शाम को टहलने नहीं जाते थे, बाग में ही रहते थे, पर लिली को धहुत खुशी हुई। दोनों रोज की रेल लाइन पर टहलने निकल गये एक पुलिस का आदमी इस 'निकारे तेनात था, उसने राय- साहब को देख कर संछाम किया

रायसाहब दूर तक निकल गये जब वे लौट्ट रहे थे तो संध्या दो चुकी भरी।बीच रास्ते में रायसाहब रूप, फिर चारों तरफ देखकर एकाएक

अन्त का मुहृत्ते

रेल लाइन के बोलटू ठीले करने लगे दिन मर प्लास चलने का श्रभ्यास किया था। पॉँच मिनट में २७ बोलटू निकाल डाले लिली दंग रद्द गई, पर कुछ बोली नहीं

राय साहक ने जक काम ख़तम कर दिया, तो प्लास वहीं डाल दिया, और लिकी का हाथ पकड़ कर वहीं से लाइन से उतर कर घर पहुँचे। घर में मजझलिस सी लग रही थी, श्रोर राजनीति की चची हो रही थी

रायसाहब ने लिली से रास्ते में कह दिया था कि कहाँ टहलने गये थे, कोई पूछे तो शहर का नाम ले लेना रायसाहब ने घर में राजनीतिक च्चो सुनी तो किर वे संजीदगी से राष्टु- विश्येधा पक्ष का समर्थत करने लगे अपम्रोलकचन्द्‌ की बात खतम भी नहीं हुईं थी कि रायसाहब बहस में हूट पढ़े, रोटी पर मक्खन की मोटी तह लगाते हुए बाले, 'भली चलाई इन देशभ को की अंग्रेज होते तो हम अगली हालत में होते, उन्दोंने ही हमें सब कुछ सिखाया, और आज हम चले हैं, उन्हें निकालने... ... ... ...

अमोलकचन्द भी बिगड़ा हुआ था, उसने राय साहब की रूरियायत ने की, और चायखाने के अग्दर खूब मुर्ग लड़े। मजे क्री बात यह हे कि लिली भी आज दुरंगी बाने कर रही थी। अमलकचन्द को इस बात से बड़ा ऋाश्चये हो रहाथा

उस दिन रात बारह बज सामरिक गाड़ी यथा रीति आईं भोर वह पटरी पर से उतर गई २६ गोरे उसी समय मर गये, १२ भस्पताल में भरे इत्यादि पुलिस ने इस मामल में ७० शादमियों को गिरफ्तार किया, जिमसें अमोलकचन्द भी था

इस बीच में रायसाहब हरनामदास फिर से जज तेनात हुए और के इसी जिले के सेशन जज बने यह मुकदमा घृमघाम कर यथा रीति निम्न प्रदालत से उन्हीं के इजलास में आया

तीन महीने सेशन में मुकद्दमा चला राय साहब ने सक् ४० आद- मेत्रों को सजा सुताई अ्रपोलमवत्द का उत्दोंने सरगना करार देकर

१-६ रक्त के बाज

२० साल की सजा दी।

इजलास से घर पहुँचे, तो लिली ने उसे कहा, “पापा यह आपने क्या किया ? मुझे तो निश्चय था कि श्राप सबको छोड़ देंगे !

साय साहब ने चेहश गरभीर बा कर कहा, '३८ गोरे मर गये, रूजा करता तो क्या करता ?”

“पश पापा ? ?

(हाँ बेटी ?

“आप तो जानते थे कि वे दोषी नहीं हैं, आप तो जानते हैं कि केसे ओलटू निकाले मये ।?

लिली और भी कुछ कद्दना चाहती थी, पर कह सकी ,फफक-फफक कर राने लगी रायसाहब ने उसे अपनी गोद में खींच लिया, बोले, “क्या तुम समभती दो मेंने वह काम किया था, नहीं उस समय तो मैं, में ही नहीं रह गया था, मेरे सिर सवार होकर किसी ने मुझ से सारा काम करवा लिया था वह क्रान्ति का मुहू्ते था !...पर फिकर मत करो, श्रपनी कलम से मेने सबको सजा दी है, पर उस फेसले पर छिद्र हैं कि हाईकोट में वह एक भी मिनट नहीं टिकेगा कुछ अमोलकचन्द फी परीक्षा भी तो होने दो, कि केवल बातें ही मारता है कि कुछ दम भी है ।... ...

“तो पापा तुम जानते हो ?” लिली निश्चिन्त होकर करीब करीध हँसती हुड्े बोली

'हाँ बेटी क्यों नहीं ?! रायसाहब ने बेटी को स्नेह से दबाथा |

“तो तुम राजी हो ?! लिली ने शरमाते हुए पूछा

हाँ, राजी क्‍यों नहीं हूँ, छड़का भच्छा है, हाँ उपर से में इस शादी से कोई सम्बन्ध गहीं रखूगा, समझी ? अब सुर पर घद्द क्रान्ति का आुहूर्त सवार थोडी द्वी हे।?

पुत्री ने पिला के पैर छू लिए दोन्में की आँखों में आँसू थे +

ऋतत का मुदूत्ते १.४.

आन्ति मंग

करीम दिल्ली में तॉँगा चला कर किसी तरह श्रपने बाल-बंध्चों को पालेवह था.। गत पन्द्रह साल से उसका एक ही कार्यक्रम था बहुत सचेरे उठ कर धोड़े की सेवा में जुट जता था, फिर ताँगा जोत कर कोई बेतुका गाना गाता हुआ चल देता था | खेरियत थी, कि घोड़ा और तौँगा उसी के थे | पर ताँगा खरीदते समय उसके बाफ ने जो कज लिया था, तो श्र तक कही अदा किया जा सका था, ओर नया घोड़ा खरीदते समय उसने जो कजा। लिया था, वही अरढा किया ज्य सका था। इसलिए वह कर्ज के बोफछ से दबा हुआ था | वह ऋझपने को मालिक समझता, तो कैसे ? फिर भी विशेष दुखी रहता।

करीम के कप कज चुफाते-चुकासे मर गये | पर कजे ज्यों का त्यों बना रहा उन दिनों ताँगा नहुत सस्ता चलछता था, और चीजें भी सरती थीं | मुश्किल खूद ही दे पाते थे। भब इधर सालों से ताँगे में पेसे लघिक मिलते हैं पर एक तो बस सर्विस अ्रधिक हो गई, भौर वूसरे चीजों के दाम अन्धाधंध बढ़ गये | उसे गेहूँ की रोटी मिले, थोड़े को चना ओर किर मनहूस महाजन का रोज-रोज तकाजा भकेडा करीम कमाने काका, और छे खाने वाले | पाँच तो घर के लोग, श्रीर एक घोड़ा ओर घोड़े को करीम झपने धर के किसी भी सदस्य से भ्रधिंक महंत्यपु्ण मॉनता था। वह तो साफ-साफ कहता था, में कमाता थोड़े ही हूँ, यही अकबर कमाता है। खुदा में करे, पर यद्द मरा कि सब मरे अब तो उधार भी नहीं मिलेगा।

१६ शक के बीज

करीम कर्ज के कारण बड़ा खिन्न रहता था। खिन्नता को दूर करने के लिये वह कभी-कभी ताडी, श्रीर जब मौका लगता, तो घटिया शराब वीता था। पर अपनी ख्री जोहरा के मारे इसमें भी उसे पूरा लुत्फ न॑ श्राता था, क्योंकि घर पहुँचता, तो बहुतेरा इलायची और पिपरमेंट खाने पर भी जोहरा भाप लेती, ओर फिर तो खूब खबर लेती 'बुड़ढे हो गये, कौर कुछ ख्याल नहीं। बाल-बच्चों की रोटियों के लाले पढ़े रहते हैं, पर इनको हर वक्‍त गुलछुरों ही सूझा करता हे ।!

करीम की समझ में यह आता, कि यदि उसने थंककर एक कुहहड' ताड़ी पी ही ली, या एक घँूँट शरात्र ही, तो इसमें कौन-सा गुलछरो उड़ाना हो गया। अरे, कड़ाके की सर्दी में और तेज लू में वही ताँगा लेकर इधर से उधर धूमता रहता हे, कि कोई आर ? जीवन-संगिनी की इन अभ्रालोचनाओं से उसे बड़ी निराशा होती, पर वह अधिक कुछ कहता था किसी दिन अधिक पीये होता, तो दो-चाश हाथ झाड़ू देता इससे जोहरा कुपित होती, पर जेसे करीम के लिये, कभी-कभी शरात्र पीना स्वाभाविक था, वेसे ही जोहरा के लिये उसे डॉटना, और फिर उसके फलस्वरूप कभी-कभी पिट जाना भी स्वाभाविक ही था। सदेव से ऐसा ही होता चला शथ्रा रहा था कम से कम जोहरा को ऐसा ही मालूम था। उसने अपनी माँ को बाप के हाथों तथा सास को ससुर के हाथों पिथते देखा था

इसमें कोई विचित्रता थी। इन लोगों का जीवन मानो किसी अ्रत्य रूप में इनके बाप दादों के जीवन की ही पुनराबृत्ति थी | जोहरा को इस बात से कोई शिकायत थी, पर करीम को थी ओहरा को घर के काम-काज से कभी छुट्टी ही मिली, कि वद्द क्रिसी बात पर गहराई से सोचे।

पर करीम को समय मिलता था | जब वह बिना सवारी के होता था, तो तौँंगे की पीछे वाली सीट पर बेठता था, फिर एक सिगरेट सुलगाकर हाथ में लगाम लेकर, वहं सबारी की तम्नाश में इधर से उधर घूमता था

आ्रान्त मेग १७

शेसे समय वह गंभीर से गंभीर समस्थाओों पर विचार करता था | अक्सर वह विचारों में इतना निमग्न हो जाता, कि घोड़ा मौका देख कर घर लोट आता जब ताँगा एकाएक एक झटके से घर के सामने खड़ा हो जता था, सब उसे होश आता था | यद्यपि घोड़ा उसके चेहरे को नहीं देख पाता था, पर लगाम के खिंचात से ही बह अपने मालिक की मानसिक श्रवस्थर की थाह लगा लेबा था

करीम परिवरतन के लिये लालायित था | वह समझता था, कि को४३ भी परिवर्तन होगा, तो उसका भला ही होगा। केसे भला होगा, हख सम्बन्ध भें उसकी काई न्‍्यष्ट घारणा थी। पर वह समझता था, कि परिवर्तन में कोई भलाई है, भोर यह थात उसके दिमाग़ में जम गे थी

हस फारण ऊच लीग के लोग झाकर उसे समकाने लगे, कि पाकिस्तान होगा तो भला होगा, तो वह उसका जबदेस्त समर्थक हैं? गया। मौका निक्राऊक्र उनक्री सभाभों में जाने लगा, डनक्री तरह बातें करने लगा, ओर अपने नये विचारों के फल स्वरूप चिर-परिचित अरस्टाखान टोपी छोड कर, फुन्देदार तुर्की टोपी पहनने छूणा

करीम विचारों से श्रनुदार था, श्रौर भब तक हिन्दुओं से उसे कोई घृणा नहीं थी पर लीगियों ने जब दादी हिलाहिल। कर बातें कह ओर उसने सोचा, और देखा कि वह एक हिन्दू सेठ का कजदार है, तो वह दिल से कुछ भोर साचत हुए भी लीगियों फी तरह बातें करने छगा। ओर जब कुछ दिनों तक बसी बातें करता रहा, तो बह बला सोचने भी लगा उसके विचार भी उसी तरीके के बन गये

उन दिनों भारत का बेंटवारा करीब-करीब तय हो चुका था | यद्यपि पहले करीम को राजनीति से कोई मतलब नहीं था, पर अब बह जस-जरा। सी बात की खबर रखता था | उसे बताया गया था, कि अ्रब पाकिस्तान होगा, और इस बात से बह इतना खुश था, कि रोज रात को शराब पीकर लोटता था

शै८ रक्त के बीज

जोहरा उसे हमेशा की तरह बुरा भला कहती थी, पर वह अब उसकी परवाह नहीं करता था एक दिन जोहरा ने जब कहा, “दो-दो लड़कियों बड़ी हो गड्ढे हैं। इनकी शादी के लिये कुछ जमा करोगे, कि सब पेंसे नयी में ही फँक डालोगे', तो करीम बोल उठा, 'तुमको तो बस छीटी-छोटी बातों की पड़ा है औरत की जात ठहरी, कम श्रक्ल पता भी हे कि पारिस्तान होने वाला है ?'

उसने “पाकिस्तान होने वाला' इस बात को ऐसे कहा, जेसे हिन्दू मोक्ष की तथा मुसलमान बहिइत की बात करते हैं उसके चेहर पर एक दिव्य ज्योति झलक रही थी, जो या तो पहुँचे हुए महात्माओों के या पागलों के चेहरे पर दृष्टिगोचर होती हे

सच तो यह है, कि जब उसके महाजन छाला नत्यूमल ने आकर उससे सूद माँगी, तो उसने टाल दिया बोला, 'महीने, दो महीने में सारी रकम मयसूद के चुकता कर दूँगा। घबराते क्यों हो ?'

पहले ऐसे माक्रों पर वह छाला नत्यूमल से गिइगिड़ा कर बात करता था कहता था, कि सूद कहों से छाऊँ ? रोटी लाले पड़े रहते हैं। माफी दो ! फिर जब छाला आंखें लाल-पीली करते थ, ता कहता था, कल दूेगा। परसों अद्धा कर दूगा लाला भी काइयो था | ठीक समय तय करवा कर ही जाता था, ओर उस नियत समय पर या तो वह खद पहुँचता था, या उसका गुमाश्ता पहुँचता था | अब की बार लाला नत्थूमल ने जो उसका लहजा बदला हुआ पाया, तो आइचये तो यद्द हे कि उन्हें आश्चये नहीं हुआ, ओर फिर वे तब से आए ही नहीं उन्हें पुरा भरसा था, कि उनका रुपया मारा नहीं जायगा

कोई आइचये करे या करे, पर जोहरा को बड़ा आश्चर्य हुआा। उसे आइचये इस कारण और भी अ्रधिक हुआ, कि उसके पड़ोसी सेवा- रास का भी वही हाल था, जो करीम का था सेवाराम के पास दो गायें थीं। उन्हीं का दूध, दही, गोबर बेचकर उसका गुजारा होता था। वह भी कहे बच्चों का बाप था | इन दिनों वह भी-शराब अधिक पीने छगा

अ्रान्त मग ३६

था। वह भी अ्रपनी स्त्री शिवरानी की बात नहीं सुंनेता था। उसके द्वारा रोके जाने पर, बह भी एक दिन बक गया, 'स्वराज्य होने वारा है अब फाहे की किक्र ! अग्नजों की सारी जायदादें और मेमें हमको मिलेगी !!?

जायदाद मिलने की बात सुनकर शिवरानी खुझ हुई, पर मेस का नाम सुनकर उसका माथा उनका | बोली, 'मेम लेकर तुम क्या करोगे ? जूढ़े होने को शाये, पर बदमाशी नहीं छोड़ी ।!

सेवाराम यों ही शक गया था। इतना सोचा नहीं था, कि इसका यह सतलब हो सकता है जल्दी से बात बदलते हुए बोला, 'मेमें हम लोगों को थोड़े ही मिलेगी बड़े-बड़े नेताओं के लिये ही काफी नहीं होंगी हमें त्तो शायद कोई देशी ह्ैसाइन भी नहीं मिलेगी ॥?

स्पष्ट था, कि उसके छहजे सें अफसोस था शिवशनी बोली, धयाद रखना, सेम हो था इसाईन, यहाँ कोई शायेगी तो इतने भाडू मारूँगी कि याद करे कोई ऐसी वैसी नहीं हूँ श्रहीर को बेटी हूँ ।'

सेबाराम को परनी की यह देशद्रोहिता पसन्द नहीं श्राई, कि यह स्व॒राज्य नहीं चाहती | वह चुप रहा सोचा कि, “अब स्व॒राज्य हो जायगा, तो इससे निपट रूँगा इससे अभी क्यों भिड़े ? आखिर औरत है इसकी जबान पर लगाम नहीं है।!

इस तरह उसने स्त्री के साथ तकरार तो किया नहीं, पर मन ही सन अपने स्वप्न की हमारत बनाता रहा। यद्यपि उसने मेम की बात कही थी, पर उसका मन सेम पर था, इंसाहन पर था। उसका मन तो पास के इसाह यतीमखाने में पली हुई तगड़ी गायों पर था। काश, उसमें से एक मिल जाती ! यह सोचते ही डसका मन ललचा उठता था

सेवाराम और करीम में गहरी दोस्ती थी करीम कितना भी लीगी हो, मोके पाकर सेबाराम के साथ वह दिल की दो-दो बातें कर लेता था। दानों का एक विषन्र में संयुक्त मोचे रहता था, कि रित्रियाँ मूर्ख होती हें, ओर उनको मँद्द नहीं लगाना चाहिए। पर कुछ भाग्य का परिहाल ऐसा था, कि श्रपनी स्त्री के बिना उनका कोई काम नहीं बनता था। वे जब एक

२० रह के बाज

दूसर से मिलते थे, तो ऐसे बात करत थे, मानों किसी ने जबरदस्तो उनकी शादी कर दी थी पर वस्तुस्थिति इसह ब्रिलकुझ विपरीत थी। दोनों जब तब्र एक साथ बेंठकर एक-दो कुल्हह भी पीकर गम-गलत कर लेते थे पर इन दिनों दोनों का पीना हद से बाहर चला जा रहा था। कर्म मन में सोचता, कि बाप-दादों के समय के कज् के बाझ से मुक्त हुआ चाहता हे। आह, ऐसा सोचना भी क्रितना आनन्द-जनक था ! "सा सोचते समय सिर कितना हल्का मारूम होता था, जेसे बीमारी से उठने के बाद होता हे

सेवाराम जब से स्वराज्य जल्दी होने की खबर सुनने लगा था, तब से उसने निएइचय कर लिया था, कि इसाहइयों के यत्रीमखाने की एक गाय उसे जरूर मिलेगी। उसका तके कुछ इस प्रकार का था, कि बड़े लोगों को तो ईमारतें, नोकरियों श्रीर मेमें मिलंगो | को क्‍या उसे एक गाय भी नहीं मिलेगी ? ऐसा नहीं हो सूता उसका देशभक्त हृदय ऐसा सोचकर देशद्रोह केसे करता!

इन्हीं परिस्थियों में स्वराज्य हुआ, और पाकिस्तान भी बना। सेवाराम को वह गाय मिली, और करीम कजे से मुक्त हुआ पर दोनों में से कोई एकदम निराश नहीं हुआ | दोनों अपने श्रपने ढंग पर आशा बॉँधे रहे | सेवाराम तो गाय पाने का दद करीब-करीब भूल गया पर करीम को तो बहुत खला, क्योंकि कजे उलऊे सिर पर एक बोझ की तरह था, श्रोर उसका उतरना खलने की बात थी

एक दिन करीम अपने लीगी साथियों से लड़ गया | बोला, 'तुम लोगों ने तो कहा था, कि ऐसा होगा, वेसा होगा। यहाँ तो कुछ भी नहीं दुआ हिन्दू मद्दाजन तो हम से अब भी सूद लेता है ।!

लीग के एक भक्त ने कहा, अर्मों, अभी इतना हुआ, आगे और

आन्ति भेग २१

होगा। दखे जाओ कि कायदे आजम किस तरह सब्र ठीक कर दते हैं क्षभी हुआ ही क्‍या हे ? फिर से सल्तनत मुगलिया कायम होगी /

करीम को कुछ तसली नहीं हुईं पर जब बड़े-बड़े पढ़े लिखे मुसल- मान ऐसा कहने लगे, तो उसे चुप हो जाना पढ़ा। भीतर ही भीतर आग सुलगती रही, पर ऊपर से शांति रही। उसका शरात्र पीना जारी रहा, बल्कि कुछ बढ़ा ही

इतने में पश्चिम से बड़ी अ्रदभ्रुत खबरें श्राने लगीं | सुनाई पढ़ने लगा, कि हिन्दू मुसलमानों को मार रहे हैं, भीर मुसलमान हिन्दुओं को दिल्‍ली में सन्ध्या के बाद ता मुसलमान हिन्द मुहलों में जाते, हिन्दू मुसलमान मुहल्लों में उघर जो छीगी करीम से कह चुके थे, कि सह्तनत मुगलिया फिर से होने वाली हे, उनसें कई सपरिवार पाकिस्तान चले जा चुके थे। जो रह गये थे, वे अश्रब भी वही नारा दे रहे थे कि 'देखे जाओ श्रभी क्या हुआ है ? श्रमी तो दिल्‍ली पर भी हमारा परचम फहरायेगा ।” पर इनमें से भी जिसको मौका मिछता था, वे पाकिस्तान रवाना होते जाते थे | करीम भी दुविधा में था कि क्या करे | वह महाजन से बचने के लिये कहीं भी जाने को तेयार था पर उसने सुना था, कि वह ताँगा भोर घोड़ा नहीं ले जा सकता। इसलिये वह जा नहीं रहा था | पर पाकिस्तान के सम्बन्ध में उसने लीगियों से इतनी तारीफ सुगी, कि अक्सर वह सोचने लगता, कि तांगा छोड़ कर वहाँ जाना ठीक रहेगा या नहीं | कहने वालों के श्रनुसार तो वहाँ कोई अभाव नहीं था, पर फिर भी शअ्रपने तांगे-घोड़े को छोड़ कर जाने को उसका जी नहीं चाहता था

सितम्बर में एकाएक दिल्ली की परिस्थिति खराब हो गईं पता नहीं

क्या हुआ, कि मुसलमानों पर मार पढ़ने रगी। करीम सपरिवार मारा जाता, पर सेवाराम ने उसे छिपा लिया श्रब॒तो मुसलमानों में पाकिस्तान जाने का आन्दोलन जोर पकड़ गया। जब दंगा शान्त हुआ,

तो सेवाराम ने करीम से रूआसे होकर कहद्दा, 'भाई, तुम भी चले जाओ ।'

२२. रक्त के बीज

समी ने यही सलाह दी करीम के कई जान-पहचानीः मार गये थे. बह उनके मारे जाने की कहानियों सुनता, ता उसके रोंगटे खड़े हो जाते वह जाने के लिए राजी हो गया | ताँगे को ता लोगों ने जरा दिया था, वर घोड़ा बचा हुआ था सेकाराम ने अपनीः गायों में उसे बाँच कर बचा लिया था तय यह हुआ, कि घोड़ा सेवाराम के पास रहे उसने करीम- परिवार की जानों को जिश्न प्रकार क्चाया था, उसे लिये उसे यह्द घोड़ा दे देना कोई बड़ी बात नहीं थी पर सेवाराम लेने को राजी नहीं हुआ करीम ने कहा, भाई, में इसे ले नहीं जा सकला। मिट्दी के मोल बेचना फडेगा इसे तुम्हीं रस्क लो

तब सेकाराम को राजी होना फ्ड़ा यह तय हुआ, कि संवाराम का खड़का एक तोगा लेकर इसे जोनेगा। जब करीम पाकिस्तान के लिये घलने लगा, तो वह अपने घोड़े अकबर से गछ मिलने गया। बड़ी देर तक मिलाई हुई घोड़ा हिनहिनाने छगा। करीम शेने लूगा ) उसी दिन करीस सपरिवार हवाई जहाज में छाहोर पहुँचाया गया

करीम कमी हवाई जहाज पर चढ़ा नहीं था, इसलिये हथाईं जहाज पर चढ़ कर वह खश हुआ प्रारम्भ अच्छा था लड़के, लड़कियाँ खुश थीं, केवल जोददरा गम्भीर थी पर किसी को उसकी परवाह नहीं थी करीम ने सोचा, कि जरूर पाकिस्तान में अच्छा रहेगा एक अकबर के बिछोह के अतिरिक्त उसके लिए सब बातें खुशी ही थी। जब छोगों ने कताया, कि श्रव हवाई