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भूमिका

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पिछले छ' वर्षा की बात है कि एक चीनी श्रमण जिनका नाम बाउ-हुईं था, काशी मे संस्कृत पढ़ने आए थे श्रद्धेय ओ्रोचंद्र- सणि मिक्तु ने मेरे पास उन्हे सस्क्रत पढने के लिये भेजा वे मेरे पास साल भर से अधिक रहे। उन्हे संस्क्रत पढ़ाते हुए मैंने चीनी भाषा का शअ्रभ्यास करना प्रारंभ किया। पहले ते कुछ उच्चारण करके अभ्यास किया पर जब मैंने देखा कि चीनो भाषा में वर्णक्रम नहीं है, जिससे शब्दों का ठीक उच्चारण हो सके, कित॒ प्रत्येक सत्व श्रौर भाव के लिये प्रथक प्रथक संकेत नियत है ते मैंने उच्चारण फो छोड दिया और संकेते का ही अ्रभ्यास करना प्रारंभ किया | इस प्रकार थोड़े समय मे जितना दो सका मैंने संकेते का अभ्यास किया |

चीनी भाषा यद्यपि हमारे पूवजों को सुगम रही दो क्योंकि हम देखते हैं कि भारतवर्ष के अ्रनेक वौद्धाचार्यों' ने जैसे आचाये कश्यपमातंग, धर्म/क्षक, कुमारजीव, वबुद्धमद्र इल्ादि ने भारत- चर्ष से चीन देश + जाकर वहां की भाषा ही का ज्ञान नही प्राप्त किया था, किंतु अनेक धर्मम्रंथों का अनुवाद वहां की भाषा में किया था जिनका मान श्रब तक वहां के मिक्षुसंघ में है, ते भी वह हमारे लिये एक अद्भुत भाषा है वहां के शब्द प्राय: सब

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के सब एकाच हैं, पर लिपि से उनके उच्चारण का कुछ भी ते संवध ही है भर लिपि से उनके उच्चारण का ज्ञान ही हो सकता है | उनकी लिपि चैत्रिक है। प्रत्येक भाव और सत्व के लिये प्रथक प्रथक्‌ सकेत हैं | ये संकेत चित्रलिपि के विकारभूत हैं एक ही भाव के लिये चाहे शब्द में भेद भले ही पड़े पर संकेत मे भेद नहीं है

इन कठिनानयां पर भी मुझ से जहां तक दो सका मैंने अभ्यास किया और इच्छा थी कि यदि चीनी भाषा का कोई कोश मिल जाता ते और भी भ्रभ्यास बढ़ा लेता पर दुर्भाग्य- वश कोई ऐसा फाोश नहीं मिलन सका

जिस समय थाड-हुई मेरे पास थे उस समय मैंने यह निश्चय किया था कि चीनी यात्रियों के यात्रा-विवरणो का हिंदी भाषा में प्रनुवाद करू ओर यदि कोई प्रकाशक मिले ते! उनका अनुवाद अंग्रेजी में भी करू। पर उस समय कोई प्रकाशक मिल्ना और मेरा यद्द निश्चय मेरे सन ही मे रह गया। श्रमण बाड-हुई भी मेरे पास से चले गए

नागरी-प्रचारिणी सभा ने श्रीयुक्त मुशी देवीप्रसाद जी सुसिफ जाधपुर की सद्दायदा से ऐतिहासिक भ्रथमाल्ाा निकालने का विचार किया और फाहियान का हिंदी अनुवाद प्रकाशित करने का निश्चय किया। इसके अनुवाद करने का भार मुझे दिया गया। देवयोग से जो प्रति मुझे मिली उससे लेगी का अनुवाद और अत में मूल भी था | भूल की देख मेरा पूवे सेकल्प फिर जाग्मत

( दे )

दो आाया और मैंने मूल को विचारना प्रारभ किया। यद्यपि मैं अग्रेजी से अनुवाद करता तो थोड़े कात्न मे करके बोक्मा टाल देता पर मैंने मूल से ही अनुवाद करना उचित समझ्का। ऐसा करने मे यद्यपि मुक्के श्रम अधिक पड़ा तथापि इसमे और अंग्रेजी के अनुवाद में जो भेद है उसे वे ही पाठक अलुमान कर सकेगे जिन्‍होने अंग्रेजी के अलन्ुवादकोीं वा तदाश्रित भाषानुवादों को देखा होगा

इस अनुवाद मे मैंने लेगी और बील के अंग्रेजी अनुवादों से तथा प्रो० समद्दार के बैंगला अनुवाद से सहायता ली है जिसके लिये मैं उनका अनुगृहीत हूं

इस अनुवाद से अंग्रेजी अनुवाद से बहुत अंतर देख पड़ेगा, क्योकि मैंने अनुवाद को चीनी भाषा के मूल के अलुसार ही जहां तक हो सका है करने की चेष्टा की है। अनेक ख्ल्लों पर विरोध का हेतु भी टिप्पणी मे दे दिया दे इसमे संदेह नह्दी कि यदि मैं यह अ्रुवाद उस समय करता जब श्रमण बाड-हुईं जी यहां उपस्थित थे ते इसमे मुभ्पे बड़ी सुगमता होती और अनुवाद भी भ्रच्छा होता पर फिर भी मैंने अनुवाद का यथातथ्य करने मे कुछ कमी नही की है | भ्रजुवाद के प्रारंभ मे एक उपक्रम है जिससे पाठकों को इसका अनुमान हो जायगा कि फाहियान किस मार्ग से भारतवर्ष ञ्राया, उसमे युरोपीय विद्वानों का क्‍या सत है और मेरे मत से कया ठहरता है। साथ ही फाद्दियान की यात्रा का सार्ग भी एक चित्र द्वारा दिखा दिया गया है। अंत मे

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अनुवाद में आए हुए उपयोगी शब्दों की अ्रकारादि क्रम से एक सूची भी लगा दी है जिसमें वोद्ध-ध्म-संचधी व्यक्तियो तथा ध्रन्य शब्दों की पर्य्याप्त व्याल्या वा विवरण दे दिया गया है

इतने पर भी यदि कुछ त्रुटि रद्द गई द्वो ते पाठको से प्राथेना है कि वे उसकी सूचना सुझे देने की कपा करें जिससे उसका सुधार दूसरे संस्करण में कर दू।

शांतिकुटी

फाब्युन शुक्ल पूर्णिमा संवत १६७२

जगन्मोहन वर्म्सा

विषय-सूची लिन कपल विषय उपक्रम पहला पर्व--यात्रार दूसरा पवे--शेनशेन और ऊए

तीसरा परवे--खुतन

चौथा पर्वे---सीहन और जीहून

पॉचवॉ पव--क्रीचा वा कैकय की छठॉ पवे--तेले वा दरद 0

सातवां पर्व--नदो पार करना .

आठवों पवे---उद्यान जनपद

नवॉ पवे---सुहोते जनपद

दसवॉ पवबे--गांधार

ग्यारहवाँ पर्व---तच्चशिला

बारहवाँ पवे---पुरुषपुर

तेरहवॉ पवे-- नगार वा नगरहार

चादहवॉ पर्ब--हेकिंग की मृत्यु-लोई और पोना जनपद

पद्रहवाँ पवे--पीतू वा पंजाब ,

सेलहवों पर्व--मथुरा हि

प्रष्ठाक से ५॥४ २... है हट छव 6 ,+ रू) १० परत १३,, १४ १४ ,, १७ १७,, १८,, ४१ १४)... २० २० ,, २१ २१ ,, देह २४ ७० "५८5 रुपए ,,. २४ रेड ,, ३०५

सत्रहवों पर्व--संकाश्य

अठारदवाोँ पर्ब--कान्यकुब्ज

उन्नोसवॉ पवे--शाखे वा शांचे

वीसवॉ पवब--श्रावस्ती

इक्कीसवॉ पर्व---कश्यप, ककुच्छद और

कनकमुनि के जन्मस्थान

चाईसवॉ पर्व--कपितल्वस्तु

तेइंसवॉ पवे---रामराज्य ओर रामस्तूप चैबीसवाॉ पर्व--परिनिर्वाण स्थान पचीसवाँ पर्--वैशाली

छब्बीसवों पर्व---आनद का परिनिर्वाण स्थान सत्ताइंसवॉ पर्व--पादलिपुतन्र अट्टाईसवॉ पर्व---राजगृह

उनतीसवा पब--ग्रघ्रकूट पर्वत

तीसवॉ पवे---शतपर्णी गुफा

इकतीसवों पर्वे---गया

बत्तीसवाँ पव--राजा अशोक

तेतीसवॉ पवै--क्ुक्कटपाद

चैौतीसवों पव--वाराणसी

पेंतीसवाँ पर्व---दक्षिण

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न्पेः

छत्तीसवों पर्व--पाटलिपुत्र मे खेज और विद्याम्यास ७€ ,,

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सैंतीसवॉ पर्व--चपा और ताम्रलिप्ति

है.)

अड़तीसवाँ पवे--सिंहल पर से उनतालीसवॉ पर्व--एक अहेत का भस्मांत-संस्कार ८प ,, रे चालीसवों पर्व--यात्रा का अत ,, ४७ उपसहार हे अंड

परिशिष्ट हि १०१ , १२३

& (किजन न. पन्क हि प्ि रा टि

(28 ध्ट 5

३०

उपक्रम

ईसा के जन्म से कई शताव्दी पहले ही से चीन देश से भारत के धर्म नीति सभ्यता आदि की ख्याति फैल गई थी | यह ख्याति संभवतः पारसी था यूनानी किसके द्वारा पहुँची इसका ठीक पता अब तक नहों चला है। सू-मा-वेइन नामक लेखक ने सब से पहले ईसा के जन्म से एक शताच्ठी पूर्व अपने इतिद्दास में भारतवप के बृत्तांतों का उल्लेख किया है। उस समय चौन देश में बौद्ध धर्म का अधिक प्रचार नहीं था। इसमें संदेह नहीं कि सम्राट अशोक ने वीद्ध घमम के शिक्षकों को सध्य एशिया में धर्मप्रचाराथे भेजा था और वे ल्ञोग प्रचार करने मे बहुत कुछ सफलमनोरघ भी हुए थे

बौद्ध घ्म की उदार नीति की चर्चा चीन देश में दिनों दिन फैलती गई और इसा के जन्म से ६७ वर्ष पीछे चीन के सम्राट मिंगटो ने भारतवर्ष से वीद्ध शिक्षकों को बुलाने के लिये अपने दूत भेजे | दृत कश्यप-मातंग और घममरक्षक नामक दे आचार्य्यी

चीनी अंथों में लिखा हे कि सम्राट मिंगटो ने ६१ सन्‌ में स्वप्न देखा कि एक तप्त-कांचन-वर्ण पुरुष श्राकाश में उसके प्रासाद के ऊपर मेंडरा रहा है। मंत्रियों से इस स्वप्त का फल पूछा ते सब ने कहा कि पश्चिम में गातम नामक एक देवता है, वही आपके दर्शन देने आया था सम्राद ने एक पंडित और कई राजकर्मचारियो का उसके चित्र ओर उपदेश-

रन

को उद्यान से अपने साथ चीन देश ले गए इन्होने बौद्ध घममे के अनेक ग्रंथों का अनुवाद चीनी भाषा मे कर वहाँ बौद्ध घर्म का प्रचार किया | बौद्ध धर्म के प्रचार से भारतवर्ष के साथ चीन देश का गुरु-शिष्य-संबंध सुदृढ़ देता गया। बौद्ध धर्म के प्रचार के साथ साथ चीन मे इस धर्म के अ्रनेक भक्तो ने प्रत्नज्या अहण की और 'चीन देश मे मिक्षुसघ का संगठन दो गया | तब से अनेक मिन्षु भारतवर्ष की ओर घधर्मयात्रा के लिये श्राते रहे, पर पंजाब से आगे कोई नही बढ़ा और किसी ने श्रपनी घमेयात्रा का विवरण ही लिख छोड़ा जिससे उसकी यात्रा का कुछ पता चक्तन सके

ऐसे यात्रियो मे जिन्होंने भारतवर्ष के भिन्न भिन्न नगरों और देशों मे भ्रमण किया और जो अपना यात्राविवरण लिखकर छोड़ गए हों फाहियान सब से पहला चीनी यात्री है। फाहियान का जन्म कब हुआ और कितनी अवस्था मे उसने यात्रारभ किया इसका ठीक पता नहीं चल्तता कोई ते उसे पूर्वीय सीन-वंशी और कोई लुइ-बश के सुग घराने का बतल्ाता है, पर यह निश्चित है कि उसका जन्म उयंग में हुआ था। उर्यंग “पिगयांग”

अंधो के लिये भेजा वे छोग भारत की ओर से कश्यप-मातग और घर्म- रक्षक के लेकर चीन गए वहाँ इन दोनों ने बौद्ध घम का अचार किया। सब से पहले एक चौवंशी राजकुमार ने बोद्ध धर्म स्वीकार किया। मिंग ने उसके लिये एक सघाराम वनवा दिया और अनेक चित्र वहाँ स्थापित कर दिए यह संघाराम “'मार्टेग चौकछान? कहलाता है।

मम. काममा.

प्रदेश में है और अब तक 'शान-सी? के अंतर्गत है। उसका पहला नाम कुंग था। उसके जन्म के यूवे उसके माता पिता की संतान जीती थी तीन लड़के आठ दस वर्ष फी अवस्था मे दूध के दाँत टूटने के पहले ही मर चुके थे। उसके पिता ने 'कुंगः का जन्मते ही भिन्लुसंघ का, जीने के लिये, चढ़ा दिया था| सामनेर” बनाकर वह प्रेमवश उसे घर ही पर रखता था दैवयोग से 'कुंग! कठिन रोगग्रस्त हो गया पिता ने धवड़ाकर उसे विद्ार में कर दिया वहां कुंग” अ्रच्छा हो गया श्रार जब पिता उसे घर लाने के लिये गया ते। 'कुंग' घर आया और विद्दार ही में रहने लगा

कुंग' की अवस्था दस वर्ष की थी जब उसके पिता का देहांत है गया श्रव उसकी विधवा माता रह गई। कुंग का चचा द्ोड़कर उसके पास विहार से गया ओर उसने बहुत चाद्दा कि वह विहार से घर आकर रहे और अपनी दुखिया माता का अवलंब बने, पर 'कंग”ः घर आया कुंग? ने स्पष्ट कह दिया कि मैं अपने पिता की इच्छा से घर त्यागकर यहां नहीं आया हूं, बरन्‌ मैं खय्य ग्रहस्थों के संसर्ग से अलग रहना चाहता हूं। यही कारण है कि में यहां आया , मुझे मिन्नु बनना रुचता है बेचारे चचा का विवश हे! उसकी बात माननी पड़ा और विशेष आग्रह कर वह अपने घर लौट गया थोड़े दिनों बाद उसकी साता भी सर गईं। यह समाचार सुन्र 'कुंग” अपने घर आया और उसे समाधि दे फिर विद्वार को लौट गया

एक ससय की बात है कि 'कुग” २० सामनेरों के साथ विहार के खेत$ मे धान काटता था | इसी बीच कुछ मर-सुक्खे चेर खेत मे पहुँचे ओर बलपूर्वंक काटे हुए घान को उठा ते चले उन्हे देख सब सामनेर भाग निकले पर कुंग खेत मे डटा रहा | वह कहने लगा “ते जाना ही चाहते हो ते जितना हो सके उठा ले जाओ पर भाई पहले जन्म मे दान देने का ते यह फल है कि तुम इस जन्म मे दरिद्र हुए अब इस जन्स में तुम दूसरों की चोरी करते फिरते हो, भावी जन्म से इससे क्या दुःख पाओगे, मुझे ते यद्दी सोचकर दुःख होता है।” यह कह कुंग खेत छोड अपने साथियों के साथ विहार मे चला आया उसकी बातों का चोरों पर इतना प्रभाव पड़ा कि खेत से सब के सब लौट गए पऔर उन्होने धान को हाथ से भी छूझा कुंग” के साहस को सुन विहार के सब मभिन्षु उसकी प्रशंसा करने लगे |

सामनेर” अवस्था समाप्त कर कुग ने 'प्रत्रज्याः अहण की उस समय उसका नाम फाहियान पड़ा चीनी भाषा से 'फा? का अथे “धर्म “विधि? और 'हियान? का अथे “श्राचाय” 'रक्षकः है| श्रत: फाहियान का अथे हमारी भाषा मे “धर्मगुरु? दोता है। धामिक शिक्षा ग्रहण कर जब फाहियान पिटक ग्रथो का

जैसे भारतवर्ष मे निहंगम साधुओं के मठ की जागीरें है, और वे कृपिकम करते है, वेसे ही चीन देश मे भी विहारो और सघारासों मे जागीरें लगी हुई है बिहार की ओर से खेती वारी होती है |

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श्रभ्यास करने छगा ते। उसे जान पड़ा कि जे अंश इस देश मे है वह अधूरा और क्रमश्रष्ट है। उसे विनय-पिटक की, जिसका विशेष संबंध श्रमणों के संघ से है, यह झ्वस्था देख वहुत ठुःख हुआ | उसने अपने मन मे दृढ़ संकल्प किया कि जिस प्रकार हो। सके विनय-पिटक की पूरी प्रति भारतवर्ष से ल्ञाकर मैं उसका प्रचार इस देश के भिन्षुसंघ से करूंगा वह इसी चिंता मे था कि हिकिंग? 'तावचिंग?, 'हेयिंग”, और “हेवीई” नामक चार और मिन्षुओं से उसकी सेंट हुईं। उस समय फाहियान “चागगान! के विहार से रहता था पॉँचें भिन्षुओरं ने सिलकर यह निश्चय किया कि हम लोग साथ साथ भारतवर्ष की ओर तीथेयात्रा को चले और तीथों मे भ्रमण करते हुए वहां के मिक्षुओ से त्रिपिटक के ग्रथों की प्रतियां प्राप्त करे। यह सम्मति कर सन्‌ ४०० में सब के सव “चांगगान? से भारतवर्ष की यात्रा के लिये चले। “ांगगान! से लुंग! प्रदेश होकर वे 'कीनकीई” प्रदेश में आए यहां उन्होंने वर्षावास! किया। आरतवपप, वर्मा, स्थाम आर लका के बौद्ध मिक्तु वर्षा ऋतु मे एक ही स्थान पर रहते हैं चीन देश में वर्षावास पाँचवें वा छठे महीने की कृष्ण प्रति- पदा से प्रारंभ दोता है। वहां अमांत सास का व्यवहार होता है। वष का आरंभ फाल्गुन शुक्ल प्रतिपदा से होता है। वर्षा- काल तीन मास का होता है। जे! लोग वर्षावास पंचम मास की कृष्ण प्रतिपदा से करते हैं उनके वर्षावास की समाप्ति श्रष्टम मास की पूर्णिमा के दिन होती है और जिनके वर्षावास का आरंभ

(न

पष्ठ सास की कृष्ण प्रतिपदा से होता है उसकी समाप्ति वे नवम भास की पूर्णिमा को करते हैं वर्षावास की विधि और कत्तेव्य का विवरण आईसिग के प्रथम अध्याय मे दिया है

'कीनकोई? से यात्री लोग साथ साथ ियंग” होते हुए “यांगलो? पर्वत पार कर “चांगयी'? पहुँचे। “चांगयी” चीन की प्रसिद्ध दीवार के पास लांगचावा के कुछ उत्तर-पश्चिम की ओर है उस समय यह नाका था। चीन देश का माल यही से होकर बाहर जाता था और पश्चिम का माल इसीसे होकर भीतर आता था उस समय वहां अशांति फैली हुई थी देश से देकर जाना कठिन था निदान यात्रियों को वहां कुछ काल के लिये ठहर जाना पड़ा। “चांगयी:ः” के अधिपति ने यात्रियों की बड़ी आवभगत की। यही पर उन्हे “चेयेन?, 'हेकीन?, पावयुनः, सांगशाओ्रे? और “सांगकिंग” नामक पाँच और यात्री मिले ये छोग भी भारतवर्ष की ओर तीथेयात्रा के लिये जा रहे थे। वे भी रोक लिए गए। सब के सब वहां लगभग वर्ष भर ठहरे रहे और विप्लव के कारण भ्रागे बढ़ सके यहीं पर सब को वर्षावास पड़ा झौर मिल जुलकर यहीं सबो ने वर्षा बिताई जब देश से शांति स्थापित हो! गई ते वहां से वे साथ साथ “ठुनहांग” नगर मे गए “ठुनहाग” नगर चीनी दीवार के बाहर पश्चिम दिशा मे पढ़ता है। यहां कुछ दिन ठद्दर कर पावयुन” आदि को वही छोड़ फाहियान आदि जो पहले वहां पहुँचे थे गोबी मरुखथल मे चल पड़े। वहां के हाकिम वा शासक ने बड़ी ऋपा

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कर उनकी यात्रा के लिये आदश्यक प्रबंध कर दिया गोबी मरुस्थल मे सत्रह दिन चत्चकर बड़ी कठिनाई से इन्होने उसे पार किया वे लगभग १५०० ली चल्ले होगे। फिर यात्री शेनशेन ? जनपद मे पहुँचे

शेनशेन जनपद कहां था इसका ठीक पता अ्रब तक नहों चत्ा है। 'फाहियान! ने इस देश फे विषय मे केवल इतना ही लिखा है कि “यह पहाड़ी प्रदेश है भूमि यहां की पथरीली और वनजर है। साधारण अधिवासी मोटे वस्थध पहनते हैं राजा का धर्म हमारा ही है|” युरोपीय विद्वानों का मत है कि इस देश की राजधानी लोब वा लोपनार फ्रील के किनारे थी। फाहियान आदि यहां एक मास के लगभग रहे, और १५ दिन उत्तर पश्चिम चलकर ऊए देश मे पहुँचे ऊए से उस समय चार हजार से अधिक हीनयान के भित्षु रहते थे। उनके आचार- विचार कठिन थे वहां कई विहार भी थे ऊए का स्थान शव तक निश्चित नहीं हुआ है वाटर साहेब का सत है कि “हम इसे 'खिरशरः के पास माने अथवा 'खरशर” और 'क्ुश्वा? के भध्य सानें तो अयुक्त नदी होगा” पर फाहियान ने उता- लीसवे पर्व मे 'खरशरः के लिये जो संकेताक्षर प्रयुक्त किए हैं वे ऊए? से बिल्कुल ही नहीं मिलते अतः ऊए को 'खरशरः सानना ते किसी दशा मे ठीक नहीं प्रतीत होता है। यह संभव है कि 'शेनशेनः और 'ऊण्ण दोनों जनपद अब गोवी की मरु- भूमि से बालू के नीचे दब गए हों। इन्ही जनपदें के नगरों

और विहारों के कुछ खंडहरों का पता रूसी और अन्य युरो- पीय यात्रियों को मरुभूसि में मिला है जहां की खुदाई से खरोष्टी प्रौर त्राह्मी भ्रादि लिपियों मे लिखी हुई अनेक प्राचीन पुस्तकों की प्रतियां उपलब्ध हुई हैं पर जब फाहियान ने यह लिखा है कि हम ऊए से दक्षिण-पश्चिम चल्ककर खुतन मे आए ते ऊए खुतन से उत्तर-पूज रहा द्वोगा ऊणवालों के अशिष्टाचार के विषय मे फाहियान ने लिखा है कि “ऊए के पश्रधिवासियों ने सुजनता और उदारता त्यागकर विदेशियो के साथ चुद्रता का व्यवद्दार किया ।?” इसे जब 'सुगयुनः और “हुईसांग”ः के तुर्किस्तान के वर्णेन से जिसे उन्होने इन शब्दों मे किया है कि “इस देश के अधिवासिया के आचार-व्यवहार भ्रसभ्योचित हैं? मिलाया जाय ते यह कहना पड़ता है कि 'ऊए? कही तुकिस्तान के किनारे ते नहीं था

फाहियान आदि 'ऊए! के 'उद्देशिक” कुंगसन के यहाँ ठहरे | उसने उनका बड़ा सत्कार किया। वहां वे दो ढाई महीना रहे 'पावयुन” भ्रादि जिनका साथ तुनहांग नगर से छूट गया था यहां गए, पर इस देश के अधिवासियों के अशिष्टाचार और कुव्यचहार से दुखी दो “चेयेनः 'हेकीनः और 'हेबीइ” ते “'कावचांग” लौट गए और शेष फाहियान शभ्रादि 'कुगसन” की कृपा से दक्षिण-पश्चिम की ओर चले आगे के देश उन्हें निर्जन मिले और राह मे झनेक नदियों को उतरना पड़ा, भाँति भाँति के कष्ट उठाने पड़े। फाहियान ने लिखा है कि “ऐसे दुःख किसी ने

॥-

(कसी ) उठाए द्वोंगे।” सब कठिनाइयों को भत्ते भ्लेलते भू महीने से चलकर सब यात्री खुतन मे पहुँच गए |

ख़ुतन? नगर 'खुतन” नामक नदी के किनारे है वहां बौद्ध घर्म का उस समय अ्रच्छा प्रचार था अनेक विद्दार और संघाराम भी थे, अधिवासी बड़े धर्मभीरु थे, घर घर स्तूप थे, श्रमणों का बड़ा आदर था फाहियान आदि वहां गोमती” नामक एक प्रसिद्ध विहार मे ठहरे हकिंग” 'तावचिंग? 'हिता” ते वहां से फाहियान आदि का साथ छोड़ कीचा ( कैकय ) देश की ओर चले गए फाहियान आदि वहां भगवान की रथयात्रा देखने के लिये तीन महीने तक ठहर गए रथयात्रा चतुथे मास की पहली तिथि से प्रारभ हुई और चोदहवी को समाप्त हुई # रथयात्रा देख कर 'सांगशाओ? ते। एक तातार

संभवत फाहियान ने इस वर्ष अपना वर्षावास छुठे महीने से प्रारंस किया धा चौथे सास का शुरू पक्त ते रथयात्रा में ही विगत हा। गया था | यदि वह पंचम मास की कृष्ण अ्रतिपढा से वर्षावास आरंभ करता ते केचल एक ही सास रह गया था | इस बीच से फाहियान आदि को खुतन से जीह्दे पहुँचने में २९ दिन छगे | जीहो में १९ दिन तक खहरे | फिर दिन दक्षिण चलकर सुंगलिंग पर्वत मिल्ला और उसे पार कर यूब्हे जनपद को गए इसमें फाहियान के २६+१५-+४-४४ दिन लगे | अरब यदि वह पंचम सास के मध्य कृष्ण अतिपदा से वर्षा- चास आरभ करना चाहता ते उसे जीहे में वर्षावास पड़ता सो भी यदि वह ठीक चतुर्थ मास की कृष्ण प्रतिपदा के खुतन छे रवाना होता पर इसमें संदेह नहीं कि वहां चौथे मास के द्वितीय पक्ष के भी अधिक

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के साथ 'कुफेन! देश को, जिसे अ्रब काबुल कहते हैं, चला गया और फाहियान आदि २५ दिन चलकर “जीहो! मे आए। यात्रा मे यह नही लिखा है कि ख़ुतन से किस ओर चले, केवल इतना लिखा है कि फाहियान आदि जीहो की ओर चलले। मार्ग मे २५ दिन चलकर उस जनपद से पहुँचे इस जनपद का पता अ्रव तक हसारे युरोपीय विद्वानों को नहीं लगा है, कोई इसे 'यारकद” और कोई इसे 'माशकुर्गन” बताते हैं। यहां का पता जे कुछ यात्रा-विवरण से चल सकता है वह यह है कि फाहियान आदि यहां १५ दिन रहे, फिर जीड्टो से दक्षिण चार दिन चले और सुगलिग पर्वत पार कर 'युव्हे” जनपद से पहुँचे। “यूव्हे! का भी पता हमारे सुज्ञ विद्वानों को श्र तक नहीं चल्ना है। केवल वाटर साहब बहादुर ने इतनी अटकल लंगाई है कि यह वर्तमान 'अ्रकताश” होगा। सुंगलिग पर्वत के विषय से इतना भी नहीं लिखा गया है कि इसका कुछ पता चला है वा नहीं ! लेगी साहब ने इतना और कर दिखाया है कि सुंगलिंग शब्द का अनुवाद पर के आदि से 077ण० एर0प(क्षा5 मोटे भव्य अक्षरों मे छाप दिया है | अ्रब विचारना यह है कि ये दोनो जनपद 'जीहो? और धयूव्हे” कान हैं प्रौर कहाँ हैं ? क्या आज कल हम उनको निर्दिष्ट कर सकते हैं वा नहीं

दिन धीत गए थे और पचम मास का मध्य कार मार्ग से ही गत हो गया। निदान आपत्ति-धर्मं के अनुसार उसने अपना वर्षावास पष्ट मास के सध्य से यूच्हे में आरंभ किया

| छा &-

पहले हमको यह देखना चाहिए कि यात्रा-विवरण से इन दोनो जनपदो का किस स्थान में होना संभव है। खुधन से यात्री लोग किधर चले इसका थात्रा-विवरण से कुछ भी पता नही चलता | इतना अवश्य कहा जा सकता है कि जीद्ो और खुतन के बीच के मार्ग को यात्रियों ने २५ दिन चलकर पार किया। यद्यपि इसका कुछ उल्लेख नहीं पर इतना अनुमान किया जा सकता है कि मागे सुखकर था | यह अनुमान ठीक भी है अन्यथा कष्टतर होता वा मार्ग मे पर्वत और नदियां अधिक पड़ती ते इसका अवश्य कुछ उल्लेख होता 'जीहो? और “यूव्हेश जनपदो के मध्य सुगलिंग पर्वत पड़ता था और दोनों जनपदेों के मध्य केवल इतना श्रेतर था कि यात्री केवल चार दिनों मे जीहो से सुंगलिंग पार कर यूव्हे मे पहुँच गए। इतना दी नही, यह भी उसी के आधार पर निम्।ित रूप से अनुमान किया जा सकता है कि “यूव्हे जनपद” सुंगलिंग के दक्षिय ओर पर्वत के मूल मे पड़ता था यूव्हें पंत के दक्तिण और जीह्दो पर्वत्त के उत्तर मे था इतनी वात कोर भी ध्यान में रखने योग्य है कि फाहियान ने जनपदों का नाम जहां ठीक पता और नाम नहीं मालूस हो सका है प्राय: उन नदियों फे नाम पर ही लिखा है जो उन जनपदों में थीं। खुतन, कुफेन आदि इसके अनेक स्पष्ट उदा- हरण हैं | फिर यह कहना अथुक्त होगा कि “जीहोा” और यूव्हे अवश्य ऐसी नदियां थीं जो उन्न जनपढ़ों मे द्वोकर प्रवा- हित थी सुंगलिंग पर्वत का ठीक ठीक पता आज तक नहीं

लगा है और कोई पर्वत मध्य एशिया का इस नास से निर्दिष्ट होता है।इस पर्वत का जे अनुवाद लेगी साहब ने प्याज (07909 ) किया है वह भी ध्यान देने योग्य है पर्वत का नाम यात्रियो ने सुंगलिंग था प्याज अवश्य किसी कारणवश ही रखा है और अधिक संभव है कि उसकी आकृति और वर्ण पर हो ध्यान देकर उन्होंने ऐसा नाम रखा हे। | सुंगलिग पंत का उल्लेख इस पुस्तक में कई स्थान पर है उनके देखने से यह प्रतीत द्वोता है कि द्विमालय, हिदुकुश, कराकोरम और पामीर के लिये यह पद लाया गया है ये पर्वत हिमाच्छन्न रहते हैं और ऊपर से देखने से प्याज से देख पडते हैं। अब यदि मध्य एशिया के नक्कशे पर ध्यान देकर इस पद्देली फो विचारे कि चह्द कान दो नदियाँ हैं जिनके बीच की भूमि प्याज के आकार की सफेद उभड़ी हुईं हो अथवा जिनके मध्य कोई ऐसा पर्वत हो जो प्याज के समान उभडा हुआ अ्रधिक ऊँचा नीचा हो और दोनो नदियों के बीच अतर भी इतना कम दो कि यात्रो उसे पार कर रूट उत्तर से दक्षिण पहुँच जाय, तो यह भ्कट विचार में आता है कि वे दोनो नदियां दरिया” और 'आज्ञस” हैं और उनके बीच की वह प्याज सी उभड़ी हुईं भूमि पामीर& है जिसे

# यह पामीर हिमालय की पश्चिमी नेक है। इसीलिये छठे पर्व मे

हिमालय को भी सुंगलिंग ही लिखा है। हिमालय का प्रसार जरफसां तक

माना जाता था और वह ऊँची भूमि जो थियनशान और कराकारम के मध्य सीहून और जीहून के बीच मे है हिमालय का ही विस्तार थी। घुराणो में थियनशान को मेरु लिखा है। चीनी भाषा में थियन स्वर्ग को कहते है।

मा

यात्रियों ने अपनी यात्रा से छहिमालय का विस्तार समक कर सुंगलिंग लिखा है। इन दोनों नदियां के प्राचीन नामों पर ध्यान देने से इस पअनुमान की और भी पुष्टि हाती है। दरिया! का प्राचीन नाम सीहन”ः और “झाज्स? का नाम जीहून” है| इन दोनों के मध्य पामीर भी है और दोनों उत्तर और दक्तिण पड़ती भी हैं। अधिक संभव जान पडता है कि फाहियान ने 'सीदून! का जीद्दो? आर “जीहून? को “युव्दे! लिखा हा खुतन से सीहून नदी की ओर आने में माग भी उतना दुप्कर नहीं है और बीच में कोई बढ़ी नदी वा और पहाड़ हूँ उनके बीच का अंतर भी इतना ही है जिसे यात्रियों का १०, १२ दिन में चल्नकर ते करने में कोई विशेष अढचन नहीं पड़ सकती | अवश्य यात्री खुतन से पश्चिम ओर चले थे ओर संभवत, समरकंद के आस पास ही से दक्षिण की ओर घृमे थे | वहीं कही सीहन नदी के किनारे वह नगर था जहां १५ दिन रहकर चार दिन दक्षिण चलकर पामीर पार कर वे जीहून फे किनारे पहुँचे। सीहून प्रदेश को सुयेनच्चांग ने अपने यात्रा- विवरण के तीसरे अध्याय में शीहान लिखा है। श्रधिक संभव है कि चीनी भाषा में भी किसी ऐसे संकेत का प्रयोग द्वो जिसका उच्चारण शीद्वान वा उससे कुछ मिलता जुलतता द्वो। प्रदेशों का संकेत दे भिन्न भिन्न यात्रियों के विवरणों में प्रायः विभिन्न देखने में भ्राया है | उनका उच्चारण भी उन लोगों के श्रवण में जैसा आया लिख दिया है | हमारे युरापीय सज्ननों ने भी दिल्ली

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को 'डेलहीः और मथुरा को मुट्रए कर डाला है। फिर एक विदेशी के लिये जिसने खुतन को यूतान! लिखा सीहून को जीद्दा और जीहून को यूठ्द्दे करने मे क्या आमश्चय्ये | अत. यह बात सुनिश्चित जान पड़ती दै कि “जीहो? और “यूव्हे! सीहून और जीहून के आ्रासपास के प्रदेश थे श्र संंगलिंग पर्वत पासीर ही था |

यूब्द्दे मे यात्रियों को वर्षो पड़ी और वहीं उन्होने वर्पावास किया तीन रास वर्षो बिताकर वे कीचा गए | कीचा जाते हुए यात्रियो को पवेत पर द्वाकर जाना पड़ा इतना ते! उन लोगों के यात्रा-विवरण मे दै पर यह पता नहीं चल्ञता कि यूव्हे से किस दिशा मे वे गए, केवल इतना लिखा है कि “पहाड़ से २५ दिन चलकर 'कीचा जनपद? मे पहुँचे।?? कीचा का भो ठीक पता अब तक युरोप के विद्वानों को नही चला है काई इसे काश्मीर, कोई लदाख, फाई खस, कोई कुछ प्नुमान करता, कोई कुछ तीसरे पर्व के इस वाक्य से कि “्हेकिंग” 'तावचाग” और वहेता? पहले द्वी 'कीचा? जनपद की ओर चलते गए? यह निश्चय होता है कि फीचा का प्रदेश चीनियों को ज्ञात था। वहां का माग वे लोग जानते थे, इसी कारण “व्देकिग” आदि बिना किसी अगुआ के कट कीचा की ओर चलने गए | कीच मे बुद्धदेव का दाँत और उनकी एक पीकदान भी थी इसी के दर्शन के लिये यात्री आया करते थे कीचा के प्रदेश को फाहियान ने “पहाड़ी और ठढा” बतलाया है और लिखा है कि वहां गेहूं के अतिरिक्त

(-

और अन्न नही होते इससे भी प्रतीत होता है कि यह जनपद पर्दत के अंतर्गत था यात्रियों का कीचा तक आने मे २५ दिन लगे थे, अत. जीहे| से कीचा तक का अंतर २५० मील से लेकर ५०० मील तक दे! सकता है, से! भी पवेत से जहां चढ़ाव उतार हो फाहियान फे खुतन से जीही की ओर चले जाने से यह भी कहा जा सकता है कि वह कीचा द्वाकर आना नहीं चाहता था | उसने समझ्का था कि भारतवर्ष कही खुतन से पश्चिस द्वोगा, पर जब वह जीद्दो पहुँचा ते उसे मालूम हुआ होगा कि बह दक्षिण-पूर्व दिशा मे है। निदान उन्हे पामीर उतर कर यूठ्द्े वा जीहन के किनारे श्राना पड़ा प्यार वहा से पवेतों मे द्वोकर वे कीचा? पहुँचे जो उन्हे ज्ञात था

अब विचारणीय यह है कि कीचा कौन प्रदेश था कीचा से यात्री पश्चिम दिशा में चले और ३० दिन तक पर्वत मे चलकर पतेले:? में पहुँचे थे आर वहां भूले से निकल कर सिधु नद पार करते ही 'वृच॑ंग” वा उद्यान प्रदेश मे पहुँच गए थे। फिर उद्यान से दक्षिण ओर उत्तर कर, सुहदोते वा सुआत में आए थे। यद्यपि यात्रियों से यद्द नहीं लिखा है कि उद्यान से कितने दिलों में वे सुआत पहुँचे ते भी उद्यान का सुआत के उत्तर द्वो्ा पाया जाता है। आने में यात्रियों का अ्रवश्य कुछ फाल छगा द्वोगा उद्यान प्रदेश के पूर्व सिंधु नद पड़ता ही नहीं है। यदि सिधु नद माना ही जाय ते उद्यान पहुँचते पहुँचते यात्रियों का एक बार और सिधु नद, चाहे वह स्कर्दो? के पास हो या कही

१)

और, अवश्य ,पार करना पड़ता, पर इसका उल्लेख यात्रा- विवरण मे कही देखने मे नहीं आता। इस पर ध्यान देते हुए यह अनुमान किया जा सकता दै कि यात्रियों ने किसी प्रन्य नदी को पार किया जो उद्यान के पू्े मिल्ली जिसे या ते! अ्रमवश सिंधु नद लिख दिया है या उन चिहो का कुछ और प्रर्थ है। यह अनुमान ठीक भी जेंचता है वाल्मीकीय रामायण के

अयोध्या काड सर्ग ७१ से भरतजी को केकय से अ्रयोध्या आते निम्नलिखित जनपदादि उलज्जिदह्न तक पड़े थे--

प्राइमुखे राजगृहादमिलियांय वीर्यवान

ततः सुदामां द्युतिमान्सतीयविक्ष्य तां नदीम्‌

हादिनी दूरपारां प्रद्यकस्नोतसतरद्लियीस

शतद्ुमतरच्छीमान्नदीमिच्वाकुनन्दन:

ऐलधाने नदी तीत्वा प्राप्य चापरपवंतान

शिल्नामाऊुव॑ती तीरत्वा आम्नेयं शल्यकर्षणम्‌

सत्मसंघ: शुचिभृत्वा प्रेच्माण' शिल्ावद्याम्‌ !

अभ्यागत्स महाशैल्लान्वन चैत्ररथं प्रति

सरस्वती गंगां थुग्मेन प्रतिपय

उत्तरान्वीरमत्स्यानां भारुण्डं प्राविशृद्वनम्‌ |

वेगिनी कुलिगाख्यां हादिनीं पर्वेताइताम

यमुनां प्राप्य संतीर्णों व्लमाश्वासयत्तदा ||

राजपुत्रो महारण्यमनभीक्ष्योपसेवितम |

भढ़ो भद्रेण यानेन मारुत: खामिवाद्यगात्‌

नी

भागीरथी दुष्प्रतरां सो एशुधाने महानदीम्‌ |

उपायाद्वाघवस्तूण प्राग्बटे विश्रते पुरे

गंगां प्राग्वटे तीर्ा सस्रायात्कुटिकोष्टिकाम्‌

सबलस्तां तीर्तापथ समगाद्धमेवर्द्धनम

तेरणं दक्षिणार्धेन जम्बूप्रस्थ समागमत्‌

वरूथ॑ ययौ रम्यं आम दशरथात्मज.

तत्र रम्ये बने वास कृत्वासों प्राइमुखे ययौ।

उद्यानमुज्िद्यानाया! प्रियका यत्र पादपा.

यहा सरस्वती, गंगा, यमुना, भागीरथी और फिर गंगा से इन शत्तदु, गंगा, यमुना और सरस्वती के अतिरिक्त अन्य छोटी छोटी और तीच्णप्रवहा पहाडी नदियों से अभिप्राय है जो सिंधु नद में कराकोरम, हिहुकुशादि पर्वता से निकलेकर श्रा मिली हैं। यहां ऊए-निवासी सुगयुन और हुईसांग के यात्रा-विवरण से भी हस थोड़ा सा अंश उद्धृत करते हैं. जिससे पाठकाी को यह स्पष्ट हो। जायगा कि वाल्मीकिजी के विवरण का उससे कहाँ तक साम्य है। वे खुतन से सीधे उद्यान की आए थे। उनका कथन है कि “सन फोहाई के द्वित्तीय वर्ष के सातवे महीने की २-७ वीं तिथि का हम ल्लोग यारकिग राज्य मे पहुँचे। यहांवाले पर्वत पर रहते हैं। साग भाजी यहां खूब उत्पन्न द्वोती है। वही सब लोग खाते हैं, उसे पीस कर झआटा बनाकर रोटी पकाते हैं वे लोग हिंसा नहीं करते जे मछली खाते हैं थे मुर्दे पशुओं का मांस भी खाते हैं। इन लोगों की रीति नीति बोली वानी

१८-

सब ख़ुतन देशवाल्लों की सी है पर लिपि उनकी ब्ाह्मी है | यहां ये पाँच दिन मे पहुँचे

“आउठवे महीने के पहले सप्ताह मे वे कर्वंध देश मे आए और दिन पश्चिम ओर चल के 'सांगलिंगः पर्व॑त पर चढ़े। फिर पश्चिम श्रर भर दिन चल फे 'किउएउ? नगर मे पहुँचे वहां से तीन दिन चलकर 'पूद्ठोई! पर्वतमाला मे पहुँचे | यह स्थान बडा ठंढा है जाड़े गर्मी दोनों ऋतुओं मे वर्फ से ढका रहता है पवत पर एक हद है उसमे एक नाग रहता है पूर्व काल मे एक व्यापारी रात के समय इस हृद फे किनारे पहुँचा नाग उस समय क्ुपित था, इसलिये उसी समय उसने वनिये का मार डाला 'प्यंटो? राज्य का राजा यह समाचार सुन अपने पुत्र की राजसिंहासन पर वैठा ब्ाह्मणो से मंत्र की शिक्षा प्राप्त करने के लिये उद्यान जनपद से गया वहां चार वर्ष रहकर और मंत्र के प्रयोगों को सीखकर वह अपने राज्य से आया और नाग पर अपने मंत्र का प्रयोग करने लगा देखते देखते नाग मनुष्य का रूप धर के निकला और अपने पाप-कर्म पर पश्चात्ताप करता हुआ राजा के पास आया राजा ने उसे उस हद से निकाल कर सांगलिंग पर्वत पर भेज दिया। वर्तमान राजा उससे बारहवी पीढ़ी में है

“इस स्थान से पश्चिम ओर का भागे श्रत्यत ऊँचा नीचा

संभव हे कि मूल में “सुंगलिग” हे और अनुवादका ने सागाछिंग कर दिया हे मिलाओ पं फाहियान

+€--

है यह बहुत ही ऊभड़ खाभड़ और ऊँचे नीचे पवतों से परिपूर्श है। इसके सामने सांगसेन पर्वत के सार्ग कुछ नहीं हैं धीरे धीरे खसककर हम लोग सांगलिंग पर्बंतमाला पर चढ़े ओऔर चार दिन से पर्वत के शिखर पर पहुँचे। यहां से नीचे देखने से मालूम द्वोता था कि हम लोग श्राकाश में छ्टके हुए हैं। “हान पानरे? राज्य इस पर्वतमाला के शिखर तक है। यहां यह प्रवाद प्रचलित है कि यह स्थान खर्ग भौर प्रथ्वी के वीचोबीच

ठहरा है। यहां के लोग खेत सीचने के लिये नदी के जल को काम मे लाते हैं। यहां के लोगों से कद्दा जाय कि मध्य देश में लोगों के खेतों मे पानी वरसता है और उससे उनकी खेती पानी पाती है ते ये लोग हँसते हैं और कहते हैं “हुं: खर्ग मे भल्ा इतना पानी कहां है ९”

“इस देश की राजधानी के उत्तर-पू्व मे एक वेगवती नदी है। सांगलिंग पर्वबतमाला के ऊपर कोई वबृत्त वनस्पति नहीं उपजती है| इस महीने मे ठंढी वायु बहती है झौर उत्तर सहस््र मील तक घफ गिरती है

“वें मद्दीने के मध्य में हम लोग 'पोद्दो? प्रदेश में पहुँचे इस स्थान के भी पर्वत ऊँचे हैं और वहां जाने मे बड़ी कठिनाई पड़ती है। यहां के राजा ने एक नगर बसा रखा है जब वह प्त पर आता है ते इसी नगर मे रहता है। इस देश के लोग सुंदर कपड़े पहनते हैं. शप्रौर कभी कभी चमड़े का भी व्यवहार करते हैं | यहां बड़ा जाड़ा पड़ता है। इतनी कड़ी सर्दी पड़ती है

१॥

कि लोग पर्वत की कद्राओं से छिपे पड़े रहते हैं और ठढी हवा चल्तने के कारण मनुष्य वन्य पशुओं के साथ रहने पर बाध्य द्वोते हैं। इस देश फे दक्षिय हिमालय पर्वत पड़ता है इस प्॑त से साथ प्रात. मोती के मुकुट के सहश भाफ उठा करती है

/ दसवे महीने के पहल्ले पाख से हम लोग 'इंखा? प्रदेश मे पहुँचे इस देश के खेते मे पहाड़ो नदियों से पानी पहुँचता है। सारी धरती उपजाऊ है। घर धर के द्वार द्वार पर एक एक नदी बहती है। यहां कोई ऐसा नगर नहीं जिसके किनारे प्राचीर हो यहां शांतिरक्षा के निमित्त स्थायो सेना है। वह सदा एक स्थान से दूसरे स्थान पर चलती फिरती रहती दै। यहां के लोग ऊन के कपड़े पहनते हैं। जिन प्रदेशों मे नदिया हैं वही अन्न की अच्छी उपज द्वोती है। ग्रीष्म ऋतु मे अधिवासी लोग पर्वत के ऊपर चले जाते हैं और जाड़े मे वहां से उतर कर भ्पने अपने गाँवा मे चले आते हैं इनकी कोई लिपि नही है, सब असभ्य हैं। यह ता ताराओं की गति जानते हैं प्लौर इनके वर्ष मे मद्दीनों के दिन नियत हैं सब महीने वराबर हैं, बारह आागो में वर्ष विभक्त है। चारों ओर की सब जातियाँ इन्हे कर देती हैं। इस जनपद के दक्षिण 'तिलो?, उत्तर 'लिलो?, पू्े “खुतन”ः और पश्चिम 'पोसी? है। प्रायः चालीस जनपद के लोग इन्हे कर देते हैं। जब इन जनपदो से कोई राजा के पास सेट लेकर आता है तो ४० हाथ लबी चौड़ी जाज़िम बिछाई जाती

१-

है और ऊपर चॉदनी वा शामियाना टॉगा जाता है। राजा सोने के सिहासन पर राजकीय वस्थाभूषण धारण करके बैठता है सिंहासन चार शादूँलो पर स्थापित रहता है जब ऊए देश के राजदूत भ्राए तो राजा ने बार बार प्रणाम करके उनसे पत्र लिया सभा मे जाने पर एक मलुष्य नाम और उपाधि बताता है, फिर भ्रभ्यागत का आगे फरके लाता है। आ्रावश्यक कार्थ्य हो जाने पर सभा का विसजेन होता है यह केवल नियम ही का प्रतिपालन करते हैं। काई वाजा आदि नहीं है। 'ईखा” देश के राजा के अंतःपुर से स्त्रियां भी राजकीय वस्त्र पहनती हैं इनके परिच्छद गज गज भर भूमि में लोटते चलते हैं उन्हे उठाने के लिये श्रलग नौकर लोग होते हैं। स्लियां इसके अति- रिक्त फुट भर या इससे भी अधिक लंबी आठ सींगे मस्तक पर धारण करती हैं। ये तीन त्तीन फुट तक लंबी लाल मूंगे की बनी और अनेक रंगों मे रैगी होती हैं. यदह्दी उनका मुकुट है राजा फे अंतःपुर की स्त्रियां जब कही अ्रन्यत्र जाती हैं तो इन सब को धारण करके जाती हैं। घर मे वे सुबर्ण जटित पीढ़ो पर वैठती हैं पीठ द्वाथी के दाँत की द्वोती है और नीचे सिंह की चार मूतियों घनी रहती हैं। इसके अ्रतिरिक्त मंत्रियों की छवियों और राजा के अंत:पुर की स्तियों का आचार व्यवद्दार शेष बातों मे समान है। मंत्रियों की स्त्िय्या भी मुकुट पर सीग धारण करती हैं | इन सीगें से चँदवे के सदश भूच्बे लटका करते हैं धनी श्रौर दरिद्र दोनों के परिच्छद भिन्न भिन्न हैं। प्रसभ्य

जातियों मे यही जाति सब से अधिक सभ्य है। इन लोगो का जौद्ध धर्म पर बहुत कम विश्वास है। प्रायः अधिक लोग अन्य धर्म के माननेवाले हैं ये लोग जीवित प्राणी को मारके उसका मांस खा लेते हैं पास के देशों से अनेक पशु कर मे आते हैं, उन्हीका मांस ये खाते हैं। 'ईखा” से हम लोगों की राजधानी २० हजार मील पर है।

“यारहवें महीने के पहले सप्ताद्द में हम लोग पोसी” देश की सीमा के श्रदेश में पहुँचे १७ दिन चलकर एक पहाड़ी श्र दरिद्र जाति के देश मे आए। इसका आचार व्यवहार असभ्य था। यहां कोई राजा का सम्मान नहीं करता | राजा भी बाहर निकलने पर वा अतःपुर मे रहने पर अधिक परिचारकों को साथ नहीं रखता | इस देश मे एक नदी है। पहले ते यह इतनी गद्दरी नहीं है पर ज्यो ज्यों पर्वत मे नीचे घुसती गई है नदी की गति बदलती गई है और दे बड़े बड़े कुड पड़ गए हैं एक देत्य यहां रहता है और बड़ी हानि पहुँचाता है। ओऔष्म- काल मे ते देल्य पानी बरसाता है और जाड़े में तुषार गिराता है। इसके कारण यात्रियों को अनेक कठिनाइयां उठानी पड़ती हैं। यहां का तुषार इतना खच्छ और चमकीला है कि उसे देखने से दृष्टिशक्ति मारी जाती है। आँख मूँदे तो अंधे होने में कुछ देर नहीं लगती यात्री लोग दैल्य की पूजा यदि चढ़ा देते हैं तो उन्हे भ्राने जाने में कोई कठिनाई नही पड़ती

“बयारहवे मद्दीने के मध्य भाग मे 'सिमिः जनपद से पहुँचे

| १।८६-

यह प्रदेश 'सांगलिंग” पर्वतमाला की सीमा पर है। देश की भूमि ऊबड़ खाबड़ है। यहाँ के रइनेवाले अत्यत दरिद्र हैं। मार्ग ऊँचा नीचा बड़ा ही भयानक और दु खदायी है। घोड़ा सवारी लेकर इस सार्ग मे बड़ी कठिनाई से जा सकता है। 'पुकालाई? से उद्यान प्रदेश तक सेतु# बना है। सेतु लोहे की जंजीरो का है। पव॑त की धाटी को पार करने के समय इन्हों जंजीरों के सद्दारे पार होना पड़ता है। ये जंजीरे अधर में लगी हैं। नीचे देखने से घाटी की तरी दिखाई नहीं पढ़ती है जंजीर द्वाथ से छूटते द्वी यात्री ४०००० फुट नीचे गिर कर चकनाचूर दवा जाते हैं। यात्रो लोग इसी लिये पानी वा भड़ो के समय पव॑त की घाटी को पार करने की चेष्टा नहीं करते “बारहवे महीने से हम लोग उद्यान प्रदेश से पहुँचे इस देश के उत्तर सांगलिंग पर्वतमाला और दक्षिण मे भारतवर्ष है ।” भ्रव विचारने की बात यह दे कि फाहियान ने भी तूले जनपद से उद्यान फे वोच सिंघुनद के उतरने के समय सेतु का जैसा वर्णन किया है वह सुंगयुन पर हुईसांग के सेतु के उस वर्णन से ठीऊ ठीक मिलता है जो अभी ऊपर पुकालाई और उद्यान फे बीच वर्णन हो चुका है वास्तव मे वह नदी सिंधु नदी जान पड़ती यद्द वही नदी है जिसका वर्णन 'सुगयुन! और “हुईसांग” ने पोसे के संबंध मे किया है। यही नदी भागे

फाहियान ने जिस सेतु का उलछेख किया है वह या ते यही है अथवा कोई दूसरा होगा जे। इस नदी पर रहा होगा

१॥

चलकर गद्दरी हो गई और अंत मे खड़ बन गई, जिसके पार करने के लिये भूले बनाए गए थे ।! यदि सिंधु नद होता ते सुंगयुन और हुईसांग ने अवश्य उसका उल्लेख किया होता | अब फीचा से तूले प्रदेश तक वेही जनपद थे और उनमे वेही नदियां आई थीं जिनका वर्णन वाल्मीकीय रामायण मे भरत की यात्रा के साथ है वा सुंगयुन श्यौर हुईसांग ने ऊपर उद्धृत किए शब्दों मे किया है

कीचा जनपद के विषय मे यदि उसका 'खश?” का ही रूपां- तर माने तो 55:ए७70 ,०५। के “खरोष्ट देश और खरोष्टी लिपि?” मे निम्न-लिखित वाक्य विवेचनीय है [९ ]8078, 7ैं॥8-

20ए8 08898, ज. (एक्रणछ5९ ला9, क#ि०छटीन 07 ("०४० ( मैं एश०7७ को भी इसीसे स्फोट संबधवान कह सकता हूं ) ००7०४०००१४१९ ४0 छं।6 डिक्याशैटापं; एक्याक्षा8 08८७, 888, ि॥58, वे ऐड एाजगाहु' 78 ९048880 ए&फ़९९ा पक 0 जिन्नान्रवेबरह (9-0 , 8-0-0 छाती प8 7046 का0प्रगांधा। गि6 7908 वेश ०९ 07)-णठाक्ा३, घो।॥ 39 सितएबा08) क्ाते ग्रबा४ एी (एप पड प6 वैंधाते रा हऋप््बनक्षा, 000फ7फराल्त 80806 96फ्९एक जिया बाबा 0 6 क्‍0ए8- वैशवा।ड छावें क76 4707एश एफब एक? भावाथे यह है--कि खश को ही चीनी भाषा से फोचा श्रादि लिखा गया है। खश लिपि दरद और चीन फे मध्य रखी गई है। अतः खश जनपद वह स्थान है जो दरदिस्तान और चीन के सध्य से है

१॥--

इससे स्पष्ट है कि सिंघु नद के दक्षिण के प्रदेशों में ( उसके दक्तिण दिशा में फिरने तक ) जो कराकोरम और हिंदहुकुश के इस पार पड़ते थे, पश्चिम में दरद वा तूले आऔर पूर्व में कीचा का प्रदेश था। इनके अंतर्गत इधर उघर श्रनेक और प्रदेश पड़ते थे जिनका उल्लेख फाहियान ने नहीं किया है। उनका विशेष वर्णन सुगयुन श्रदि के यात्रा-विवरण में है अ्रतः युव्हे से फाहियान पूर्व की ओर कराकारस के किनारे से कीचा का गया और फिर क्षीचा से दरद